30 June 2012

My spy, my pride - मेरा जासूस, मेरी नाक


जासूसी जीवन का अँधेरा पक्ष है. बड़ी खुशी है सुरजीत सिंह कि तुम रोशनी में लौट आए.

मोहन लाल भास्कर पाकिस्तान में जासूस था. कोट लखपत की जेल के अँधेरे में अमानवीय यात्नाओं से तंग आ चुका मोहन जेलर को देखते ही ऊँची आवाज़ में उसे माँ-बहन की गंदी गालियाँ लग़ातार देता जाता ताकि वह एक ही बार पीट-पीट कर मोहन की हत्या कर दे. लेकिन जेलर ठंडे मन से उसकी गालियाँ सुनता और यात्नाएँ सलीके से देता. बाद में मोहन प्रधान मंत्री मोरार जी देसाई से मिला. अपनी कथा सुनाई.

जासूस किसी सरकारी कर्मचारी की नहीं बल्कि निजी हैसियत से शत्रुदेश में जाता है. सूचना के लिए महीनों पागलों की तरह घूमता है, धीमा और बोरिंग काम. यदि दुश्मन के राकेटों के ज़खीरे में आग लगाई जा सके तो ठीक-ठाक रकम मिल सकती है लेकिन मर गए तो शहीदों में शुमार नहीं हो सकते.

मोहन भास्कर की (शायद) पेंशन की माँग सुन कर मोरार जी ने खरी-खरी सुना दी जिसे याद करते हुए उसने लिखा है- यदि उस समय मेरे पास रिवाल्वर होता तो मैं सारी गोलियाँ मोरार जी के सीने में उतार देता. सुरजीत यार, तुम ऐसा कोई फिल्मी डॉयलाग न बोलना. तुम्हारे इंटरव्यू के बाद अब तक सरबजीत का कितना दिमाग़ निचोड़ा गया होगा किसको पता.

जासूसी अविश्वास की दुनिया है. जासूस दुश्मन की जेल में हो या बाहर उसके डबल-क्रॉस होने की आशंका बनी रहती है. सीमा पार से दुश्मन उसे स्कैन करता है. दुश्मन के जासूस उसे उसके ही देश में अगुवा कर सकते हैं.

तो जासूस एक तरह की लंबी नाक होती है जिसे खतरा सूँघने के लिए दूसरे मुल्क में रख दिया जाता है लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जाता. लग़ातार सत्यापन होता है. यह नाक पकड़ी जाए तो कोई देश स्वीकार नहीं करता कि पकड़ी गई नाक मेरी है.


मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था- मोहन लाल भास्कर

22 June 2012

BJP and Megh-1 - भाजपा और मेघ-1


पिछले 65 वर्षों से मेघवंशी कांग्रेस को माँ मान कर उसके चरणों में लोटते रहे हैं.

अंग्रेज़ों से सत्ता हस्तांतरित होकर कांग्रेसियों के पास आने के कारण और उस समय कांग्रेस का सशक्त विकल्प न होने के कारण कोई अन्य गोद नहीं थी जिसमें ये बैठने की कोशिश करते. लेकिन दूध पिलाना तो दूर कांग्रेस ने इन्हें कभी ढँग से पास में बिठाया भी नहीं. इनके पास पैसा और पार्टी फंड नहीं था. केवल वोट था जिसे सस्ते में लेकर इस पार्टी ने वोटर को भूल जाना बेहतर समझा. अति ग़रीब समुदायों की स्थिति नहीं बदली. धीरे-धीरे इनकी निराशा बढ़ती गई.

जम्मू-कश्मीर में मेघ समुदाय के सामाजिक स्तर को बेहतर बनाने में राजा हरि सिंह का बहुत बड़ा हाथ रहा है. लेकिन वहाँ के कार-ए-बेगार कानून (यह कानून हिंदू समुदायों को कानूनन यह हक देता था कि वे मेघों को बिना किसी तरह की पगार दिए उनसे कोई भी काम ले सकते थे) के पश्चप्रभावों (after effects) से जूझ रहे मेघों की अधिकांश संख्या को अभी तक आर्थिक विकास का मुँह देखना नसीब नहीं हुआ. हालाँकि वे पंजाब के मेघों के मुकाबले अब अधिक शिक्षित हैं और अधिक उन्नति कर चुके हैं, राजनीतिक रूप से भी. 

भारत विभाजन के बाद स्यालकोट से जालंधर और पंजाब के अन्य शहरों में आकर बसे मेघों को दोहरी मार पड़ी. वहाँ अंग्रेज़ों के राज में इनके लिए जो रोज़गार के अवसर बने थे वे अचानक समाप्त हो गए. भारत में आकर फिर से इन्हें न केवल प्रतिदिन की रोटी के लिए जूझना पड़ा बल्कि जात-पात को नई जगह और नए माहौल में झेलना पड़ा. यह मानना इनकी नियति थी कि जिस कांग्रेस को सत्ता दी गई है शायद वही इनकी नैया को पार लगाएगी. अंग्रेज़ों द्वारा दिए गए आरक्षण का श्रेय अब कांग्रेस को दिया जाने लगा या कहें कि कांग्रेस उस श्रेय को बटोरने लगी.

इस बीच भारत की राजनीति का चेहरा बहुत बदल गया है. जनसंघ से लेकर भाजपा तक एक हिंदूवादी विचारधारा विकसित हुई जिसे दलित संदेह की दृष्टि से देखते रहे हैं क्योंकि हिंदू धर्म के नाम से चल रही छुआछूत को जनसंघ से जोड़ कर भी देखा जाता रहा और भाजपा से भी. इस बीच लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद जो जनता पार्टी अस्तित्व में आई उसने जनसंघ की कट्टर हिंदूवादी छवि को बदलने में मदद की.

मुझे याद है कि 1977 में आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए थे उसमें श्री मनमोहन कालिया के प्रयासों से जालंधर के भार्गव कैंप के एक सामाजिक कार्यकर्ता श्री रोशन लाल को जनता पार्टी का टिकट मिला. देश भर में जनता पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन मिला लेकिन श्री रोशन लाल मेघों के गढ़ भार्गव कैंप से चुनाव हार गए. मेघों ने हलधर पर मोहर लगाई तो सही लेकिन ऐसा करने की सही राजनीतिक समझ रखने वाले मेघ उस समय कम थे. रोशन लाल जी के हक में प्रचार करने के लिए मैं भी जालंधर गया था और मुझे याद है कि आर्यसमाजी विचारधारा (उस समय यह शब्द कांग्रेसी विचारधारा का पर्यायवाची था) के लोगों ने उन्हें हराने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया था.

अब समय में काफी परिवर्तन आ चुका है. कई मेघों ने अपने सेवा क्षेत्र के छोटे-छोटे उद्योग धंधों और लघु उद्योगों के बल पर आर्थिक विकास किया है. समय के साथ भाजपा ने दूकानदारों और व्यापारियों की पार्टी होने की छवि अर्जित की है. इसी सिलसिले में इसने मेघ समुदाय के व्यापारियों और उद्यमियों को चिह्नित किया है.

वर्ष 1997, 2007 और 2012 के चुनाव में जालंधर वेस्ट से भाजपा ने आरएसएस काडर से आए श्री चूनी लाल भगत को चुना और भाजपा का टिकट दिया. वे अजेय समझे जाने वाले कांग्रेसी उम्मीदवार को हरा कर चुनाव जीत गए. वे तीन बार चुनाव जीते. 2011 में शिरोमणी अकाली दल और भाजपा गठबंधन के समर्थन से वे पंजाब विधान सभा के डिप्टी स्पीकर बने. वर्ष 2012 के पंजाब चुनावों में वे विजयी हुए और पंजाब विधान सभा में उन्हें भाजपा के विधायक दल का नेता बनाया गया. केबिनेट मंत्री के तौर पर उन्हें लोकल बॉडीज़ और मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च मंत्रालय दिया गया. भाजपा और शिअद गठबंधन की यह पहल ध्यान खींचती है.

उधर राजस्थान से श्री कैलाश मेघवाल को भाजपा का समर्थन मिला और केंद्र में भाजपा शासन के दौरान वे सन् 2003 से 2004 तक सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के राज्यमंत्री रहे. वे 1975 से 1977 तक आपातकाल के दौरान जेल काट चुके हैं. श्री अर्जुन मेघवाल (जो पूर्व में आईएएस अधिकारी थे) आरएसएस काडर से भाजपा में आए और लोक सभा के बहुत सक्रिय सदस्य हैं. श्री नितिन गडकरी ने भारतीय जनता मजदूर महासंघ की स्थापना की है. इस कार्य के लिए राजस्थान में तीन बार विधायक रह चुके और एक बार राज्य मंत्री, आयुर्वेद, रह चुके अचलाराम मेघवाल को भारतीय जनता मजदूर महासंघ, पाली जिला के अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपी गई है. श्री मेघवाल पाली जिले में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक रहे हैं. पंजाब में श्री कीमती भगत, जो आरएसएस काडर से आए हैं, को भाजपा ने गोरक्षा समिति का चेयरमैन बनाया है. ऐसे ही मेघों के और बहुत से नाम होंगे जो अब भाजपा से जुड़े हैं.

मेघवंशियों के लिए इन बातों से यह समझना आसान हो सकता है कि भाजपा ने भारत के मेघवंशियों (वृहद्तर रूप में दलितों और आदिवासियों) में अपनी पैठ बनाई है जिसने भाजपा की छवि को बदला है और भाजपा के ज़रिए राजनीति में इन समुदायों की सहभागिता बढ़ी है.

इतना होने के बावजूद अति पिछड़े मेघ समुदायों के लिए यह एक मुद्दा बना रहेगा कि 'अपने पास देने के लिए पार्टी फंड कितना है'. राजनीति पैसे के बिना नहीं चलती. समुदायों के भीतर ऐसे फंड बनाने ही पड़ेंगे.
Arjun Meghwal, BJP, Raj.
Kailash Meghwal, BJP, Raj.
Chuni Lal Bhagat, BJP, Punjab
Achalaram Meghwal, BJP, Raj.
Kimti Bhagat, BJP, Punjab
Chandrakanta Meghwal, BJP, Raj.
Mrs. Kamsa Meghwal, BJP, Raj.

Bali Bhagat, BJP, Jammu
भाजपा और मेघ-2


19 June 2012

Lost brother of Meghvanshis - Banjara (Gypsies, Roma) community - मेघवंशियों का गुमनाम बिरादर - बंजारा (जिप्सी, रोमा) समुदाय

ऐसे संकेत मिले हैं कि बंजारे और ख़ानाबदोश (Gypsies and Roma) सिंधुघाटी सभ्यता की ही मानव शाखाएँ हैं. बाहरी आक्रमणों के बाद ये लोग भारत के दक्षिण में भी फैले और यूरोप में स्पेन आदि देशों में भी गए. ऐसा प्रतीत होता है कि आक्रमणकारी आर्यों ने इन्हें पहचाना, इनका पीछा किया और इनके विरुद्ध विषैला प्रचार किया. स्पेन के नाटककार फेडेरिको गर्सिया लोर्का (Federico Garcia Lorca ) के नाटक 'द हाऊस ऑफ बर्नार्डा आल्बा' (The House of Bernarda Alba) में इसका उदाहरण देखा जा सकता है जिसमें इनके बारे में नकारात्मक टिप्पणियाँ हैं.
 
बहुत देर के बाद आज बंजारा समुदाय के बारे में एक अच्छा खोजपूर्ण आलेख पढ़ने को मिला. 1963 में टोहाना प्रवास के दौरान बंजारों को काफी नज़दीक से देखा है. इनकी भाषा के उच्चारण को ध्यान से सुने तो ऐसी ध्वनियाँ सुनने में आती हैं जो पंजाबी मिश्रित हैं.  इन पर भारत के एक महान शोधकर्ता डब्ल्यू. आर. ऋषि (Padmashri W.R. Rishi) ने काफी कार्य किया है (ऋषि जी से मिलने का मौका एक बार चंडीगढ़ में मिला था और उन्होंने रोमां लोगों की भाषा पर जानकारी दी थी). उनसे संबंधित लिंक्स से ज्ञात होता है कि रोमां और जिप्सियों के उत्थान के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास हो रहे हैं.

बंजारों को राजपूतों और जाटों का वंशज माना जाता है. चूँकि अधिकतर दलित राजपूतों के वंशज हैं इस दृष्टि से मैं इन बंजारों-रोमां को भी मेघवंशी कहता हूँ. वैसे भी अधिकतर दलित सूर्यवंशी हैं और इनके मूल को सूर्यवंशी (भगवान) रामचंद्र के कुल में ढूंढा जाता है. इनकी वर्तमान दशा के बारे में ख़बरकोश.कॉम ने एक बहुत अच्छा आलेख प्रकाशित किया है जो भारत के बंजारों की दशा के बारे में बहुत कुछ बताता है. आलेख नीचे दिया गया है :-



18 June 2012

Megh community felicitates Bhagat Chuni Lal - मेघ समुदाय ने भगत चूनी लाल का नागरिक अभिनंदन किया


ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ ने 17 जून, 2012 को अंबेडकर भवन, सैक्टर-37, चंडीगढ़ में मेघ भगत परिवारों का एक गेटटुगेदर आयोजित किया जिसमें भगत श्री चूनी लाल, माननीय मंत्री लोकल बॉडीज़ और मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, पंजाब सरकार का मेघ समुदाय की ओर से नागरिक अभिनंदन किया गया.

वातावरण में अपूर्व उत्साह था. उनके आते ही सभागार का माहौल भगत चूनी लाल ज़िंदाबाद के जयकारों से गूँज उठा. इस अवसर पर सभी वक्ताओं ने श्री चूनी लाल जी के राजनीतिक करियर की चर्चा की, इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों का उल्लेख किया और उनके करियर की वर्तमान बुलंदियों की जम कर तारीफ़ की गई. वक्ताओं ने भाजपा और शिरोमणी अकाली दल के नेतृत्व को धन्यवाद दिया जिन्होंने भगत जी को वांछित समर्थन दे कर मेघ समुदाय की छवि को भी नई पहचान दी है. साथ ही उन्होंने मेघ भगत समुदाय से अपील की कि वे भविष्य में ऐसी ही एकता का प्रदर्शन करते रहें और विभाजित करने वाली ताक़तों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ें और अपनी चमकदार पहचान बनाएँ.

भगत चूनी लाल जी के राजनीतिक जीवन में उनके अपने समुदाय द्वारा किया गया उनका यह पहला नागरिक अभिनंदन था और इस पहल का श्रेय ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ को जाता है.

इस अवसर पर बोलने वालों में सर्वश्री महेंद्र कुमार (आईएएस), यशपाल (आईईएस), राजेश कुमार, (सेवानिवृत्त सुपरिन्टेंडिंग इजीनियर), ऑल इंडिया मेघ सभा के इंद्रजीत मेघ (अध्यक्ष), गोविंद कांडल (सचिव) आदि प्रमुख थे.

श्री गोविंद कांडल ने इस अवसर पर मेघ समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ता श्री गोपीचंद भगत, श्री बुड्डामल भगत, श्री मिल्खीराम भगत (पीसीएस), श्री लेखराज भगत (आईपीएस) आदि द्वारा मेघ समुदाय के उत्थान के लिए किए गए अथक प्रयासों को याद किया और उनका आभार प्रकट किया. उन्होंने ऊँची स्थिति पर बैठे मेघों और इंटरनेट के द्वारा मेघ समाज की सेवा करने वाले सदस्यों का आभार प्रकट किया. 

ऑल इंडिया मेघ सभा की ओर से बोलते हुए श्री इंद्रजीत मेघ ने मुख्य अतिथि श्री चूनी लाल को इस संस्था के एक पुराने और महत्वपूर्ण सपने कबीर मंदिर की याद दिलाई जिसे मेघ भवन के नाम से भी जाना जाता है. भगत जी को बताया गया कि इसके लिए कई प्रयास किए गए हैं लेकिन ज़मीन की कीमतों और राजनीतिक समर्थन के अभाव में यह सपना अभी पूरा नहीं हुआ है. अपने भाषण के दौरान भगत जी ने इस बात को नोट किया और आश्वासन दिया कि इस सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए शीघ्र ही प्रयास शुरू करेंगे. इस माँग को भगत जी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले श्री महेंद्र भगत ने भरपूर हामी दी और कहा कि यह सपना पूरा हो कर रहेगा.

हाल ही में पीसीएस परीक्षा में चुने गए युवाओं को बधाई दी गई और बहुत अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण हुए छात्र-छात्राओं को इस अवसर पर सम्मानित किया गया. मंच संचालन श्री राजेश भगत (सेवानिवृत्त सुपरिन्टेंडिंग इजीनियर) ने किया और उन्होंने श्री चूनी लाल जी के सम्मान में अपनी कविताओं का पाठ किया.

कार्यक्रम के अंत में एक प्रीति भोज का आयोजन किया गया. शेष इन तस्वीरों में :-



MEGHnet 

 

16 June 2012

A homoeopathic success story via Dr. Dinesh Sahajpal – एक होमियोपैथिक सफलता की कहानी बाज़रिया डॉ. दिनेश सहजपाल


पूरा परिवार होमियोपैथों का था. कोई डिग्रीधरी, कोई आरएमपी और कोई उनका अधीनस्थ. फिर भी होनी यह हुई कि 30 वर्ष पहले उनकी एक बहु को हिस्टीरिया हो गया. कड़वी ज़बान उग आई, सनकी हो गई और बेशर्मी की हरक़तें करने लगी. आस-पास कोई बैठा है इसका भी ध्यान उसे न होता (typically Hyoscyamus). घर के होमियोपैथों ने उसके मामले को सँभाला. काफी वर्ष तक गुज़ारा ठीक-ठाक चला हालाँकि सौ फीसदी आराम नहीं आया.

पाँचेक वर्ष पहले उस महिला का संवेदनशील पति अपनी पत्नी के स्वभाव से खीजने लगा और प्रभावित होने लगा. आत्महत्या के विचार आने लगे. मर जा या मार दे की स्थिति हो गई. उसने डॉ. दिनेश सहजपाल से संपर्क किया. कहा कि डॉक्टर साहब, मुझे ख़ुदकुशी के विचार आते हैं.
Dr. Dinesh Sahajpal
डॉक्टर- विचार ही आते हैं या कोशिश भी की है?
मरीज़- कोशिश तो नहीं की लेकिन नींद की गोलियों का इंतज़ाम कर लिया था.
डॉक्टर- मरने से डर लग रहा था?
मरीज़- उस समय डर नहीं लग रहा था.
डॉक्टर- तो ख़ुदकुशी क्यों नहीं की?
मरीज़- मालूम था कि यह एक तरह की बीमारी होती है तो क्यों न डॉक्टर से बात की जाए.
डॉक्टर- क्या आप डॉक्टर हैं?
मरीज़- नहीं, मैं होमियोपैथ परिवार से हूँ.
डॉक्टर- सुसाइड के थॉट आने की कोई ख़ास वजह?
मरीज़- वाइफ़ हिस्टीरिक है.
डॉक्टर- मैं समझ गया. आपको बस इतना ही बताना चाहता हूँ कि मैं आपके हालात तो नहीं बदल सकता लेकिन हालात से लड़ने के लिए आपके हार्मोंस को बैलेंस करके आपकी हेल्प कर सकता हूँ. कुछ देर आप मेडिसिन लो. अगले हफ़्ते फिर रिपोर्ट करो. (यह एक घंटे तक चली केस टेकिंग का साराँश है.)


मैं इस होमियोपैथ परिवार को जानता हूँ. तीन महीने बीत चुके हैं. पत्नी की तबीयत ठीक-ठाक सी है. लेकिन मेरा मित्र अब ठीक है और अपने रोज़मर्रा के कामकाज में खुश है. हाँ उसकी चमड़ी पर कुछ इरप्शंस उभर आई हैं. इसका कारण होमियोपैथ डॉक्टर ही बता सकता है.

एलोपैथ अवश्य झल्लाया होगा, "आईएमए के होते हुए यह क्या हो रहा है." :(

इसमें आईएमए क्या करेगी? मरीज़ को आराम आया है तो आया है :)


Dr. J.B.D. Castro



(किसी पत्रिका में पढ़ा था कि एम. के. गाँधी, फिल्म एक्टर अशोक कुमार और मनोज कुमार होम्योपैथी के बड़े फैनों में से रहे हैं. लता मंगेशकर अपने गले के लिए अशोक कुमार से दवा लिया करती थी).










12 June 2012

Raag Darbari - राग दरबारी


इस जीवन-राग को लेकर कई अंतर्विरोध मेरे ज़ेहन में हैं. मैंने ख़ुद से रागदरबारी कभी नहीं गाया. संभव है इसमें निबद्ध कोई फिल्मी गीत मुँह से निकल गया हो. 
नौकरी के दौरान राजनीतिज्ञों या बड़े अफ़सरों के सामने कोई महत्वपूर्ण रागदरबारी 'जोगन बन जाऊँ रे.....' नहीं गाया (सम्राट अक़बर और मियाँ तानसेन इस पर हैरानगी प्रकट कर सकते हैं कि कमाल है भाई, अगर नहीं गाया!!). बैंक में नौकरी थी सो कभी-कभी सायं चार बजे चपरासियों, लिपिकों को यह राग सुनाना पड़ता था- 'महाराज जितना संभव हो, कार्य कर जाना, इख़्लाक़ बुलंद रहे, चलता रहे बैंक घराना'. यहाँ राग का गायन समय अत्यंत लोचशील है, प्रातः से सायं तक, कभी भी.
घर के दरबार में मेरी 'राजा-सी' हैसियत कभी नहीं रही सो 'रानी' (नारी) स्वर में रागदरबारी सुनने को नहीं मिला. लेकिन इस क्षेत्र में मेरी गायकी के कुछ व्यंगात्मक किस्से मुझ तक लौटे कि 'भई बीवी के सामने खूब गाते हो रागदरबारी, क्या बात है!!'  किस्सा सुनाने वालों की तान (दाँत) तोड़ने की तमन्ना दिल में ही रह गई.
दिल्ली के रास्ते में कई ढाबे आते हैं. चाचे का ढाबा, राणा ढाबा, पप्पू ढाबा, रॉकी वैष्णो ढाबा, पहलवान ढाबा. ये हिंसक नाम हैं. देसी पुलिस के लिए सीधा संदेश देते हैं- 'जब चाहे आओ, ठंडा-वंडा पीओ और 'मसाला भाषा' में 'देसी' गाने सुनो. बस, पंगा नहीं लेना'. जानने योग्य है कि हमारी नौकरशाही संगीत के नाम पर केवल इसी शास्त्रीय राग को आराम से गा पाती है. यह इस राग की विशेषता है.
सड़क किनारे 'महाराजा पान शॉप' पर अनजाने कलाकार की यह कलाकृति दिखी. फोटू खींच ली. इसमें एक तबलची, एक सारंगी मास्टर है और राजसी ठाठ में रागदरबारी है. कलात्मक वस्तुएँ महलों से निकल कर कहाँ-कहाँ पहुँचीं, भई वाह!! विश्वास हो गया कि राज घरानों, दरबारियों और पनवाड़ियों में कभी खूब छनती थी.
आप पूछ सकते हैं कि पुराने अंदाज़ के दरबार तो समाप्त हो गए, आजकल रागदरबारी कहाँ और कैसे गाया जाता है. येस-येस, इसकी प्रस्तुति का वेन्यू अब राजनीतिक पार्टियों की हाई कमान के यहाँ है लेकिन सुर वही हैं, शैली वही है और ठाठ वही है.
ऊपर की पेंटिंग से मिलता जुलता एक चित्र फेसबुक पर आज (09-01-2014 को) मिला है जिसे नीचे चिपका रहा हूँ-
  
MEGHnet