27 September 2011

Baba Faqir Chand and Inner Practices – बाबा फकीर चंद और आंतरिक साधन


Baba Faqir Chand
A question had been hanging on my mind whether Baba Faqir Chand, who spoke and wrote so much on inner practices, had really got fed up with all such yogic practices.

It is certain that all divine visions experienced during inner practices can continue till we exist in the body and till neural activity continues. What happens after death is a matter of imagination and entertainment. The fact is that nobody returned after ‘final death’ of heart and brain and did not reveal his experiences about it. Stories of rebirth are fabricated and shops keep humming with business.

I got a reference from Bhagat Munshi Ram’s book ‘Santmat (The opinion of Saints)’. He writes:-

The soul which realizes the third form of Guru gets liberated in due course. That is why he (Faqir) has written in his last discourses that ‘he was against inner practices. Whenever he sat for inner practices he surrendered to that form (Murti). He sought shelter in that. Intentional inner practices were nothing but a come back to the region of ego and he used to curse his mind and ask what good it was for.’ Param Dayal Ji used to explain it in these words:-
“I have pulled down the sand house”

It is clear indication that inner practices done intentionally do tire us and a desire to get rid of them takes us to yet another state though all such stages are different experiences within neural activity. It is like child making sand house, playing with it till getting fed up with it and then again constructing something new.

Bhagat Munshi Ram
यह बात मेरे मन पर अटकी थी कि साधन-अभ्यास का आंतरिक अवस्थाओं पर इतना बोलने-लिखने वाले बाबा फकीर चंद क्या इन साधनों से उकता नहीं होंगे.

यह तो तय है कि साधन के दौरान अलौकिक और दैवी दृष्य और विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव तभी तक होता है जब तक शरीर है या मस्तिष्क की न्यूरल गतिविधि चलती है. हृदय और मस्तिष्क की अंतिम मृत्यु के बाद क्या होता है यह केवल अनुमान और मनोरंजन का विषय है. हृदय और मस्तिष्क की अंतिम मृत्यु के बाद आज तक न कोई लौटा और न अपने तत्संबंधी अनुभव के बारे में किसी ने कुछ बताया. पुनर्जन्म की कहानियाँ गढ़ ली जाती हैं और दुकानदारियाँ चलती रहती हैं.

मुझे भगत मुंशीराम जी की पुस्तक संतमत से यह उद्धरण मिला है. वे लिखते हैं:-

जिस जीव पर उनकी परम दयालुता से तीसरी मूर्ति के दर्शन हो जाते हैं, उसके धीरे-धीरे सभी बंधन कट जाते हैं. इसलिए उन्होंने (फकीर ने) अपने आखिरी सत्संगों में लिखा है कि मैं अभ्यास के विरुद्ध हूँ. मैं जब कभी अपनी नीयत से अभ्यास करने बैठता हूँ तो अपने आप को उस मूर्ति के हवाले कर देता हूँ. शरणागत हो जाता हूँ. अपनी नीयत से अभ्यास करना अब अभिमान में आना समझता हूँ और मन को लानत देता हूँ कि ऐ मन तू क्या कर सकता है. इस बात को हुज़ूर परम दयाल जी महाराज इन शब्दों में ब्यान करते थे :-
मैंने अब सब ढेरियाँ ढा दीं.

इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि नीयत से साधन करना एक प्रकार की थकान देता है और उस थकान से अलग होने की इच्छा व्यक्ति को एक अन्य अवस्था में ले जाती है यद्यपि वे सभी अवस्थाएँ न्यूरल गतिविधि के ही अनुभव हैं.  यह लगभग वैसा ही है जैसे बच्चा रेत का घर बनाता है, खुश होता है और उकता कर उसे तोड़ता है. फिर कुछ नया बनाता है.



20 September 2011

Meghdhara - Media of Meghvansh - मेघवंश के समाचार-पत्र का प्रकाशन






11 सितंबर 2011 को मैं इंटरनेट खोल कर बैठा था कि जितनी जल्दी हो सके कच्छ, गुजरात से प्रकाशित होने वाले मेघ समाज के नए समाचार-पत्र मेघधारा के उद्घाटन कार्यक्रम को देख सकूँ. और मैं इसे देख पाया. हृदय प्रसन्नता से भर गया. इस प्रकाशन का आइडिया आने, इसके नाम सुझाने की प्रक्रिया और इसके रजिस्ट्रेशन तक के सारे विवरण श्री नवीन भोइया मुझे देते रहे हैं और इन पर लंबी चर्चा होती रही है. अब इस लघु समाचार-पत्र के विमोचन और तत्संबंधी कार्यक्रम के फोटो भी प्राप्त हो गए हैं. इस महत्वपूर्ण क्षण को MEGHnet पर सहेज रहा हूँ. मेघ समाज को बहुत बधाई. साथ ही एक सुझाव है कि इस समाचार पत्र को वे अपनी वेबसाइट पर भी प्रकाशित कर दिया करें. मेरी हार्दिक इच्छा है कि ऐसा एक समाचार-पत्र जम्मू से भी निकले और आपस में सूचनाओं का आदान प्रदान एक गति पकड़े. राजस्थान से पहले ही कई समाचार-पत्र छप रहे हैं यथा- 'हक़दार', 'दर्द की आवाज़', 'उदय मेघ' आदि. मध्यप्रदेश से 'राजा बली समाज' छपता है. ये सभी समाचार-पत्र समुदाय में सूचनाएँ और जानकारी साझा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसी सिलसिले में अब 'मेघधारा' का नाम भी जुड़ गया है.


MEGHnet


श्री नवीन भोइया द्वारा ईमेल से भेजा विशेष नोट :-


MEGHDHARA INAUGURATION PROGRAM HELD ON 11.09.2011 AT BHUJ-KUTCH.

Inauguration of first mouthpiece of Maheshwari Meghwar community’s mouthpiece ‘Meghdhara’ was held on 11.09.2011 at Bhuj-Kutch. Prominent people from all the 10 Talukas of Kutch District were present in the function. Meghdhara is the first community paper for uniting Meghwars of Kutch, Saurastra, Jamnagar districts of Gujarat.

Shri M. Thennarson, Collector, Kutch was the Chief Guest who inaugurated the magazine. Dr. L.V. Fafal, President of Akhil Kutch Maheshwari Vikas Seva Sangh (a registered Trust popularly also known as All India Maheshwari Youth Federation) welcomed the guests and apprised about need of intellectual unity in the community. Dr. Naresh Keniya invited the guests to take seats on dice. Mrs. Bhartiben Katuva and Mr. Mavjibhai Maheshwari, an award winner Gujarati literature writer and Hon. Editor of Meghdhara anchored the function. Mr. Khim Dhua and Mr. Navin K. Bhoiya arranged live telecast of the function on maheshpanthi website.

Pir-Shri Meghji Nangshi Lalan (religions head of Barmati Panth), Mr. Kanji Bharya, Mr. J P Maheshwari, Directors ICON Nirman Pvt. Ltd., Mr. Ramji Dheda, Businessman, Shri Thennarson, Collector-Kutch, Shri L.V. Fafal and Shri Ramesh Maheshwari (MLA of Kutch) remained present on the dice.

This function was one of the biggest functions in the community in which delegates from Districts like Jamnagar, Rajkot and Ahmedabad were also present along with delegates from Kutch District.

The program was initiated by singing National Anthem to show solidarity as citizen and indigenous inhabitant of India.




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इस समाचार-पत्र के विमोचन से संबंधित जानकारी नीचे दी गई है :-


मेघधारा का प्रकाशन - हार्दिक निमंत्रण - धर्माचार

आप सभी को यह तथ्य विदित है कि हमारा महेश्वरी मेघवाल समाज प्रतिदिन हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. समय के साथ ताल मिलाते हुए नई पीढ़ी संघर्ष करके नए परिणाम ला रही है. हमारे पास जनशक्ति है. ज़रूरत है एक मंच की, एक व्यवस्था की जो हमारे समाज के बंधुओं को एक-दूसरे के नज़दीक लाए और समाज में भावनात्मक एकता सुदृढ़ हो सके. इसी व्यवस्था को कायम करने वाला समाज का प्रतिबिंब एक समाचार-पत्र होता है.

ईमेल से मिला निमंत्रण-पत्र
श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ (मुन्द्रा) के तत्वाधान में महेश्वरी समाज के समाचार-पत्र मेघधारा का प्रकाशन शुरू किया जा रहा है. इसी समाचार पत्र मेघधारा के प्रथम अंक के विमोचन के ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बने और सपरिवार पधारने का भाव भरा निमंत्रण स्वीकार करें.

कार्यक्रम का उद्घाटन : पीर श्री मेघजी नांगशी लालण, (अखिल महेश्वरी मेघवाल समाज के धार्मिक प्रमुख)

विमोचन कर्ता : श्री एम. थेन्नारेसन IAS, माननीय कलेक्टर, कच्छ

मुख्य अतिथि : श्री वी. एम. पारघी, IPS, IGP बोर्डर रेन्ज कच्छ

श्री जी. एल. भगत, IRS, कमिश्नर ऑफ इन्कम टैक्स, मुंबई
श्री रमेशभाई महेश्वरी, माननीय धारासभ्य , मुंद्रा मत विभाग

तारीख : 11-09-2011 रविवार, समय  :  सुबह 10.00 बजे
स्थान : श्री लोहाणा समाजवाडी , वी. डी. हाईस्कूल के पास, भुज, कच्छ

इस स्वर्णिम अवसर पर प्रतिभागिता करके समाज का गौरव बढ़ाएँ यही अनुरोध है.
निमंत्रक  : श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ मुन्द्रा, कच्छ
(श्री जी. एल. भगत भाग नहीं ले सके.)

समारोह के शुभारंभ में कच्छ के कलेक्टर ने सहयोग दिया
 
कार्यक्रम में दर्शक - एक ऐतिहासिक क्षण

बैनर

Collector Kutch Mr. M. Thennarsan, IAS giving his speech

Felicitation of Pir Auva (Religious Head of Maheshwari Community)

Felicitation of Shri Ramesh Maheshwari, MLA by Shri Vallabh Katuva

First lady professor of our Maheshwari community Mrs. Divyaben Maheshwari

Glimpse of inauguration

Public view during National Anthem

Shri Mavjibhai Maheshwari, Editor-Meghdhara

Smt. Bhartiben Katuva, Mavjibhai, Navinbhai and Mangalbhai

Inaugural front page of 'Meghdhara'

प्रेस विज्ञप्ति :-

14 September 2011

Dr. J.B.D. Castro - Miracle we call him - बोले तो चमत्कार !!! डॉ. कैस्ट्रो


चंडीगढ़ के एक प्रसिद्ध होमियोपैथ हैं डॉ. कास्ट्रो (Dr.J.B.D. Castro). केरल के हैं. इनके बहुत से मज़ेदार किस्से-कहानियाँ होमियोपैथी के सर्कल में मशहूर हैं. चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्र में होमियोपैथी को लोकप्रिय बनाने में इनका कोई सानी नहीं.

कैंसर पर लिखी इनकी पुस्तक ‘Cancer-Cause, Care & Cure’ को देखने का कल अवसर मिला. इसकी शुरूआत ही यूँ थी, "हमने एक अमूल्य जीवन खो दिया." कैंसर के एक मरीज़ को बहुत चुन कर दवा दी गई. लेकिन मरीज़ की मृत्यु हो गई क्योंकि उसका इलाज करने वाले होमियोपैथ चिकित्सकों की टीम नोटिस नहीं ले पाई कि मरीज़ बहुत उदास रहती थी. अन्य सभी लक्षणों के आधार पर उसे दवा दी जाती रही. हर चिकित्सा प्रणाली अपनी असफलताओं से सीखती है. पुस्तक नकारात्मक उदाहरण से शुरू होती है और सकारात्मकता की ओर जाती है. टिपिकल कास्ट्रो और कास्ट्रोलॉजी !!

सुना है कि डॉ. कास्ट्रो के क्लीनिक में एक अत्याधुनिक जीवन शैली का पढ़ा-लिखा पंजाबी जोड़ा आता था. दोनों में प्रेम था. सुंदर कद-काठी की महिला 40 वर्ष की और नौजवान लड़का 23-24 का. बेमेल प्रेम का मामला था. कुछ समय बाद महिला को पता चला कि उसके मित्र लड़के की मित्रता एक हमउम्र लड़की से भी हो गई थी. परेशान महिला डॉ. कास्ट्रो के पास आई और कहा, उस लड़के को ऐसी दवा दो कि वह उस लड़की को छोड़ कर मेरे पास लौट आए.” कई लोग सोचते होंगे कि इसका दवा से क्या लेना-देना. 

लेकिन आगे चल कर उस लड़के ने अपनी हमउम्र लड़की से शादी की और शादी जम गई. इस मामले में नेट्रम म्यूरिएटिकम नाम की दवा का ज़िक्र था जो बेमेल प्रेम के मामले में कार्य करती है- जैसे नौकरानी से प्रेम आदि. कहते हैं डॉ. कास्ट्रो ने उस लड़के को चुपचाप यह दवा दे कर मामला सही बैठा दिया. प्रेम में यदि वह महिला निराश हुई होगी तो उसे 'इग्नेशिया' दे कर सँभाल लिया होगा.

मैं सोचता हूँ कि वह पंजाबी महिला अगर मेरा ब्लॉग आज पढ़ ले तो गला फाड़ कर दहाड़ेगी, डॉ. कास्ट्रो! यू केरलाइट चीट!! आई विल नॉट स्पेयर यू. एंड भूषण !! यू चंडीगढ़ियन रैट...आई एम नॉट गोइंग टू स्पेयर यू आइदर.पहली नज़र में लगता है कि उस महिला को उसके युवा मित्र ने धोखा दिया और डॉक्टर ने भी धोखा दिया. सच यह भी है कि वह महिला खुद को धोखा दे रही थी.

जैसा कि कहा जाता है- डॉक्टर इज़ डॉक्टर. उसने दो युवाओं का जीवन बचा लिया जो अधिक महत्वपूर्ण है. 

मैं डर रहा हूँ कि यदि असली बात से अनजान उस महिला ने मेरा ब्लॉग में सच को पढ़ लिया तो? लेकिन डर इस बात से दूर हो रहा है कि मेरा ब्लॉग हिंदी में है और फिर....डॉक्टर पास ही है न.

13 September 2011

Kayasthas in Radhasoami Mat - राधास्वामी मत में कायस्थ – Maharishi Shivbrat Lal Varman महर्षि शिवब्रत लाल वर्मन


पहले यह कह देना उचित होगा कि राधास्वामी मत की स्थापना स्वामी जी महाराज ने की थी जो सहजधारी सिख थे. उन्होंने सत्गुरु (सत्ज्ञान) देने का कार्य राय सालिग्राम को दिया दिया था जो कायस्थ थे और राधास्वामी मत का आज का जो स्वरूप है उसे आकार देने वाले राय सालिग्राम ही हैं.

सालिग्राम जी के शिष्य शिवब्रत लाल बर्मन का जन्म सन् 1860 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िला में हुआ था. वे दाता दयालऔर महर्षि जीके नाम से प्रसिद्ध हुए. वे स्नातकोत्तर (एम.ए., एल.एल.डी.) थे और साथ ही लेखक और आध्यात्मिक गुरु के रूप में ख्याति पाई. उन्होंने विभिन्न विषयों यथा सामाजिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर लगभग 3000 पुस्तकें-पुस्तिकाएँ लिखीं और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. संतमत, राधास्वामी मत और सुरत-शब्द योग आदि पर अनेक पुस्तकें लिखने के कारण उन्हें राधास्वामी मत का वेद व्यासभी कहा गया.

उनका अपने गुरु में अटल विश्वास था और वे राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन के अनुयायी बन गए. सन् 1898 में अपने गुरु के निधन के बाद उन्होंने सन् 1898 से ले कर 1939 तक राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन की सेवा की.

उर्दू साप्ताहिक 'आर्य गज़ट' के संपादक के तौर पर कार्य करने के लिए वे लाहौर गए थे. 01 अगस्त 1907 को उन्होंने अपनी एक पत्रिका 'साधु' शुरू की. बहुत जल्द यह लोकप्रिय हो गई. एक लेखक के रूप में वे स्थापित हुए. हिंदी के अतिरिक्त इन्होंने उर्दू और अंग्रेज़ी में भी लिखा. ये फ़ारसी के भी अच्छे जानकार थे. इनकी पुस्तकें 'लाइट ऑन आनंद योग', 'दयाल योग' और 'शब्द योग' बहुत प्रसिद्ध हुईं.

विश्व में राधास्वामी आध्यात्मिक आंदोलन फैलाने के लिए उन्होंने लाहौर से दुनिया की यात्रा शुरू की. 2 अगस्त 1911 को वे कोलकाता पहुँचे. 22 अक्टूबर 1911 को वे कोलकाता से रंगून की ओर समुद्र से रवाना हुए. 31 अक्तूबर को वे पेनांग पहुँचे और सिंगापुर और जावा होते हुए 22 नवंबर को हांगकांग पहुँचे. इन सभी स्थानों पर वे राधास्वामी आध्यात्मिक आंदोलन का संदेश फैला रहे थे. उसके बाद वे जापान और बाद में सैनफ्रांसिस्को, अमेरिका गये और सैनफ्रांसिस्को में व्याख्यान भी दिए.

सन् 1912 में शिवब्रत लाल जी ने गोपी गंज, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश, भारत में अपने आश्रम की स्थापना की. उनके प्रेरक प्रवचनों ने समस्त भारत और विदेशों में भी राधास्वामी आंदोलन के चाहने वालों को आकर्षित किया. 23 फरवरी 1939 को उनासी वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. उनकी पवित्र समाधि गोपी गंज के निकट राधास्वामी धाम में है.

इसके अतिरिक्त और बहुत कुछ है जो दाता दयाल महर्षि के बारे में जानने योग्य है. वे कायस्थ थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत की दूसरी टॉकी फिल्म शिवब्रतलाल जी ने बनाई थी जिसका नाम था शाही लकड़हारा जो इन्हीं के एक आध्यात्मिक उपन्यास पर आधारित थी. सुना है कि यह फिल्म इन्होंने अपने दामाद की सहायता करने के लिए बनाई थी.

Faqir Library, Hoshiarpur
इनके साहित्य में इनके शिष्य उक्त बाबा फकीर चंद का बहुत बार उल्लेख आता है. इन्होंने एक पूरी पुस्तकफ़कीर शब्दावली लिखी है. पहले कभी सुनने में नहीं आता था कि किसी गुरु ने अपने शिष्य की प्रशंसा में पुस्तकें लिखी हों. ऐसा करना गुरु गद्दी के लिए खतरा बन सकता है. दाता दयाल इन बातों से ऊपर थे और उन्होंने अपने शिष्य की दिल खोल कर तारीफ की है. फकीर ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने अनुयायी भगत मुंशीराम की तारीफ में बुहत कुछ कहा है. भगत मुंशीराम जी ने दाता दयाल जी की वाणी और शिक्षा की व्याख्या अपने साहित्य में की है.
Statue of Data Dayal  Ji Maharaj, Hoshiarpu
मैंने स्वयं परम दयाल फकीर चंद जी से सुना है कि जब दाता दयाल जी बहुत बूढ़े हो चुके थे तब भी देश के दूरदराज़ के शहर-गाँव में जाकर राधास्वामी मत का कार्य करते थे. एक बार फकीर ने कहा कि दाता आप इस उम्र में क्यों इतना कष्ट उठाते हैं, अब आप इतनी यात्रा न किया करें तो उन्होंने कहा, फ़कीर, मेरे गाँव के लोग बहुत गरीब हैं. मैं जाता हूँ तो उनके लिए चार पैसे ले आता हूँ. इस पैसे से वे अपने गाँव में एक आश्रम चलते थे जहाँ लोगों को रोज़गार और भोजन मिल जाता था. कमाई के लिए सारी-सारी रात लिखते थे. सहायता स्वरूप दान देने में कभी कोई कमी नहीं आने दी. शिष्यों के दान और चढ़ावे में से अपने लिए कुछ इस्तेमाल नहीं करते थे. फकीर ने भारत और इराक में की हुई अपनी कमाई का बहुत-सा हिस्सा इन्हें भेजा. दाता दयाल जानते थे कि फकीर की कमाई पर उसके परिवार का हक़ है. जब कई वर्ष बाद फकीर घर लौटे तो उनकी पत्नी ने दाता दयाल से शिकायत की कि ये घर में पैसे नहीं देते हैं तो दाता दयाल ने कहा कि किसने कहा है फकीर ने तुम्हारे लिए पैसा नहीं रखा. और उन्होंने बैंक से निकलवा कर 20000/- रुपए फकीर की पत्नी को दिए.

फकीर ने अपने सत्संगों में बताया है कि वे एक बार अपने घर में बहुत कष्टपूर्ण स्थिति में थे और ध्यान दाता दयाल की दया पर लगा था. उस समय दाता दयाल किसी अन्य शहर में सत्संग करा रहे थे. अचानक उन्होंने सत्संग समाप्त करते हुए कहा कि चलो भाई, मेरा फकीर मुसीबत में है. इतनी संवेदनशीलता कितने लोगों में देखने को मिलती है.

दूसरे विश्वयुद्ध में इराक में युद्ध के दौरान एक बार फकीर और उनके साथी शत्रु फौजों से घिर गए. बचने की कोई उम्मीद नहीं थी क्योंकि गोला-बारूद लगभग खत्म हो चुका था. जैसा कि साधक करते आए हैं फकीर ने दाता दयाल जी का ध्यान किया और दाता दयाल का रूप प्रकट हुआ जिसने कुछ हिदायतों के साथ कहा कि विरोधी सेनाओं को उनके मृत फौजियों की लाशें ले जाने दो, वे तुम पर हमला नहीं करेंगे. फकीर ने यह बात सब को बताई जिसका पालन किया गया. वे सभी सुरक्षित रहे. जब वे इराक से लौटते हुए लाहौर स्टेशन पर पहुँचे तो फकीर के कुछ शिष्यों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि, हम युद्ध की मुसीबतों में फँस गए थे. हमने आपका ध्यान किया और आपने हमारी मदद की.

फकीर सोच में पड़े कि मैं तो स्वयं मुसीबत में था और दाता दयाल का ध्यान कर रहा था. मैं तो इनकी मदद के लिए गया नहीं. क्या माजरा है कि ये लोग कह रहे हैं कि मेरा रूप इनके यहाँ प्रकट हुआ था. इस घटना ने फकीर की आँखें खोल दीं और उन्हें दाता दयाल की वह बात याद हो आई जो उन्होंने फकीर को कही थी कि सत्संगियों के रूप में तुम्हें सत्गुरु (सच्चे ज्ञान) के दर्शन होंगे. वे जान गए कि कोई गुरु, ईश्वर, अल्लाह बाहर से नहीं आता. वे सब व्यक्ति के भीतर के संस्कार होते हैं जो किसी कठिन परिस्थिति में रूप बन कर प्रकट होते दिखते हैं. तब से फकीर दाता दयाल की सही प्रकार से क़द्र कर पाए. कैलिफोर्निया में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और धार्मिक पाखंडवाद के विशेषज्ञ डॉ. डेविड सी. लेन ने इस पर एक फिल्म बनाई है जिसे इस लिंक पर देखा जा सकता है- Inner Visions and Running Trains.

हैदराबाद के संत श्री पी. आनंद राव जी जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है उन्होंने दाता दयाल के बारे में एक कथा सुनाई थी कि एक बार एक स्त्री उनके पास अपने छह माह के शिशु को ले आई जिसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. उस स्त्री को विश्वास था कि दाता दयाल उसे ज़िंदा कर सकते हैं. दाता दयाल ने उसे डॉक्टर की सलाह मानने के लिए कहा लेकिन वह नहीं मानी और शिशु को उनके आश्रम में छोड़ कर चली गई. प्रातः जब वह स्त्री लौटी उस समय शिशु खेल रहा था. ऐसे कई चमत्कार उनके जीवन से जुड़े हैं जिनके बारे में दाता दयाल ने कभी कोई श्रेय नहीं लिया. वे उन्हें स्वाभाविक घटनाएँ बताते रहे.

जीवन में इतना कार्य करने वाले और जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने वाले शिवब्रत लाल जी के जीवन का आखिरी पड़ाव बहुत निर्धनता में बीता. खाना भी पूरा और ठीक से नहीं मिलता था. फकीर ने कहीं लिखा है कि दाता दयाल में फकीरी की अवस्था का बहुत गहरा ख़्याल होने के कारण ऐसा होना स्वाभाविक था. उन्होंने मकाँ जब छुट गया तो क्यों ख़्याले ला मकाँ रखना जैसे शब्दों की रचना की थी.
शिवब्रत लाल जी ने देश-विदेश में खूब भ्रमण किया. इस सिलसिले में उन्होंने कितने शिष्य बनाए इसका सही पता लगाना कठिन है. दाता दयाल जी के चोला छोड़ने के बाद उनके गाँव में उनकी समाधि बना दी गई. किसी महात्मा की मृत्यु के बाद उनकी छोड़ी परंपरा में लोग सब से पहले उसकी संपत्ति देखते हैं. उनकी शिक्षा को जायदाद मानने वाले बिरले होते हैं. बाबा फकीर चंद निस्संदेह प्रमुख शिष्य थे लेकिन वे गोपी गंज जाना नहीं चाहते थे. उन्होंने समय-समय पर लोगों को वहाँ आचार्य नियुक्त किया. पहले एक सज्जन श्री कुबेरनाथ श्रीवास्तव को वहाँ का आचार्य बनाया. लेकिन दाता दयाल के संबंधियों ने उनका विरोध किया. उसके बाद अध्यात्म के क्षेत्र में बहुत ही व्यावहारिक व्यक्ति श्री प्रेमानंद जी को उक्त कार्य दिया लेकिन उन्हें भी कार्य नहीं करने दिया गया.

दाता दयाल जी की वाणी की व्याख्या बाबाफकीर और भगत मुंशीराम ने खूब की है. वर्तमान में मानवता मंदिर में गुरु का कार्य कर रहे दयाल कमल जी महाराज (श्री बी.आर. कमल) भी अपने सत्संग में दाता दयाल की वाणी के आधार पर सत्संग कराते हैं.

दाता दयाल जी के एक अन्य शिष्य श्री मामराज शर्मा ने दाता दयाल जी की जीवनी लिखी है जिसका प्रकाशन मानवता मंदिर, होशियारपुर के ट्रस्ट ने किया था और उसे निःशुल्क वितरित किया था.

दाता दयाल की समाधि पर एक बहुत बड़े स्तंभ का निर्माण किया जा रहा है.

अन्य लिंक्स सहित विस्तृत आलेख यहाँ पढ़ा जा सकता है:-


राधास्वामी मत से जुड़े अन्य कायस्थ सज्जन

संत कुबेरनाथ, एडवोकेट (कायस्थ)
संत प्रेमानंद जी (कायस्थ)  f/o Shri A.N. Roy
अगम प्रसाद माथुर (कायस्थ) ऱाधास्वामी मत पर इनकी पुस्तकें बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं.




09 September 2011

अध्यात्म और अनुभव ज्ञान - बाबा फकीर चंद




(कल बहुत दिनों के बाद अपनी गढ़त करने वाली पुस्तकों को छुआ. और बाबा फकीर चंद जी की एक पुस्तक 'अगम-वाणी' से यह मिला. यह इसलिए भी अच्छा लगा कि यह MEGHnet पर 200वीं पोस्ट है.) 
"वाणी कहती है कि राधास्वामी अनामीअरंग अरूप की आदि अवस्था में थे जिसे अचरज रूप कहते हैंकेवल इस ख्याल से कि मैं किसी के अन्तर नहीं जातामेरे अन्तर जो रूपरंगदृश्य पैदा होते थे उनको तथा सहसदल कंवलत्रिकुटी आदि को छोड़ने के लिये मैं विवश हुआ क्योंकि वह मुझे मायावी और कल्पित सिद्ध हुएवे दृश्य आदि हमारे मन पर बाह्य प्रभावों से या अपनी प्रकृति के कारण आते हैंशब्द और प्रकाश से गुज़रता हुआ जब इनसे आगे चलता हूँ तो फिर उस मालिक को समझनेदेखने की शक्ति नहीं हैसिवाय अचरज के और कुछ नहीं हैजब वहाँ से उत्थान होता हैशब्द और प्रकाश की चेतनता आती हैवह अगम हैइसी प्रकार मेरी ही नहीं हर एक जीव की या हर एक मनुष्य की यही दशा है. 
तो फिर मेरे जीवन की रिसर्च यह सिद्ध करती है कि उस परमतत्त्वअनामीअकाल पुरुष की अवस्था से यह चेतन का बुलबुला प्रगट हुआ और उसी में समा गया. ‘लब खुले और बन्द हुयेयह राज़े ज़िन्दगानी है’.

अब संसार वालोसोचोमैंने जो खोज की हैक्या वह सत्य नहीं हैआज 80 वर्ष के बाद अपना अनुभव कहता हूँ कि जो कुछ वाणी में लिखा है वह ठीक हैइसकी सचाई का ज्ञान केवल गुरुपद पर आने से हुआजो लोग मेरा रूप अपने मन से या अपनी आत्मा से अपने अन्तर में बनाते है और मैं नहीं होता तो सिद्ध हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर जो वह हैवह और है और जो शक्ति उसकी रचना करती हैउसकी अंश हैवह उसकी सत्ता है इसलिये वह जो उस अनामी धामहैरतअकाल पुरुष की सत्ता है वह रचना करती हैतमाम धर्म पंथहर प्रकार के योगीहर प्रकार के विचारवानकिससे काम लेते हैंवह है अपने आपकी सत्ताजो मनरूपी उनके साथ रहती है और उससे काम लेते हैंमनुष्य के अन्तर में उसका मन रचना करता है और ब्रह्मंडब्रह्मंडीय मन उस अकाल पुरुष, परमतत्त्वअनामीआश्यर्चरूप की सत्ता है
प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय तथा पंथ वाले उस मालिक को अपने मन से अलग समझकर उसको पूजते हैंकोई कहता है अन्तर में राम मिलता है कोई कहता है उसका अलग मंडल हैअलग लोक हैमैं भी ऐसा ही समझा करता था मगर जब सत्संगियों के कहने से ज्ञान हुआ कि वह अपने अन्तर सूर्यचन्द्रमादेवीदेवताओं के रूप देखते हैं और मेरा रूप भी देखते हैं मगर मैं नहीं होता तो मुझे निश्चय हो गया कि यह सब खेल इनके अपने ही काल रूपी मन का हैइसी प्रकार इस बाहरी रचना में ब्रह्माविष्णुमहेशदेवी देवतालोक-लोकान्तर सब ब्रह्मंडी मन काल ने बनाये हैंजिस तरह मनुष्य का मन अपने अन्तर अपनी रचना करता है और वह रचना हमारी सुरत को भरमाती रहती हैइसी प्रकार यह बाहर की रचना हमको भरमाती रहती हैवास्तव में यह रचना उस असल अकाल पुरुषदयाल पुरुष का प्रतिबिम्ब है और हम उस अकाल पुरुष या दयाल पुरुष की अंश हैयहाँ आकर अपनी रचना में और बाहरी रचना में इसे भूल गयेउस भूल को मिटाने के लिये यह परम संत सत्गुरु का रूप धारण करके जीवों को अपने घर का पता देता है."बाबा फकीर चंद, अगम वाणी से

Wikipedia : बाबा फकीर चंद

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