12 October 2010

Balijan Cultural Movement बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन-2

मैंने शीर्षक में ही बलि को बली लिखा है. ऐसा मैंने जानबूझ कर किया है. विश्वस्त हूँ कि ऐसा करके ग़लती को ठीक कर रहा हूँ. क्योंकि बलि होना किसी का शौक या हॉबी नहीं हो सकती.

वर्ष जून 2010 में जम्मू में भगत महासभा द्वारा आयोजित कबीर के 612वें जयंती समारोह के अवसर पर जयपुर से पधारे श्री गोपाल डेनवाल (मेघवाल) ने अन्य साहित्य के साथ उक्त आंदोलन का घोषणापत्र मुझे दिया था. यह मेरे लिए एक नई चीज़ थी जिसे मैंने मेघ भगत पर प्रकाशित किया.

इस बीच इसकी जानकारी एकत्रित करने की कोशिश करता रहा. इस सिलसिले में दिल्ली के श्री दिनेश कुमार सांडिला से परिचय हुआ. फोन पर बात हुई. वे चंडीगढ़ पधारे. उनके साथ बातचीत में मेघ समुदाय के दो प्रतिष्ठित व्यक्ति भी शामिल हुए.

इस आंदोलन का घोषणापत्र अब हिंदी में प्राप्त हुआ है जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन. अभी तत्संबंधी साहित्य का अध्ययन कर रहा हूँ. संक्षेप में अभी इतना कहना पर्याप्त होगा कि इस आंदोलन का ईसाईयत की ओर झुकाव है. जातिवाद की शिकार अविकसित जातियों की उन्नति का जो मार्ग इसने चुना है उसमें अन्य पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियो/जनजातियों को सम्मिलित रूप से लक्ष्य बनाया गया है और उन्हें अपनी विचारधारा के साथ जोड़ने का इनका मिशन है. यह मिशन धर्मपरिवर्तन नहीं कराने का दावा करता है.

जहाँ तक इस आंदोलन के नामकरण का सवाल है यह ठीक प्रतीत होता है. इस समूह के अस्तित्व में आने से पहले भी कई इतिहासकार और लेखक इस बात से सहमत हो चुके हैं कि पौराणिक कथाएँ वास्तव में इनके लेखन के समसामयिक भारतीय समाज को एक साँचे में ढालने के लिए एक समूह के द्वारा ख़ास तरीके से लिखी गई हैं जिससे उस समूह का हित लंबे समय तक सधता रहे. यह सफलता पूर्वक किया गया. परंतु अब शिक्षा के साथ कई व्यक्ति और जातिसमूह उन पौराणिक कथाओं की मानसिक गुलामी से निकल चुके हैं. हालाँकि यह बहुत कठिन काम था. उस शिक्षा के आधार पर अस्तिव में आए कई दर्शन और धर्म-संप्रदाय आदि समाप्त हो गए या कमज़ोर पड़ गए. संतमत ने इस दिशा में बहुत कार्य किया. राधास्वामी मत इस दिशा में सक्रिय है जिस पर आक्रमण होते आ रहे हैं.

प्रह्लाद का पोता राजा बली या महाबली (केरल में मावेली के नाम से प्रसिद्ध) एक ऐसा पौराणिक चित्र है जिसकी चमक भारतीय समाज में समांतर चल रही दो सभ्यताओं सुर (आर्य- मध्य एशिया से आई जनजाति) और अनार्य (असुर- सिंधु घाटी सभ्यता का विकास करने वाली जाति और वहाँ के मूल निवासी ) दोनों में बराबर दृष्टिगाचर होती है. वह एक नेक, न्यायी, महाबली, सुशासन देने वाला राजा था जिससे सुर जलते थे और उसे धोखे से पाताल लोक (केरल या अमेरिका) में भेज दिया गया या मार डाला गया. लोग उसे आज तक भूले नहीं. वे उसके लौटने की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उसके राज्य में सभी सुखी थे. इसी मिथ के आधार पर बलीजन सामाजिक आंदोलन का नामकरण हुआ है. इस आंदोलन ने इसे ईसाई धर्म के न्यू टेस्टामेंट के साथ जोड़ा है. इसमें कुछ शब्दों की रूपसज्जा की गई है जो सुने हुए से प्रतीत होते हैं. यथा महादेव, यःशिवा आदि. अभी इसे थोड़ा ही पढ़ पाया हूँ.

श्री सांडिला जी कुछ और पुस्तकें भी दे गए हैं. जो कुछ मुझे प्रभावित करेगा उसे आपके साथ साझा करूँगा.

 

विशेष टिप्पणी: अंग्रेज़ों के शासन के दौरान ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ा था. वे जुड़े भी. उनमें से कई ईसाई बने. वहाँ खूब पैसा था. जब मिशनरियों ने अविकसित जातियों में अपने धर्मप्रचार के लिए उनके समूहों में शिक्षा की मुहिम चलाई तब उसे धर्मपरिवर्तन या विश्वासपरिवर्तन कह कर कई तरह से बदनाम किया गया और उन जातियों में भय पैदा करके उन्हें पढ़ाई से दूर रखने की हर कोशिश की गई. आज भी उस कोशिश का अंत हुआ प्रतीत नहीं होता जबकि यह स्थिति आज से करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व मुद्दा बन चुकी थीं. महात्मा फुले और डॉ. अंबेडकर का साहित्य इसकी गवाही देता है. लेकिन व्यापक रूप से शिक्षा से वंचित किए गए वर्गों तक इस साहित्य का संदेश पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच सका, यह विडंबना रही.

संपन्न जातियों के बहुत से लोग विदेशों में जा बसे हैं, ईसाई बन चुके हैं या बिना अपना नाम बदले ईसाईयत को अंगीकार कर चुके हैं. उनके विरुद्ध भारत में कोई दुष्प्रचार नहीं किया जाता. जबकि अविकसित जातियों के विकास की जब भी कोई योजना ईसाई मिशनरी बनाते हैं तब गंदा धार्मिक प्रचार करके या धार्मिक घृणा फैला कर उसे रोकने का प्रयास किया जाता है (मुझे धर्म और घृणा पर्यायवाची से लगने लगे हैं). उद्देश्य केवल एक कि इन जातियों तक अच्छी शिक्षा, रोज़गार और संपन्नता बड़े स्तर पर न पहुँचे. आज शिक्षा का मँहगा होना और भारत सरकार की निर्धन बच्चों की शिक्षा के प्रति उपेक्षा उसी की कड़ी है. (ग़रीबों को बढ़िया और अच्छी शिक्षा देने का प्रबंध कौन करेगा? इन जातियों को शिक्षित बनाने की कारगर आयोजना क्या सरकार का काम नहीं है? अगर नहीं है तो जो भी संस्था यह कार्य करे लोग उसे समर्थन क्यों न दें.)

ब्लॉग लेखक के तौर पर अपना उत्तरदायित्व पूरा करना चाहता हूँ. माता-पिता धार्मिक कार्यों पर न्यूनतम खर्च करें, सामाजिक कार्यों पर फिज़ूलखर्ची बिल्कुल न करें और पैसा बच्चों की शिक्षा पर लगाएँ. सरकारी शिक्षण संस्थाओं/स्कूलों में शिक्षा के नाम पर हो रहे मज़ाक और फैले हुए भ्रष्टाचार  को चुनाव का मुद्दा बनाएँ. युवक-युवतियाँ रोज़गार के लिए किसी भी धर्म या भगवान पर भरोसा न करें, रोज़गार पकड़ें. पैसा सब कुछ न सही परंतु काफ़ी कुछ है. प्रथम आजीविका.


इस आंदोलन के घोषणा-पत्र का अंग्रेज़ी पाठ इस लिंक पर देखा जा सकता है--> Balijan

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