09 September 2011

अध्यात्म और अनुभव ज्ञान - बाबा फकीर चंद




(कल बहुत दिनों के बाद अपनी गढ़त करने वाली पुस्तकों को छुआ. और बाबा फकीर चंद जी की एक पुस्तक 'अगम-वाणी' से यह मिला. यह इसलिए भी अच्छा लगा कि यह MEGHnet पर 200वीं पोस्ट है.) 
"वाणी कहती है कि राधास्वामी अनामीअरंग अरूप की आदि अवस्था में थे जिसे अचरज रूप कहते हैंकेवल इस ख्याल से कि मैं किसी के अन्तर नहीं जातामेरे अन्तर जो रूपरंगदृश्य पैदा होते थे उनको तथा सहसदल कंवलत्रिकुटी आदि को छोड़ने के लिये मैं विवश हुआ क्योंकि वह मुझे मायावी और कल्पित सिद्ध हुएवे दृश्य आदि हमारे मन पर बाह्य प्रभावों से या अपनी प्रकृति के कारण आते हैंशब्द और प्रकाश से गुज़रता हुआ जब इनसे आगे चलता हूँ तो फिर उस मालिक को समझनेदेखने की शक्ति नहीं हैसिवाय अचरज के और कुछ नहीं हैजब वहाँ से उत्थान होता हैशब्द और प्रकाश की चेतनता आती हैवह अगम हैइसी प्रकार मेरी ही नहीं हर एक जीव की या हर एक मनुष्य की यही दशा है. 
तो फिर मेरे जीवन की रिसर्च यह सिद्ध करती है कि उस परमतत्त्वअनामीअकाल पुरुष की अवस्था से यह चेतन का बुलबुला प्रगट हुआ और उसी में समा गया. ‘लब खुले और बन्द हुयेयह राज़े ज़िन्दगानी है’.

अब संसार वालोसोचोमैंने जो खोज की हैक्या वह सत्य नहीं हैआज 80 वर्ष के बाद अपना अनुभव कहता हूँ कि जो कुछ वाणी में लिखा है वह ठीक हैइसकी सचाई का ज्ञान केवल गुरुपद पर आने से हुआजो लोग मेरा रूप अपने मन से या अपनी आत्मा से अपने अन्तर में बनाते है और मैं नहीं होता तो सिद्ध हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर जो वह हैवह और है और जो शक्ति उसकी रचना करती हैउसकी अंश हैवह उसकी सत्ता है इसलिये वह जो उस अनामी धामहैरतअकाल पुरुष की सत्ता है वह रचना करती हैतमाम धर्म पंथहर प्रकार के योगीहर प्रकार के विचारवानकिससे काम लेते हैंवह है अपने आपकी सत्ताजो मनरूपी उनके साथ रहती है और उससे काम लेते हैंमनुष्य के अन्तर में उसका मन रचना करता है और ब्रह्मंडब्रह्मंडीय मन उस अकाल पुरुष, परमतत्त्वअनामीआश्यर्चरूप की सत्ता है
प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय तथा पंथ वाले उस मालिक को अपने मन से अलग समझकर उसको पूजते हैंकोई कहता है अन्तर में राम मिलता है कोई कहता है उसका अलग मंडल हैअलग लोक हैमैं भी ऐसा ही समझा करता था मगर जब सत्संगियों के कहने से ज्ञान हुआ कि वह अपने अन्तर सूर्यचन्द्रमादेवीदेवताओं के रूप देखते हैं और मेरा रूप भी देखते हैं मगर मैं नहीं होता तो मुझे निश्चय हो गया कि यह सब खेल इनके अपने ही काल रूपी मन का हैइसी प्रकार इस बाहरी रचना में ब्रह्माविष्णुमहेशदेवी देवतालोक-लोकान्तर सब ब्रह्मंडी मन काल ने बनाये हैंजिस तरह मनुष्य का मन अपने अन्तर अपनी रचना करता है और वह रचना हमारी सुरत को भरमाती रहती हैइसी प्रकार यह बाहर की रचना हमको भरमाती रहती हैवास्तव में यह रचना उस असल अकाल पुरुषदयाल पुरुष का प्रतिबिम्ब है और हम उस अकाल पुरुष या दयाल पुरुष की अंश हैयहाँ आकर अपनी रचना में और बाहरी रचना में इसे भूल गयेउस भूल को मिटाने के लिये यह परम संत सत्गुरु का रूप धारण करके जीवों को अपने घर का पता देता है."बाबा फकीर चंद, अगम वाणी से

Wikipedia : बाबा फकीर चंद

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