26 July 2011

Aarakshan (आरक्षण) - यहाँ दो भारत बसते हैं – लोकल भारत लुट रहा है

I once heard some students discussing the medieval meaning of nationality. The conclusion was that at that time it had been limited to small states. It was not as vast as present day India.

A sentence is often heard in independent India. If a man from that state and a snake come together, kill the man first and then kill the snake. Medieval trend probably still exists.

Now, Amitabh Bachchan's film "Aarakshan (Reservation)" is getting much publicity in media. In promo Amitabh says, “There are two countries living in India. What's there in the movie, I do not know, however, what he says is no different from the truth.

A few days ago this news appeared in a newspaper:-

“In 1871 the British Parliament raised the issue of adult franchise. Alarm bells started ringing in British India. By 1918, the political ambition had emerged in intellectuals belonging to backward castes. They had started discussing entering politics. Balgangadhar Tilak was restless. He put his real heart into his speech while addressing a gathering at Athani (Maharashtra). He said, "I do not understand what the Teli, Tamboli and Khati Kunbhat (all low castes) would do in Parliament. Will Teli sell oil in Parliament? Will Tamboli stitch clothes in Parliament and Khati Kunbhat (Kurmi or Patidar) plough in the parliament?”

This narrow thinking and limited definition of Swaraj prevails even today. One of my colleagues from Andhra Pradesh had said, “Gandhi became a leader of the nation whereas Gokhale or Tilak should have been the leaders. It was bad luck of this country! " 

Such statements must have affected popularity of Tilak. Gandhi had done some work for SCs, STs and OBCs. As a result Teli-Tamboli became his followers. In 1930, freedom fighters from Koli tribe joined his Dandi Marching where they were in great numbers. 

If we take Tilak's Statement as product of medieval thinking or thinking of his own time, it can be forgiven. But it is clear from the corruption prevailing in the present day country that his words have become sign boards pointing to his type of Self Rule and independence. Today, it is dangerous for India. Scheduled Castes, Tribes and other backward castes have very little role in Self Rule or independence. In fact they are struggling for human dignity for themselves. Human rights are distant dream for them. Are not they constrained to start a freedom movement for improving their human personality and quality of life?

Budget is provided in government scheme for development of the poor. As per Rajiv Gandhi’s statement only 10% reaches (?) the masses. Will the corrupt let this money (called ‘independence’ in the holiest meaning) reach the righteous hands?

हिंदी विभाग के कुछ विद्यार्थियों को मैंने हिंदी साहित्य के इतिहास के वीरगाथा काल पर बहस करते कभी सुना था. मुद्दा था कि उस समय की राष्ट्रीयता का स्वरूप क्या था. यह प्रश्न उनके बीच बैठे एक राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी ने उठाया था. अंत में संतोषजनक जवाब भी उसी से आया कि तब की राष्ट्रीय भावना छोटे-छोटे राज्यों तक ही सीमित थी. आज जैसे विशाल भारत जैसी उदात्त नहीं थी.

स्वतंत्र भारत में कई राज्यों में कार्य करते हुए एक वाक्य कई बार सुनने में आया कि यदि फलाँ राज्य का व्यक्ति और साँप एक साथ आ जाएँ तो साँप को बाद में मारो और उस व्यक्ति को पहले. शायद वीरगाथा काल की वह पुरानी प्रवृत्ति आज भी कार्य करती है.

इन दिनों अमिताभ बच्चन की एक नई फिल्म ‘आरक्षण की चर्चा है. इसके प्रोमो में अमिताभ कहते हैं कि इस देश में दो भारत बसते हैं. इस बात का फिल्म में क्या अर्थ है पता नहीं, परंतु जो नज़र आता है वह सच्चाई से अलग नहीं.


कुछ दिन पूर्व एक समाचार-पत्र में यह पढ़ा है-

'सन् 1871 में ब्रिटिश संसद में प्रौढ़ मताधिकार का मामला उठा. ब्रिटिश इंडिया में खतरे की घंटी बजने लगी. सन् 1918 तक पिछड़ों के बुद्धिजीवयों में राजनैतिक महत्वाकांक्षा का प्रादुर्भाव होने लगा और उनमें राजनीति में प्रवेश की चर्चा होने लगी थी. तब बालगंगाधर तिलक से रहा नहीं गया. उन्होंने अथनी (महाराष्ट्र) की एक जनसभा को संबोधित करते हुए अपने दिल की बात कह डाली- मेरी समझ में नहीं आता कि ये तेली, तंबोली और खाती कुनभट संसद में क्यों जाना चाहते हैं. तेली क्या संसद में जाकर तेल बेचेगा. तंबोली क्या संसद में जाकर कपड़ा सिलेगा और खाती कुनभट (कुर्मी या पाटीदार) क्या संसंद में जाकर हल चलाएगा.

यह संकुचित सोच और स्वराज की सीमित परिभाषा आज भी उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश के मेरे सहकर्मी सत्यनारायण ने एक बार कहा था, जब गोखले या तिलक को देश का नेता होना चाहिए था तब गाँधी देश का नेता बना. यह इस देश का दुर्भाग्य है.


मैं सोचता हूँ शायद तिलक के ऐसे वक्तव्यों का उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ा होगा. गाँधी ने बहुत तो नहीं परंतु जितना किया उसके कारण तेली-तंबोली उनके साथ हो लिए थे. 1930 के डाँडी मार्च में बहुत बड़ी संख्या जुझारू कोलियों (Koli tribals) की थी.

तिलक के वक्तव्य को यदि वीरगाथाकाल की परिस्थितियों या तिलक के अपने समय की परिस्थितियों का उत्पाद मान लिया जाए तो बात को भुलाया भी जा सकता है. परंतु देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से स्पष्ट है कि इसे तिलक के स्वराज और स्वतंत्रता के दिशापट्ट के तौर पर रख लिया गया जो आज के भारत के लिए अनिष्टकर है. ऐसी स्थिति में भारत की अनुसूचित जातियाँ, जन जातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ स्वराज्य और स्वतंत्रता में हिस्सेदार नहीं मानी जाएँगी. तब क्या उन्हें अपने मानवीय व्यक्तित्व में सुधार और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए स्वतंत्रता आंदोलन चलाना होगा?

गरीबों के उत्थान के लिए जो सरकारी योजनाओं में पैसा दिया जाता है उसका 10 प्रतिशत ही उन तक पहुँच पाता है, ऐसा राजीव गाँधी ने माना था. क्या भ्रष्टाचारी तंत्र इतनी बड़ी राशि को (जिसे पवित्रतम रूप में स्वराज कहा जाता है) सही जगह पहुँचने देगा?


विशेष नोट : यह पोस्ट बड़ी तेज़ी से इस ब्लॉग की टॉप 5 पोस्टस (यथा 10-08-2011 को) में आ गई है. इसका एक कारण यह भी है कि फिल्म का प्रदर्शन अभी मद्रास हाईकोर्ट ने रोका है और फिल्म के बारे में लोगों की जिज्ञासा बढ़ी है. इस बीच NDTV पर रवीश कुमार की फिल्म के निर्माता प्रकाश झा, अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी से एक बातचीत यू-ट्यूब पर उपलब्ध है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं- आरक्षण






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(Key words: Koli, Kori, Kol, Khati, Kunbhat, Teli, Tamboli, Bal Gangadhar Tilak, Dandi March, Gandhi, Film Resevation, Amitabh Bachchan, Big B)