29 July 2011

Film Dr. Babasaheb Ambedkar डॉ बाबा साहेब अंबेडकर


राष्ट्रीय फिल्म विकास कार्पोरेशन लि., सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय, भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने बाबा साहेब अंबेडकर पर एक फिल्म बनाई है. बाबा साहेब को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है. यह पुरस्कृत फिल्म है. इसका यूट्यूब लिंक नीचे दिया है.

 

The Chamars and Putt Chamaran De द चमार और पुत्त चमाराँ दे



A book titled ‘The Chamars’ by M.G.W. Brings was published in the year 1920 wherein 1156 castes were mentioned as Chamars i.e. a single caste with different names. There was a large scale move of hatred started against the word Chamar. The purpose was to divide Dalit castes. It was so poisonous propaganda that Dalit castes which were never averse to 'Chamar' word started distancing themselves from it.

In the recent past a religious head of this community was murdered in Vienna. In the circumstances Ravidasia (Chamar) community went ahead with establishing their own religion named ‘Ravidassia’. Its emblem has 'Hari' in it. Some people opine that it should have been 'Ravi' instead.

Ravish Kumar of NDTV has covered these developments in three parts. You Tube links are given below. These are important documents. 



Part-3

वर्ष 1920 में एम.जी.डब्ल्यू. ब्रिंग्स द्वारा लिखित दि चमार्सनामक पुस्तक में 1156 जातियों के चमारहोने का उल्लेख किया था. फिर मुहिम चली. 'चमार' शब्द के प्रति बड़े पैमाने पर घृणा की लहर चली. इसका प्रयोजन दलित जातियों में भीतरी दरार पैदा करना था. यह प्रचार इतना विषैला था कि इसके कारण अन्य दलित जातियाँ जो पहले 'चमार' शब्द से परहेज़ नहीं करती थीं वे स्वयं को चमार शब्द से दूर करने लगीं.

अधिक समय नहीं हुआ जब वियेना में इस समुदाय के एक डेरा प्रमुख की हत्या कर दी गई. इन परिस्थितियों में रविदासिया (चमार) समुदाय ने उत्तर प्रदेश में अपना धर्म स्थापित कर लिया है जिसे रविदासिया धर्म कहा गया है. इसके शुभंकर में 'हरि' शब्द लिखा है. कुछ लोगों का मत है इसे 'रवि' होना चाहिए था.



इन घटनाओं को एनडीटीवी के रवीश कुमार ने विशेष रूप से तीन खंडों में कवर किया है. इसके यू-ट्यूब लिंक्स पाठकों की जानकारी के लिए नीचे दिए गए हैं. तीनों खंड महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं.



भाग-3



Other links:





http://en.wikipedia.org/wiki/Ravidasi



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MEGHnet 




Key words: Chamar, Putt Chamaran De, Ravidasia Religion, Hari, Chamars NDTV report, हरि, ਹਰਿ  

26 July 2011

Aarakshan (आरक्षण) - यहाँ दो भारत बसते हैं – लोकल भारत लुट रहा है

I once heard some students discussing the medieval meaning of nationality. The conclusion was that at that time it had been limited to small states. It was not as vast as present day India.

A sentence is often heard in independent India. If a man from that state and a snake come together, kill the man first and then kill the snake. Medieval trend probably still exists.

Now, Amitabh Bachchan's film "Aarakshan (Reservation)" is getting much publicity in media. In promo Amitabh says, “There are two countries living in India. What's there in the movie, I do not know, however, what he says is no different from the truth.

A few days ago this news appeared in a newspaper:-

“In 1871 the British Parliament raised the issue of adult franchise. Alarm bells started ringing in British India. By 1918, the political ambition had emerged in intellectuals belonging to backward castes. They had started discussing entering politics. Balgangadhar Tilak was restless. He put his real heart into his speech while addressing a gathering at Athani (Maharashtra). He said, "I do not understand what the Teli, Tamboli and Khati Kunbhat (all low castes) would do in Parliament. Will Teli sell oil in Parliament? Will Tamboli stitch clothes in Parliament and Khati Kunbhat (Kurmi or Patidar) plough in the parliament?”

This narrow thinking and limited definition of Swaraj prevails even today. One of my colleagues from Andhra Pradesh had said, “Gandhi became a leader of the nation whereas Gokhale or Tilak should have been the leaders. It was bad luck of this country! " 

Such statements must have affected popularity of Tilak. Gandhi had done some work for SCs, STs and OBCs. As a result Teli-Tamboli became his followers. In 1930, freedom fighters from Koli tribe joined his Dandi Marching where they were in great numbers. 

If we take Tilak's Statement as product of medieval thinking or thinking of his own time, it can be forgiven. But it is clear from the corruption prevailing in the present day country that his words have become sign boards pointing to his type of Self Rule and independence. Today, it is dangerous for India. Scheduled Castes, Tribes and other backward castes have very little role in Self Rule or independence. In fact they are struggling for human dignity for themselves. Human rights are distant dream for them. Are not they constrained to start a freedom movement for improving their human personality and quality of life?

Budget is provided in government scheme for development of the poor. As per Rajiv Gandhi’s statement only 10% reaches (?) the masses. Will the corrupt let this money (called ‘independence’ in the holiest meaning) reach the righteous hands?

हिंदी विभाग के कुछ विद्यार्थियों को मैंने हिंदी साहित्य के इतिहास के वीरगाथा काल पर बहस करते कभी सुना था. मुद्दा था कि उस समय की राष्ट्रीयता का स्वरूप क्या था. यह प्रश्न उनके बीच बैठे एक राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी ने उठाया था. अंत में संतोषजनक जवाब भी उसी से आया कि तब की राष्ट्रीय भावना छोटे-छोटे राज्यों तक ही सीमित थी. आज जैसे विशाल भारत जैसी उदात्त नहीं थी.

स्वतंत्र भारत में कई राज्यों में कार्य करते हुए एक वाक्य कई बार सुनने में आया कि यदि फलाँ राज्य का व्यक्ति और साँप एक साथ आ जाएँ तो साँप को बाद में मारो और उस व्यक्ति को पहले. शायद वीरगाथा काल की वह पुरानी प्रवृत्ति आज भी कार्य करती है.

इन दिनों अमिताभ बच्चन की एक नई फिल्म ‘आरक्षण की चर्चा है. इसके प्रोमो में अमिताभ कहते हैं कि इस देश में दो भारत बसते हैं. इस बात का फिल्म में क्या अर्थ है पता नहीं, परंतु जो नज़र आता है वह सच्चाई से अलग नहीं.

कुछ दिन पूर्व एक समाचार-पत्र में यह पढ़ा है-

'सन् 1871 में ब्रिटिश संसद में प्रौढ़ मताधिकार का मामला उठा. ब्रिटिश इंडिया में खतरे की घंटी बजने लगी. सन् 1918 तक पिछड़ों के बुद्धिजीवयों में राजनैतिक महत्वाकांक्षा का प्रादुर्भाव होने लगा और उनमें राजनीति में प्रवेश की चर्चा होने लगी थी. तब बालगंगाधर तिलक से रहा नहीं गया. उन्होंने अथनी (महाराष्ट्र) की एक जनसभा को संबोधित करते हुए अपने दिल की बात कह डाली- मेरी समझ में नहीं आता कि ये तेली, तंबोली और खाती कुनभट संसद में क्यों जाना चाहते हैं. तेली क्या संसद में जाकर तेल बेचेगा. तंबोली क्या संसद में जाकर कपड़ा सिलेगा और खाती कुनभट (कुर्मी या पाटीदार) क्या संसंद में जाकर हल चलाएगा.

यह संकुचित सोच और स्वराज की सीमित परिभाषा आज भी उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश के मेरे सहकर्मी सत्यनारायण ने एक बार कहा था, जब गोखले या तिलक को देश का नेता होना चाहिए था तब गाँधी देश का नेता बना. यह इस देश का दुर्भाग्य है.

मैं सोचता हूँ शायद तिलक के ऐसे वक्तव्यों का उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ा होगा. गाँधी ने बहुत तो नहीं परंतु जितना किया उसके कारण तेली-तंबोली उनके साथ हो लिए थे. 1930 के डाँडी मार्च में बहुत बड़ी संख्या जुझारू कोलियों (Koli tribals) की थी.

तिलक के वक्तव्य को यदि वीरगाथाकाल की परिस्थितियों या तिलक के अपने समय की परिस्थितियों का उत्पाद मान लिया जाए तो बात को भुलाया भी जा सकता है. परंतु देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से स्पष्ट है कि इसे तिलक के स्वराज और स्वतंत्रता के दिशापट्ट के तौर पर रख लिया गया जो आज के भारत के लिए अनिष्टकर है. ऐसी स्थिति में भारत की अनुसूचित जातियाँ, जन जातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ स्वराज्य और स्वतंत्रता में हिस्सेदार नहीं मानी जाएँगी. तब क्या उन्हें अपने मानवीय व्यक्तित्व में सुधार और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए स्वतंत्रता आंदोलन चलाना होगा?

गरीबों के उत्थान के लिए जो सरकारी योजनाओं में पैसा दिया जाता है उसका 10 प्रतिशत ही उन तक पहुँच पाता है, ऐसा राजीव गाँधी ने माना था. क्या भ्रष्टाचारी तंत्र इतनी बड़ी राशि को (जिसे पवित्रतम रूप में स्वराज कहा जाता है) सही जगह पहुँचने देगा?


विशेष नोट : यह पोस्ट बड़ी तेज़ी से इस ब्लॉग की टॉप 5 पोस्टस (यथा 10-08-2011 को) में आ गई है. इसका एक कारण यह भी है कि फिल्म का प्रदर्शन अभी मद्रास हाईकोर्ट ने रोका है और फिल्म के बारे में लोगों की जिज्ञासा बढ़ी है. इस बीच NDTV पर रवीश कुमार की फिल्म के निर्माता प्रकाश झा, अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी से एक बातचीत यू-ट्यूब पर उपलब्ध है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं- आरक्षण


(Key words: Koli, Kori, Kol, Khati, Kunbhat, Teli, Tamboli, Bal Gangadhar Tilak, Dandi March, Gandhi, Film Resevation, Amitabh Bachchan, Big B)

अभी हाल ही में एनडीटीवी के अनिंद्यो ने आरक्षण के मुद्दे पर एक स्टोरी की है. उसे आप देख सकते हैं.

14 July 2011

Meghvansh- One direction - मेघवंश - एक दिशा


कल 05 मई, 2012 को चंडीगढ़ के पास एक गाँव बहलाना में कई मेघवंशी और कबीरपंथी समुदायों के प्रतिनिधियों का एक सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें मेघवंशी समुदायों के परस्पर समन्वय के लिए किए जाने वाले कार्यों की सूची पर विचार-विमर्ष हुआ. इस सेमिनार की अध्यक्षता श्री गोपाल डेनवाल ने की और श्री आर.पी. सिंह इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे. कार्यक्रम का आयोजन हिमाचल प्रदेश की संस्था कबीरपंथ महासभा (Kabir Panth Mahasabha) ने किया था.
(From left) S/Sh. Baru Pal, Gopal Denwal and R.P. Singh
इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों से पधारे प्रतिनिधियों ने अपने-अपने विचार रखे जिनका सार-संक्षेप यह है कि मेघवंशी और अन्य दलित सामाजिक संगठनों के साझा धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मंच तैयार करने की आवश्यकता है. इसके लिए शिक्षा और एकता की भावना विकसित करने की तत्काल ज़रूरत है. जातियों के बँटवारे की पूर्वनिर्मित भ्रामक मान्यता को तोड़ना होगा. जानना होगा कि अनुसूचित जातियाँ, जनजातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ वास्तव में एक ही हैं. इस नकली विभाजन को मन से निकालना होगा. धार्मिक विभाजन की दीवारों को खंडित करके आत्म सम्मान के भाव को सशक्त करना होगा.
अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री गोपाल डेनवाल ने कहा कि विभिन्न नामों में बँटा मेघवंशी समाज आपस में नाम पर ही भिड़ जाता है. इस प्रवृत्ति को तोड़ना ज़रूरी है. नाम अलग होने से कुछ नहीं होता बल्कि सभी मेघवंशी समुदायों का आपस में मिल कर शिक्षा और आर्थिक विकास का प्रबंध करना महत्वपूर्ण है. इसके लिए सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक संगठन की कोशिशें तेज़ होनी चाहिएँ.

इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से पधारे अन्य वक्ताओं में सर्वश्री/सुश्री जसविंदर कौर, बारू पाल, हरबंस लाल लीलड़, इंद्रजीत मेघ, प्रीतम सिंह, त्रिलोक चंद, प्रो. कायस्थ, मस्त राम, गणपतराय, रमेश, भारत भूषण आदि थे.

विशेष नोट – मेघ भगतों के संगठन ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व श्री इंद्रजीत मेघ ने और भगत महासभा, जम्मू का प्रतिनिधित्व श्री भारत भूषण ने किया.

एक विस्तृत नोट नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.









    

09 July 2011

Believer and non-believer (आस्तिक बनाम नास्तिक)

  








Theism-atheism is the subject of long debate on many blogs. Naturally, many groups surface there. Three major groups are – (1) Believer, (2) Atheists and (3) neither this side nor that side. People are afraid of being branded an atheist. It can appropriately be called ‘religious timidity’.

There is no conclusion on this subject. Comments are pouring in given today. There are more than five hundred comments which is a record in the history of Hindi blogging.

I've become an atheist, but atheism in itself is a belief.

In India, belief has disseminated lot of unscientific knowledge. This has harmed this country greatly. Thinking of much larger human groups has lost the edge in the network of theism and religiosity. Science has been pushed to the second place. Ancient knowledge (tribal stories) has been propagated as science.

Agnostic has his own belief. Theist believes in a power which is different from him. An atheist believes in himself. He has faith in available science. The base element is faith. It is beneficial.

Faith gives confidence when we lose hope. It is a psychological fact. Faith increases person's capacity to recover. It improves the process of healing. Accordingly, it increases the chances of his life. This faith is the proven process. It does not make a difference to belief whether person is a believer or an atheist. It goes on working like a flame.


डॉ दिव्या के ब्लॉग पर नास्तिकता-आस्तिकता के विषय पर लंबी बहस छिड़ गई. टिप्पणी दर टिप्पणी आई. स्वाभाविक कई समूह बन गए. तीन प्रमुख रहे- 1. आस्तिक, 2. नास्तिक और 3. कुछ इधर के कुछ उधर के या न इधर के न उधर के. एक बात फिर स्पष्ट हुई कि लोग नास्तिक होते हैं लेकिन स्वयं पर इसका ठप्पा लगने से डरते हैं. इसे भीरूता कहना अधिक उपयुक्त होगा.
इन टिप्पणियों में दूसरे पर इक्कीस पड़ने की प्रवृत्ति भी थी और एक दूसरे को नीचा दिखाने की भी. यह ऐसा विषय है कि इसका अंतिम निष्कर्ष निकलना नहीं था और न निकला. आज की तारीख में भी टिप्पणियाँ आ रही हैं. हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास में साढ़े तीन सौ से अधिक टिप्पणियों का रिकार्ड बन चुका है.
मैं नास्तिक हो चुका हूँ, लेकिन इतनी बहस के बाद नास्तिकता में छिपी आस्तिकता के बारे में एक बात विशेष रूप से यहाँ लिख देना चाहता हूँ.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आस्तिकता के माध्यम से फैलाया गया अज्ञान देश को बहुत हानि पहुँचा चुका है. बहुत बड़े मानव समूह की सोच आस्तिकता-धार्मिकता के ताने-बाने में कुंद हुई है. विज्ञान को दूसरे दर्जे पर धकेल कर पौराणिक ज्ञान से ढँका गया जिसका महत्व वास्तव में कबीलाई कहानियों से अधिक नहीं है.
यह कहना भी सही नहीं है कि नास्तिक में आस्तिकता नहीं होती. आस्तिक अपने से अलग सत्ता में आस्था-विश्वास रखता है और नास्तिक स्वयं पर विश्वास करता है और उपलब्ध विज्ञान में आस्था रखता है. तत्त्व है- किसी पर दृढ़ विश्वास. यह लाभकारी होता है.
कहते हैं कि आस्तिकता तब शक्ति देती है जब व्यक्ति को किसी स्थिति में निराशा घेर ले. मनोविज्ञान की दृष्टि से यह तथ्य है. गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के भीतर यदि किसी दवा, डॉक्टर, ईश्वर या पास खड़े रिश्तेदार में विश्वास हो आए तो उसमें बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है और निरोग होने की प्रक्रिया में सुधार होता है. फलतः उसके जीवित रहने की संभवनाएँ बढ़ती हैं. यह विश्वास की प्रमाणित कार्यप्रणाली है. कोई आस्तिक है या नास्तिक इससे विश्वास को कोई अंतर नहीं पड़ता. वह लौ की तरह है.

ये चित्र श्री सज्जन सिंह ने ई-मेल से भेजे हैं:-








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