11 December 2012

Katju and Phoolan - काटजू और फूलन


Katju and Phoolan -Dilip Mandal

दुनिया फूलन देवी को जॉन ऑफ आर्क और आंग सान सू की की लिस्ट में रखकर सलाम करती है (देखें दुनिया की सबसे बड़ी पत्रिका TIME की लिस्ट http://www.time.com/time/photogallery/0,29307,2057714_2251971,00.html लेकिन मिस्टर काटजू के लिए वे पिछड़ी जाति यानी OBC की डकैत और हत्यारिन मात्र थीं, जो अपने चुनाव क्षेत्र में पिछड़ी जातियों की ज्यादा संख्या होने के कारण जीत गईं. मिस्टर काटजू, क्या आप बताएंगे कि भारत का कौन सा लोकसभा चुनाव क्षेत्र ऐसा है जहां OBC मेजोरिटी में नहीं है. बताएं, क्योंकि आप बेवकूफ नहीं हैं.

.क्योंकि मिस्टर काटजू को फूलन देवी होने का मतलब नहीं मालूम और क्योंकि उन्हें लगता है कि फूलन देवी जैसी "डकैत और हत्यारिन" सिर्फ जाति के दम पर चुनाव जीत जाती हैं, इसलिए यह बताना जरूरी है कि दुनिया की सबसे बड़ी पत्रिका TIME ने फूलन देवी को विश्व इतिहास की 16 शीर्ष विद्रोहिणियों की लिस्ट में चौथे नंबर पर रखा है. भारत में यह एकमात्र एंट्री है. काटजू जी, TIME मैगजीन में आप सिंगल कॉलम नहीं छप पाते.

Phoolan Devi

Indian folk hero who metamorphosed from outlaw into law-maker
The Guardian, Thursday 26 July 2001 23.36 BST

Phoolan Devi, who has been gunned down, aged 38, on her own doorstep in New Delhi's high-security area in broad daylight, has an assured place in contemporary Indian history. She was an opposition MP but, before that, she had been the legendary "Bandit Queen". This honorific generated a lot of glamour - and led to the Channel 4-backed feature film Bandit Queen (1994) - but it gained momentum not because of any Robin Hood-like acts during her years as a dreaded dacoit and killer but because of her metamorphosis, during the last seven years of her life, from notorious outlaw into law-maker.

In the latter incarnation she did not make much contribution to parliamentary debate, but fought valiantly, more outside the House than inside, for the poor and the downtrodden, the class into which she was born. She was even more ferocious in seeking gender equality and justice in a male-dominated society in which the oppression and exploitation of women is egregious. Her passion wasn't based on hearsay - she had been subjected to unspeakable physical and sexual abuse. It was that which had driven her to the Chambal ravines in central India, citadel of murderers, robbers, marauders and gangsters.

She was born into an utterly impoverished, low-caste family of boatmen, the second of four siblings. At 11 she was married off to a much older man - and a sadist. Within a year she was back in the parental hovel, but not for long.

A gang of upper-caste robbers abducted her and took her to their Chambal hideout. Thus began her career in crime. In 1980 she was gang-raped by the desperados belonging to the upper-caste Dhakurs. She took her revenge in 1981, slaughtering 22 Dhakur gangsters, including her one-time gang leader and lover. There was sensation and shock across India and a massive, fruitless hunt for Phoolan.

In 1983, she surrendered to the authorities, reportedly in return for a promise that she would stay behind bars for only eight years. But she was released only in 1994. It is a measure of the notorious judicial delays in India that although she was charged with 49 heinous crimes, she was never convicted.

The victims of her killings, however, kept demanding that she be put on trial again. But politically the times in India had changed. The backward-castes had suddenly become important in India's electoral calculus. Devi's caste became her passport to politics.

In 1996 she was first elected to parliament with a big majority on the ticket of Samajwadi (Socialist Party). But parliament was dissolved two years later and she lost her seat in the ensuing election; she was elected again in 1999.

By this time she had become a cult figure with a large following, especially among the lower-caste and the former untouchables. By this time she had remarried; he was a small-time politician, Umed Singh. More importantly, she had also started going to beauty parlours and wearing designer clothes, thus joining the great Indian middle class even while leading the fight of the poor and the disadvantaged for empowerment.

There were many biographies, including India's Bandit Queen: The True Story of Phoolan Devi (1991) by Mala Sen. This formed the basis of the Channel 4 production, which was only one of several films made about her. It was only released in India after several cuts. The Indian authorities did not want to show gory scenes of rape and murder. Thus, ironically, the films and the books gave Phoolan tremendous publicity and glamour - and a great deal of money by Indian standards.

Yet the circumstances of her death and the reaction it has produced indicate that Phoolan might now be more powerful than at any time during her life. Large-scale and at times violent demonstrations have erupted in her state, Uttar Pradesh, India's most populous, and a key political area. The leaders of her party have openly accused the Nationalist Hindu Party (BJP) of conspiracy to kill her. They say that UP's BJP government deliberately scaled down her security, something done also in the case of other opposition leaders. The government has denied the charges.

UP is going to the polls to elect a provincial parliament in February. The BJP's future prospects are uncertain, and the main challenge comes to it from the party to which Phoolan belonged. It is led by Mulyam Singh Yadav, a former chief minister of UP and a former Indian defence minister. He has vowed that Phoolan's murder will be avenged by the people, routing the BJP at the polls.

For the republic's president, K R Narayanan, Phoolan Devi was the symbol of the struggle of the poorest of the poor and of the feminist crusade at its finest.

• Phoolan Devi, campaigner, born 1963; died July 25 2001

MEGHnet 


 

28 November 2012

Indian Government ji, wake up – भारत सरकार जी, जागो


पोंटी चड्डा के मामले में मेरी नज़र केवल इस तथ्य पर अटक कर रह गई है कि उनके परिवार के कुछ सदस्यों को एक ही दिन में कई हथियारों के लाइसेंस दे दिए गए. उसके साथ ही बुलंदशहर में एक पति की हत्या (जिसे बदतमीज़ मीडिया अभी भी ऑनर किलिंग कहे जा रहा है) में प्रयोग हुए फायर आर्म्ज़ ने मुझे उन सभी घटनाओं की याद दिला दी है जिनमें यहाँ-वहाँ गली-कूचे में पता नहीं कहाँ से तमंचे, पिस्तौलें, राइफलें निकल आती हैं और खून से सनी लाशें छोड़ जाती हैं.

देश में आर्थिक हालात काफी तेज़ी से बदल रहे हैं. लोगों में ज़बरदस्त असंतोष है और सिस्टम के प्रति घृणा व्याप्त हो रही है. केजरीवाल की एक प्रेस कांफ्रेंस में प्रशांत भूषण ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि देश में गृहयुद्ध के हालात बन रहे हैं. पता नहीं सरकार की मंशा क्या है.

मैं सरकार पर कोई व्यंग नहीं करना चाहता हालाँकि प्रशासन हथियार और लाइसेंस देता है. अब समय आ गया है कि सरकार जारी हथियार वापस ले और उनकी संख्या को न्यूनतम करे. माफिया की नकेल कसे.

देश को भयंकर परिणामों से बचाने की सख़्त ज़रूरत है.


Let us play fire – आओ ठायँ-ठायँखेलें



19 November 2012

Ashoka the great - Ravana the great - अशोक महान - रावण महान


बचपन से एक प्रश्न मन में था कि लंका में बनी अशोक वाटिका में क्या कभी सम्राट अशोक रहते थे या यह वाटिका अशोक ने बनवाई थी? सीता-माता जिसमें रह रही थी उस वाटिका को हनुमान ने क्यों नष्ट कर दिया?

खैर ये बच्चे के मन में उठे छोटे-छोटे बेकार प्रश्न हो सकते हैं. फेसबुक पर एक प्रकरण पढ़ा जिसमें तार्किक दृष्टि से मुझे एक नई बात का पता चला. इसमें बड़ा प्रश्न निहित है कि रामायण (जिसे इतिहास से भी पहले का अतिप्राचीन ग्रंथ कहा जाता है) पहले लिखी गई या इतिहास में लिखे बुद्ध पहले हुए. इस बारे में फेसबुक पर अशोक दुसाध ने रामायण में से ही एक उद्धरण दिया है जो इस प्रकार है-

यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम् -अयोध्याकांड सर्ग 110 श्लोक 34

जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे! (श्लोक 34, सर्ग 109, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड.)”

इस श्लोक में बुद्ध-तथागत का उल्लेख होना हैरान करता है और इसके आधार पर मैं इस तर्क को अकाट्य मानता हूँ कि बुद्ध पहले हुए और रामायण की रचना बाद में की गई.  

इसी संदर्भ में फेसबुक पर क्षेत्रीय शक्यपुत्र की एक अन्य पोस्ट देखी जो इस कहानी को अन्य तरीके से कहती है. फिर भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि पुरानी कथा-कहानियाँ कई तरीके सुनी-सुनाई जाती रही हैं अतः लिखी बात का अर्थ भी हर व्यक्ति को अलग तरीके से संप्रेषित होता है. (हालाँकि शक्य पुत्र की यह पोस्ट रामायण की कथा में खोज-खुदाई करती है और अशोक के संदर्भ में कुछ समानताओं और विसंगतियों को ढूँढ लाती है, लेकिन इस पोस्ट में अपनी भी कुछ विसंगतियाँ हो सकती हैं.) ब्लॉग की दृष्टि से इसका थोड़ा सा संपादन मैंने किया है.


"1-रावण के कार्यकाल में अशोक वाटिका कहाँ से आती है? कहीं साहित्यकारों ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक को रावण के रूप में प्रदर्शित तो नहीं किया? क्योंकि, रावण की कुछ विशेषताएँ थीं जो कि सम्राट अशोक से मिलती जुलती हैं, महान विद्वान, वीर योद्धा, शूर सिपाही, बहुत बड़ा संत, अपने संबंधियों व प्रजा का दयालुता पूर्वक पालनकर्ता, शक्तिशाली पुरुष, वरदानी पुरुष,तना ही नहीं बल्कि रावण एक बौद्ध राजा था ऐसा श्रीलंका स्थित कुछ विद्वान भिख्खुओं का कहना है. आज भी रावण को श्रीलंका में पूजनीय माना जाता है. श्रीलंका में रावण के विहारों में कुछ मूर्तियाँ और कुछ शिल्पकलाएँ पाई जाती हैं जिनमें रावण धम्म का प्रचार करते हुए स्पष्ट नजर आते हैं. इतिहास को एक बार देखा जाए तो श्रीलंका में बौद्ध धम्म को फैलाने वाले और कोई नहीं वे सम्राट अशोक ही थे. रावण ऋषियों से घृणा करते थे. क्यों? क्योंकि वे यज्ञ के नाम पर छल-कपट पूर्ण स्वधर्म नियमानुसार गूँगे पशुओं को आग में बलि दे कर हृदय विदारक अपराध करते थे. तो इसी से यह साफ होता है कि रामायण एक काल्पनिक एवं बम्मनों द्वारा रची हुई नकली कथा है. अगर रावण यज्ञ में चल रहे पशुओं की बलि सह नहीं सकते थे तो क्या वे जटायु नामक पशु को मार सकते हैंरामायण में एक और कथा कही गयी है कि रावण ने सभी देवी-देवताओं को बंदी किया था. यह कथा भी सम्राट अशोक की कथा से मिलती जुलती है. क्योंकि सम्राट अशोक ने भी धम्म में घुसे हुए कुछ नकली लोगों को बंदी बनाकर उन्हें धम्म से हटा दिया था. अगर आप एक बार रामायण पढ़ें तो उसमें आपको दिखाई देगा कि इस नकली एवं काल्पनिक ग्रंथ के लेखक ने खुद रावण की प्रशंसा की है. वह लिखता है कि रावण एक सज्जन पुरुष था. वह सुंदर और उत्साही था. किंतु जब रावण ब्राह्मणों को यज्ञ करते हुए और सोमरस पीते हुए देखते थे तो उन्हें कड़ा दंड देते थे. इसलिए मुझे तो लगता है कि सम्राट अशोक का विद्रूपीकरण करके ही पाखंडियों ने रावण को ऐसा प्रदर्शित किया है. क्योंकि इतिहास तो यही कहता है कि धर्मांध लोगों द्वारा दशहरा माना जाता है. दशहरा का और दस पारमिता का कही कोई संबंध तो नहीं? क्योंकि इसी दिन सम्राट अशोक ने शस्त्र का त्याग कर बुद्ध का धम्म अपनाया था. जिसे आज हम धम्मचक्र प्रवर्तन दिन और अशोक विजयादशमी कहते हैं. आपने रामायण पढ़ी है? उसमें एक श्लोक आता है जो खुद रामायण की रचना करने वाले वाल्मीकि राम के मुख से कहलवाते हैं कि-

यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि 
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम् -
                                                                                       (अयोध्याकांड, सर्ग 110, श्लोक 34)


जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे!

उपर्युक्त श्लोक अपने आप में यह सिद्ध करने में पर्याप्त है कि रामायण की रचना बुद्ध के काल के बाद की है. यही कारण है कि रामायण के रचनाकार ने बुद्ध और नास्तिकों के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने का अवसर भी खोना नहीं चाहा. चाहे राम और रामायण काल्पनिक हो सकते हैं पर अनजाने में लेखक ने जो बुद्ध का उल्लेख किया है उसका क्या? क्या बुद्ध काल्पनिक है? सलिए दोस्तो बम्मनों द्वारा क्या ऐसी कथाएँ सिर्फ बौद्धों के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करने के लिए रची जाती हैं? क्योंकि संपूर्ण रामायण में रावण को नास्तिक कहा है और पाखंडियों के मतानुसार तो नास्तिक सिर्फ बौद्ध धम्मीय होते हैं. रावण को भी नास्तिक कहा है. क्या रावण बौद्ध था? क्या सम्राट अशोक को ही रावण के रूप में प्रदर्शित किया है?

2-सम्राट अशोक के पुत्र भदंत महेन्द्र की रामायण में नक़ल!! मोग्लिपुत्त तिष्य की  आज्ञा से सम्राट अशोक ने पहले अपने प्रिय पुत्र महेन्द्र को, इत्तीय, शम्बल, उक्तिय और भादशाल इन चार भिक्षुओं सहित श्रीलंका भेजा. बाद में पुत्री संघमित्रा को भी भेजा. विदिशागिरी में पहुँचने पर महेन्द्र ने अपने माता के भतीजे के पुत्र 'भंदु' को बुद्ध धम्म में दीक्षित कर भिक्षु बनाया और भंदु को साथ लेकर महेन्द्र अपने चार साथियों सहित श्रीलंका में मिस्सक (मिश्रक) पर्वत के समीप पहुँचा. इसी समय श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य अपने 40,000 अनुयायियों के साथ एक हरिण का शिकार करने में लगा था. एक हरिण भागता हुआ मिस्सक (मिश्रक) पर्वत पहुँचा जहाँ महेन्द्र अपने साथियों सहित ठहरा हुआ था. देवानुप्रिया त्तिष्य अपने 40,000 अनुयायियों के साथ हरिण के पीछे-पीछे हो लिया और हरिण महेन्द्र के पास पहुँच कर लुप्त हो गया और इस प्रकार देवानुप्रिया त्तिष्य का भदंत महेन्द्र के साथियों से परिचय हुआ और श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य महेन्द्र और उनके साथियों को लंका लेकर चला गया.

रामायण में इसकी नक़ल इस प्रकार की गई है- 

वनवास के समय, एक रावण (देवानुप्रिया त्तिष्य लंका के राजा को रावण बना दिया) ने सीता का हरण किया था (सही घटना का अर्थ "श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य महेन्द्र और उनके साथियों को लंका लेकर चला गया"). रामायण के अनुसार, सीता और लक्ष्मण कुटिया में अकेले थे तब एक हिरण की वाणी सुन कर सीता परेशान हो गयी और श्रीराम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने हरिण के पीछे-पीछे हो लिए (सही घटना का अर्थ "हरिण की आवाज सुन कर श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य हरिण के पीछे-पीछे हो लिया"). राम को बहुत दूर ले गया. मौका पा कर राम ने तीर चलाया और हिरन बने मारीच का वध कर दिया. मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! कहा (सही घटना का अर्थ "हरिण ने राजा देवानुप्रिया त्तिष्य को मारीच (मिस्सक) पर्वत ले गया जहाँ सम्राट अशोक का बेटा भदंत महेन्द्र अपने साथियों के साथ रुके थे"). रामायण में मारीच नामक इस पर्वत को रावण का मामा 'मारीच' कह कर नाम की नक़ल की गई. वास्तव में मारीच यह पर्वत है जहाँ श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य और सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और उनके साथियों में पहली भेंट हुई थी.......देवानुप्रिया त्तिष्य का भदंत महेन्द्र के साथियों के परिचय को काल्पनिक कथा का स्वरूप देकर रामायण के पाखंडी रचनाकार ने "सीता हरण" के नाम से जनमानस के मन-मष्तिक में ठूँस दिया.

एक और कथा फेसबुक से सामने आई है. उसे भी देखते हैं. रुचिकर है-

"श्रीलंका" यह रावण की लंका नही ।-

अनेक विद्वान इतिहासकारों ने रावण की लंका नर्मदा और सोनभद्र नदि के संगम के पास अमरकंठक पर्बत के उपर होने का दावा किया है। लंका मतलब ऊँचा टीला। लंका शब्द गौंडी भाषा का शब्द है। इसीलिए गौंड (द्रविड) राजा रावण कि लंका मध्य प्रदेश के अमरकंठक पर्बत पर थी ऐसा विद्वान मानते हैं। अमरकंठक पर्बत के पास ही बडा दलदली इलाका है, जिसे पार करना असंभव है, वही वाल्मीकि का समुंद्र है।

आज भी अमरकंठक पर्बत के पास "रावण ग्राम" नामक गौंड जाती के लोगों का गांव है। वहाॅ रावण की जमीन के उपर सोती हुई पत्थर कि मूर्ती है, और वहाॅ के लोग विजया दशमी के दिन "रावण बाबा" कहकर उसकी पूजा करते हैं। रावण बाबा उन्हें सुखी रखता है, ऐसी उनकी श्रध्दा है। (ज्यादा जानकारी के लिए पढीए दिवाकर डांगे लिखित मराठी ग्रंथ "रहस्य विश्वोत्पतीचे आणि इश्वराचे।".)

ध्यान देने की बात है कि यहाँ रावण को आदिवासियों का आराध्य दिखाया गया है.

13 November 2012

BAMCEF-3 - बामसेफ-3


बामसेफ-बीएमएम चंडीगढ़ यूनिट की एक साप्ताहिक बैठक 04-11-2012 को अंबेडकर भवन, सैक्टर-37 ए, चंडीगढ़ में आयोजित हुई जिसमें भाग लेने का अवसर मिला. बामसेफ से मेरा संपर्क युवावस्था में हुआ था जब मैंने इसकी एक बैठक ए.जी. ऑफिस सैंक्टर-17 में देखी थी. बाद में माननीय काशीराम जी के देहत्याग के बाद बामसेफ काफी उतार-चढ़ाव में से गुज़री है. अब माननीय वामन मेश्राम के नेतृत्व में इसने काफी प्रगति की है और आरक्षण प्राप्त शूद्र और दलित कर्मचारियों के एक राष्ट्रव्यापी संगठन के रूप में जानी जाती है. बामसेफ दो समाचार पत्रों का प्रकाशन कर रही है. मूलनिवासी नायक जो दैनिक है और बहुजनों का बहुजन भारत जो साप्ताहिक है. इनका प्रकाशन लखनऊ और पुणे से हो रहा है.

प्रकाशनों से स्पष्ट होता है कि बामसेफ की एक सुस्पष्ट विचारधारा है जिसका वह प्रचार करती है और सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध है. इसके सामाजिक संगठन का नाम भारत मुक्ति मोर्चा है.



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07 November 2012

Aborigines (Adivasis) struggle for independence – स्वतंत्रता के लिए मूलनिवासी (आदिवासी) संघर्ष


25 नवंबर 2010 को मैंने भीलों (भील मीणा) मूलनिवासियों की अपनी स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष के बारे में एक पोस्ट यहाँ लिखी थी. भीलों की वह कुर्बानी जलियाँवाला बाग़ की घटना से कई गुणा बड़ी है जिसे इतिहासकारों ने समुचित स्थान न दे कर बेईमानी का काम ही किया है क्योंकि वह संघर्ष अंग्रेज़ों के विरुद्ध नहीं था बल्कि उस व्यवस्था के विरुद्ध था जिसने उन्हें ग़ुलाम बनाया हुआ था. अब तो ब्राह्मण भी उस व्यवस्था को ब्राह्मणवाद या मनुवाद कहने लगे हैं.

उस संघर्ष के तथ्यों को भारत के मूलनिवासियों ने अब भली प्रकार से उठाना शुरू किया है और उन्हें मान्यता मिली है. 17-11-12 को उस शहादत के सौ वर्ष पूरे हो जाएँगे. इस अवसर पर 'मानगढ़ धाम' पर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है और एक पुस्तक शहादत के सौ साल जारी की जाएगी जिसके प्रधान संम्पादक केबिनेट मंत्री महेन्द्रजीत मालवीया हैं. आशा है कि इस पुस्तक से भारत के मूलनिवासियों के अभी भी चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में और भी तथ्यात्मक जानकारी अवश्य उपलब्ध हो जाएगी.

इस कार्यक्रम की सूचना श्री पी एन बैफलावत ने फेसबुक पर इस प्रकार दी है.

आदिवासी शहादत के सौ सालदिनांक 17-11-1913 को "मानगढ़ पहाड़ी" बांसवाड़ा पर आदिवासी संत गोविन्द गिरी (जिन्हें गोविंद गुरु भी कहा जाता है) के नेतृत्व में अपनी स्वतंत्रता व माँगो के लिए आयोजित मेले पर एकत्रित आदिवासियों के दमन हेतु संत रामपुर, कुशलगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही और मेवाड़ के राजाओं ने अंग्रेज पोलिटिकल एजेन्ट के साथ साज़िश रचकर अंग्रेज सरकार से आदिवासियों की बग़ावत की झूठी शिकायत की. अंग्रेज सरकार ने कर्नल शटन की कमाण्ड में इन राज्यों की सेना के साथ दो अंग्रेज बटालियन भेजी और गोविन्द गिरी और उनके साथियों की गिरफ्तारी व दमन का आदेश दिया. चारों ओर से घेर कर आदिवासियों पर अन्धाधुंध गोलियाँ बरसाई गईं जिसमें हजारों आदिवासी घायल हुए. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1600 सौ आदिवासी मारे गये. यह बलिदान जलियाँवाला बाग हत्याकाँड से चार गुणा बड़ा था. रियासत शासक और मनुवादी लेखकों ने इस घटना को वर्षों तक दबाये रखा. जब जागरूक आदिवासी इस घटना को देश के सामने लाये तब जाकर इसे शहादत की मान्यता मिली. 17-11-2012 को इस शहादत दिवस के शताब्दी वर्ष पर "मानगढ़ धाम" पर श्री रमेश चन्द मीणा एमएलए, टोडाभीम के अथक प्रयास से इस शहादत को नमन करने के लिए दो लाख आदिवासियों की सभा की जा रही है. साथ ही राज्य सरकार की ओर से राजस्थान के इस मानगढ़ धाम पर आजादी के आन्दोलन के दौरान हुए नरसंहार के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित की जा रही पुस्तक "शहादत के सौ साल" कई राज़ खोलेगी. पुस्तक के प्रधान संम्पादक केबिनेट मंत्री महेन्द्रजीत मालवीया हैं. समस्त देश के आदिवासी व अन्य देश प्रेमी इस शहादत को नमन व सम्मान देने अवश्य पधारें.

Dalit Community (Today’s Valmikis) were mislead – दलित समुदाय (आज के वाल्मीकियों) को गुमराह किया गया था



इसे पढ़ कर आपकी तीसरी आँख खुल जाएगी-

जब हम इतिहास का अवलोकन करते हैं, तो 1925 से पहले हमें वाल्मीकि शब्द नहीं मिलता. सफाई कर्मचारियों और चूह्डों को हिंदू फोल्ड में बनाये रखने के प्रयोजन से उन्हें वाल्मीकि से जोड़ने और वाल्मीकि नाम देने की योजना बीस के दशक में आर्यसमाज ने बनाई थी. इस काम को जिस आर्यसमाजी पंडित ने अंजाम दिया था, उसका नाम अमीचंद शर्मा था. यह वही समय था, जब पूरे देश में दलित मुक्ति के आन्दोलन चल रहे थे. महाराष्ट्र में डा. आंबेडकर का हिंदू व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह, उत्तर भारत में स्वामी अछूतानन्द का आदि धर्म हिंदू आन्दोलन और पंजाब में मंगूराम मूंगोवालिया का आदधर्म आन्दोलन उस समय अपने चरम पर थे. पंजाब में दलित जातियाँ बहुत तेजी से आदधर्म स्वीकार कर रही थीं. आर्यसमाज ने इसी क्रांति को रोकने के लिए अमीचंद शर्मा को काम पर लगाया. योजना के तहत अमीचंद शर्मा ने सफाई कर्मचारियों के मोहल्लों में आना-जाना शुरू किया. उनकी कुछ समस्याओं को लेकर काम करना शुरू किया. शीघ्र ही वह उनके बीच घुल-मिल गया और उनका नेता बन गया. उसने उन्हें डा. आंबेडकर, अछूतानन्द और मंगूराम के आंदोलनों के खिलाफ भडकाना शुरू किया. वे अनपढ़ और गरीब लोग उसके जाल में फँस गए. 1925 में अमीचंद शर्मा ने 'श्री वाल्मीकि प्रकाश' नाम की किताब लिखी, जिसमें उसने वाल्मीकि को उनका गुरु बताया और उन्हें वाल्मीकि का धर्म अपनाने को कहा. उसने उनके सामने वाल्मीकि धर्म की रूपरेखा भी रखी.

पूरा आलेख आप नीचे दिए लिंक से देख सकते हैं.

वाल्मीकि जयंती और दलितमुक्ति का प्रश्न