01 June 2011

Baba Faqir Chand- Secret-3 बाबा फकीर चंद - रहस्य-3



(In the last Post 'Secret-2', the secret of mental life force was mentioned, which got prominence   in Rhonda Byrne’s book 'The Secret'.  Seekers have expressed their experiences pertaining to life beyond mind and thoughts. This area was not in the perspective of Rhonda Byrne nor did she emphasize this in her book. It was not required. This state is attainable by a person not having worldly desires. It is here in words of Faqir.

पिछली पोस्ट Secret-2’ में मानसिक जीवन शक्ति के रहस्य का उल्लेख था जिसे रॉण्डा बर्न (Rhonda Byrne) की पुस्तक ‘The Secret’ में मुख्य रखा गया था. मन-विचार से आगे के जीवन के बारे में साधकों ने अपने-अपने अनुभव व्यक्त किए हैं. यह क्षेत्र रॉण्डा बर्न के परिप्रेक्ष्य में नहीं था न ही उसने अपनी पुस्तक में इस पर बल दिया है. इसकी आवश्यकता भी नहीं थी. इस अवस्था में वही व्यक्ति जा सकता है जिसकी सांसारिक इच्छाएँ न हों. इसे फकीर के शब्दों में सुने.) :-

Spiritual life - In addition to the life realization described above there is another life where there is no awareness of body or mind. There is no thought in that life and it is independent of the body and mind. When a person gets accustomed to the experiences of physical and mental senses, it becomes natural desire for him to enter such a state where he may get complete rest, just like a man desires joy of deep sleep after a day of hard work. Same way his desire to search a state of complete physical and mental rest is natural i.e. going beyond the reach of physical and mental senses which is the first step toward spiritual enlightenment.

Until a person works to the extent that the physical and mental fatigue is properly experienced, he cannot enjoy deep sleep. Similarly a person who does not obtain mental and physical peace in his physical and mental life and until he is totally fed up with the game of Maya, he cannot desire for spiritual enjoyment, a state of peace and bliss.

आत्मिक जीवन - जीवन के बोध के अतिरिक्त जिस को मैंने ऊपर वर्णन किया है, एक और जीवन है जहाँ शरीर या मन का बोध नहीं है. उस जीवन में विचार नहीं रहता और वह शरीर और मन के बोध से स्वतंत्र है. जब कोई व्यक्ति शारीरिक व मानसिक इन्द्रियों का अनुभव करते-करते अभ्यस्त हो जाता है तो उसके लिए ऐसी अवस्था की अभिलाषा स्वाभाविक हो जाती है जहाँ कि उसे पूर्ण विश्राम मिले, जैसे कि दिन भर के कठिन परिश्रम के पश्चात मनुष्य गहरी नींद का आनन्द उठाना चाहता है. जैसे मानसिक व शारीरिक कठिन परिश्रम के पश्चात एक व्यक्ति के लिए गहरी नींद की इच्छा स्वाभाविक होती है ठीक उसी प्रकार ऐसी अवस्था की खोज जहाँ कि उसे शारीरिक व मानसिक पूर्ण विश्राम मिल सके, स्वाभाविक होती है अर्थात् शारीरिक व मानसिक इन्द्रियों की पहुँच के परे जाना है जो आत्मिक ज्ञान की ओर पहला कदम है.

जब तक कोई व्यक्ति ठीक इतना कार्य नहीं करता कि वह शारीरिक व मानसिक थकान का भान न करने लगे, वह गहरी नींद का आनन्द नहीं उठा सकता. ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति जिसको अपने शारीरिक व मानसिक जीवन में सच्ची मानसिक व आत्मिक शान्ति प्राप्त नहीं होती और माया के खेल खेलते हुये पूर्णतया उकता नहीं जाता, वह अध्यात्म (रूहानियत) की जो शान्ति और आनन्द का भंडार है, जिज्ञासा नहीं कर सकता.

नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)