17 December 2010

Megh Day Celebrated with Fan and Fare


Bhagat Mahasabha, Punjab Distt.Units Participated in “MEGH JAYANTI” function held at Megh Rishi Chowk, Abohar, Punjab on 16/12/2010 in which Prof. Raj Kumar addressed the gathering. Other members who addressed at the function were Rajesh Bhagat, Ludhiana; Sham Lal Bhagat, Ludhiana; Jatinder Jind, Jalandhar; Girdhari Lal Bhagat, Pathankot; Des Raj Bhagat,Ludhiana; Sanjeev Kumar Rinku, Jalandhar; Pritam Dass, Bhagat, Qadian, Gurdaspur.

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09 December 2010

Human Rights Day special - (Jotiba Phule) - मानवाधिकार दिवस पर विशेष- महात्मा जोतीबा फुले


Mahatma Jotiba Phule (Photo Wikipedia)
महात्मा जोतीबा फुले को सत्य शोधक समाज’ (Satya Shodhak Samaj) की स्थापना, महिलाओं के अधिकारों (Women Rights) के लिए संघर्ष और श्रमिक जागृति के लिए किए गए कार्य के लिए जाना जाता है. उनकी पुस्तक गुलामी’ (Slavery) की चर्चा मैंने सुनी थी परंतु इसे तभी देखा जब बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन (Balijan Cultural Movement) के बारे में जानकारी प्राप्त हुई. हाल ही में इसे पढ़ने का मौका मिला. इसे पढ़ कर अहसास हुआ कि मेरी जानकारी कितनी कम थी जब मैं मेघनेट और मेघ भगत पर आलेख लिख रहा था. उन आलेखों में कई ऐसे थे जो मुझे अपना आइडियालगे. परंतु उनमें से बहुत से आइडियामहात्मा फुले की सन् 1873 में लिखी पुस्तक में उपलब्ध थे. पुस्तक के कई पृष्ठ एक ही बैठक में पढ़ गया. इसमें राजा बली (Mahabali, Maveli), उसके पूर्वजों, उसके उत्तराधिकारियों, उसकी प्रजाओं और उनकी आज की स्थिति के बारे में एक साफ़ तस्वीर उभर कर आई. देश की बहुसंख्यक आबादी (majority of the people) के ग़रीब होने और उनकी दासता की बेड़ियों का ताना-बाना और ताना-पेरा समझ में आने लगा. आर्य (Aryans) आक्रमणकारियों ने इस देश के मूल निवासियों (aboriginals) को ग़ुलाम बनाने के लिए कैसे-कैसे हिंसक तरीके (violence) अपनाए इसका खुलासा मिला. साथ ही उन्होंने अपने हिंसक तरीकों को कैसे धर्म’ (Religion) में लपेटे रखा उसका भी पता चला. महात्मा फुले आगे चल कर डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर (Dr. Baba Sahab Ambedkar) के वृहत् कार्य का आधार बने.  इस बीच महेश्वरी समाज की वेबसाइट पर एक आलेख मिला जिसे प्रोफेसर वी.जे. नाइक (Prof. J.V. Naik, Renowned Scholar-Historian and Ex-Chairman, Indian History Congress) ने लिखा था- Mahatma Phule – India’s First Social Activist and Crusader for Social Justice.

इस आलेख को पढ़ कर भारत के मेघ समुदाय (Meghvansh) का ध्यान आया जो अभी तक इस प्रश्न के साथ जूझ रहा है कि वह कौन है, उसका इतिहास क्या है, उसकी जनसंख्या कितनी है, उनकी शिक्षा का स्तर क्या है, उसका धर्म क्या है आदि. उसे आज तक कुछ भी तो पता नहीं. महात्मा फुले को उक्त पुस्तक लिखे 138 वर्ष हो चुके हैं. शिक्षा से वंचित रखे इस समुदाय के 98 प्रतिशत लोगों (जिसमें SC,ST और OBC शामिल हैं) को महात्मा फुले का नाम पता नहीं होगा. ऐसे समाज को अपनी गुलामी का अहसास कराना कितना कठिन है. अब शिक्षा इतनी मँहगी कर दी गई है कि ये मेघवंशी समुदाय शताब्दियों तक इसके साथ कदम मिला कर नहीं चल सकते. नतीजा यही कि वे लंबी अवधि के लिए ग़ुलामी का जीवन जीते हुए सस्ता श्रम बन कर रह जाएँगे. इस कुचक्र का नाम है:-
'Costly education in India helps continuity of system of slavery in the form of cheap labor.' (भारत में मँहगी शिक्षा दासता की प्रथा को सस्ते श्रम के रूप में जारी रखने में सहायता करती है.) 
A link for information on Human Rights Day (10-12-2010)


All links retrieved on 09-12-2010
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04 December 2010

Struggle Against Social Evils - सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष

मृत्यु भोज (Death Feast) का किया विरोध

डबवाली (लहू की लौ) मेघवाल महासभा की एक बैठक रविवार को बाबा रामदेव मंदिर धर्मशाला में हुई. जिसकी अध्यक्षता हल्का मलोट के पूर्व एम.एल.ए. श्री नत्थू राम ने की.

बैठक को मेघवाल सभा श्रीगंगानगर के (सर्वश्री) अध्यक्ष अभय सिंह, पूर्व अध्यक्ष कांशी राम चौहान, मेघवाल महासभा हरियाणा के धन्ना दास ऋषि, लीलू राम मेघवाल सदस्य अखिल भारतीय मेघवाल महासभा, बुध राम जिला परिषद सदस्य, मास्टर किशन चन्द्र गंगा, आत्मा राम सुढा चौटाला, चानन सिंह ब्लाक अध्यक्ष औढ़ां, राजेन्द्र राठी ब्लाक अध्यक्ष डबवाली, इन्द्राज सिंह मेघवाल, बलकौर सिंह, राजा राम आदि ने संबोधित किया. वक्ताओं ने अपने संबोधन में मेघवाल समाज के सदस्यों को संगठित होने का आह्वान किया. समाज में फैली कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, नशा खोरी तथा मृत्यु भोज जैसी बुराई को खत्म करने की शपथ दिलाई.

मेघवाल (Meghwal) कौन हैं

श्री इन्द्राज सिंह मेघवाल ने मेघवालों के संदर्भ में बताया कि मेघवाल, मेघ ऋषि (Megh Rishi) के वंशज  हैं. जिन्होंने सर्वप्रथम कपड़ा तैयार किया. कुछ समय पूर्व इन्हें चमार (चमड़ा प्रयोग करने वाले) कहकर पुकारा जाता था. लेकिन मेघवालों का कार्य चमड़े का न होकर कपड़ा बनाना है. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी चमार को अपमानित शब्द की संज्ञा दी है. इस प्रकार अब उनके जाति प्रमाण-पत्रों में चमार की अपेक्षा मेघवाल शब्द का प्रयोग होने लगा है. मेघवाल अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं. पूरे भारत में इनकी संख्या तकरीबन 10 करोड़ है. जिनमें से करीब 15 लाख मेघवाल हरियाणा राज्य में रहते हैं.
साभार - लहू की लौ

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