30 September 2013

True Ramayana - सच्ची रामायण

पेरियार

यह पुस्तक उत्तर प्रदेश के 20-12-1969 के ग़ज़ट के अनुसार जब्त की गई थी. मुकद्दमा हुआ और रिस्पांडेंट श्री ललई सिंह यादव की जीत हुई. इस पुस्तक के लेखक प्रसिद्ध पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर हैं. इस सच्ची रामायण को आप नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं:-
   

Human point of view of an Asur (Asura) - असुर का मानवीय दृष्टिकोण


यह पोस्ट रिकार्ड के लिए रखी गई है.

प्रेस-कॉन्फ्रेंस/28 सितंबर 2013

सुषमा असुर ने आज झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपील की है कि दुर्गा पूजा के नाम पर असुरों की हत्या का उत्सव बंद होना चाहिए. असुर आदिम आदिवासी समुदाय की युवा लेखिका सुषमा ने कहा कि महिषासुर और रावण जैसे नायक असुर ही नहीं बल्कि भारत के समस्त आदिवासी समुदायों के गौरव हैं. वेद-पुराणों और भारत के ब्राह्मण ग्रंथों में आदिवासी समुदायों को खल चरित्र के रूप में पेश किया गया है जो सरासर गलत है. हमारे आदिवासी समाज में लिखने का चलन नहीं था इसलिए ऐसे झूठे, नस्लीय और घृणा फैलाने वाली किताबों के खिलाफ चुप्पी की जो बात फैलायी गयी है, वह भी मनगढंत है. आदिवासी समाज ने हमेशा हर तरह के भेदभाव और शोषण का प्रतिकार किया है. असुर, मुण्डा और संताल आदिवासी समाज में ऐसी कई परंपराएं और वाचिक कथाएँ हैं जिनमें हमारा विरोध परंपरागत रूप से दर्ज है. चूँकि गैर-आदिवासी समाज हमारी आदिवासी भाषाएँ नहीं जानता है इसलिए उसे लगता है कि हम हिंदू मिथकों और उनकी नस्लीय भेदभाव वाली कहानियों के खिलाफ नहीं हैं.

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की सुषमा असुर ने कहा कि असुरों की हत्या का धार्मिक परब मनाना देश और इस सभ्य समाज के लिए शर्म की बात होनी चाहिए. सुषमा ने कहा कि देश के असुर समाज अब इस मुद्दे पर चुप नहीं रहेगा. उन्होंने जेएनयू दिल्ली, पटना और पश्चिम बंगाल में आयोजित हो रहे महिषासुर शहादत दिवस आयोजनों के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की और असुर सम्मान के लिए संघर्ष को जारी रखने का आह्वान किया. सुषमा ने कहा कि वह सभी आयोजनों में उपस्थित नहीं हो सकती हैं पर आयोजकों को वह अपनी शुभकामनाएँ भेजती हैं और उनके साथ एकजुटता प्रदर्शित करती हैं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे भी उपस्थित थीं. उन्होंने कहा कि आदिवासियों के कत्लेआम को आज भी सत्ता एक उत्सव की तरह आयोजित करती है. रावण दहन और दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक आयोजनों के पीछे भी एक भेदभाव और नस्लीय पूर्वाग्रह की मनोवृत्ति है.

सुषमा असुर
वंदना टेटे
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा.
साभार ...!!!

सुषमा जी के इस बयां पर मीडिया चुप क्यों है ?? कहीं कोई बहस नहीं, चर्चा नहीं ?? क्या सुषमा जी की इस मुहिम को समस्त मूलनिवासियों द्वारा समर्थन मिलना चाहिए ?? इस ऐतिहासिक सत्य और खुलासे पर आपके क्या विचार हैं ????

22 September 2013

Worship places of Megh Bhagats - मेघ भगतों के पूजा स्थल


देहुरियाँ (डेरे-डेरियों) का इतिहास-
(यह आलेख डॉ. ध्यान सिंह के शोधग्रंथ के एक अंश का संपादित रूप है जिसे उनकी अनुमति से यहाँ प्रकाशित किया गया है)
पंजाब और जम्मू क्षेत्र की मेघ जाति की अधिकतर देहुरियाँ और देहुरे’ (डेरे-डेरियाँ) जम्मू क्षेत्र में बने हैं. पंजाब में भी दो-एक देहुरियाँ हैं जो जम्मू की देहुरियों से कुछ यादगार या प्रतीक के तौर पर कुछ मिट्टी-पत्थर ला कर बनाई गई हैं. ये डेरियाँ मेघों के पूजा स्थल हैं. प्रत्येक गोत्र (खाप) की अलग डेरी है. इन पर वर्ष में दो बार  मेला लगता है जो दशहरा और जून मास में होता है. इसे ‘मेल कहते हैं. प्रत्येक गोत्र के लोग अपनी-अपनी डेरी पर इकट्ठे होते हैं. ये देहुरियाँ जम्मू के आसपास छोटे-छोटे गाँवों में बिखरी हुई हैं. झिड़ी नामक गाँव में देहुरियों की काफी संख्या है.
अधिकतर देहुरियाँ खेतों में बनी हैं. खेतों की मेढ़ पर चल कर इन तक पहुँचना पड़ता है. कुछ देहुरियों का स्थान जंगल-सा दिखाई देता है. वहाँ पेड़ व झाड़ियाँ हैं. इसे बाग़ भी कहते हैं. कुछ स्थानों पर इन बाग़ों को काट कर देहुरियों को अच्छी तरह से बनाया जा रहा है. पहले ये अधिकाँशतः कच्ची मिट्टी की और बहुत छोटी हुआ करती थीं.
ये देहुरियाँ (मौखिक इतिहास के अनुसार) मेघ शहीदों और सतियों के स्मृति स्थल हैं जिन्हें ऊँची जाति वालों ने कत्ल कर दिया था. लोगों ने क़त्ल की जगह पर कुछ पत्थर या पिंडी रूपी पत्थर लगवा दिए और उनकी पूजा करने लगे.
अधिकतर देहुरियाँ इतनी छोटी हैं कि इनके भीतर बैठना, खड़े होना संभव नहीं. देहुरी के भीतर जो पिंडी होती है जिसे 'स्थान' अथवा 'शक्तिपीठ' भी कहते हैं. परंपरागत आस्था के अनुसार उसमें बहुत शक्ति होती है. जब से पंजाब के मेघ, भगत, कबीरपंथी इन देहुरियों पर जाने लगे हैं, इनकी हालत में सुधार आया है. पिछले 20-25 वर्षों में लोगों का इस ओर रुझान हुआ है.
पहले इन देहुरियों पर बकरा हलाल किया जाता था. लेकिन अब यहाँ झटका हो रहा है, क्योंकि पहले वहाँ मुसलमानों का प्रभाव था. वे इन्हें झटका नहीं करने देते थे.
इन देहुरियों पर लोग अपनी मन्नतें माँगने आते हैं. मन्नत पूरी होने पर अहसान के तौर पर बकरे की बलि दी जाती है. मेघ अपने यहाँ पहला पुत्र होने पर बकरा देते हैं. मुंडन पर भी बकरा देते हैं. शादी होने पर भी कुछ देहुरियों पर बकरा लगता है, जिसे अपनी जाति की देहुरी पर लेकर जाते हैं. 
देहुरी के पुजारी को पात्र कहा जाता है. पुजारी का एक चेला भी होता है.पात्र या चेला मेले के दिन देहुरी पर बैठते हैं. जो मेघ बकरे को बलि के लिए लेकर आते हैं वे परिवार सहित देहुरी के भीतर या बाहर बैठते हैं और कहते हैं कि बाबा जी दर्शन दो, बकरा परवान करो, मेहर करो.
बकरे के सामने धूप जलाया जाता है, उसका सिर व पाँव पानी से साफ़ करते हैं. वह शरीर झटकता है. यदि वह शरीर न झटके तो उसके ऊपर पानी के छींटे लगाए जाते हैं. वह फिर अपना शरीर झटकता है तो लोग कहते हैं कि बिजी गया और फिर उसको काट देते हैं. उसके रक्त से सभी को टीका लगाया जाता है. उसकी कलेजी पोट पहले बनाकर खाई जाती है जो प्रसाद की तरह लिया जाता है. से 'मंडला' भी कहा जाता है.
यदि किसी कारण बकरा अपना शरीर नहीं झटकता तो बकरा चढ़ाने वाले परिवार के बड़े बूढ़े कान पकड़ते हैं, नाक रगड़ते हैं और कहते हैं कि हमें कुछ पता नहीं था. हमारी भूल क्षमा करो. सिर झुकाते हैं. यह तब तक दुहराया जाता है जब तक बकरा बिज नहीं जाता. यहाँ आने वाले मेघों को जाति निर्धारित नियमों का उपदेश दिया जाता है. फिर सभी बकरा खा लेते हैं. अब राजपूत व मुसलमान भी इसमें शरीक होते हैं.
मेले के अवसर पर बकरा अर्पित करते हुए लोग शराब पीते हैं, बकरा भी खाते हैं. इससे कई बार विवाद हो जाता है. इसी लिए कुछ देहुरियों पर बकरा काट कर रांधने की मनाही है. इन देहुरियों पर लाल रंग का झंडा होता है. वहाँ कुछ चूहों ने मिट्टी निकाल कर ढेर लगा रखा होता है. कहा जाता है कि ऐसे स्थान पर सांप देवता निवास करते हैं. उस मिट्टी को लोग वरमी कहते हैं. उसकी भी कुछ लोग पूजा करते हैं. एक देहुरी पर एक ही दिन में 10 बकरों की बलि भी होती है. शाकाहारी मेघ भी यहाँ आ कर रीति को निभाने के लिए बकरा चख लेते हैं. ऐसे मौकों पर देहुरी का पात्र मेल के अवसर पर चौंकी (ज़ोर से सिर हिलाना) करता है तथा आए हुए लोगों की पुच्छों (प्रश्नों) के उत्तर देता है.
कभी इन देहुरियों पर पीने का पानी नहीं होता नहीं होता था लेकिन अब वहाँ नल लगा लिए गए हैं. कुछ देहुरियों पर छाया के लिए शैड बन गए हैं. कुछ ने आने-जाने वालों के लिए बर्तन भी रख लिए हैं. बकरा बनाने के लिए ईंधन इकट्ठा कर लिया जाता है.
कुछ देहुरियों पर अन्य चित्रों के साथ कुत्ते की भी पूजा होती है क्योंकि वह किसी की शहादत या सती होने के समय वहाँ रहा था. कुछ राजपूत यज्ञ आदि करते हैं तो वह एक मेघ और कुत्ते को रोटी खिलाते हैं. इसी से वह यज्ञ संपूर्ण हो पाता है. कहा जाता है कि राजपूतों की एक जाति को हत्या लगी हुई है. इसलिए ये यज्ञ के दिन मेघ की पूजा करते हैं.


साकोलियों की डेरी, बडियाल ब्राह्मणा, आर.एस. पुरा, जम्मू.


उपर्युक्त जानकारी पर मेरे नोट्स
डॉ. ध्यान सिंह के शोधग्रंथ की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि पहली बार किसी ने मेघ भगतों के गोत्रों से संबंधित डेरे-डेरियों (जिन्हें ध्यान सिंह ने ‘देहुरियाँ’ और ‘देहुरे’ कहा है) पर इतनी सामग्री एकत्रित की.
मेरे पास उपलब्ध शब्दकोशों में देहुरियाँ शब्द नहीं मिला. संभव है यह शब्द बोलचाल की भाषा का हो जिसे शब्दकोश में सम्मिलित होने की प्रतीक्षा है. शब्दकोश में कबीर द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘देहरा’ है जो ‘देवालय’ से बना है और ‘मंदिर’ का पर्यायवाची है. एक शब्द ‘देहर’ है जिसका अर्थ है नदी के पास की नीची ज़मीन. इन सभी शब्दों की अर्थ छटाएँ छोटे-छोटे पूजा स्थानों की ओर इंगित करती हैं. तथापि ‘देहुरिया’ शब्द पर विचार आवश्यक है. वैसे डेरे-डेरी का समान्य अर्थ ‘encampment’ होता है. बड़े-बड़े धार्मिक/गुरु डेरों की छवि से भी इसकी तुलना नहीं की जा सकती. संभवतः कल हो सके.
इस शोधग्रंथ में उपल्ब्ध डेरे-डेरियों की जानकारी से स्पष्ट है कि ये पूजा स्थल हैं जहाँ कर्मकांड किए जाते हैं. पूजास्थल होने के साथ-साथ ये शहीदों के स्मारक भी हैं. यह मृत पूर्वजों की पूजा का ही एक रूप है. दुनिया के अधिकतर ग़रीब (भारत में दलित और आदिवासी) कबीलों में मृतकों की पूजा की परंपरा है. विकसित कबीलों में ईश्वर जैसी अवधारणाएँ हैं जिसमें ईश्वर को जन्म-मृत्यु के परे माना जाता है. दूसरी ओर विकसित कबीले सुनिश्चित करते रहे हैं कि दलित कबीलों के पूजा स्थलों की ओर धन न जाए. दूसरी ओर उनके अपने पूजा स्थल बड़े और भव्य हैं. पैसे का खेल साफ नज़र आता है. दलित कबीलों के पूजा स्थलों को विकसित नहीं होने दिया गया और उन्हें नष्ट करने/ धन के अभाव से नष्ट होने देने की परंपरा रही. इसी लिए ये डेरे-डेरियाँ जैसे-तैसे बच गईं और कच्चे, छोटे, छितराए और अविकसित स्ट्रक्चर के रूप में इनका अस्तित्व बना रहा. कई जगह तो पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं थी. इस शोधग्रंथ में यह पढ़ना संतोषकर है कि अब इन्हें विकसित किया जा रहा है और राजपूत तथा मुसलमान मेल के दिनों में यहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं.
भारत के जनजाति कबीलों में किसी न किसी रूप में देवी की पूजा और पशु-बलि की परंपरा है. मेघों में भी यह परंपरा है जैसाकि इन डेरियों पर देखा जा सकता है. इन स्थलों पर पुजारी या पात्र होता है जो चौकी (चौंकी) देता है और उपस्थितों की ‘पुच्छें’ (प्रश्नों के उत्तर और दिल की बातें) बतलाता है. यह रुचिकर है.
मैंने कुछ मेघों में देवी माता का आना सुना है. एक दो महिलाओं को चौकी देते देखा है. यह जनजातीय परंपरा में आता है. देखा गया है कि ‘चौकी’ देने का प्रयोग शरीकों के प्रति घृणा फैलाने के लिए किया जाता है. वैसे जब किसी जनजातीय महिला में देवी या माता प्रकट होती है वहाँ ऊँची जातियों के पुजारी पहुँच जाते हैं. ध्यान से देखने की बात है कि चौकी देने वाली दलित महिला को कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाया जाता न ही दूसरी जाति का कोई उससे प्रश्न पूछता है, अलबत्ता उसके परिवार की जासूसी अवश्य कर ली जाती है. दूसरी ओर ऊँची जाति की कई महिलाओं ने 'चौकी' को व्यवसाय बना लिया है. चौकी देने वाली दलित महिलाओं का पैसा ऊँची जातियों के मंदिरों/पूजा स्थलों पर चढ़ावे के रूप में जाता है जो बुरी बात है. संभव है डेरे-डेरियों पर ऐसा न होता हो. 
शोधग्रंथ में लिखा है कि कुछ देहुरियों पर अन्य चित्रों के साथ कुत्ते का चित्र लगा होता है और कि कुछ राजपूत लोग यज्ञ में एक मेघ व एक कुत्ते को रोटी खिलाते हैं. मुझे दूर तक नज़र नहीं आता कि मेघों में कुत्ते जैसे जीव की पूजा करने की परंपरा कभी रही हो. यहाँ ऐसा क्यों है? इंसान और कुत्ते के अच्छे गुणों की तुलना हो सकती है लेकिन पूजास्थल पर कुत्ते का चित्र कई प्रश्न खड़े करता है. ऐसे ही राजपूतों का वह व्यवहार सम्मानजनक नहीं लगता जब वे एक मेघ और एक कुत्ते को इसलिए भोजन कराते दिखते हैं कि इससे उनका यज्ञ संपूर्ण होता है. ऐसा करके वे शायद अपने किए अत्याचारों का प्रायश्चित करते हों या प्रकारांतर से अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करते हों. कुल मिला कर यह स्थिति मेघों के लिए सम्मानजनक नहीं है.
ये डेरे-डेरियाँ ऊँची जातियों द्वारा मेघ पुरुषों और स्त्रियों पर किए अत्याचारों के स्मारक हैं और उनकी कुर्बानियों-शहादतों के गवाह हैं. यह भी एक कारण है कि इन स्थलों को विकसित नहीं होने दिया गया. दलित तबकों को सदियों से उनकी मजबूरियाँ याद दिलाई जाती रही हैं जिससे अब वे उबर रहे हैं.
मेघों के डेरे-डेरियाँ उनका संपूर्ण इतिहास नहीं है. उन्होंने सदियों से कोई जंग नहीं लड़ी सिवाय अपने अस्तित्व की जंग के जिसमें ज़िंदा रहने मात्र का महत्व था. सदियों तक इनकी साँसें अमानवीय यात्नाओं की टीस सहलाने में खर्च हुईं. कुछ साँसें राहत और ग़ैबी ताकत पर खर्च करना ज़रूरी था. डेरे-डेरियाँ इसी का अलिखित और प्रत्यक्ष इतिहास हैं. यही मेघों के संघर्ष का सूक्ष्मतम रूप है.
क्या संभव है कि मेघ इन कुर्बानियों और शहादतों को याद रखें और अपनी पूजा पद्धतियों को बदल कर विकसित भी कर लें? ऐसा एक संकेत शोधग्रंथ में वर्णित कबीर मंदिरों के निर्माण के संदर्भ में किया गया है.
एक प्रश्न और भी मन में उठता है कि क्या मेघों के सभी गोत्रों/खापों का एक साझा पूजा स्थल नहीं बन सकता? मेरा विचार है कि यह संभव है. 

(अभी परसों ही राजस्थान के श्री भगवानाराम मेघवाल से फोन पर जानकारी मिली कि राजस्थान में मेघवालों के पूजा स्थल हैं जो ऐसी सतियों के हैं जो मेघवंशी थीं. आज (17-09-2013) को डॉ. ध्यान सिंह ने जम्मू स्थित कुछ डेरियों के फोटो भेजे हैं जो नीचे दिए गए हैं. संभव है शीघ्र ही भगवानाराम जी से भी फोटो प्राप्त हो जाएँ.)

उक्त देरियों पर तैयार एक वीडिया इस लिंक पर देखा जा सकता है-



















MEGHnet

15 September 2013

Serial 'Budhha' – 'बुद्ध' सीरियल


किसी भी टीवी चैनल का हर कोई सीरियल कुछ कहता है. डीडी नेशनल पर रविवार को प्रातः 11.00 बजे दिखाया जा रहा सीरियल 'बुद्धा' भी कुछ कहता है.


जैसी कि उम्मीद थी यह मनोरंजक (रोचक, भयानक और अनहोनी कहानियों से भरे) तरीके से ऐसे बनाया गया है जिसे लोग देखें. स्वागत है. लेकिन ज्ञातव्य है कि बुद्धिज़्म ईश्वर या भगवान की बात नहीं करता, बल्कि व्यावहारिक जीवन की बात करता है. सत्य को जानने के लिए आँखें खुली रखने की सलाह देता है. लेकिन इस सीरियल के कारण बड़ा विवाद इस बात से खड़ा होता है कि बुद्ध के जन्म को राम के साथ जोड़ा गया है जबकि पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि 'राम के जन्म' से पहले (?) लिखी गई 'रामायण' में वाल्मीकि ने कहा है :-


यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि तस्माद्धि,
यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम्.

"जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे! (श्लोक 34, सर्ग 109, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड.)”


अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह सीरियल क्या कहता है. स्पष्ट है कि यह वेदों, शास्त्रों, पुराणों, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों को बुद्ध से पहले का बताने की कुचेष्टा है. यह दुनिया जानती है कि मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला मार्ग ऐतिहासिक दृष्टि से बुद्ध ने ही बनाया था जिसे दुनिया 'बुद्धिज़्म' के नाम से जानती है. इसके बाद के सभी धर्मों के मूल में यही धर्म है.


आज का एपीसोड देखते हुए मैं डर रहा था कि कहीं बालक बुद्ध का जनेऊ संस्कार न दिखा दिया जाए :) ऐसे सीरियलों में कुछ भी संभव है.


14 September 2013

Religious and Caste Riots - धार्मिक और जातीय दंगे

मुलायम सिंह ने कहा कि मुज़फ़्फ़रपुर में हुए दंगे धार्मिक नहीं जातीय थे. कुछ सवाल मन में उठे हैं :-

1.
क्या जातीय दंगे कहने से उनकी गंभीरता कम हो जाती है?
2. 90
प्रतिशत मुसलमान जातिवाद से तंग आकर धर्मांतरण करके मुसलमान बने हैं. उनके विरुद्ध दंगे क्या केवल धार्मिक दंगे हैं?
3.
यदि मुसलमान और दलित अपना एक वोट बैंक मज़बूत करके कांग्रेस, बीजेपी और एसपी के खिलाफ वोट डालें तो क्या यह बेहतर नहीं होगा?
अब तक 47 लोग काट डाले गए हैं. वैसे यह प्रश्न भी पीछा नहीं छोड़ता कि अचानक गली-कूचों में इतने हथियार कहाँ से निकल आते हैं! सरकार जी, आपने हथियार जब्त करने का कानून बनाया हुआ है न? बना के कहाँ रख दिया हुजूर? Civil War कराने का इरादा है क्या?
MEGHnet





08 September 2013

Messengers of Death - जमदूत

आम आदमी
सोचा था कि देश में संभावित गृहयुद्ध (Civil war) के बारे में लिखूँ जिसकी चेतावनी प्रशांत भूषण ने एक पत्रकार सम्मेलन में दी थी........जो बन गई थी 'कल्पनाओं को चीरती हुई सनसनी......' फिर विचार आया कि देश में स्मगल हो कर आ रहे और सरकारी नीतियों के तहत बँट रहे फायर आर्म्स पर कलम की एके-47 चला दूँ (मेरे पास केवल यही है). लेकिन मैं डर गया. इसलिए कबीर वाणी याद कर के अपने उर को शांत कर रहा हूँ.

'....जम के दूत बड़े मरदूद......' 

आम आदमी हथियार बाँटने वालों से क्या कहे सिवाय इसके कि- ''एकदम सामने तो आप ही हो भगवन्! आप ही पूछते हो कि घूँसा पास है या भगवान!! आप सामने हो तो भगवान के पास पहुँचने में कितना समय लगता है?"

01 September 2013

Talk from a distance Your Holiness! - दूर से बात करो महात्मा जी !

टीवी पर आसाराम का केस सुनते-सुनते कान पक गए हैं. इसे कबीर के दो शब्दों में समेटा जा सकता है-

                                  दास कबीर हर के गुन गावे, बाहर कोऊ पार न पावे
                                  गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला.

गुरु का अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य होता है. हर व्यक्ति का होता है. एक गुरु के पास एक चेले के चरित्र संबंधी शिकायत आई तो उसने कहा कि 'यह चेला मेरे पास आया है. गंदे कपड़े ही धोबी घाट पर आते हैं.'

अंधश्रद्धा रखने वाले भोले लोग अपने बच्चों का पेट काट कर गुरुओं-महात्माओं को दान देते हैं. समझदार गुरु और स्वामी सारा दान इकट्ठा करके अपनी गद्दियाँ-आश्रम बना कर अपने बच्चों-रिश्तेदारों के नाम कर जाते हैं. How sweet Baba ji !! 

लेकिन अगर 'महात्मा' पर आर्थिक चोरी (सभ्य भाषा में अनियमितता) का आरोप हो और महिलाओं को इनसे शिकायत होती हो, तो? इसका इलाज है, बहुत कारगर. चाणक्य ने कहा है कि युवा माता को युवा बेटे के साथ अकेले यात्रा नहीं करनी चाहिए. व्यावहारिक माताएँ अपने घर में पिता और बेटी को अकेले छोड़ कर दूर नहीं जातीं. ये बातें बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही हैं. महात्माओं के पास महिलाओं का जाना और जा कर उनके 'पैर छूना' या 'चरण दबाना'.....पता नहीं आप क्या सोचते हैं.....मैंने कभी नहीं सुना कि किसी संत, सत्गुरु, आचार्य आदि ने स्वयं के नपुंसक, अक्षम या हिजड़ा होने की बात कही हो.

इनसे बचना और दूर रहना बेहतर है. गृहस्थी अपना धन-समय बच्चों और अपने समाज के विकास पर ही व्यय करें.