23 April 2013

Milkhi Ram Bhagat, PCS

 Milkhi Ram Bhagat (12 November, 1912 - 04 March, 1978)

एक परिचय

भारत विभाजन के बाद स्यालकोट से विस्थापित होकर पंजाब (भारत) में आए मेघ भगत समुदाय के लोगों में से एक सज्जन पुरुष को बहुत याद किया जाता है- श्री मिल्खी राम भगत. उनका पूरा जीवन कर्म योग पर आधारित था. अपनी पोज़ीशन और जज़्बे के अनुसार उन्होंने अपने समुदाय के लिए बहुत कार्य किया. श्री मिल्खी राम जी को लोग बहुत आदर और सम्मान के साथ याद करते हैं. वे मेघ भगत समुदाय का एकमात्र ऐसा व्यक्तित्व हैं जिसने नौकरियाँ प्राप्त करने में एक-दो नहीं बल्कि अपने समुदाय के हज़ारों नौजवानों को मार्ग दर्शन दिया और व्यावहारिक मदद की. उनमें से कई नौजवान जीवन में आगे बढ़े और आगे चल कर ऊँचे ओहदों और बढ़िया आर्थिक स्थिति में पहुँचे. आगे चल कर उनके बच्चे भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करके देश के विकास में योगदान दे रहे हैं. भगत जी के कार्य और व्यक्तित्व ने मेघ समुदाय के अलावा अन्य वंचित समुदायों की हज़ारों ज़िंदगियों को छुआ है और प्रभावित किया है.

श्री मिल्खी राम जी का जन्म 12 नवंबर 1918 में हुआ. सन् 1903 में आर्य समाज द्वारा मेघों के शुद्धिकरण के बाद आर्य समाज ने मेघों की पढ़ाई की मुहिम शुरू की थी. उसी दौर में मिल्खीराम जी की प्रारंभिक पढ़ाई स्यालकोट के आर्य समाज स्कूल में हुई. फिर वे ईसाई स्कूल में पढ़े. उन्होंने डीएवी कालेज, लाहौर से 1939 में इंगलिश ऑनर्स के साथ बी.. किया. 1940 में उन्होंने अविभाजित पंजाब के गवर्नर के कार्यालय में क्लर्क के तौर पर करियर की शुरुआत की. 1947 में भारत विभाजन के बाद 19-9-1947 को उन्होंने शिमला में सहायक के तौर पर कार्यभार संभाला. 1950 में पंजाब सरकार में मंत्री रहे पृथ्वीसिंह आज़ाद की अनुशंसा पर वे पीसीएस नामित हुए और एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर रहे. उसके बाद भगत जी के प्रयासों से कई अन्य मेघ भगत भी पीसीएस सेवाओं में आए.

भगत मिल्खी राम जी का गाँव गोहतपुर था जो स्यालकोट (अब पाकिस्तान में) के पास ही था. भगत जी के दादा का नाम श्री भोलानाथ था और पिता का नाम श्री अमींचंद. माता का नाम मोहताब देवी था. उनकी एक बहन वीराँदेवी हैं जो 85 वर्ष की हैं. नौकरी के सिलसिले में मिल्खी राम जी का परिवार चंडीगढ़ में बसा. पंजाब सरकार के शिड्यूल्ड कास्ट वेल्फेयर कार्पोरेशन में डायरेक्टर के पद पर रहते हुए उन्होंने वंचित समुदायों के लिए बहुत कार्य किया जिसके लाभार्थी आज बेहतर माली हालत में हैं.
Mr. Milkhi Ram Bhagat, Magistrate (Dharamshala)
1953 में उन्होंने गुरदासपुर में मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के तौर पर कार्य किया. फिर वे 1955 में स्थानांतरित हो कर वे बटाला में रेज़िडेंट मैजिस्ट्रेट हुए जहाँ उनके पास दंड देने की जूडीशियल शक्तियाँ थीं. 1956 में वे करनाल के डीसी के जी. मैजिस्ट्रेट बने. 1959 में कंडाघाट (अब हिमाचल प्रदेश में) में एसडीएम नियुक्त हुए और नियमित डीसी की अनुपस्थिति में दो माह तक डीसी का कार्यभार भी संभाला. 1962 में फूड एंड सप्लाईज़ के तथा 1964 में इंडस्ट्रीज़ विभागों के अंडर सेक्रेटरी रहे. 13 नवंबर 1976 को वे पंजाब सरकार के स्वास्थ्य विभाग से डिप्टी सैक्रेटरी के तौर पर सेवानिवृत्त हुए. उनके सुपुत्र कर्नल राजकुमार ने बताया है कि भगत जी अपने लंबे करियर के अनुभव का लाभ सरकार को देना चाहते थे और उनकी हार्दिक इच्छा थी कि सेवानिवृत्ति के बाद शिड्यूल्डकास्ट कार्पोरेशन, रोपड़ में मानद (honorary) सेवा दें. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इससे वे बहुत निराश हुए और यही उनकी सेहत के बिगड़ने का एक बड़ा कारण भी बना. 04 अप्रैल 1978 को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहावसान हुआ.
श्रीमती बलबीर देवी भगत (15 November 1927 - 20 October 1980)

मिल्खी राम जी का विवाह 1944 में श्रीमती बलबीर देवी से हुआसमाज सेवा के साथ-साथ य भगत दंपति अपने बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित थाबढ़िया परवरिश के कारण और इनके मार्गदर्शन में सभी बच्चों और बच्चों के परिवारों ने आगे खूब प्रगति की है.

Family Photos

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इनके सबसे बड़े पुत्र श्री राज कुमार आर्मी में रहे. वे कर्नल पद से रिटायर हुए हैं. दूसरे पुत्र श्री विजय भगत लीगल मीटरॉलॉजी, फूड एंड सप्लाइज़ एंड कन्ज़यूमर अफ़ेयर्ज़ विभाग से असिसटेंट कंट्रोलर के पद से रियाटर हुए. सब से छोटे पुत्र श्री प्रदीप भगत इस समय चंडीगढ़ में आर्किटेक्चर कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय होने के साथ अपने क्षेत्र में अच्छा नाम कमा रहे हैं. सब से बड़ी बेटी शशि भाटिया कैनेडा में बसी हैं जो फाइन आर्ट्स में स्नातक हैं. इन्होंने फेडरल और प्रोविंशियल स्तर के कई अर्ध-न्यायायिक बोर्डों और ट्राइब्यूनलों में कार्य किया है जिनमें से दो प्रमुख हैं “इम्मीग्रेशन एंड रिफ्यूजी बोर्ड” और “सोशल बेनेफिट ट्राइब्यूनल”. वर्तमान में ये कैनेडा के एसोसिएट नेशनल डिफेंस मिनिस्टर की ‘पॉलिसी एडवाइज़र-आऊटरीच’ के तौर पर कार्य कर रही हैं. इसके अतिरिक्त ये ICCAD (Indo Canadian Cultural Association of Durham, Inc.) की चेयरपर्सन भी हैं. सबसे छोटी बेटी स्नेहलता कुमार आईएएस हैं और हाल ही तक दिल्ली में ट्राइबल अफेयर्स मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक के तौर पर तैनात रही हैं. स्नेहलता ने मध्यप्रदेश के सुदूर जनजातीय इलाकों की समस्याओं के समाधान के लिए बहुत कार्य किया है. वर्तमान में वे आयोजना आयोग में कन्सल्टेंट के तौर पर कार्यरत हैं. मँझली बेटी सुनीता (एलएलबी) सफल अधिवक्ता (वकील) और अपने क्षेत्र की बहुत लोकप्रिय सरपंच रहीं. उनका कुछ वर्ष पूर्व दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था.

जब पंजाब की अनुसूचित जातियों की सूची जब बन रही थी तब मेघों के बारे में कहा गया कि इस जाति के सामाजिक रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों जैसे हैं इसलिए इन्हें अनुसूचि में शामिल न किया जाए. ऐसा कहने के पीछे मंशा यह थी कि मेघ सस्ते मज़दूर बने रहें. लेकिन श्री हंसराज भगत, एडवोकेट और डॉ. अंबेडकर के प्रयासों से मेघों को उक्त सूची में शामिल कर लिया गया. लेकिन बाद में भी कुछ लोग लिखते रहे कि मेघ समाज को इस सूची में रखना ग़लत है अतः सूची से इन्हें हटाया जाए. यह बात मिल्खी राम जी को दिल्ली के एक मित्र ने टेलिफोन पर बताई. बिना समय खोए भगत जी अपने साथियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली गए और स्थिति को संभाला. आज सभी जानते हैं कि मेघों के आर्थिक विकास के पीछे आरक्षण की बहुत बड़ी भूमिका रही है.

वे मेघों की व्यक्तिगत समस्याओं के हल के लिए हमेशा सक्रिय रहे. एक युवा मेघ को चंडीगढ़ के वेरका मिल्क प्लांट में अधिकारी की नौकरी मिली थी. लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण उसके अधिकारियों ने उसके लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए. उसका नौकरी करना दुश्वार हो गया. वह युवक भगत जी के पास गया. भगत जी ने उसी समय फोन मिला कर वेरका के प्राधिकारी से पूछा, “आपके यहाँ स्टाफ में कितने शिड्यूल्ड कास्ट हैं?” उत्तर मिला, “एक.” भगत जी ने दूसरा सवाल पूछा, “क्या आप लोगों से एक आदमी भी बर्दाश्त नहीं होता?” अगले दिन से उस युवा के हालात कुछ सुधार गए.

जिन विभागों का कार्यभार इन्होंने सँभाला वहाँ कार्य का बोझ काफी अधिक था. लेकिन इन्होंने सभी उत्तरदायित्व पूरी कार्यकुशलता से निभाए. इन सभी नियमित व्यस्तताओं और थकान के बावजूद ये अपने सामाजिक सरोकारों के लिए कार्य करते रहे. ऐसी परिस्थितियों में कार्य करते हुए मैंने स्वयं उन्हें देखा है.

जहाँ तक इनकी धार्मिक मान्यताओं का प्रश्न है ये बहुत उदारमना थे. सभी धर्मस्थलों पर खुले मन से जाते थे. बचपन की शिक्षा का ही प्रभाव था कि ये आर्य समाज में भी उतनी ही श्रद्धा से जाते जितना चर्च में.

जीवन भर इन्होंने अपने और अन्य वंचित समुदायों की अथक और निस्वार्थ सेवा की और ज़रूरतमंदों को सहारा दिया. इनके इसी प्रेमभाव के कारण हज़ारों लोग आज भी इन्हें आदरपूर्वक याद करते हैं. इनका जीवन और कार्य हमारी आने वाली पीढ़ियों और समाज सेवियों को हमेशा रास्ता दिखाएगा. उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि.


उक्त जानकारी देने में श्रीमती शशि भाटिया, कर्नल राजकुमार, श्री विजय भगत और श्रीमती वीराँदेवी ने अमूल्य सहयोग दिया है. उनका हार्दिक आभार.
Drawing room of Bhagat ji's house
Col. Rajkumar Bhagat
Smt. Shashi Bhatia

Late Sh. Vijay Bhagat


Smt. Snehlata Kumar
Mr. Pradeep Bhagat

Notes of Shashi Bhatia received through email – शशि भाटिया के ईमेल से प्राप्त नोट्स

Anyone who knew Bauji still remembers him fondly. Even in Canada many people of my father's era speak about him with so much respect.  His passion, commitment and dedication to the needs of people was commendable and widely admired by those with whom he came in contact.

As a magistrate my Father always believed in reforming rather than sentencing. I have a vivid childhood memory of Bauji while serving as a magistrate in Karnal bringing a young man home from the law courts to our house because he had nowhere to go and was without a family to go to. My mother asked him to take Bauji's clothes to the Dhobi. Instead the young man took off with Bauji’s clothing and never returned. Of course Mamaji was quite upset. But typically my father urged forgiveness and understanding of the lad’s circumstances and of course this episode did nothing to change my father's  passion to help people.

While serving in Chandigarh I remembered Bauji was always encouraging young people to pursue higher education. He became a local guardian of many children from Himachal Pradesh who came to further their education in Chandigarh. My parents provided the comforts of home to those children supporting and guiding them. Many of them went on to successful and fulfilling lives and in later years would often return to express their appreciation for the assistance my father unselfishly gave them.

On the home front not only did he provide all his children with a nurturing, very protective and comfortable life but there was an additional element somewhat unusual for the time. Its fair to say that in those days Indian society followed traditional practices in which girls and boys were treated differently and faced different expectations. Today we would call it sexism. Thanks to my father’s progressive views all his children were treated equally. As a result his three daughters all received a higher education and were inspired to go on to lead productive professional lives.

Both my sisters and I have followed the path our father prepared. Sunita became a lawyer and successful and well liked politician who was elected Sarpunch and Sneh became a civil servant of the highest rank. In my case, although I graduated in “fine arts”, was my father disappointed with my choice of study? On the contrary not only did he support me in making my own decisions as to what to study but he always encouraged my every effort stressing that the important thing was to take responsibility for your actions and be the best that you can be.

It was that confidence which allowed me to be fully integrated into Canadian life.

On September 14, 2012 on behalf of Her Majesty Queen Elizabeth II I was honored to be awarded the with the Queen Elizabeth Diamond Jubilee Medal for my service to the community and Canada. I was humbled to receive this recognition and its no surprise that I dedicated it to his memory for at heart he made it possible.

जो कोई भी बाऊ जी को जानता था वह उन्हें बहुत प्रेम से आज भी याद करता है. यहाँ तक कि कैनेडा में भी उनके समय के कई लोग हैं जो उन्हें बहुत आदर से याद करते हैं. लोगों के प्रति उनका अनुराग, प्रतिबद्धता और समर्पण अनुकरणीय भी है और प्रशंसनीय भी.

मेरे पिता ने हमेशा सज़ा की बजाय सुधार में विश्वास रखा. मुझे बाऊ जी की एक घटना की याद आती है जब वे करनाल में मजिस्ट्रेट थे. वे एक युवा को घर ले आए क्योंकि सका कोई पता-ठिकाना नहीं था (पक्का नहीं कि उसका कोई घर-परिवार था). मेरी माँ ने उसे बाऊ जी के कपड़े धोबी को देने के लिए दिए. वह युवा बाऊ जी के कपड़े बजाय धोबी के पास जाने के भाग गया और कभी नहीं लौटा. इससे परेशानी तो हुई लेकिन इससे लोगों की मदद करने वाले मेरे पिता के उत्साह में कोई कमी नहीं आई.

मुझे याद है कि चंडीगढ़ में नौकरी के दौरान बाऊ जी युवाओं को उच्चतर शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे. वे उन कई बच्चों के स्थानीय अभिभावक बन गए थे जो शिक्षा प्राप्ति के लिए हिमाचल प्रदेश से चंडीगढ़ आए थे. मेरे माता-पिता ने उन बच्चों को घर जैसी सुविधाएँ दीं, सहायता की और मार्गदर्शन दिया. उनमें से कई आज बहुत अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

उन्होंने अपने सभी बच्चों को बहुत सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन दिया.

मैं यह भी कहना चाहूँगी कि जब उनकी तीनों बेटियाँ बड़ी हो रही थीं उस समय लड़कियों का घर से निकलना बहुत सुरक्षित नहीं माना जाता था. लेकिन मेरे परिवार में ऐसा नहीं था. मेरी दोनों बहनों को और मुझे जीवन को रचनात्मक तथा व्यावसायिक बनाने के लिए प्रेरणा घर में मिली. सुनीता सफल अधिवक्ता (वकील) और बहुत लोकप्रिय सरपंच रहीं और स्नेह उच्चतम सिविल सेवा में है और मेरे मामले में, यद्पि मैने फाइन आर्ट्स में स्नातक किया था, क्या मेरे पिता मेरे चुने हुए अध्ययन विषय से निराश थे? नहीं इसके विपरीत उन्होंने मुझे अपना निर्णय लेने में सहायता की कि मुझे किन विषयों का अध्ययन करना चाहिए और मेरे प्रत्येक प्रयास को उनका समर्थन मिला. यही वह विश्वास था जिसने मुझे कैनेडा के जीवन में पूरी तरह रम जाने की शक्ति दी.

14 सितंबर, 2012 को मुझे महारानी एलिज़ाबेथ-II की ओर से क्वीन एलिज़ाबेथ डायमंड जुबली मेडल दिया गया है जो समुदाय और कैनेडा की सेवा के लिए प्रदान किया गया है. मैं इस सम्मान को विनम्रता से ले रही हूँ और यह सम्मान मैं अपने पिता को समर्पित कर रही हूँ.

यह सब इसलिए कह रही हूँ कि बात बच्चों की परवरिश की थी और मेरे पिता का दृष्टिकोण बहुत सकारात्मक था



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