24 June 2011

Yogeshwaranand Saraswati Paramhans - योगेश्वरानंद सरस्वती परमहंस


(जन्म 1887.  निर्वाण 23 अप्रैल 1985 को-निन्यानबे वर्ष की आयु में)

मेरा बचपन धार्मिक वातावरण में बीता. पिता जी कई वर्ष पूर्व स्वामी शिवानंद से मार्गदर्शन ले चुके थे. तुलसी की विनय पत्रिका के पद भावविभोर हो कर गाया करते थे. और 1963 तक वे बाबा फकीर चंद जी के संपर्क में आ गए और उनकी जीवन-धारा बदल गई. वे साधक थे और उससे घर का वातावरण सुगंधित था. टोहाना स्थित हमारा सरकारी स्कूल जैन साध्वियों, स्वामियों (जिनमें स्वामी हरमिलापी जी भी थे) और कई योगाचार्यों के आगमन से सुशोभित होता रहता था.


इन्हीं दिनों पिता जी तीन वृह्दाकार पुस्तकें ले कर आए जिनके शीर्षक थे- बहिरंग योग, आत्म-विज्ञान और ब्रह्म-विज्ञान. मैं उस समय सातवीं कक्षा में था. बहुत जानकारी नहीं थी. आत्म-विज्ञान और ब्रह्म-विज्ञान पुस्तकें बहुत आकर्षक थीं. उलट-पलट कर देखीं लेकिन उनका कथ्य समझ में नहीं आया. फिर बहिरंग योग पढ़नी शुरू की. इसके शुरू में ही अष्टांग योग का वर्णन था जो मेरी बालसुलभ बुद्धि में सहज ही बैठता चला गया. यम, नियम, आसन,  प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को जिस परिमार्जित भाषा में समझाया गया था वह कठिन नहीं थी. मैं समाधि लगाने की ओर अधिक प्रवृत्त हुआ. लेकिन जैसा कि मैंने कहा है तब मैं सातवीं कक्षा में था. किशोरावस्था आ चुकी थी (स्कूल में दाखिला छः वर्ष की आयु में होता था). इस आयु में जिन विचारों का विकास हो रहा होता है, सभी जानते हैं. समाधि में जिस प्रकार के हमारे विचार-वृत्तियाँ होती हैं उन्हें बल मिल जाता है. इससे मुझे आगे चल कर हानि उठानी पड़ी. पिता के मार्गदर्शन के कारण कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ. निजी अनुभव बता देना मैंने ज़रूरी समझा. बेहतर होता है कि इस आयु में बच्चों को पूजा-पाठ, समाधि की ओर न लगा कर उनके चरित्र निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाए. वैसे आजकल बच्चों को इन यौगिक विषयों की ओर देखने का अवसर ही नहीं मिलता और परिणामतः वे कई मायनों में योगियों-साधकों आदि से बेहतर जीवन जी जाते हैं. मैंने कहीं पढ़ा है कि यदि युवा बच्चे अधिक धार्मिकता प्रदर्शित करने लगें तो माता-पिता को होशियार हो जाना चाहिए कि कहीं बच्चा मानसिक ब्रह्मचर्य की समस्या में तो नहीं है.

कुछ विषयांतर हो गया. ख़ैर, मैंने उस पुस्तक का डूब कर अध्ययन किया. अनजाने में पुस्तक के लेखक ब्रह्मचारी स्वामी व्यास देव की छवि भी मन में उतरती गई. यही स्वामी व्यास देव आगे चल कर श्री 1008 स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती के नाम से जाने गए. पिछले दिनों नेट पर सर्च के दौरान देखा कि उनका नाम स्वामी योगेश्वरानंद परमहंस भी दर्ज हुआ है. समझते देर नहीं लगी कि भाव समाधि की उनकी साधना के कारण उन्हें यह नाम दिया गया.


समाधि के क्षेत्र में उनकी एक नई खोज का उल्लेख भगत मुंशीराम जी ने अपनी एक पुस्तक में किया है. इसमें साधक अपने मन में किसी एक वस्तु यथा- पृथ्वी- का रूप बना लेता है और उससे संबंधित एक-एक वस्तु को देखता जाता है और एक बार देखी वस्तु को दोबारा स्मरण नहीं करता. यह करते हुए वह एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जिसे शून्य समाधि कहा जाता है. योग के क्षेत्र में यह नई पद्धति थी.


स्वामी योगेश्वरानंद जी की पुस्तक से प्राप्त संस्कार मेरे मानस पर गहरे हैं. मैं उनसे मिलना चाहता था. सुयोग से मेरे कॉलेज के दिनों में वे चंडीगढ़ के एस.पी. श्री भनोट के घर पधारे. उनका एक प्रवचन लाला लाजपतराय भवन में सुना तथा श्री भनोट जी के निवास पर योग प्रशिक्षण के दौरान उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ. योगी कैसे मन को प्रभावित करते हैं और चमत्कार दिखाते हैं इसका अनुभव वहीं हुआ. हवा के झोंकों को महसूस करना, उनकी अंगुली से निकलती विद्युत तरंगों को देखना, अपने भीतर त्रिकुटी के स्थान पर गुफा द्वार से आते तीव्र प्रकाश में प्रवेश करना एक नया अनुभव था. (क्षमा करें, मैं यहाँ चमत्कारों की स्थापना नहीं कर रहा. ऐसे अनुभव साधक को सुझाव (impressions and suggestions) दे कर कराए जाते हैं. साधक वही महसूस करता है जो उसे अनुदेशक (instructor) या गुरु बताता है.


यह पोस्ट अपने समय के महानतम योगी स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती परमहंस को कृतज्ञता पूर्वक सप्रेम समर्पित है जिनकी कही बातों ने मेरे जीवन को अच्छी दिशा दी.


Other links:
 
Yoga Niketan Ashram
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MEGHnet

22 June 2011

Gotras of Megh Bhagats - मेघ भगतों के गोत्र

डॉ. ध्यान सिंह, पीएचडी

डॉ. ध्यान सिंह का शोधग्रंथ कई मायनों में उपयोगी है. इसमें मेघ भगतों के गोत्रों को भी समेकित किया गया है. इस विषय में मुझे कुछ जानकारी तो थी लेकिन डॉ. सिंह द्वारा तैयार गोत्रों की सूची से बहुत कुछ नया भी मिला. गोत्रों की सूची इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे संकेत मिलते हैं कि हम कौन हैं, कहाँ से आए थे और हमारे पूर्वज क्या करते थे. इस सूची में दिए नाम सिद्ध करते हैं कि हमारे कुछ पूर्वज अस्सीरिया से संबंधित थे. इस दृष्टि से अस्सरिया और एरियन शब्द अपनी कहानी कहते हैं. इसी प्रकार इस सूची में केशप (कश्यप) और प्राशर (पराशर) ऋषियों के नाम से गोत्र होना और विवाहों आदि में हमारा ऋषि गोत्र के रूप में भारद्वाज, अत्रि आदि ऋषियों का नाम बताना एक शोध का विषय हो सकता है क्योंकि कुछ अन्य ऋषियों के नाम हमारे समुदाय से जुड़े नहीं हैं.

सूची से स्पष्ट है कि गोत्रों का नामकरण कई प्रकार से हुआ है. गोत्र के मूल में गाँव, रेस, ऋषि, व्यवसाय, किसी नई जाति विशेष से संपर्क में आने के बाद नया नाम, रंग और छवि, विशेष आदत, गुण विशेष, क्षेत्र विशेष, पशु-पक्षी (व्यवसाय के रूप में भी), इष्ट, शारीरिक बनावट, महँगे पत्थरों आदि के नाम हैं. बहुत से गोत्रों के नाम ऐसे हैं जो संभवतः कभी शुद्ध रूप में तत्सम् (संस्कृत स्पैलिंग के अनुसार) रहे हैं और बाद में अन्य जातियों ने उनका रूप ज़बरदस्ती बिगाड़ दिया है या वे घिसते हुए इस तद्भव रूप को प्राप्त हुए हैं.

अंत में एक बात जोड़ना चाहूँगा कि गोत्रों की सूची को मैंने शब्दकोश विज्ञान (Lexicography) के नियम के अनुसार वर्णक्रम में लगा दिया है. आने वाले समय में शोधकर्ता इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग कर सकेंगे.

भारत भूषण, चंडीगढ़
ईमेल- bhagat.bb@gmail.com


मेघ भगतों के गोत्रों की सूची
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अगर, अस्सरिया,
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एरियन,
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कंगोत्रा, ककड़, कतियाल, कड़थोल, कपाहे, कम्होत्रे, कलसोंत्रा, कलमुंडा, करालियाँ, कांचरे, कांडल, काटिल, काले, किलकमार, कूदे, केशप, कैले, कोकड़िया, कोण,
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खंगोतरे, खंडोत्रे, खड़िया, खढ़ने, खबरटाँगिया, खरखड़े, खलड़े, खलोत्रा, खोखर, खोरड़िये,
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गंगोत्रा, गाँधी, गुटकर, गड़गाला, गड़वाले, गिद्धड़, गोत्रा, गौरिये,
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घई, घराई, घराटिया, घराल, घुम्मन,
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चखाड़िये, चगोत्रा, चगैथिया, चबांते, चलगौर, चलोआनियाँ, चितरे, चोकड़े, चोपड़ा, चोहड़े, चोहाड़िए, चौदेचुहान, चौहान,
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छापड़िया, छोंके,
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जजूआं, जल्लन, जल्लू,
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टंभ, टनीना, टुंडर, टुस्स, टेकर, टोंडल,
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डंडिये, डंबडकाले, डग्गर, डांडिये, डोगरा, डोगे,
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ढम, ढींगरिये,
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तरपाथी, तराहल, तरियल, तित्तर,
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थंदीरा, थिंदीआलिया, थापर,
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दत्त, दमाथियां, दलवैड, दरापते,
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धूरबारे,
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नजोआरे, नजोंतरे, नमोत्रा,
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पंजगोत्रे, पंजवाथिए, पंजाथिया, पकाहे, पटोआथ, पडेयर, पराने, परालिये, पलाथियाँ, पवार, पहाड़ियाँ, पाड़हा, पानोत्रा, पाहवा, पूंबें, पौनगोत्रा, प्राशर (पराशर),
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बकरवाल, बजगोत्रे, बजाले, बदोरू, बक्शी, बग्गन, बाखड़ू, बादल, बटैहड़े, बरेह, बिल्ले, बैहलमें,
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भगोत्रा, भलथिये, भसूले, भिंडर, भिड्डू,
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मंगलीक, मंगोच, मंगोतरा, मंजोतरे, मड़ोच, मनवार, मन्हास, ममोआलिया, मल्लाके, मांडे, मुसले, मैतले,
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रतन, रत्ते, रमोत्रा, रूज़म,
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लंगोतरा, लंबदार, लालोतरा, लचाला, लचुंबे, लसकोतरा, लातोतरा, लासोतरा, लीखी, लुड्डन, लेखी, लोंचारे,
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शौंके,
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संगलिया, संगवाल, संगोत्रे, सकोलिया, सपोलिया, समोत्रा, सलगोत्रे, सलगोत्रा, सलहान, सलैड, सांगड़ा, साठी, सिरहान, सीकल, सीहाला, सोहला, सुंबरिये, सेह्,
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हरबैठा, हितैषी.
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(गोत्रों की यह सूची डॉ. ध्यान सिंह के पीएचडी के लिए स्वीकृत शोधग्रंथ पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकाससे ली गई है.)

21 June 2011

Baba Faqir Chand- Secret-4 बाबा फकीर चंद - रहस्य-4


Everywhere the same element is widespread and has its own four cells or worlds - physical, mental, spiritual and fourth is the essence. The game or work or self-powered motion of every world creates bodies of various forms made of either solid matter or subtle or causal matter and this texture generates a kind of consciousness or awareness which is called life. This life is physical, mental and spiritual. When parts of a body of any of these bodies get destroyed or become useless, then the life of that body comes to an end and the same parts of that get merged with other bodies or create another body.

The whole world, with all its parts, is a game of nature or God Almighty. The essence, infiniteness or origin of this entire existence (power) cannot be estimated or sensed. No one can see, understand or feel it. The human senses, which are result of acts of gross, subtle and spiritual bodies, cannot go beyond causal matter or spiritual body, so none has right to say what that eternal (reality) is. It is what it is, or, to say it from spiritual angle, it is an absolute wonderful condition.


एक ही तत्व सर्वत्र व्यापक है और जिसके अपने ही चार कोष या लोक हैं - शारीरिक, मानसिक, आत्मिक और चौथा सार तत्व हैं. प्रत्येक लोक का खेल या कार्य अथवा स्वयं संचालित गति या तो स्थूल पदार्थ के या सूक्ष्म या कारण पदार्थ के विभिन्न रूप वाले शरीर बनाती है और इस बनावट से एक प्रकार की चेतना या बोध उत्पन्न होता है जिसको जीवन कहते हैं. वह शारीरिक, मानसिक और आत्मिक होता है. जब इन शरीरों में से किसी शरीर के अंग नष्ट हो जाते हैं अथवा नाकारा हो जाते हैं, तो उस शरीर का जीवन भी नाश हो जाता है और उस शरीर के वही अंग या तो दूसरे शरीरों से मिल जाते हैं अथवा दूसरे शरीर बना लेते हैं.


संसार अपने समस्त अंगों सहित प्रकृति या सर्वशक्तिमान ईश्वर का एक खेल है. इस समस्त अस्तित्व (सत्ता) के सार तत्व, अनन्तता या उद्गम का न अनुमान किया जा सकता है और न बोध. न कोई उसे देख सकता है, न समझ सकता है न महसूस कर सकता है. मनुष्य की इन्द्रियाँ जो स्थूल, सूक्ष्म और आत्मिक शरीरों के कृत्यों का परिणाम हैं, कारण पदार्थ या आत्मिक शरीर के आगे नहीं जा सकतीं, इसलिये किसी को यह कहने का अधिकार नहीं है कि वह अनन्त (असलियत) क्या है. वह जो है सो है अथवा मानसिक और आत्मिक दृष्टि से कहने के लिये एक परम आश्चर्यजनक दशा है.


नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)

20 June 2011

Megh/Megh Bhagat : Known history


MEGHnet ब्लॉग पर मैंने दलितों के इतिहास से संबंधित आलेख (चिट्ठे) लिखे हैं जो पुस्तकों और इंटरनेट से उपलब्ध सामग्री के आधार पर हैं. ये इतिहास नहीं हैं परंतु कई पौराणिक और आधुनिक सूत्रों को समझने तथा उन्हें एक जगह एकत्रित करने का प्रयास है. अन्य से ली गई सामग्री के लिए संबंधित लेखक या वेबसाइट के प्रति विधिवत् आभार प्रकट किया गया है. मेघनेट के बहुत से आलेख कई अन्य वेब साइट्स और ब्लॉग्स पर मेघनेट के साभार डाले गए हैं जो बहुत संतोष देने वाला है

कपूरथला के डॉ. ध्यान सिंह को जब मैं मिला तब उन्हें अपनी मंशा बता कर उनका पीएचडी थीसिस मैं ले आया था और उसे एक अन्य ब्लॉग 'Hisory of Megh Bhagats' या 'पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास' के नाम से काफी देर से इंटरनेट पर रखा हुआ है. इस ब्लॉग पर कई जिज्ञासु आए हैं.

मन में यह इच्छा थी कि डॉ. ध्यान सिंह के संपूर्ण थीसिस को या उसके कुछ अंशों को यूनीकोड में टाईप कर करके इंटरनेट पर डाला जाए जिससे उसे कोई भी हिंदी में पढ़ सकें. इसमें एक खतरा भी था कि कोई भी शोधग्रंथ की सामग्री को आसानी से कॉपी कर सकता था और प्रयोग कर सकता था. क्योंकि यह सामग्री मूलतः ध्यान सिंह जी की है अतः मेरा कर्तव्य था कि इसे यथा संभव सुरक्षित रखा जाए और पीडीएफ बना कर लिंक के रूप में अपने विभिन्न ब्लॉग्स पर रख दिया जाए ताकि जिज्ञासु इसे पढ़ सकें. आप इस फाइल का प्रिंट आऊट लेकर पढ़ सकते हैं.

शोधग्रंथ का यह एक ही अध्याय है जो प्रस्तुत किया जा रहा है लेकिन निश्चित है कि इसमें मेघ भगतों का ज्ञात इतिहास है. मेघों का प्राचीन इतिहास कथा-कहानियों के रूप में है. उन्हें संकेत माना जा सकता है. वास्तविक/विस्तृत इतिहास या तो लिखा ही नहीं गया या उसे आक्रमणकारी कबीलों ने नष्ट कर दिया. अतः जो ज्ञात है उसे पहले जाना जाए.

डॉ. ध्यान सिंह के साभार और उनके कर कमलों से उनके शोधग्रंथ का तीसरा और मुख्य अध्याय मेघवंशियों को समर्पित है.

डॉ. ध्यान सिंह
 
उक्त ज्ञात इतिहास को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.

01 June 2011

Baba Faqir Chand- Secret-3 बाबा फकीर चंद - रहस्य-3



(In the last Post 'Secret-2', the secret of mental life force was mentioned, which got prominence   in Rhonda Byrne’s book 'The Secret'.  Seekers have expressed their experiences pertaining to life beyond mind and thoughts. This area was not in the perspective of Rhonda Byrne nor did she emphasize this in her book. It was not required. This state is attainable by a person not having worldly desires. It is here in words of Faqir.

पिछली पोस्ट Secret-2’ में मानसिक जीवन शक्ति के रहस्य का उल्लेख था जिसे रॉण्डा बर्न (Rhonda Byrne) की पुस्तक ‘The Secret’ में मुख्य रखा गया था. मन-विचार से आगे के जीवन के बारे में साधकों ने अपने-अपने अनुभव व्यक्त किए हैं. यह क्षेत्र रॉण्डा बर्न के परिप्रेक्ष्य में नहीं था न ही उसने अपनी पुस्तक में इस पर बल दिया है. इसकी आवश्यकता भी नहीं थी. इस अवस्था में वही व्यक्ति जा सकता है जिसकी सांसारिक इच्छाएँ न हों. इसे फकीर के शब्दों में सुने.) :-

Spiritual life - In addition to the life realization described above there is another life where there is no awareness of body or mind. There is no thought in that life and it is independent of the body and mind. When a person gets accustomed to the experiences of physical and mental senses, it becomes natural desire for him to enter such a state where he may get complete rest, just like a man desires joy of deep sleep after a day of hard work. Same way his desire to search a state of complete physical and mental rest is natural i.e. going beyond the reach of physical and mental senses which is the first step toward spiritual enlightenment.

Until a person works to the extent that the physical and mental fatigue is properly experienced, he cannot enjoy deep sleep. Similarly a person who does not obtain mental and physical peace in his physical and mental life and until he is totally fed up with the game of Maya, he cannot desire for spiritual enjoyment, a state of peace and bliss.

आत्मिक जीवन - जीवन के बोध के अतिरिक्त जिस को मैंने ऊपर वर्णन किया है, एक और जीवन है जहाँ शरीर या मन का बोध नहीं है. उस जीवन में विचार नहीं रहता और वह शरीर और मन के बोध से स्वतंत्र है. जब कोई व्यक्ति शारीरिक व मानसिक इन्द्रियों का अनुभव करते-करते अभ्यस्त हो जाता है तो उसके लिए ऐसी अवस्था की अभिलाषा स्वाभाविक हो जाती है जहाँ कि उसे पूर्ण विश्राम मिले, जैसे कि दिन भर के कठिन परिश्रम के पश्चात मनुष्य गहरी नींद का आनन्द उठाना चाहता है. जैसे मानसिक व शारीरिक कठिन परिश्रम के पश्चात एक व्यक्ति के लिए गहरी नींद की इच्छा स्वाभाविक होती है ठीक उसी प्रकार ऐसी अवस्था की खोज जहाँ कि उसे शारीरिक व मानसिक पूर्ण विश्राम मिल सके, स्वाभाविक होती है अर्थात् शारीरिक व मानसिक इन्द्रियों की पहुँच के परे जाना है जो आत्मिक ज्ञान की ओर पहला कदम है.

जब तक कोई व्यक्ति ठीक इतना कार्य नहीं करता कि वह शारीरिक व मानसिक थकान का भान न करने लगे, वह गहरी नींद का आनन्द नहीं उठा सकता. ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति जिसको अपने शारीरिक व मानसिक जीवन में सच्ची मानसिक व आत्मिक शान्ति प्राप्त नहीं होती और माया के खेल खेलते हुये पूर्णतया उकता नहीं जाता, वह अध्यात्म (रूहानियत) की जो शान्ति और आनन्द का भंडार है, जिज्ञासा नहीं कर सकता.

नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)