01 September 2013

Talk from a distance Your Holiness! - दूर से बात करो महात्मा जी !

टीवी पर आसाराम का केस सुनते-सुनते कान पक गए हैं. इसे कबीर के दो शब्दों में समेटा जा सकता है-

                                  दास कबीर हर के गुन गावे, बाहर कोऊ पार न पावे
                                  गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला.

गुरु का अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य होता है. हर व्यक्ति का होता है. एक गुरु के पास एक चेले के चरित्र संबंधी शिकायत आई तो उसने कहा कि 'यह चेला मेरे पास आया है. गंदे कपड़े ही धोबी घाट पर आते हैं.'

अंधश्रद्धा रखने वाले भोले लोग अपने बच्चों का पेट काट कर गुरुओं-महात्माओं को दान देते हैं. समझदार गुरु और स्वामी सारा दान इकट्ठा करके अपनी गद्दियाँ-आश्रम बना कर अपने बच्चों-रिश्तेदारों के नाम कर जाते हैं. How sweet Baba ji !! 

लेकिन अगर 'महात्मा' पर आर्थिक चोरी (सभ्य भाषा में अनियमितता) का आरोप हो और महिलाओं को इनसे शिकायत होती हो, तो? इसका इलाज है, बहुत कारगर. चाणक्य ने कहा है कि युवा माता को युवा बेटे के साथ अकेले यात्रा नहीं करनी चाहिए. व्यावहारिक माताएँ अपने घर में पिता और बेटी को अकेले छोड़ कर दूर नहीं जातीं. ये बातें बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही हैं. महात्माओं के पास महिलाओं का जाना और जा कर उनके 'पैर छूना' या 'चरण दबाना'.....पता नहीं आप क्या सोचते हैं.....मैंने कभी नहीं सुना कि किसी संत, सत्गुरु, आचार्य आदि ने स्वयं के नपुंसक, अक्षम या हिजड़ा होने की बात कही हो.

इनसे बचना और दूर रहना बेहतर है. गृहस्थी अपना धन-समय बच्चों और अपने समाज के विकास पर ही व्यय करें.