24 October 2012

Martyrdom Day of Mahishasur - महिषासुर का शहीदी दिवस

 
Everything changes with time. As a child, I thought that Asuras and Rakshasas had been very bad to us. With the increase of knowledge I came to know that in fact we were the Asuras and Rakshasas who had been defeated at the hands of outside invaders i.e. Aryans. Due to the continuity of our struggle to come back to power, we were made targets of immense hatred. Our image was distorted through mythical stories.

Today, due to the spread of education, Dalits, tribals and OBCs know better about themselves. Last year Mahishasur’s Martyrdom Day was celebrated at Jawaharlal Nehru University. This year too, preparations are underway at several other places. It is mentionable that Asur is a tribe/caste (aborigines of India) in Jharkhand and Bengal. In Bengal, this Asur tribe mourns the death of Mahishasur during the Durga Puja days.

I have read at some places that such programs are held as a reaction to Durga Puja. This makes no sense to me. Everyone has a right to respect his forefathers. There cannot be any justification if there is any sense of opposition to Durga Puja.

For more information about the Mahishasura Martyrdom Day please see the link below.
समय के साथ बहुत कुछ बदलता रहता है. बचपन में मैं असुरों और राक्षसों को बहुत बुरा समझता था. जैसे-जैसे जानकारी बढ़ी वैसे-वैसे पता चला कि ये तो हमीं हैं जो प्राचीन समय में आक्रांता आर्य कबीलों से युद्ध में हारे थे. हमारे संघर्ष की निरंतरता के कारण हमें घृणा के निशाने पर रख दिया गया. पौराणिक कथा-कहानियों के माध्यम से हमारी छवि खूब बिगाड़ी गई.
 
शिक्षा के प्रसार के कारण अब दलित, आदिवासी और ओबीसी अपने बारे में बेहतर जानते हैं. पिछले वर्ष जवाहर लाल नेहरू यूनीवर्सिटी में महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया था. इस वर्ष इसकी तैयारी कई अन्य स्थानों पर भी चल रही है. उल्लेखनीय है कि असुर एक जाति है जो झाड़खंड में और बंगाल में पाई जाती है. बंगाल में यह जाति दुर्गा पूजा के दिनों के दौरान अपने घरों में शोक मनाती है.

कुछ स्थानों पर पढ़ा है कि ऐसे आयोजन दुर्गा पूजा की प्रतिक्रिया स्वरूप किए जाते हैं. इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. अपने पुरखों को सम्मान देने का अधिकार सभी को है. यदि दुर्गा पूजा के प्रति विरोध की कोई भावना है तो उसका कोई औचित्य नहीं.

महिषासुर के शहादत दिवस के बारे में अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर देखें.


दुर्गा नहीं महिषासुर की जय

Resurrecting Mahishasur - Deccan Herald dt.30-10-2012


30-10-2012
PRESS NOTE, AIBSF
 
"जेएनयू में मनाया गया महिषासुर का शहादत दिवस
 
• अगले सप्ताह महिषासुर-दुर्गा : एक मिथक का पुनर्पाठवि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी

• इतिहास में जो छल करते रहे उन्हीं को देवत्व का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी ऊर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी उन्हें असुर या राक्षस करार दे दिया गया.
जेएनयू 30 अक्टूबर 2012 : विवादित विषयों पर बहस की अपनी पुरानी परंपरा को बरकरार रखते हुए जेएनयू के पिछडे समुदाय के छात्रों के संगठन ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम (एआईबीएसएफ) के बैनर तले सोमावार (29 अक्टूबर) रात को महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया.
देर रात तक चले इस समारोह में देश भर से आए विद्वानों ने महिषासुर पर अपने विचार रखे. इस अवसर पर प्रसिद्ध चित्रकार लाल रत्नाकर द्वारा बनाये गये महिषासुर के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया गया.
समारोह को संबोधित करते हुए आदिवासी मामलों की विशेषज्ञ और युद्धरत आम आदमीकी संपादक रमणिका गुप्ता ने कहा कि इतिहास में जो छल करते रहे उन्हीं को देवत्व का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी ऊर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी उन्हें राक्षस करार दे‍ दिया गया. ब्रह्मणवादी पुराणकारों/ इतिहासकारों ने अपने लेखन में इनके प्रति नफरत का इज़हार का भ्रम का वातावरण रच दिया है. आखिर समुद्र मंथन में जो नाग के मुँह की तरफ थे और जिन्हें विष मिला वे राक्षस कैसे हो गए? कामधेनु से लेकर अमृत के घडों को लेकर भाग जाने वाले लोग किस आधार पर देवता हो सकते हैं?‘ उन्होंने कहा कि वंचित तबका इन मिथकों का अगर पुनर्पाठ कर रहा है तो किसी को दिक्कत क्यों हो रही है?’
जेएनयू की प्रो. सोना झरिया मिंज ने कहा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कहानियों के समानांतर आदिवासी समाज में कई कहानियाँ प्रचलित हैं. इन कहानियों के नायक तथाकथित असुर या राक्षस कहे जाने वाले लोग ही हैं जिन्हें कलमबद्ध करने की जरूरत है.
प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने कहा कि मिथकों की राजनीति और राजनीति के मिथक पर बहस बहुत जरूरी है. हमारे नायकों को आज भी महिषासुर की भाँति बदनाम करने की साजिश चल रही है.
इतिहास-आलोचक ब्रजरंजन मणि ने कहा कि शास्त्रीय मिथकों से कहीं ज्यादा खतरनाक आधुनिक विद्वानों द्वारा गढे जा रहे मिथक हैं. पौराणिक मिथकों के साथ-साथ हमें आधुनिक मिथकों का भी पुनर्पाठ करना होगा.
मंच का संचालन करते हुए एआईबीएसएफ के अध्यक्ष जितेंद्र यादव ने कहा कि पिछड़ा तबका जैसे-जैसे ज्ञान पर अपना अधिकार जमाता जाएगा वैसे-वैसे अपने नायकों को पहचानते जाएगा. महिषासुर का शहादत दिवस इसी कडी में है. संगठन महिषासुर शहादत दिवस को पूरे देश में मनाने के लिए प्रयत्नशील है.
संगठन के जेएनयू प्रभारी विनय कुमार ने कहा कि अगले सप्ताह महिषासुर-दुर्गा : एक मिथक का पुनर्पाठवि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी, जिसका संपादन अकादमिदक जगत में लोकप्रिय पत्रिका फारवर्ड प्रेसके संपादक प्रमोद रंजन ने किया है. गौरतलब है कि फारवर्ड प्रेसमें ही पहली बार वे महत्वपूर्ण शोध प्रका‍शित हुए थे, जिससे यह साबित होता है असुरएक (आदिवासी) जनजाति है, जिसका अस्तित्व अब भी झाड़खंड व छत्तीसगढ में है और महिषासुर राक्षस नहीं थे बल्कि इस देश के बहुजन तबके के पराक्रमी राजा थे. उन्होंने कहा कि पुस्तिका में महिषासुर और असुर जा‍ति के संबंध में हुए नये शोधों को प्रकाशित किया जाएगा तथा इसे विचार-विमर्श के लिए उत्तर भारत की सभी प्रमुख यु‍निवर्सिटियों में वितरित किया जाएगा.

इस मौके पर इन साइट फाउंडेशनद्वारा महिषासुर पर बनाई गई डाक्युमेंट्री भी दिखाई गई.
समारोह को एआईबीएसएफ कार्यकर्ता रामएकबाल कुशवाहा, आकाश कुमार, मनीष पटेल, मुकेश भारती, संतोष यादव, श्री भगवान ठाकुर आदि ने भी संबोधित किया.
प्रेषक : विनय कुमार, जेएनयू अध्यक्ष, एआईबीएसएफ, 158, साबरतमी जेएनयू मोबाइल 9871387326"

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