08 January 2012

The rat, my friend - चूहा, मेरा मित्र


मनुष्य के तौर पर पैदा हुए हमारे वैज्ञानिकों को जब दवाइयों और रसायनों का प्रयोग करना हो तो चूहों पर करते हैं. फिर मनुष्यों में चूहों का दर्जा प्राप्त चुनिंदा मनुष्यों पर अपने प्रयोग करते हैं. फिर आगे के प्रयोगों के लिए उन दवाओं आदि को मनुष्य रूपी चूहों से भरे दक्षिण एशिया में भेज देते हैं. अमेरिकी और यूरोपियन चूहों की बारी शायद ही कभी आती हो.

बचपन में देखा कि हमारी टोहाना मंडी के मोटे चूहे देसी घी के डिब्बे के ढक्कन खोल कर घी चट कर जाते थे. कपड़े धोने वाले देसी साबुन और नहाने वाले साबुन को भी बड़े शौक से खाते थे. अब देखता हूँ कि ये चूहे साबुनों को देखते तक नहीं.

मनुष्य हूँ सो प्रयोग करने की आदत है. एक रात मैंने दो चम्मच देसी घी खुली कटोरी में डाल कर बिना ढके रसोई में रख दिया. सुबह देखा. घी पर खरोंच तक नहीं थी. अलबत्ता एक पतीले का ढक्कन चूहों ने उतार फेंका था जिसमें उबले आलू रखे थे. आलू खा कर वे कुछ टुकड़े छोड़ गए थे जैसे कह गए हों, "थैंक्यू अंकल जी, यह आलू अच्छा रहा." समझें तो चूहों ने साफ़ बता दिया कि देसी घी मिलावटी था और आलू सुरक्षित था. सुना है कुछ और जानवर भी ख़तरनाक कैमिकल्ज़ को सूँघ लेते हैं और रिजेक्ट कर देते हैं.

सरकार भी मानने लगी है कि हमारे खाने में कीटनाशकों की भारी मात्रा होती है. इधर मेरा वज़न कम हो रहा है. सोचता हूँ खाने में आलू की मात्रा बढ़ा दूँ. इंसान के तौर पर जब मेरी बुद्धि खाने-पीने की चीज़ों की सही परख नहीं कर सकती और परख हो भी गई तो खाना तो वही पड़ेगा जो बाज़ार में मिल रहा है तो ऐसी हालत में चूहों की पसंद को समझने में ही समझदारी है. दक्षिण एशिया का हूँ तो जितनी भी है अक्ल तो रखता ही हूँ.