13 September 2014

Megh Warriors – मेघ योद्धा

Bheema Koregaon Victory Pillar
मेघों को मेघों से पूछते सुना है कि क्या मेघों ने कभी कोई युद्ध लड़ा है. मेघों ने ज़रूर युद्ध लड़े हैं. इसके पक्ष में पहला साधारण तर्क तो यह है कि कोई भी जातीय समूह वीरों से विहीन नहीं होता. यदि कोई वीर होने के साथ सभ्य भी है तो वह असभ्य और क्रूर जातीय समूह (जैसे आर्य या अन्य) से पराजित भी हो सकता है. संभवतः अपनी इसी कमज़ोरी के कारण मेघवंशियों ने युद्ध हारे हैं. लेकिन मेघवंशी वीरों का कभी भी सर्वथा अभाव नहीं रहा.

अब सूचना प्रणाली में आई तेज़ी और नए दृष्टिकोण ने उस इतिहास के अर्धसत्य को पूर्णता प्रदान करने के प्रयास तेज़ किए हैं. बताया जाने लगा है कि आधुनिक इतिहास में दलितों के सहयोग से लड़ा गया पहला प्लासी का युद्ध था जिसे दुसाध (पासवान) वीरों के सहयोग से जीता गया. दूसरा भीमा कोरेगाँव का युद्ध है जो पेशवाओं के खिलाफ था और म्हारों के सहयोग से जीता गया था. इस युद्ध ने भारत से पेशवा राज को समाप्त कर दिया. इतिहासकारों ने म्हारों और मेघों को एक ही जाति समूह का माना है. महारों के इतिहास की झांकी इस इस लिंक पर देख सकते हैं.

अंग्रेज़ों ने मेघवंशी योद्धाओं की मदद से दो युद्ध जीते. उनके बारे में लिखते हुए इतिहासकारों को प्रत्यक्षतः काफी संकोच हुआ और इतिहास में उनका विस्तृत उल्लेख नहीं किया. उन दोनों युद्धों को जीतने के कारण ही अंग्रेज़ों को भारत में अपना राज्य स्थापित करने में मदद मिली. इऩ युद्धों के बहाने से देश के दलितों को अंग्रेज फौज में भर्ती होने का अवसर मिला और उन्होंने अपनी युद्ध योग्यता का प्रमाण दिया. आगे चल कर अंग्रेज़ों ने दलितों के हित में कई कदम उठाए. लॉर्ड मैकाले ने अपने लगभग तीन वर्ष के कार्यकाल में नई शिक्षा प्रणाली शुरू की जिसने दलितों के लिए शिक्षा के रास्ते खोल दिए और भारत को Indian Penal Code और Criminal Procedure Code दे कर मनुस्मृति की काली छाया को हमेशा के लिए हटा दिया.

भीमा-कोरेगाँव युद्ध पर एक विस्तृत आलेख 


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