10 May 2011

Yogini Mata - योगिनी माता - Baba Faqir Chand



Twilight of Yogini’s Life

Tripta Devi was born in village Darangli of Gurdaspur, Punjab in the year 1940 She was a beautiful and promising child. After marriage she did not have a child and as a result she got her husband married to another women. Children were born to second wife. However home environment remained turbulent. One day she went to a temple with unlocked hair and danced. The statues in temple got entangled in the hair and fell around. She had become a Yogini. Her first guru was Baba Bhag Singh. Her second master was Shraddhanand of Jammu and later she came in contact with Param Dayal Faqir Chandji. He gave her the name of ‘Yogini Mata’ and appointed her guru of women. She stayed in Manavta Mandir, Hoshiarpur for many years and worked as a guru. Here is the summary of conversation with her.

After much searching on the internet I could contact David C Lane a professor of philosophy and sociology in California, United States. In his very first email he enquired about Yogini Mata. Hence, for the past two years I had been searching Yogini Mata. I contacted Mrs. Asha Bhagat, activist of Bhagat Mahasabha, Pathankot. Luckily she had known Yogoni Mata for the past many years. I reached Pathankot on 09-10-2010. Yogini lives in a room, a part of her father’s house. I saw her after almost 35 years. She met with all affection but a sort of detachment was visible in her behavior.

I introduced myself and made a mention about Bhagat Munshi Ramji and his wife Karam Devi. She could remember everything. I presented her fruits etc. She enquired about my wife and children. Then I told her the purpose of my visit. She sat in Sukhasana (cross legged).
“Do you remember David C. Lane? He came to the temple.”
“Yes, David!”
Then I further asked, “Do you recall Param Dayalji?”
“Yes.”
“Do you worship him within?”
“No, I do not do that.”
“Do you do inner practices?”
“I have left doing inner practices. During those days I saw all the three forms of Param Dayalji i.e. Dharma, the Form and the Light.”
“Sadhana (inner practice) is also Maya. I used to experience numbness in the body.”
“Do you deliver Satsangs.”
“I do not like delivering Satsang. I am fed up with Guruism. I will not give Namdan to anyone. (Here she recalls a lady). Shanti used to come to me for inner practices. I do not know what happened to her. She just lied on the railway track and committed suicide. Param Dayalji then said to me that Namdan should be given only to the righteous person.”
“Dayal Das and youself used to instruct people for inner practices,” I asked. She said, “Yes, Dayal Das used to give instructions for very high stages of inner practices. He used to attract mystically. I used to go at his place but I always quarreled with him.”

After a few moments, I expressed my wish to ask her some specific questions about what sort of dreams she would generally see. 70 year Yogini immediately replied, “I do not see any dreams. Param Dayal Dayalji did cut them.”

I asked, “What type of visions you see during inner practices?” She said, “Nothing special. Previously I used to see divine forms, used to go to light.” “Once I was sitting in front of Shraddhanand (her second guru). During inner practices I felt as if five snakes came out of my Joon (योनि, private part) and entered into Shraddhanand. I told it to Shraddhanand. He said, “These five snakes are in fact ‘desire’, ‘anger’, ‘greed’, ‘infatuation’ (मोह) and ‘ego’. From today on wards you are free from all of them.”

I asked her, “How about your internal state now.” She said, “Sometimes I get angry. I do quarrel.”

During this conversation Yogini Mata sang and shared many devotional songs. There was intense flow of strong sentiments in her singing.


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एक योगिनी की जीवन संध्या

गुरदासपुर, पंजाब के गाँव दरांगली में 1940 के आसपास जन्मी तृप्ता देवी सुंदर और होनहार बच्ची थी. विवाह के बाद संतान न होने के कारण इन्होंने अपने पति का विवाह अन्य स्त्री से करा दिया. उससे संताने हुईं. घर का वातावरण अशांत बना रहा. एक दिन मंदिर में जा कर बाल खोल कर नाचीं और मंदिर की मूर्तियाँ बालों में उलझ कर इधर-उधर जा गिरीं. ये योगिनी हो चुकी थीं. इनके पहले गुरु बाबा भाग सिंह थे. दूसरे गुरु श्रद्धानंद थे और बाद में ये परम दयाल फकीर चंदजी के संपर्क में आईं. उन्होंने इन्हें योगिनी माता का नाम दे कर स्त्रियों का गुरु बना दिया. ये कई वर्ष मानवता मंदिर, होशियारपुर में रह कर गुरुवाई का कार्य करती रहीं. यह उन्हीं से बातचीत का सार है.


इंटरनेट पर काफी खोज के बाद कैलिफोर्निया, अमेरिका के जाने-माने समाज शास्त्री और धार्मिक पाखंडवाद के विशेषज्ञ डॉ. डेविड सी. लेन (David C Lane) से संपर्क हो पाया. पहली ही ई-मेल में उन्होंने योगिनी माता का अता-पता पूछा. मैं पिछले दो वर्ष से योगिनी को ढूँढ रहा था. पठानकोट में कार्य कर रही भगत महासभा कार्यकर्ता आशा भगत ने उनका पता दिया. 09-10-2010 को मैं सायं पठानकोट पहुँचा. योगिनी एक कमरे में रहती हैं. मैंने उन्हें लगभग 35 वर्ष के बाद देखा. बहुत प्रेम से मिलीं. व्यवहार में एक योगीसुलभ वैराग्य था.
मैंने अपना परिचय दिया, भगत मुंशीराम जी (Bhagat Munshi Ram) और उनकी धर्मपत्नी का उल्लेख किया. वे पुरानी स्मृतियों से ताज़ा हो उठीं. मैंने उन्हें फल आदि भेंट किए. उन्होंने मेरी पत्नी-बच्चों का हाल पूछा. तब मैंने अपने आने का उद्देश्य बताया. वे बातचीत के लिए पालथी लगा कर बैठ गईं.
आपको डेविड सी. लेन याद हैं? मंदिर में आए थे?”
हाँ, डेविड!”
तब मैंने बात बढ़ाई, आप परम दयाल जी को याद करती हैं?”


हाँ.
क्या उनका ध्यान करती हैं?”
नहीं, मैं परम दयाल जी का ध्यान नहीं करती.
अभ्यास करती हैं?”
अभ्यास अपने आप छूट गया. परम दयाल जी के तीनों रूप उस समय देखे- धर्म, मूर्ति और प्रकाश स्वरूप.”
साधन-अभ्यास के बारे में कुछ कहेंगी.”
साधन भी माया है. उस समय अभ्यास के दौरान शरीर में सुन्नपना आता था.”
अब भी आप सत्संग कराती हैं?”
सत्संग कराना अच्छा नहीं लगता. गुरुआई से मन भर गया. अब किसी को नामदान नहीं देना. (वे एक महिला को याद करती हैं). शांति मेरे पास आकर अभ्यास करती थी. एक दिन पता नहीं क्या हुआ कि रेलगाड़ी के आगे जा कर लेट गई. इस मौके पर परम दयाल जी ने कहा था कि अधिकारी को ही नामदान देना चाहिए.


दयालदास और आप अन्य लोगों को साधन कराया करते थे,” मैंने पूछा. वे बोलीं, हाँ, दयालदास बहुत ऊँची अवस्थाओं का अभ्यास कराता था. खींच जैसी मारता था. मैं उसके यहाँ चली जाती लेकिन वहाँ जा कर उससे झगड़ती थी.”
कुछ क्षण बाद मैंने कहा कि बहन जी मैं आपसे एक विशेष सवाल पूछना चाहता हूँ कि आपको सपने कैसे आते हैं. 70 वर्षीया योगिनी एकदम बोल पड़ीं, सपने नहीं आते हैं. परम दयाल जी ने काट दिए.


मैंने पूछा, अभ्यास के दौरान आप कैसे दृश्य देखती हैं?” उन्होंने कहा, कुछ ख़ास नहीं. मूर्तियाँ देखती, प्रकाश में चली जाती थी. एक बार मैं श्रद्धानंद के सामने बैठी थी. साधना के दौरान मुझे लगा लगा जैसे मेरे जून से पाँच साँप निकल कर श्रद्धानंद (गुरु) में प्रवेश कर गए. यह बात मैंने श्रद्धानंद को बताई. उसने कहा कि ये पाँच साँप काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार हैं. आज से तू इनसे मुक्त है.
मैंने पूछा, आपकी आंतरिक अवस्था कैसी है. कहने लगीं कि कभी-कभी क्रोध आता है. झगड़ा करती हूँ.


इस बातचीत के दौरान योगिनी माता ने कई भक्तिपद गा कर सुनाए. उनमें तीव्र संवेगों का छिपा हुआ तीव्र प्रवाह था.


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A Hidden Yogini - Tripta Devi - A film upload by David C. Lane

23-10-2016

She died on 18th October, 2016


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