07 January 2012

Baba Faqir Chand and circle of rebirth - बाबा फकीर चंद और आवागमन


आवागमन को लेकर एक प्रश्न उठता रहता है कि इतने ऋषि-मुनि, गुरु, महात्मा, संत, बाबा, योगी आदि हो गुज़रे हैं और उनके इतने शिष्य और शिष्यों की अगणित शाखाएँ-प्रशाखाएँ हैं कि यदि वे आवागमन के चक्र से बाहर हो जाते तो जन्म-मरण के सिद्धांत के अनुसार विश्व की आबादी, विशेष कर भारत की, कम होनी चाहिए थी. हुआ उलटा. इसकी एक व्याख्या बाबा फकीर चंद के साहित्य से मिली है जो मुझे बेहतर लगती है :-

सोचता हूँ यह सृष्टि अनादि हैयदि यह मान लूँ कि सन्तों की शिक्षा से आवागमन छूट जाता है तो ख्याल करता हूँ कि सत का प्राकट्य कलियुग में हुआ तो आबादी तो इतनी बढ़ी कि जिसका कोई हिसाब नहींघट जानी चाहिए थीइसे जानने में मेरा दिमाग़ फेल होता हैमैं तो हौसले से कहना चाहता हूँ कि कुदरत के भेद का पता शायद कबीर को भी न लगा होइतना ही लगा कि वे इस संसार से उस ज्ञान के आधार परजो मैंने संतमत में समझाशायद आप अलग हो गये होंकई बार सोचता हूँ कि अलग हो गये तो क्या हो गयाजो अलग हो गया उसके लिए संसार नहीं रहादुनिया जैसी है वैसी बनी हुई हैसत्युगत्रेताद्वापर और कलियुग के चक्र आते रहते हैंक्या कहूं कि कितने मनुष्य या कितनी आत्माएँ इस संसार से निकल गईंसमझ यही आई कि आप निकल गया उसके लिये संसार भी निकल गया.”    (अगम-वाणी से)