19 December 2011

Train from Pakistan (Jassadan Wali Train)- ‘जस्सड़ां वाली गाड़ी’- अनकही कथा

(Revised)

1947 में भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए लोग एक रेलगाड़ी का नाम बहुत लेते हैं- जस्सड़ां वाली गड्डी. इस गाड़ी में सवार लगभग सभी लोगों को मार डाला गया था. इसकी प्रतिक्रिया में लाशों से भरी दो गाड़ियाँ भारत से पाकिस्तान भेजी गईं. इनमें से एक गाड़ी की पृष्ठभूमि में खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) का उपन्यास Train to Pakistan लिखा गया. जस्सड़ां वाली गाड़ी को Train from Pakistan कह सकते हैं. मैंने एक दिन यों ही अपनी सासु माँ से पूछा कि आपको जस्सड़ां वाली गाड़ी के बारे में कुछ जानकारी है तो बोली, हाँ, है. हम उसी में आए थे. इसके बाद जो कुछ उन्होंने बताया वह मैंने समेकित किया है. जब यह घटना घटी तब वे लगभग सोलह वर्ष की थीं.

मेरी सासु माँ का नाम ध्यान देवी है और वे स्यालकोट के मोहल्ला प्रकाशनगर, गाँव लुट्टर की रहने वाली हैं. पिता का नाम हाड़ी राम और माता का नाम वीरो देई था.

भारत विभाजन के समय जब यह परिवार स्यालकोट से चला तो पहले स्यालकोट छावनी में नौ दिन रुका. इस परिवार में ध्यान देवी के माता-पिता के अतिरिक्त देसराज (भाई), ज्ञान देवी (बहन), आज्ञावंती (भाभी), प्रकाश (भाई), महेश कुमार (भाई, आयु 3 वर्ष), एक नवजात बहन कांता (आयु 20 दिन) और दादी थीं. स्यालकोट छावनी से गाड़ी पकड़ी. गाड़ी ठसाठस भरी हुई थी. दरवाज़ों-खिड़कियों और छतों पर भी लोग लटके हुए थे. वहाँ के अच्छे इंसानों ने सभी यात्रियों को रास्ते के लिए संतरे दे कर विदा किया. ध्यान देवी ने भी दो-तीन संतरे खीसे में डाल लिए. जस्सड़ स्टेशन नारोवाल और डेरा बाबा नानक के बीच पड़ता था और डेरा बाबा नानक से पहले रावी नदी पर एक पुल था जिसे पैदल पार करना था. जस्सड़ में मुसलमानों का एक समूह आया और आऊटर सिग्नल पर गाड़ी रोक दी गई और उसे चलने नहीं दिया. ध्यान देवी बताती हैं कि यह समूह गाड़ी में सवार एक महिला शीलू (शीला) को भारत नहीं आने दे रहा था क्यों कि शादी से पूर्व उसका एक मुसलमान लड़के से प्रेम रह चुका था. शीलू के सिख पति और अन्य संबंधियों द्वारा ज़ोर ज़बरदस्ती का विरोध करना मारकाट की वजह बन गया. हत्याओं का दौर शुरू हुआ और लूटपाट भी मची. इंसानियत कोने में दुबकी रही. धर्म-मज़हब हमेशा की तरह अप्रभावी हो गए. पुल आने से पहले ही लोगों को मारने का सिलसिला शुरू कर दिया गया. मारने की एक रणनीति थी. युवाओं को काट कर मारा गया, बूढ़ों और बच्चों को दरिया में फेंका गया. युवतियों को हाँक कर ले जाया गया. एक-एक युवती और 15-15 हाँकने वाले. उनकी दिशा छीन ली गई. ध्यान देवी उन्हें और तब के वातावरण को याद करती हैं....भगदड़ ही भगदड़....
ये जो थोड़े से लोग बच गए ये जैसे-तैसे पुल पार कर गए. दादी पुल पार करके नहीं आई. शायद मार डाली गई. अपनाई गई रणनीति के अनुसार युवा भाई प्रकाश को काट कर दरिया में फेंका गया. तीन साल के भाई महेश को जीवित दरिया में फेंका गया. माँ वीरो पर गंडासे से हमला हुआ. वह मुँह और सिर पर चोट खा कर गिर गई. लेकिन वह समय पीछे मुड़ कर मदद करने का नहीं था. जो पीछे छूट गया उसके मरा होने या ज़िंदा होने की सुध लेने की सुध किसी को नहीं थी. केवल एक दिशा का पता था कि उधर जाना है.
पुल पार करके सुरक्षित जगह पहुँचे लोगों को अब इंतज़ार करने का कुछ समय मिला. वे पीछे देखने लगे कि शायद कोई बचा हुआ संबंधी पुल पर आता दिख जाए. जो ज़िंदा बच गए थे उन बेघरों को अपनी आने वाली समस्याएँ दिखने और सताने लगीं.

16 वर्षीय ध्यान देवी ने अपनी 20 दिन की बहन को उठाया हुआ था और बीच-बीच में उसे संतरे का रस दे कर चुप कराती रही. उसकी माँ के ज़िंदा होने का पता नहीं था. पिता की चिंता थी कि इतनी छोटी बच्ची को कहाँ लिए फिरेंगे. कौन पालेगा. नन्हें शिशु को ध्यान देवी से ले कर दरिया में फेंकने की तैयारी कई बार की गई. परंतु ध्यान देवी सब समझती थी. हर बार वह बहन को किसी बहाने वापस ले लेती और संतरे का रस देती रही. शाम होते-होते पुल से कुछ लोग आते दिखे. ध्यान देवी को अपनी माँ घायल अवस्था में आती दिखाई दी. फिर दरिया में फेंका गया छोटा भाई महेश भी आता दिखा. तीन वर्षीय महेश अपने गाँव की दो अन्य बच्चियों को अपनी छोटी-छोटी उँगलियाँ थमा कर साथ ला रहा था. घटना के तौर पर इतना काफी था. लेकिन नहीं.....

सासु माँ की कहानी तीन घंटे चली. शीलू कौन थी जिसका नितांत निजी जीवन हज़ारों लोगों के मारे जाने का बहाना बन गया. शीलू इनके घर से तीसरे घर में रहती थी. शीलू बहुत सुंदर थी. उसकी पहली माँ का नाम भागवंती और दूसरी माँ का नाम सुमित्रा था. पिता संतराम बढ़ई थे. शीलू एक मुसलमान लड़के से प्रेम करती थी. उसके माता-पिता किसी मुसलमान से उसकी शादी के खिलाफ थे. उसकी शादी एक सिख परिवार में कर दी गई. वह सारा सिख परिवार, शीलू सहित, जस्सड़ां वाली गाड़ी काँड में मारा गया. उस माहौल में भी शीलू के माता-पिता ने पाकिस्तान में रहना बेहतर समझा और आगे चल कर मुसलमान हो गए.


(श्रीमती ध्यान  देवी   का  निधन 03-12-2013  को हुआ.)


13 December 2011

O' smileys - ओ! स्माइलियो

मेरी प्यारी स्माइलियो, खुश रहो, आबाद रहो. मेरे आलेखों को नया आयाम देने के लिए आभार. मैं तुम्हें बना सका इसकी खुशी है. अभी तक किसी ने तुम्हें पहचाना नहीं :(     उम्मीद है तुम्हें पहचान मिलेगी  :))  
























10 November 2011

Micro-macro economics - defiant definitions - सूक्ष्म-स्थूल अर्थशास्त्र - धृष्ट परिभाषाएँ


भारत में कई अच्छे वित्तमंत्री हुए हैं जिनमें से कई अच्छे अर्थशास्त्री नहीं थे. इसका उलटा भी समझ लीजिए. कई शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों की किस्मत में विपक्ष में बैठना ही लिखा था.

प्रतिवर्ष वित्त बजट पेश होने के बाद विपक्ष का नेता कहता था कि इस बजट से मँहगाई बढ़ेगी. उसका ऐसा कहना कीमतें बढ़ाने की 'राष्ट्रीय अपील' का काम करता था. जनसंघ/भाजपा की छवि छोटे दुकानदारों की पार्टी की रही है. इसलिए तब वाजपेयी की राष्ट्रीय अपील के बाद अगली सुबह से कीमतें बढ़नी शुरू हो जाती थीं. आगे चल कर वित्तमंत्रीगण चालाक हो गए और स्वयं ही कहने लगे, विकास चाहिए, तो कीमतें बढ़ेंगी. स्थानीय नेता वोटर को कहने लगे, वित्तमंत्री ने कह दिया न? जो कन्ना है कल्ले. राष्ट्रीय अपील का कार्य विपक्ष से छिन गया. इसका अपहरण वित्तमंत्रियों ने कर लिया. कीमतें बढ़ाने की राष्ट्रीय अपील राष्ट्रीय बजट के साथ नत्थी की जाने लगी.

लगता नहीं कि हमारे प्रमुख अर्थशास्त्री विद्वानों ने सूक्ष्म अर्थशास्त्र (micro economics) का अध्ययन किया है. वे स्थूल अर्थशास्त्र (macro economics) के धनी हैं. 

अर्थशास्त्र के ज्ञान की अंतिम सीमाएँ लाँघ चुके एक विद्वान ने स्थूल अर्थशास्त्र और सूक्ष्म अर्थशास्त्र की परिभाषाएँ इस प्रकार दी हैं- स्थूल अर्थशास्त्र से तात्पर्य यह जानना है कि लाखों करोड़ रुपए के बजट में से कितने हज़ार करोड़ रुपए किस खाते में कहाँ रखने हैं, और यह जानना भी कि यहाँ रखा हुआ पैसा यहाँ से निकल कर किन-किन हाथों में जाएगा. कुल बजट के सौ में से दस पैसे लक्ष्य तक पहुँच जाएँ तो आयोजना को सफल माना जाता है. इति स्थूलमर्थशास्त्रं .

सूक्ष्म अर्थव्यस्था से अभिप्रायः है- 32 रुपए के आम आदमी का बजट-सह-रोज़नामचा बनाना. स्थूल अर्थशास्त्री के कार्यक्षेत्र में यह नहीं आता कि वह आम आदमी और उसके परिवार के रोज़-रोज़ के जन्म-मरण का हिसाब रखे."

भावार्थ यह कि आधा लिटर दूध शहर में 16 का है. शहर से बाहर बस्ती में 16.50 का हो जाता है (Transportation cost you know!). एक लिटर दूध लेने वाला शहरी ग़रीब (32 रुपए वाला) ग़रीबी रेखा के नीचे रहेगा और बस्ती का ग़रीब (33 रुपए वाला) अमीरी रेखा के ऊपर आ जाएगा.  जबकि मान्यता यह है कि शहर में आया हुआ ग़रीब, ग़रीब नहीं रह जाता.

(इन परिभाषाओं पर माया पैर पटक कर चिल्ला रही होगी, "हम ने कह दिया है कि ये मनुवादी परिभासाएँ हैं". इसी बात पर कोई मुस्काते हुए कह रहा होगा, बाबा रामदेव यादव के उद्योगतंत्र को मनुस्मृति की दंडसंहिता दिखा दी. दिग्गी!! तू कितना सही है रे.

योजना आयोग में कार्यरत एक अर्थशास्त्री ने बड़ी ईमानदारी से टीवी चैनल पर स्वीकार करते हुए कहा, मेरा कार्य देश की दीर्घावधि आर्थिक आयोजना तैयार करना है. ग़रीब आदमी का 32 रुपए का बजट कैसे बनाना है, मैं नहीं जानता. उसके इस साक्षात्कार से पहले सभी समाचार पत्र बजट-32 बना-बना कर मुखपृष्ठों पर आम-ओ-ख़ास के लिए छाप चुके थे. ज़ाहिर है स्थूल अर्थशास्त्री भारत के मीडिया को पढ़ना-देखना नहीं चाहते. (हा...हा...हा...भारतीय मीडिया! अनपढ़-गँवार कहीं का!!). अगले चुनाव में आम आदमी पूछेगा कि बजट-32 बनाने वाले को वित्तमंत्री क्यों नहीं बनाया जा सकता? (ऐसा नहीं हो सकता न प्यारे? मीडिया और तू इस सिंहासन पर नहीं बैठ सकते न!!).

मैंने जो यहाँ लिखा है उसे मेरे प्यारे पाठक संक्षेप में इस प्रकार समझ सकते हैं. एक बार कक्षा में मेरे सहपाठियों ने भारी तालियाँ बजाई थीं जब प्रोफेसर ने भारतीय रुपए की विशेषता पर प्रश्न पूछा और उसके उत्तर में मैंने कहा था, ग़रीब आदमी का एक रुपया, अमीर आदमी के एक रुपए के मुकाबले बहुत कम कीमत का होता है. प्रोफेसर ने पहले नासिका को मध्यमा से उठाया फिर सारी कक्षा को संबोधित करते हुए मुस्करा कर कहा था, "It is beautiful summary of what I have known about rupee." इस विषय की आंतरिक परीक्षाओं में मुझे जादुई 33% अंक मिले. मैं भाग्यशाली रहा.

04 November 2011

Aboriginal tribes of India भारत के आदिवासी (मूलनिवासी)

आदिवासी क्षेत्र के विकास और शिक्षण-पोषण की योजनाएँ भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा साधन हैं. योजनाएँ  लाने (मलाई खाने) में एनजीओ और सरकारी विभाग रुचि रखते हैं लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करने में उनकी कोई रुचि नहीं है. दुराग्रहपूर्ण दृष्टिकोण रखने वाले भारतीय मीडिया ने सभी आदिवासियों को नक्सली छवि में रंग दिया है जिसका टॉप नेतृत्व बेकसूर बना रहता है लेकिन साधारण कार्यकर्ता को पुलिस की बंदूकों के सामने खड़ा किया जाता है. इस व्यवस्था में इनका क्या भला हो सकता है! ज़मीनी सचाई यह है कि इन आदिवासियों (मूलनिवासियों) को देश के मानव संसाधनों में न गिनने की प्रवृत्ति हमारे यहाँ है.

भारत का तथाकथित पढ़ा-लिखा (एक) वर्ग इनके बारे में बहुत कुछ कहता है लेकिन उसमें वास्तविकता के प्रति संवेदनशीलता का अभाव है. पिछले दिनों एक साइट पर भारत की आदिवासी जातियों पर कुछ आलेख देखने को मिले जिनमें सुंदर शब्दों में बहुत कुछ कहा गया था. लेकिन इनकी परंपराएँ (घोटुल) दिखाने के नाम पर आदिवासी महिलाओं के ऐसे ब्लैक एंड व्हाइट चित्रों का प्रयोग किया गया जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं थे. लेखक की नीयत साफ़ झलक रही थी. भारत का ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति कपड़े पहनता है बशर्ते उसके पास हो. ज़ाहिर है विद्वान लेखक को भारत की छवि नहीं चाहिए थी बल्कि आलेख के लिए 'मसाला' चाहिए था.

उस साइट के लेखक ने इन आदिवासियों के पुराने, ब्लैक एंड व्हाइट, चित्रों का प्रयोग किया है. स्पष्टतः ये चित्र लेखक के नहीं थे. क्या भारत के ये मूलनिवासी लोग अपनी ग़रीबी की ऐसी फोटो खींचने की अनुमति आज देते हैं? नहीं. और क्यों दें? सामाजिक कार्यकर्ता जानते हैं कि 'बाहर' से यदि कोई आ जाए तो ये लोग पहले अपनी झोंपड़ियों में जाते हैं और जो भी बेहतर कपड़ा हो उसे पहन कर सामने आते हैं. काश लेखक ने इनकी समझदारी का सम्मान किया होता. इस बारे में मैंने उस साइट पर एक टिप्पणी लिखी थी जिसे हटा दिया गया. आपसे शेयर कर रहा हूँ कि जो मैंने लिखा था वह इसी पैरा में है. बाद में पता चला कि लेखक, जो स्वयं को आदिवासी मामलों का विशेषज्ञ बताता है, वास्तव में वहाँ लकड़ी का ठेकेदार है. यानि उन्हीं लोगों में से एक जिन्होंने आदिवासी क्षेत्रों को उजाड़ने के लिए कई हथकंडे अपनाए जिनमें ऐसे आलेख छपवाना भी शामिल था जो यहाँ के निवासियों को मानवता की सीमा से बाहर की चीज़ साबित कर सकें.  

उस साइट पर टिप्पणी करने वालों में ऐसे चेहरे भी दिखे जिन्होंने एक ब्लॉगर पर भद्दी टिप्पणियाँ की थीं. इसलिए उस साइट का लिंक नहीं दे रहा हूँ. यही बेहतर है.

इन क्षेत्रों की समस्या आप इन तीन वीडियोज़ में देख सकते हैं.
Between devil and deep sea-1
Between devil and deep sea-2
Between devil and deep sea-3

04 October 2011

Original Aarti- Om Jai Jagdish Hare – ओम जय जगदीश हरे- आरती का मूल रूप


श्रद्धाराम फिल्लौरी
(चित्र विकिपीडिया के साभार)
अगस्त, 2011 में दिल्ली में आयोजित एक हवन में शामिल होने का अवसर मिला. हवन के अंत में आरती गाई गई- ओम् जय जगदीश हरे. सब ने इसे बहुत भावपूर्वक गाया. मेरे लिए कई पंक्तियाँ नई थीं. कुछ बहुत नई नहीं थीं जैसे इसका अंतिम भाग- कहत शिवानंद स्वामी.... आरती के बाद पंडित से पूछा कि क्या इस आरती के लेखक का नाम जानते हो. उसने अनभिज्ञता प्रकट की.  

यह वर्ष 1971 की बात है जब मुझे डॉ. सरन दास भनोट से इस आरती के रचयिता की जानकारी मिली थी.

इस आरती को पंजाब के विद्वान साहित्यकार श्रद्धाराम फिल्लौरी ने सन् 1870 में लिखा था. उस समय के एक छोटे-से कस्बे फिल्लौर में जन्मे श्रद्धाराम की लिखी आरती आज पूरे भारत और विदेशों में गाई जाती है. ये हरफ़नमौला रमल भी खेलते थे. फिल्म 'पूरब और पश्चिम' ने इस आरती को सिनेमा का ग्लैमर दिया लेकिन इस आरती की पंक्तियाँ- ....तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा मूल आरती में नहीं है. जहाँ तक दृष्टि जाती है इस फिल्म के बाद इस आरती के स्वरूप को तेज़ी से बदलते देखा है. स्वामी शिवानंद जैसे अग्रणी वेदांती के साथ कब इस आरती को जोड़ दिया गया पता ही नहीं चला लेकिन यह अज्ञान से उपजा प्रक्षिप्त अंश है. 

ख़ैर ! कभी-कभी कोई भजन इतना लोकप्रिय हो जाता है कि विद्वानों की लापरवाही और जन-कीर्तन की बेपरवाही का शिकार हो जाता है. आप इसे जैसे पहले गाते रहे हैं उसे गाते रहिए. इस आरती का शुद्ध रूप केवल जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ.


आरती

ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का
सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति

दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे.
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा

01 October 2011

Dr. Dhian Singh - Known history of Megh Bhagats - मेघ भगतों का इतिहास


Emergence and Evolution of Kabir Panth in Punjab
पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास

Are you searching for history/known history of Megh Bhagats? 
Yes, this thesis of Dr Dhian Singh can
guide you through

An enthusiastic young man Mr. Dhian Singh from Kapurthala (Punjab), pioneered research on history of Megh Bhagat community in the backdrop of emergence and evolution of Kabir Panth in Punjab. This was very important from the point of view that his work helps in reconstruction of history of Dalit communities which has been destroyed and corrupted. Researcher Dr. Dhian Singh and director of this research work Dr. Seva Singh have, within the limitations, put in tireless efforts using research methodologies while pursuing intensive study, visits and interviews. Use of libraries for research work is a common thing. Dr. Dhian Singh undertook intensive touring of Jammu-Kashmir, Punjab, Haryana and Rajasthan at his own expense. His hard work together with diligence of his Director helped his thesis through for Ph.D degree in the year 2008.

For the past two years I had been requesting Dr. Singh to help  make his thesis on line for the benefit of others. Now on 08-02-2011 he gave me his thesis which was scanned and blogged. It is in the form of PDF file. To make it easy to read please press ‘ctrl’ and +.

I hope that, now, the desire of Meghs will be satiated with regard to their eternal questions as to who they are, who were their ancestors and what they used to do.

This thesis will help change the conventional thinking of Megh community which has been divided in so many names and religions that their social and political integration seems to be a distant dream. This thesis will help the community grow a sense of unity.

Finally big thanks to you Dr. Seva Singhji and Dr. Dhian Singhji. You have done a work of great importance. 
कपूरथला (पंजाब) के एक उत्साही युवक ध्यान सिंह ने पंजाब ने कबीर पंथ के उद्भव और विकास की पृष्ठभूमि में मेघ भगत समुदाय के इतिहास पर शोध करने का बीड़ा उठाया था. यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण इसलिए था कि जिन दलित समुदायों का इतिहास नष्ट-भ्रष्ट किया जा चुका हो उनका इतिहास कैसे लिखा जाए. शोध के लिए पुस्तकालयों का उपयोग करना एक सामान्य बात है. शोधछात्र के तौर पर ध्यान सिंह ने और उनके निर्देशक डॉ सेवा सिंहडी.लिट्. ने शोध सामग्री को देखते हुए विचार-विमर्ष के बाद मान्य पद्धतियों (methodologies) की सीमाओं में रहते हुए गहन अध्ययन के अतिरिक्त यात्रा और साक्षात्कार का सहारा लेने का निर्णय लिया. ध्यान सिंह जी ने इसके लिए जम्मू-कश्मीर, पंजाबहरियाणा और राजस्थान के दौरे किए. उनके परिश्रम और निर्देशक के मार्गदर्शन से कार्य बखूबी हुआ और शोधग्रंथ वर्ष 2008 में पी.एच.डी. की डिग्री के लिए स्वीकार कर लिया गया. यह अपनी तरह का पहला कार्य है.

मैं दो-एक वर्ष से डॉ ध्यान सिंह से आग्रह कर रहा था कि वे अपने शोधग्रंथ को अन्य के लाभ के लिए ऑन-लाइन करें. अब 08-02-2011 को उन्होंने यह शोधग्रंथ मुझे सौंपा और मैंने उसकी स्कैनिंग कराने के बाद उसे एक ब्लॉग का रूप दे दिया.

मुझे आशा है कि अब हमारे मेघ भाइयों की यह जिज्ञासा शांत हो जाएगी कि हम कौन हैंकहाँ से आए हैं और हमारे पुरखे क्या करते थे.

सब से बढ़ कर यह शोधग्रंथ मेघ भगत समुदाय की पारंपरिक सोच को बदलने में सहायक होगा जिसे इतने नामों और धर्मों में बाँट दिया गया है कि उनमें सामाजिक और राजनीतिक एकता दूर का सपना लगती है. इसे पढ़ने के बाद इस समुदाय में एकता की भावना बढ़ेगी.

अंत में डॉ ध्यान सिंह और डॉ सेवा सिंह जी को कोटिशः धन्यवाद. आपने बहुत महत् कार्य को संपन्न किया है. यह शोधग्रंथ सात पीडीएफ फाइलों के रूप में नीचे दिया गया है. इन पर क्लिक करें और पढ़ें. फाइल खोलने के बाद स्क्रीन पर बड़ा पढ़ने के लिए ctrl और + को दबाएँ. पीडीएफ फाइल पर भी ऊपर दाएँ हाथ (+) और (-) के चिह्न हैं उनका भी प्रयोग किया जा सकता है. यह पीडीएफ़ फाइल एक बार खोलने से न खुले तो दूसरी बार क्लिक कर के खोलें. 

पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास
Please click the links below
नीचे दिए लिंक्स पर क्लिक कीजिए 



Key words: History of Meghs, History of Megh Bhagats, History of Kabir Panthis, Punjabi Kabir Panthis, Megh Bhagat, Thesis, मेघ भगत, शोधग्रंथ,  

27 September 2011

Baba Faqir Chand and Inner Practices – बाबा फकीर चंद और आंतरिक साधन


Baba Faqir Chand
A question had been hanging on my mind whether Baba Faqir Chand, who spoke and wrote so much on inner practices, had really got fed up with all such yogic practices.

It is certain that all divine visions experienced during inner practices can continue till we exist in the body and till neural activity continues. What happens after death is a matter of imagination and entertainment. The fact is that nobody returned after ‘final death’ of heart and brain and did not reveal his experiences about it. Stories of rebirth are fabricated and shops keep humming with business.

I got a reference from Bhagat Munshi Ram’s book ‘Santmat (The opinion of Saints)’. He writes:-

The soul which realizes the third form of Guru gets liberated in due course. That is why he (Faqir) has written in his last discourses that ‘he was against inner practices. Whenever he sat for inner practices he surrendered to that form (Murti). He sought shelter in that. Intentional inner practices were nothing but a come back to the region of ego and he used to curse his mind and ask what good it was for.’ Param Dayal Ji used to explain it in these words:-
“I have pulled down the sand house”

It is clear indication that inner practices done intentionally do tire us and a desire to get rid of them takes us to yet another state though all such stages are different experiences within neural activity. It is like child making sand house, playing with it till getting fed up with it and then again constructing something new.

Bhagat Munshi Ram
यह बात मेरे मन पर अटकी थी कि साधन-अभ्यास का आंतरिक अवस्थाओं पर इतना बोलने-लिखने वाले बाबा फकीर चंद क्या इन साधनों से उकता नहीं होंगे.

यह तो तय है कि साधन के दौरान अलौकिक और दैवी दृष्य और विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव तभी तक होता है जब तक शरीर है या मस्तिष्क की न्यूरल गतिविधि चलती है. हृदय और मस्तिष्क की अंतिम मृत्यु के बाद क्या होता है यह केवल अनुमान और मनोरंजन का विषय है. हृदय और मस्तिष्क की अंतिम मृत्यु के बाद आज तक न कोई लौटा और न अपने तत्संबंधी अनुभव के बारे में किसी ने कुछ बताया. पुनर्जन्म की कहानियाँ गढ़ ली जाती हैं और दुकानदारियाँ चलती रहती हैं.

मुझे भगत मुंशीराम जी की पुस्तक संतमत से यह उद्धरण मिला है. वे लिखते हैं:-

जिस जीव पर उनकी परम दयालुता से तीसरी मूर्ति के दर्शन हो जाते हैं, उसके धीरे-धीरे सभी बंधन कट जाते हैं. इसलिए उन्होंने (फकीर ने) अपने आखिरी सत्संगों में लिखा है कि मैं अभ्यास के विरुद्ध हूँ. मैं जब कभी अपनी नीयत से अभ्यास करने बैठता हूँ तो अपने आप को उस मूर्ति के हवाले कर देता हूँ. शरणागत हो जाता हूँ. अपनी नीयत से अभ्यास करना अब अभिमान में आना समझता हूँ और मन को लानत देता हूँ कि ऐ मन तू क्या कर सकता है. इस बात को हुज़ूर परम दयाल जी महाराज इन शब्दों में ब्यान करते थे :-
मैंने अब सब ढेरियाँ ढा दीं.

इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि नीयत से साधन करना एक प्रकार की थकान देता है और उस थकान से अलग होने की इच्छा व्यक्ति को एक अन्य अवस्था में ले जाती है यद्यपि वे सभी अवस्थाएँ न्यूरल गतिविधि के ही अनुभव हैं.  यह लगभग वैसा ही है जैसे बच्चा रेत का घर बनाता है, खुश होता है और उकता कर उसे तोड़ता है. फिर कुछ नया बनाता है.

20 September 2011

Meghdhara - Media of Meghvansh - मेघवंश के समाचार-पत्र का प्रकाशन






11 सितंबर 2011 को मैं इंटरनेट खोल कर बैठा था कि जितनी जल्दी हो सके कच्छ, गुजरात से प्रकाशित होने वाले मेघ समाज के नए समाचार-पत्र मेघधारा के उद्घाटन कार्यक्रम को देख सकूँ. और मैं इसे देख पाया. हृदय प्रसन्नता से भर गया. इस प्रकाशन का आइडिया आने, इसके नाम सुझाने की प्रक्रिया और इसके रजिस्ट्रेशन तक के सारे विवरण श्री नवीन भोइया मुझे देते रहे हैं और इन पर लंबी चर्चा होती रही है. अब इस लघु समाचार-पत्र के विमोचन और तत्संबंधी कार्यक्रम के फोटो भी प्राप्त हो गए हैं. इस महत्वपूर्ण क्षण को MEGHnet पर सहेज रहा हूँ. मेघ समाज को बहुत बधाई. साथ ही एक सुझाव है कि इस समाचार पत्र को वे अपनी वेबसाइट पर भी प्रकाशित कर दिया करें. मेरी हार्दिक इच्छा है कि ऐसा एक समाचार-पत्र जम्मू से भी निकले और आपस में सूचनाओं का आदान प्रदान एक गति पकड़े. राजस्थान से पहले ही कई समाचार-पत्र छप रहे हैं यथा- 'हक़दार', 'दर्द की आवाज़', 'उदय मेघ' आदि. मध्यप्रदेश से 'राजा बली समाज' छपता है. ये सभी समाचार-पत्र समुदाय में सूचनाएँ और जानकारी साझा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसी सिलसिले में अब 'मेघधारा' का नाम भी जुड़ गया है.


MEGHnet


श्री नवीन भोइया द्वारा ईमेल से भेजा विशेष नोट :-


MEGHDHARA INAUGURATION PROGRAM HELD ON 11.09.2011 AT BHUJ-KUTCH.

Inauguration of first mouthpiece of Maheshwari Meghwar community’s mouthpiece ‘Meghdhara’ was held on 11.09.2011 at Bhuj-Kutch. Prominent people from all the 10 Talukas of Kutch District were present in the function. Meghdhara is the first community paper for uniting Meghwars of Kutch, Saurastra, Jamnagar districts of Gujarat.

Shri M. Thennarson, Collector, Kutch was the Chief Guest who inaugurated the magazine. Dr. L.V. Fafal, President of Akhil Kutch Maheshwari Vikas Seva Sangh (a registered Trust popularly also known as All India Maheshwari Youth Federation) welcomed the guests and apprised about need of intellectual unity in the community. Dr. Naresh Keniya invited the guests to take seats on dice. Mrs. Bhartiben Katuva and Mr. Mavjibhai Maheshwari, an award winner Gujarati literature writer and Hon. Editor of Meghdhara anchored the function. Mr. Khim Dhua and Mr. Navin K. Bhoiya arranged live telecast of the function on maheshpanthi website.

Pir-Shri Meghji Nangshi Lalan (religions head of Barmati Panth), Mr. Kanji Bharya, Mr. J P Maheshwari, Directors ICON Nirman Pvt. Ltd., Mr. Ramji Dheda, Businessman, Shri Thennarson, Collector-Kutch, Shri L.V. Fafal and Shri Ramesh Maheshwari (MLA of Kutch) remained present on the dice.

This function was one of the biggest functions in the community in which delegates from Districts like Jamnagar, Rajkot and Ahmedabad were also present along with delegates from Kutch District.

The program was initiated by singing National Anthem to show solidarity as citizen and indigenous inhabitant of India.




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इस समाचार-पत्र के विमोचन से संबंधित जानकारी नीचे दी गई है :-


मेघधारा का प्रकाशन - हार्दिक निमंत्रण - धर्माचार

आप सभी को यह तथ्य विदित है कि हमारा महेश्वरी मेघवाल समाज प्रतिदिन हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. समय के साथ ताल मिलाते हुए नई पीढ़ी संघर्ष करके नए परिणाम ला रही है. हमारे पास जनशक्ति है. ज़रूरत है एक मंच की, एक व्यवस्था की जो हमारे समाज के बंधुओं को एक-दूसरे के नज़दीक लाए और समाज में भावनात्मक एकता सुदृढ़ हो सके. इसी व्यवस्था को कायम करने वाला समाज का प्रतिबिंब एक समाचार-पत्र होता है.

ईमेल से मिला निमंत्रण-पत्र
श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ (मुन्द्रा) के तत्वाधान में महेश्वरी समाज के समाचार-पत्र मेघधारा का प्रकाशन शुरू किया जा रहा है. इसी समाचार पत्र मेघधारा के प्रथम अंक के विमोचन के ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बने और सपरिवार पधारने का भाव भरा निमंत्रण स्वीकार करें.

कार्यक्रम का उद्घाटन : पीर श्री मेघजी नांगशी लालण, (अखिल महेश्वरी मेघवाल समाज के धार्मिक प्रमुख)

विमोचन कर्ता : श्री एम. थेन्नारेसन IAS, माननीय कलेक्टर, कच्छ

मुख्य अतिथि : श्री वी. एम. पारघी, IPS, IGP बोर्डर रेन्ज कच्छ

श्री जी. एल. भगत, IRS, कमिश्नर ऑफ इन्कम टैक्स, मुंबई
श्री रमेशभाई महेश्वरी, माननीय धारासभ्य , मुंद्रा मत विभाग

तारीख : 11-09-2011 रविवार, समय  :  सुबह 10.00 बजे
स्थान : श्री लोहाणा समाजवाडी , वी. डी. हाईस्कूल के पास, भुज, कच्छ

इस स्वर्णिम अवसर पर प्रतिभागिता करके समाज का गौरव बढ़ाएँ यही अनुरोध है.
निमंत्रक  : श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ मुन्द्रा, कच्छ
(श्री जी. एल. भगत भाग नहीं ले सके.)

समारोह के शुभारंभ में कच्छ के कलेक्टर ने सहयोग दिया
 
कार्यक्रम में दर्शक - एक ऐतिहासिक क्षण

बैनर

Collector Kutch Mr. M. Thennarsan, IAS giving his speech

Felicitation of Pir Auva (Religious Head of Maheshwari Community)

Felicitation of Shri Ramesh Maheshwari, MLA by Shri Vallabh Katuva

First lady professor of our Maheshwari community Mrs. Divyaben Maheshwari

Glimpse of inauguration

Public view during National Anthem

Shri Mavjibhai Maheshwari, Editor-Meghdhara

Smt. Bhartiben Katuva, Mavjibhai, Navinbhai and Mangalbhai

Inaugural front page of 'Meghdhara'

प्रेस विज्ञप्ति :-