07 November 2012

Aborigines (Adivasis) struggle for independence – स्वतंत्रता के लिए मूलनिवासी (आदिवासी) संघर्ष


25 नवंबर 2010 को मैंने भीलों (भील मीणा) मूलनिवासियों की अपनी स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष के बारे में एक पोस्ट यहाँ लिखी थी. भीलों की वह कुर्बानी जलियाँवाला बाग़ की घटना से कई गुणा बड़ी है जिसे इतिहासकारों ने समुचित स्थान न दे कर बेईमानी का काम ही किया है क्योंकि वह संघर्ष अंग्रेज़ों के विरुद्ध नहीं था बल्कि उस व्यवस्था के विरुद्ध था जिसने उन्हें ग़ुलाम बनाया हुआ था. अब तो ब्राह्मण भी उस व्यवस्था को ब्राह्मणवाद या मनुवाद कहने लगे हैं.

उस संघर्ष के तथ्यों को भारत के मूलनिवासियों ने अब भली प्रकार से उठाना शुरू किया है और उन्हें मान्यता मिली है. 17-11-12 को उस शहादत के सौ वर्ष पूरे हो जाएँगे. इस अवसर पर 'मानगढ़ धाम' पर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है और एक पुस्तक शहादत के सौ साल जारी की जाएगी जिसके प्रधान संम्पादक केबिनेट मंत्री महेन्द्रजीत मालवीया हैं. आशा है कि इस पुस्तक से भारत के मूलनिवासियों के अभी भी चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में और भी तथ्यात्मक जानकारी अवश्य उपलब्ध हो जाएगी.

इस कार्यक्रम की सूचना श्री पी एन बैफलावत ने फेसबुक पर इस प्रकार दी है.

आदिवासी शहादत के सौ सालदिनांक 17-11-1913 को "मानगढ़ पहाड़ी" बांसवाड़ा पर आदिवासी संत गोविन्द गिरी (जिन्हें गोविंद गुरु भी कहा जाता है) के नेतृत्व में अपनी स्वतंत्रता व माँगो के लिए आयोजित मेले पर एकत्रित आदिवासियों के दमन हेतु संत रामपुर, कुशलगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही और मेवाड़ के राजाओं ने अंग्रेज पोलिटिकल एजेन्ट के साथ साज़िश रचकर अंग्रेज सरकार से आदिवासियों की बग़ावत की झूठी शिकायत की. अंग्रेज सरकार ने कर्नल शटन की कमाण्ड में इन राज्यों की सेना के साथ दो अंग्रेज बटालियन भेजी और गोविन्द गिरी और उनके साथियों की गिरफ्तारी व दमन का आदेश दिया. चारों ओर से घेर कर आदिवासियों पर अन्धाधुंध गोलियाँ बरसाई गईं जिसमें हजारों आदिवासी घायल हुए. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1600 सौ आदिवासी मारे गये. यह बलिदान जलियाँवाला बाग हत्याकाँड से चार गुणा बड़ा था. रियासत शासक और मनुवादी लेखकों ने इस घटना को वर्षों तक दबाये रखा. जब जागरूक आदिवासी इस घटना को देश के सामने लाये तब जाकर इसे शहादत की मान्यता मिली. 17-11-2012 को इस शहादत दिवस के शताब्दी वर्ष पर "मानगढ़ धाम" पर श्री रमेश चन्द मीणा एमएलए, टोडाभीम के अथक प्रयास से इस शहादत को नमन करने के लिए दो लाख आदिवासियों की सभा की जा रही है. साथ ही राज्य सरकार की ओर से राजस्थान के इस मानगढ़ धाम पर आजादी के आन्दोलन के दौरान हुए नरसंहार के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित की जा रही पुस्तक "शहादत के सौ साल" कई राज़ खोलेगी. पुस्तक के प्रधान संम्पादक केबिनेट मंत्री महेन्द्रजीत मालवीया हैं. समस्त देश के आदिवासी व अन्य देश प्रेमी इस शहादत को नमन व सम्मान देने अवश्य पधारें.