06 September 2010

Balijan (बलिजन) Cultural Movement

Recently I had written a post regarding Meveli and Onam. Now I got some additional information through further search.
Folk culture never dies. It forms basis for many religions, schools of thoughts, political thoughts etc. The myth of King Bali has survived with two images in two different cultures of Indian society. Both the cultures admit that he was a great king who is known for his humanism, justice, charity and egalitarian regime. His image is used by brahmins as well as non-brahmins, by shudras as well as non-shudras of course with opposite intentions. His name may not appear in the manifestos of political parties but the ground reality is that his present generations are divided in various castes and names. All political parties try to divide their votes for obvious benefit. So much so, their hutments are pulled down in order to rehabilitate them at a far off place where their vote becomes isolated and ineffective thus further reducing their political say.
I know nothing about the political ideology of Eklavya but he is curious about the present position of Balijan Cultural Movement. I learnt only from him that the manifesto of this movement was released in Osmania University in the year 2009. Recently (in the past two days) I have come to know that the movement is alive though moving slowly. It is active in New Delhi and other states. One periodical named ‘Balijan Samaj’ is being published from Indore. I hope to get a copy of it in near future.
The work of Mahatma Phule and Mr. Braj Ranjan Mani’s book form the basis of philosophy of this movement. We await other details and literature.

हाल ही में राजा बली और ओणम उत्सव पर आलेख दिया था. इसी सिलसिले में खोजबीन की तो कुछ और जानकारी मिली.
लोक संस्कृति कभी मरती नहीं है. लोक संस्कृति को आधार बना कर कई धर्म, विचार धाराएँ, राजनीतिक विचारधाराएँ आदि पनपती हैं. राजा बली का मिथ भारतीय समाज में दो संस्कृतियों में दो छवियों के साथ जीवित है. दोनों छवियों में राजा बली समानता, मानवधर्म, न्यायप्रियता, दानवीरता के कारण जाना जाता है.
उसकी छवि का प्रयोग ब्राह्मण भी करते हैं और अब्राह्मण भी, शूद्र भी करते हैं और अशूद्र भी. उसका नाम राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में भले ही न हो परंतु ज़मीन पर उसके वंशजों को विभिन्न जातियों और नामों में बाँट कर रखा गया है. सभी राजनीतिक पार्टियाँ उनके वोटों को आपस में बाँटने का प्रयास करती रहती हैं. यहाँ तक कि उनके घरों को गिरा दिया जाता है ताकि उन्हें कहीं और ऐसी जगह बसाया जा सके जहाँ उनके वोट अलग-थलग पड़ जाएँ, अप्रभावी हों जाएँ और उनकी राजनीतिक आवाज़ पहले से कम हो जाए.
मैं ठीक से नहीं जानता कि एकलव्य की विचार धारा क्या है परंतु उन्हें बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन की आज की स्थिति की जानकारी चाहिए. मुझे उन्हीं से पता चला कि बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन का घोषणा पत्र सन् 2009 में उस्मानिया विश्वविद्यालय से जारी किया गया था. पिछले दो दिनों में मेरी जानकारी में आया है कि यह आंदोलन चल रहा है चाहे धीमी गति से चल रहा है. यह नई दिल्ली और अन्य राज्यों में सक्रिय है. इंदौर से बलिजन समाज नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित हो रही है. शीघ्र ही उनसे एक प्रति मिलने की आशा है.
इस आंदोलन का दार्शनिक आधार महात्मा फुले और श्री ब्रज रंजन मणि की पुस्तक है. अन्य ब्यौरे और साहित्य की हमें प्रतीक्षा रहेगी.

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