30 June 2014

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-2 - समीक्षा

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति - लेखक : ताराराम

पुस्तक समीक्षा

जितना आपका अधिकार अपने जीवन इतिहास पर है उतना ही मेरा भी अपने इतिहास पर है. लेकिन धन्य हैं वे इतिहासकार जो अपना और दूसरों का इतिहास ढूँढते हैं, जानते हैं और लिखते हैं.

पढ़ाए जा रहे इतिहास को एक विश्वसनीय दस्तावेज़ होना चाहिए. लेकिन भारत में सदियों से यह दस्तावेज़ीकरण बेइमानी का भी शिकार हुआ. अब आकर स्वतंत्र भारत के लोगों को लगने लगा है कि इतिहास का 'निर्ब्राह्मणीकरण (debrahmanisation)' करने की आवश्यकता है.

इतिहास से गुम मेघवंशी लोग पिछले लगभग 150-200 वर्ष से अपने इतिहास के बारे में अत्यधिक जिज्ञासु हुए हैं जिसका कारण उनमें शिक्षा का प्रचार-प्रसार है. इसका श्रेय निस्संदेह लॉर्ड मैकाले और उसके साथी अंग्रेज़ों को जाता है जिसने वंचितों के लिए शिक्षा का मार्ग खोला. दूसरी ओर अभी तक इतिहास में वर्णित अंधकारकाल (Darkages) में कई इतिहासकारों की रुचि जगी है. इससे भी मेघों के इतिहास की गवेषणा को गति मिली है. इसका श्रेय लॉर्ड कन्निंघम जैसे पुरातत्त्ववेत्ताओं को जाता है जिन्होंने सिंधुघाटी सभ्यता को खोज निकाला और कई तथ्य उजागर किए. उनके ही वैज्ञानिक कार्य के कारण नागवंशियों और मेघवंशियों ने अपनी सभ्यता के दर्पण को पहचानना शुरू किया है जिस पर पौराणिक कथाओं की सांस्कृतिक धूल जमी थी.

भारत में इतिहास लेखन की शास्त्रीय परंपरा की जड़ें अपने आश्रयदाता के गुणगान में हैं जो अंततः पौराणिक कथा या दरबारी काव्य से अधिक महत्व की नहीं रह जातीं. ऐसी रचनाएँ लोक को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देतीं. यह काफी सुखद है कि कई आधुनिक इतिहासकार नए दृष्टिकोण के साथ आए हैं जिन्होंने परंपरागत इतिहास की प्रचलित मान्यताओं को चुनौती दी है.

सदियों से पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जा रहे इतिहास ने भारत की अधिकांश जनसंख्या को ठगा है. यह एक ऐसा विषय है जिसमें व्यक्ति अपनी पहचान पा कर गौरव महसूस करने का अवसर पाता है. शेष को हैरानगी होती है कि क्या उसके समुदाय/समूह में किसी ने भी स्मरण रखने योग्य कोई कार्य नहीं किया? एक पक्षीय इतिहास जनमानस को समुचित उत्साह से नहीं भरता बल्कि कड़ुवाहट देता है. यही कारण है कि ज्यों-ज्यों भारत में शिक्षा का प्रसार हो रहा है त्यों-त्यों यह विचार प्रबल हो रहा है कि भारत के वास्तविक इतिहास को वैज्ञानिक आधार पर और संतुलित तरीके से पुनः लिखने की आवश्यकता है. आजकल पाठ्यक्रमों में शामिल ज्योतिराव फुले आदि से संबंधित जानकारी इसी बात को प्रमाणित करती है.

जहाँ तक मेघों के इतिहास का प्रश्न है इसके लेखन के कुछ प्रयास पहले भी हुए हैं. यह लेखन मेघवंशियों ने ही किया. इधर एक मेघवंशी श्री ताराराम द्वारा लिखित "मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-1" पढ़ा था. इस पुस्तक में मेघवंश के प्राचीन इतिहास और मेघवंशी राजाओं के अस्तित्व की ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ खोजबीन की गई थी. इसके सौजन्य से मेघवंश के लगभग गुम इतिहास का एक चमकदार हिस्सा प्रकट हुआ.

इसी सिरीज़ के "मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-2” में अब 'मेघ संस्कृति' पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है. लेखक ने जिस भाषा में इसे लिखा है वह विषय के अनुरूप है और उसमें राजस्थानी छुअन है. यह काफी वस्तुपरक दृष्टिकोण से लिखा गया है. तथ्यों, संदर्भों, अनुमान, प्रमाण और लोक-संस्कृति से प्राप्त जानकारियों का भरपूर प्रयोग इसमें हुआ है.

यह पहली बार है कि किसी पुस्तक ने इस बात को स्थापित किया हो कि भारत के कई राज्यों में मेघवंशी लोग मेघ, मेघवाल, मेघवार, मेंघवाल, मेघवल, कबीरपंथी, आदि नामों से न केवल अधिसूचित हैं बल्कि भारत के लगभग सभी राज्यों में विभिन्न नामों से बसे हैं. यह सारे भारत में निवास करने वाला एक विशिष्ट प्राचीन समाज है.

विषय के ताने-बाने को देखें तो इस पुस्तक के अध्याय-1 में हिंदूधर्म में मेघवंश की हीन दशा का चित्रण है और व्याख्या भी. ये वाक्य अपने आप में काफी कुछ समेटे हुए हैं- "अपने आप में एक पृथक समूह होने व विशिष्ट मान्यताओं को अपनाने के कारण ही यह एक अलग जाति बनीं. ......तत्कालीन समाज व्यवस्था में ऐसे ध्वजाहत दासों की निम्नतर स्थिति बनाने में 'स्मृति युग' ने आग में घी डालने का काम किया. .......मेघवंश के पतन के बाद पराजित मेघ राजाओं और उनकी प्रजा के सामने भी ऐसे ही विकल्प थे. इतिहास साक्षी है कि ‘मेघवंश‘ ने अपनी संस्कृति की अक्षुण्णता बनाए रखने हेतु अमानवीय शर्तों के अधीन भी रहना स्वीकार किया." सर्वदा अध्यात्म सुखभोगी मेघों के दुखते मर्म पर यह सबसे सशक्त टिप्पणी है. राजस्थान में सामन्तों, जागीरदारों, महाजनों, दलालों, बिचौलिओं और अंग्रेज़ों की मिली भगत ने कतारिए मेघवालों के लिए ऐसी दर्दनाक स्थिति पैदा कर दी थी कि उसे इस अध्याय में लेखक काफी जगह देने के लिए बाध्य हुआ है. लेखक ने स्पष्ट किया है कि मेघों को कोई राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं था.

दूसरे अध्याय में मेघों के धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन है. यहाँ लेखक ने देवरे का ज़िक्र किया है (जिसे जम्मू-कश्मीर में देहुरी या डेरी कहा जाता है). बताया गया है कि इस समाज ने अपने ‘आराध्य-स्थल‘ को कभी भी मंदिर, मस्जिद या मठ के अर्थ में नहीं माना. इनके संत पुरुषों या सिद्धों के ध्यान-विपश्यना स्थल को ये 'धूणी' कहते हैं और ऐसे पुरुषों की यादगार में बनाए जाने वाले पूजा स्थल (मंदिरनुमा या मठनुमा आकृतियों) को ‘देवरा‘ कहते आए हैं. प्रत्येक मेघवाल कुनबे की अलग-अलग 'कुल देवी' होती हैं. अपने मंगल कार्यों के लिए देवी को ये लोग ‘जोत‘ करते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं और बकरे की बलि भी देते हैं. कुछ खापें (गोत्र) अपनी कुलदेवी को 'चूरमा' (मीठा) प्रसाद चढ़ाती हैं. इस वर्णन से भी स्पष्ट हो जाता है कि यह पूजा पद्धति देश भर के मेघवंशियों में है और इसका स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मामूली अंतर के साथ वही है.

तीसरे अध्याय में सांस्कृतिक मूल्यों का विवरण दिया गया है. इसमें मेघवंशियों के खानपान, भोजन के नियम, व्रत-उपवास, वेशभूषा, उजोवणा-निमंत्रण, साख्या या साकिया, मरणासन्न मान्यताओं, अंतराभव, शंखोद्धार या संकोढ़ाल, वैशाख स्नान और सांस्कृतिक मूल्यों (खानपान, भोजन-नियम, पगड़ी धारण, आभूषण, गृहनिर्माण परंपरा, वाद्य यंत्र, रोशनी, सफाई-पानी की व्यवस्था, पीळा औढ़ना आदि का वर्णन किया गया है. मेरे विचार से इस प्रकार का इतना विस्तृत विवरण प्रकाशित रूप में पहली बार देखने में आया है. चौथे अध्याय में बताया गया है कि मेघवाल समाज को कई जगह बांभी कहा जाता है. इसमें उनकी जीवन शैली का चित्रण है जो पढ़ने योग्य है. इसमें उत्तर भी हैं और सवाल भी.

यह पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि मेघ जाति से संबंधित सभी परंपराएँ मेघ नामक पुरुष/ऋषि के वंशधरों की विरासत से आई हैं. इन परंपराओं को बढ़ाने वाले ये लोग एक ही वंश से हैं.

लेखक ने इतिहासकारों जैसे डॉ. नवल वियोगी, के. पी. जायसवाल आदि के हवाले से सिद्ध किया है कि मेघवंश का उत्थान कोसल, कन्नौज के राजा विमलचन्द्रपाल के पोते मेघचन्द, गंधार-कश्मीर से और राजस्थान के प्राचीन भू-भाग से हुआ है. लेखक का मत है कि ऐतिहासिक रूप से कोसल-बघेलखंड इस जाति के उत्थान का सुस्पष्ट उद्गम स्थान है जबकि गंधार-कश्मीर में 6ठी शताब्दी के बाद के प्रमाण मिलते हैं. एक निष्कर्ष के तौर पर लेखक इस बात को मानता है कि तथ्यों के आधार पर मेघवंश का उद्गम कोसल से है, जो उस समय सिंधुघाटी सभ्यता का ही एक प्रमुख भू-भाग था. मेघ लोग वहीं से भारत के विभिन्न भू-भागों में आए-गए और वहीं के निवासी बन गए.

लेखक ने बताया है कि मेघवंश एक प्राचीन क्षत्रिय वंश था. यह क्षत्रियों से उत्पन्न हिंदू धर्म की कोई जाति नहीं थी. उनकी जाति आधारित हीनता का कारण उनके हिंदू धर्म में शामिल होने की प्रक्रिया में है. मेघवंशी अपनी मान्यताओं और विश्वासों पर डटे रहे और कालांतर में राजनीतिक लड़ाइयाँ हारने के कारण हिंदू धर्म की हीन जातियों में शामिल हो गए और दासत्व को प्राप्त हुए. अधिकांश मेघों ने कपड़े बुनने के कार्य में ही अपने को लगाया और यह उनका पुश्तैनी धंधा बनकर उभरा.

आज़ादी के बाद पैदा हुए अधिकतर मेघ युवा इस तथ्य को सहज स्वीकार नहीं कर पाते कि अतीत में उनके पराजित समाज के पास जीवित रहने के लिए दासत्व स्वीकारने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. बड़े-बूढ़े मेघ आज भी उलझन में हैं कि - "हम कौन हैं......कहाँ से आए हैं....." और अंततः इस दार्शनिक प्रश्न पर अटक जाते हैं कि - "......हम कहाँ जाएँगे?". इसका मुख्य कारण यह है कि सदियों तक मेघों का इतिहास न लिखा गया, न पढ़ाया गया, न ही उनकी कोई कहानी थी जो उनके जीवित भर रहने के संघर्ष से अलग होती. यदि कोई गौरवपूर्ण इतिहास था तो वह अंधकारकाल के पृष्ठों में दफ़्न था. इस पुस्तक का कथ्य आधुनिक मेघ समाज को अहसास करा जाता है कि मेघवंशियों ने वैदिक कर्म-कांडों और ब्राह्मणी-वितंडावाद से हमेशा दूरी बनाए रखी.

यह पुस्तक मेघों की गोत्र प्रणाली और धार्मिक रीति रिवाज़ों पर भी प्रकाश डालती है और उनकी 'कुलदेवी पूजा' सहित कई मान्यताओं का मूल बौध धर्म और सिद्ध परंपरा में देखती है. सामाजिक परंपराओं और रीतियों में खाप (गोत्र) का महत्व और स्वरूप इसमें बख़ूबी उभर कर आया है.

इससे पूर्व इने-गिने मेघवंशियों ने 'मेघवंश/मेघों का इतिहास' लिखने का प्रयास किया. जो पुस्तकें उन्होंने लिखीं उनमें दी गई जानकारी और लेखकीय क्षमता कई कारणों से एक सीमा में बँधी थी. ताराराम की उक्त पुस्तक ने मेघ इतिहास की कमी को कुछ हद तक दूर किया है. इस क्षेत्र में अभी बहुत कार्य होना है ऐसे संकेत इस पुस्तक में ही मिल जाते हैं. आने वाले समय में यह पुस्तक इतिहासकारों का ध्यान खींचेगी और संदर्भ प्रदान करेगी इसमें संदेह नहीं.

यह पुस्तक निश्चय ही मेघों के गौरवशाली अतीत का स्वर्णिम इतिहास और सांस्कृतिक इतिवृत्त है.

निम्नलिखित सूचना श्री ताराराम जी ने ईमेल के ज़रिए 11-08-2014 को भेजी है. इसमें उक्त पुस्तक के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार श्री नवल वियोगी द्वारा व्यक्त विचार दिए गए हैं-


इन विद्वानों ने इस पुस्तक के बारे में कहा है-

(1)

मेघवंश इतिहास और संस्कृति : अँधेरे को उजाले में बदल देगा - डा. नवल वियोगी

Naval Viyogi
लुधियाना; 22 जुलाई, 2013. श्री तारा रामजी द्वारा रचित ग्रन्थ "मेघवंश इतिहास और संस्कृति" भाग-2 का आदि से अंत तक अध्ययन कर मुझे अति हर्ष हुआ है। भारत के मूल निवासियों को, जिन्होंने सिन्धु घाटी की महान सभ्यता को जन्म दिया, इतिहास के अनेक मानक स्थापित किये, उच्च गरिमावाले राजवंश पैदा किये, मनु आदिक ब्राह्मण ऋषियों ने कठोर कानून बना कर विद्या अध्ययन पर रोक लगा दी और उन्हें अज्ञान के गहन अँधेरे में धकेल दिया। परिणाम स्वरुप उनमें अपने अतीत के गौरव को अंकित करने की परंपरा नहीं पनप सकी। यही उनकी सबसे बड़ी समस्या है। मगर यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि उक्त ग्रन्थ (मेघवंश : इतिहास और संस्कृति) की रचना कर तारारामजी ने उस परंपरा को डंके की चोट पर तोडा है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसका अध्ययन उनके गौरवशाली अतीत के अँधेरे को उजाले में बदल देगा और उनका सिर गौरव से उन्नत हो जायेगा।

उक्त रचना में विद्वान् साथी ने मात्र मेघवंश की संस्कृति और परम्पराओं को ही अंकित नहीं किया है बल्कि उसमें अन्य अनेक आदिवासी जातियों को भी शामिल कर ज्ञान के घड़े को भरा है।

मैं विद्वान् लेखक तारारामजी को उनके इस सफल प्रयास पर बधाई प्रेषित करता हूँ। इस रचना की प्रशंसा मात्र विद्वान ही नहीं, विषय से सम्बंधित हर व्यक्ति करेगा।

डॉ नवल वियोगी, निदेशक; भारतीय राष्ट्रीय ऐतिहासिक अनुसन्धान समिति; लुधियाना(पंजाब)
दिल्ली में एक सम्मान समारोह के दौरान श्री नवल वियोगी (एकदम बाएँ)
पधारे और उन्होंने श्री ताराराम (दाएँ से दूसरे) को बधाई दी.
(2)

श्री माना राम बालोच, आई.एफ.एस.


(3)
श्री हेमेंद्र चंदालिया के ब्लॉग पर इस पुस्तक को इस प्रकार वर्णित किया गया है-

"The History of Meghvansh has been recorded in a number of writings by prominent Dalit writers. 'Meghvansh : Itihas Aur Sanskriti' written by Tararam is a set of two volumes. The author traces the history of Meghwals to a ruling clan called Meghvansh which existed somewhere around 220 – 320 AD. Prof. Angane Lal, in his preface to the book states that “Koshambi” has been the centre of the Meghvansh’s territory. The relics discovered from the nearby archaeological sites suggest that the Meghvanshis were followers of Buddhism. The Meghvansh declined with the rise of Gupta dynasty. The author describes in details various symbols, icons, coins associated with the Megh dynasty during their rise as a power in some parts of the country. Tara Ram writes in this book, “After the Nirvaan of Buddha, he has been represented by the symbols of a tree, foot marks and the religious Wheel (Dharmcakra). We find these symbols in Amraavati during the regime of Meghwan dynasty. Similar symbols are found in Koshambi, Bandhogarh and Bheeta. Thus, it is clear that Meghwan dynasty and Megh dynasty were the same; they had the same origin and the same religious beliefs.

Most of the Historians consider them Brahmin – born followers of Buddha. But a historical analysis proves it wrong because the Varna system which is so emphasized upon in the Vedic period gets slackened in the Upanishad Era and in the Mauryan period which follow it. In the Smriti Age the existence of all the Varna’s is seen. In the meanwhile, it was assumed that the king will be either a Kshatriya or a Brahmin. As a consequence even the Buddhist rulers were dubbed as Kshatriya or Brahmin. In reality they were followers of Buddhism, opponents of the Varna system and the supporters and propagators of Pali tradition. Thus it is clear that the rule of Meghvansh continued for a long time but due to their faith in the idea of a society without the hierarchical division of the Varnas, their dynasty could not be sustained for long. (Tararam 62-63)"


प्रकाशक:
सम्यक प्रकाशन
32/3, पश्चिमपुरी, नई दिल्ली-110063
टेलिफोन – 98102 49452, 98183 90161
मूल्य – 200 रुपए

भारत भूषण भगत


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20 June 2014

Strength of Indian Constitution - भारतीय संविधान की शक्ति

AURANGABAD: The Constitution can replace the religious texts in today's times, Chief Justice of India S H Kapadia said here today.
 
"The Constitution should be studied by Indians to know about citizens' rights. If you read it, there is no need to read the religious books as you may find God in our Constitution. Gaining knowledge of the Constitution would be a real homage to Dr Babasaheb Ambedkar," he said, delivering a lecture on `Constitutional Ethics' at Dr Babasaheb Ambedkar Marathwada University here. Chief Justice of Bombay High Court Justice Mohit Shah was also present on this occasion.

"I belong to the Parsi community and would have never thought of becoming the Chief Justice anywhere (else) in the world. It is only in India that it was possible due to the Constitution," said the CJI.

The judges should be acquainted with multiple fields of knowledge, which can help them in the court, he said.

Judges can learn a lot from "constructive criticism" but not from "destructive criticism", he said.

Poverty was "a basic violation of human rights", he said, talking about the need to have a "balanced" society.



Original source (retreived as on 20-06-2014)



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03 June 2014

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति - ਮੇਘ - ਮੇਘਵੰਸ਼ : ਇਤਹਾਸ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ (ਸਭਿਆਚਾਰ) ਭਾਗ-2 - पुस्तक-सार



 ਮੇਘਵੰਸ਼ : ਇਤਹਾਸ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਭਾਗ-2

ਸ਼੍ਰੀ ਤਾਰਾਰਾਮ ਜੀ ਦੁਆਰਾ ਲਿਖਤ 'ਮੇਘਵੰਸ਼ : ਇਤਹਾਸ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਭਾਗ-2' ਦਾ ਦੂਜਾ ਭਾਗ ਪੜ੍ਹਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਇੱਛਾ ਸੀ ਕਿ ਇਸਦਾ ਸਾਰ ਮੇਘਨੇਟ ਉੱਤੇ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਮੇਘਵੰਸ਼ੀਆਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾ ਦੇਵਾਂ. ਇਸ ਪੁਸਤਕ ਸਿਰੀਜ਼ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦਾ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਇਤਹਾਸ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ. ਇਸ ਦੂੱਜੇ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਮੇਘ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ (ਸਭਿਆਚਾਰ) ਉੱਤੇ ਵਿਸਥਾਰ ਲਾਲ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ. ਇਤਹਾਸ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਦੇਣਾ ਆਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ੇ ਨਾਲ ਛੇੜ-ਛਾੜ ਕੀਤੇ ਬਿਨਾਂ ਇਹ ਕਾਰਜ ਹੋ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ. ਤਾਂ ਵੀ ਮੇਘਾਂ ਦੇ ਇਤਹਾਸ ਦੇ ਜਿਗਿਆਸੁ ਪਾਠਕਾਂ ਲਈ ਕਿਤਾਬ ਵਿੱਚ ਹੋਏ ਸਟੀਕ ਵਰਣਨ ਦੀ ਕੱਟ-ਛੰਡ ਦਾ ਖ਼ਤਰਾ ਲੈ ਕੇ ਦੂੱਜੇ ਭਾਗ ਦਾ ਸਾਰ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਹੈ ਜੋ ਤੁਹਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਹੈ. ਲੇਖਕ ਨੇ ਜਿਸ ਤਰਾਂ ਦੀ ਭਾਸ਼ਾ ਦਾ ਪ੍ਰਯੋਗ ਕੀਤਾ ਹੈ ਉਹ ਇਤਹਾਸ ਵਿਸ਼ਾ ਦੇ ਜਾਣਕਾਰਾਂ ਦੇ ਲਈ ਹੈ. ਇਸ ਭਾਸ਼ਾ ਦਾ ਕੋਈ ਵਿਕਲਪ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਤਦ ਵੀ ਪੰਜਾਬੀ ਮੇਘਾਂ ਲਈ ਕਈ ਅਭਿਵਿਅਕਤੀਯਾਂ ਨੂੰ ਸਰਲ ਹਿੰਦੀ ਵਿੱਚ ਕਰਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਹੈ ਤਾਂਕਿ ਉਸਦਾ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਠੀਕ-ਠਾਕ ਮਸ਼ੀਨੀ ਅਨੁਵਾਦ ਹੋ ਸਕੇ. ਪਰ ਹੈ ਇਹ ਮਸ਼ੀਨੀ ਅਨੁਵਾਦ ਹੀ. ਇਸ ਦੀਆਂ ਸੀਮਾਵਾਂ ਹ. ਉਮੀਦ ਹੈ ਪਾਠਕ ਇਸਨੂੰ ਕਬੂਲ ਕਰਣ ਦੀ ਕ੍ਰਿਪਾਲਤਾ ਕਰਣਗੇ. ਇਹ ਖਾਸ ਤੌਰ ਤੇ ਰਾਜਸਥਾਨ ਦੇ ਮੇਘਾਂ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚ ਹੈ. ਤਾਰਾਰਾਮ ਜੀ ਨੂੰ ਧੰਨਵਾਦ ਸਹਿਤ.
ਮੇਘਵੰਸ਼ : ਇਤਹਾਸ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ - ਲੇਖਕ - ਤਾਰਾਰਾਮ

ਪੁਸਤਕ - ਸਾਰ

ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਅਣਗਿਣਤ ਜਾਤੀਆਂ ਹਨ. ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵੀ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਹੈ ਜੋ 6000 ਨਾਲੋਂ ਜਿਆਦਾ ਨਾਮਾਂ ਵਿੱਚ ਵੰਡਿਯਾਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ. ’ਮੇਘ‘ ਜਾਤੀ 10 ਰਾਜਾਂ ਅਤੇ 2 ਕੇਂਦਰ ਸ਼ਾਸਿਤ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀ ਹੈ. 8 ਰਾਜਾਂ ਵਿੱਚ ਇਹ ’ਮੇਘ‘ ਨਾਮ ਨਾਲ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਹੈ. ਛੱਤੀਸਗੜ ਅਤੇ ਮੱਧਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਇਹ ਕੇਵਲ ‘ਮੇਘਵਾਲ‘ ਨਾਮ नाल ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਹੈ. ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵਾਲ ਅਤੇ ਮੇਂਘਵਾਰ ਨਾਮ ਨਾਲ, ਗੁਜਰਾਤ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵਾਰ, ਮੇਘਵਾਲ ਅਤੇ ਮੇਂਘਵਾਰ ਨਾਮ ਨਾਲ ਅਤੇ ਰਾਜਸਥਾਨ ਵਿੱਚ ‘ਮੇਘ‘ ਦੇ ਨਾਲ ਮੇਘਵਲ, ਮੇਘਵਾਲ ਅਤੇ ਮੇਂਘਵਾਲ ਦੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਹੈ. ਜੰਮੂ-ਕਸ਼ਮੀਰ ਵਿੱਚ ਮੇਘ ਅਤੇ ਕਬੀਰ ਪੰਥੀ ਦੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਹੈ. ਕਸ਼ਮੀਰ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਕੋਇੰਬਟੂਰ ਤੱਕ ਕੋਈ ਵੀ ਅਜਿਹਾ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਇਹ ਜਾਤੀ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਨਹੀਂ ਹੈ. ਇਹ ਸੰਪੂਰਣ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਫੈਲਿਆ ਜ਼ਮੀਨ ਉੱਤੇ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਇੱਕ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਸਮਾਜ ਹੈ. ਉੱਤਰ ਪ੍ਰਦੇਸ਼, ਬਿਹਾਰ, ਝਾਰਖੰਡ, ਪਂ. ਬੰਗਾਲ ਅਤੇ ਪੂਰਵੀ ਰਾਜਾਂ ਵਿੱਚ ਇਹ ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ੁਮਾਰ ਨਹੀਂ ਹੈ. ਦੱਖਣ ਵਿੱਚ ਕੇਰਲ, ਤਮਿਲਨਾਡੁ, ਆਂਧਰਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਅਤੇ ਉੜੀਸਾ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮੇਘ ਅਨੁਸੂਚਿਤ ਜਾਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ੁਮਾਰ ਨਹੀਂ ਹ. ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਇਹ ਜਾਤੀ ਅਧਿਸੂਚਿਤ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਉੱਥੇ ਵੀ ਇਸ ਜਾਤੀ ਦੇ ਲੋਕ ਨਿਵਾਸ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਉਸਦੇ ਪ੍ਰਮਾਣਿਕ ਆਂਕੜੇ ਉਪਲੱਬਧ ਨਹੀਂ ਹ.

ਪਰੰਪਰਾਗਤ ਤੌਰ ਤੇ ਮੇਘ ਲੋਕ ਇੱਕ ਹੀ ਵੰਸ਼ ਦੇ ਲੋਕ ਹਨ. ਇਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਮੇਘ, ‘ਮੇਘਵੰਸ਼ੀ‘ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ. ਵੀਰਤਾ, ਪੁੱਨ-ਪ੍ਰਤਾਪ, ਕੀਰਤੀ ਅਤੇ ਖਿਯਾਤੀਪ੍ਰਾਪਤ ਮੇਘ (ਰਿਸ਼ੀ) ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਮੰਣਦੇ ਹਨ. ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਮੇਘ ਦੇ ਵਂਸ਼ਜ ਹੀ ਮੇਘ ਨਾਮ ਨਾਲ ਜਾਣੇ ਗਏ ਅਤੇ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੇ ਉੱਨਤੀ ਦੇ ਨਾਲ ਇਹ ਸਮਾਜ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਇੱਕ ਜਾਤੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਅਲਗ-ਥਲਗ ਪੈ ਗਿਆ ਅਤੇ ਵੰਚਿਤ (ਅਨੁਸੂਚਿਤ) ਜਾਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੋ ਗਿਆ.

ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਸੰਸਥਾਪਕ ਸੰਬੰਧਤ ਮਾਨਤਾਵਾਂ

ਮੇਘ ਜਾਤੀ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਸਾਰਿਆਂ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ, ਮੇਘ ਜਾਤੀ ਦੀ ਝੁਕਾਉ ਮੇਘ ਨਾਮਕ ਪੁਰਖ ਦੇ ਵੰਸ਼ਜਾਂ ਤੋਂ ਹੋਣਾ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਕੁੱਝ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ ਇਸਦੇ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ਠਾਪਕ ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਮੇਘ ਦੇ ਸਮਾਨ ਹੀ ਕਸ਼ਤ੍ਰਿਯ ਅਤੇ ਕੁੱਝ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ ਬਾਹਮਣ ਮੂਲ ਦੀਆਂ ਹਨ. ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਤਹਿਤ ਸੰਸਥਾਪਕ - ਪੁਰਖ ਮੇਘ ਦੇ ਨਾਮ ਦੇ ਨਾਲ ਸ੍ਰੀ, ਚੰਦ, ਕੁਮਾਰ ਅਤੇ ਰਿਖ ਸ਼ਬਦ ਇਸਤਮਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਇਸ ਆਦਿਪੁਰੁਸ਼ ਨੂੰ ਮੇਘਸਿਰੀ, ਮੇਘਚੰਦ, ਮੇਘਕੁਮਾਰ ਅਤੇ ਮੇਘਰਿਖ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੰਨਣੇ ਵਾਲੇ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਇੱਕ ਹੀ ਪਰੰਪਰਾ ਅਤੇ ਇੱਕ ਹੀ ਖ਼ਾਨਦਾਨ ਦੇ ਹਨ, ਇਸਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਹੈ.

ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਇਤਿਹਾਸਿਕਤਾ

ਮੇਘਵੰਸ਼ ਭਾਰਤ ਦਾ ਇੱਕ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਸਮਾਜ ਹੈ. ਡਾ. ਨਵਲ ਵਿਯੋਗੀ ਮੇਘ ਜਾਤੀ ਨੂੰ ਮਹਾਨ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਵਰਣਿਤ ਮਦ੍ਰ ਜਾਤੀ ਨਾਲ ਮੇਲਦੇ ਕਰਦੇ ਹਨ. ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਇਤੀਹਾਸਕਾਰ ਕੇ. ਪੀ. ਜਾਇਸਵਾਲ ਆਦਿ ਇਸਦਾ ਉੱਤਥਾਨ ਕੋਸਲ ਤੋਂ, ਕੁੱਝ ਕੰਨੌਜ ਦੇ ਰਾਜੇ ਵਿਮਲਚੰਦਰਪਾਲ ਦੇ ਪੋਤਰੇ ਮੇਘਚੰਦ ਤੋਂ, ਕੁੱਝ ਗੰਧਾਰ-ਕਸ਼ਮੀਰ ਵਲੋਂ ਅਤੇ ਕੁੱਝ ਵਰਤਮਾਨ ਰਾਜਸਥਾਨ ਦੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਧਰਤੀ-ਭਾਗ ਤੋਂ ਮੰਣਦੇ ਹਨ. ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਰੂਪ ਤੇ ਕੋਸਲ-ਬਘੇਲਖੰਡ ਤੋੰ ਇਸ ਜਾਤੀ ਦੀ ਉੱਨਤੀ ਦੇ ਸਪਸ਼ਟ ਪ੍ਰਮਾਣ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦੇ ਹਨ. ਗੰਧਾਰ-ਕਸ਼ਮੀਰ ਵਿੱਚ 6ਵੀਂ ਸਦੀ ਦੇ ਬਾਅਦ ਦੇ ਪ੍ਰਮਾਣ ਮਿਲਦੇ ਹਨ. ਰਾਜਸਥਾਨ ਵਿੱਚ ਮੇਘ ਜਾਤੀ ਦਾ ਉਦਗਮ ਮੰਨਣੇ ਵਾਲੀ ਮਾਨਤਾ ‘ਧਾਰੂਮੇਘ‘ ਨੂੰ ਹੀ ਮੇਘ ਅਤੇ ਮੇਘ ਰਿਖ ਮੰਨਦੀ ਹੈ ਜਿਸਦੀ ਹਾਜਰੀ ਮਾਲਾਣੀ (ਰਾਜਸਥਾਨ ਦਾ ਬਾੜਮੇਰ ਜਿਲਾ) ਦੇ ਅਧਿਪਤੀ ਮਾਲ ਦੇ (ਮੱਲੀਨਾਥ) ਦੀ ਸਮਕਾਲੀ ਹੈ. ਇਸ ਤਰਾਂ ਪ੍ਰਮਾਣਾੰ ਦੇ ਆਧਾਰ ਉੱਤੇ ਇਸਦਾ ਉਦਗਮ ਕੋਸਲ ਤੋਂ ਮੰਨਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਉਸ ਸਮੇਂ ਸਿੱਧੂ ਘਾਟੀ ਸਭਿਅਤਾ ਦਾ ਹੀ ਇੱਕ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਹਿੱਸਾ ਸੀ. ਮੇਘ ਲੋਕ ਉਥੋਂ ਹੀ ਭਾਰਤ ਦੇ ਵੱਖਰੇ ਹਿੱਸਯਾਂ ਵਿੱਚ ਆਏ ਅਤੇ ਗਏ. ਆਪਣੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਦੇ ਲਿਹਾਜ਼ ਨਾਲ ਇਹ ਇੱਥੇ-ਉੱਥੇ ਦੇ ਨਿਵਾਸੀ ਬੰ ਗਏ. .

ਇਸ ਤਰਾੰ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਇੱਕ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਕਸ਼ਤ੍ਰੀ ਖ਼ਾਨਦਾਨ ਸੀ ਨਾ ਕਿ ਕਸ਼ਤ੍ਰਿਯਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਪੈਦਾ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੀ ਇੱਕ ਜਾਤੀ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਜਾਤੀ ਆਧਾਰਿਤ ਛੁਟਿਤਣ ਦੀਆਂ ਜੜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਮਿਲ ਜਾਣ ਦੀ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਆ ਵਿੱਚ ਹਨ. ਇਸ ਮਿਲ ਜਾਣ ਦੀ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਆ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵੰਸ਼ੀ ਆਪਣਿਆੰ ਮਾਨਤਾਵਾਂ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾਂ ਉੱਤੇ ਡਟੇ ਰਹੇ ਪਰ ਉਹਣਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਗੁਆਚਦੀ ਚਲੀ ਗਈ. ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਉਹ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੀ ਹੀਨ ਜਾਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੋ ਗਏ.

ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਕਾਲ ਵਿੱਚ ਕੈਦਿਆੰ ਅਤੇ ਯੁੱਧ ਬੰਦੀਆਂ ਨੂੰ ਦਾਸ ਬਣਾ ਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਅਤੇ ਅਜਿਹੇ ਲੋਕ ਆਪਣੀ ਅਜਾਦੀ ਗੁਆ ਦਿੰਦੇ ਸਨ. ਹਾਰੇ ਹੋਏ ਲੋਕ ਜਾਂ ਤਾਂ ਉੱਥੋੰ ਕੂਚ ਕਰ ਜਾਂਦੇ ਸਨ ਜਾਂ ਗੁਲਾਮੀ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਸਨ. ਅਤ: ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੈ ਕਿ ਮੇਘਾਂ ਦੇ ਦੁਆਰੇ ‘ਸਾਗੜੀ‘ ਜਾਂ ‘ਹਾਲੀ‘ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਗੁਲਾਮੀ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਣਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਦਾ ਨਤੀਜਾ ਹੈ. ਗੁਲਾਮੀ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਣ ਵਾਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਜਿਆਦਾ ਸੀ, ਜੋ ਰਾਜਨੀਤਕ ਕਾਰਣਾਂ ਕਰਕੇ ਪੀਡ਼ਿਤ ਹੁੰਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਔਖੇ ਹਾਲਾਤ ਦੇ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਜਾਣ ਮਗਰੋੰ ਦਾਸਤਾ ਰਾਹ ਚਲਦੇ ਸਨ. ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਗੁਲਾਮੀ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਜਾਂ ਵਿਅਵਾਸਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਰੂਪ ਤੈਅ ਨਹੀਂ ਸੀ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲੋੰ ਕੱਪੜਾ ਬਣਵਾਉਣ, ਖੇਤੀ-ਬਾੜੀ ਦਾ ਕਾਰਜ ਕਰਵਾਉਣ, ਪਸ਼ੂ-ਪਸ਼ੁ ਦੀ ਦੇਖਭਾਲ ਕਰਵਾਓਣ, ਚਮੜੇ ਦਾ ਕੰਮ ਕਰਵਾਉਣ ਆਦਿ ਕੋਈ ਵੀ ਕਾਰਜ ਕਰਵਾਏ ਜਾ ਸੱਕਦੇ ਸਨ, ਪਰ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਮੇਘਾਂ ਨੇ ਕੱਪੜੇ ਬੁਣਨੇ ਦੇ ਕਾਰਜ ਵਿੱਚ ਹੀ ਆਪਣੇ ਨੂੰ ਲਗਾਯਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਇੱਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਪੁਸ਼ਤੈਨੀ ਧੰਧਾ ਬਣਕੇ ਸਾਮਣੇ ਆਇਯਾ.

ਇਸ ਸਮਾਜ ਦੀ ਜੀਵਿਕਾ ਦੇ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਸਾਧਨ ਖੇਤੀ, ਖੇਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਅਤੇ ਕੱਪੜਾ ਬੁਣਨਾ ਰਹਿ ਗਿਆ. ਇੰਨਾ ਸਭ ਕੁੱਝ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਮੇਘਵਾਲ ਜਾਤੀ ਦੀ ਉਤਪੱਤੀ ਕਿਸੇ ਵੀ ਪੇਸ਼ੇ ਤੋੰ ਨਹੀਂ ਹੋਈ ਹੈ. ਵਾਸਤਵ ਵਿੱਚ ਇਹ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਮਾਨਤਾਵਾਂ ਵਾਲਾ ਨਿਵੇਕਲਾ ਸਮੂਹ ਸੀ ਜੋ ਇੱਕ ਵੱਖ ਜਾਤੀ ਬੰਨ ਗਈ.

ਮੇਘਾਂ ਦੇ ਪਰਾਭਵ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਕਾਰਨ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਹਾਰਨਾ ਹੀ ਰਿਹਾ ਹੈ. ਅਜਿਹੇ ਹਾਰੇ ਹੋਏ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜੋ ਜੀਵਨਦਾਨ ਮਿਲਦਾ ਉਹ ਆਪਣੀ ਅਜਾਦੀ ਗੁਆ ਕੇ ਹੀ ਮਿਲਦਾ ਸੀ. ਜੋ ਲੋਕ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉੱਥੇ ਚਲੇ ਜਾੰਦੇ ਸਨ, ਉਹ ਵੀ ਕਿਤੇ ਹੋਰ ਜਾ ਕੇ ਹੋਰ ਪ੍ਰਭਾਵ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਾਤਹਿਤ ਆਪਣੀ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਲੁਕੋ ਕੇ ਜੀਵਨ-ਜੀਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੁੰਦੇ ਸਨ. ਪਰਵਾਰ ਦੀ ਆਰਥਕ ਹਾਲਤ ਵਿਗੜਨ ਅਤੇ ਅਕਾਲ ਆਦਿ ਹੋਰ ਕਾਰਣਾਂ ਕਰ ਕੇ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਵਿਗੜਦੀ ਸੀ. ਇਸ ਤਰਾੰ ਇਹਨਾੰ ਦੀ ਗੁਲਾਮੀ ਦੀਆੰ ਬੇੜੀਆਂ ਹੋਰ ਵੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਹੁੰਦਿਆਂ ਗਈਆਂ. ਊਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਸਮਾਜਿਕ ਵਿਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹੇ ਹਾਰੇ ਹੋਏ ਦਾਸਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣ ਵਿੱਚ ਸਮ੍ਰਿਤੀ ਕਾਲ ਨੇ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਘੀ ਪਾਉਣ ਦਾ ਕੰਮ ਕੀਤਾ.

ਰਾਜਸਥਾਨ ਦੇ ਗੋਲੇ, ਦਰੋਗਾ, ਚਾਕਰ, ਦਾਸ, ਖਾਨੇਜਾਦਾ, ਚੇਲਿਆ ਇਤਆਦਿ ਜਾਤੀਆਂ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦਾ ਦਾਸਤਵ ਮੇਘ ਸਮਾਜ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਰਿਹਾ ਪਰ ਫਿਰ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਗੁਲਾਮੀ ਨਾਲੋੰ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਸੀ. ਉਹ ਆਪਣੇ ਪੇਸ਼ੇ ਲਈ ਦਰ-ਦਰ ਭਟਕਦੇ ਰਹੇ, ਪਰ ਗੁਲਾਮਿਯਤ ਦੀ ਖੱਟੀ ਨੂੰ ਕਦੇ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ. ਸਥਾਨ, ਸਮਾਂ ਅਤੇ ਹਾਲਾਤ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਵੱਖਰਾ ਕੱਮ ਅਤੇ ਪੇਸ਼ਾ ਅਪਣਾਉਂਦੇ ਰਹੇ. ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਉਹ ਏਧਰ ਤੋੰ ਉੱਧਰ, ਦੇਸ਼-ਵਿਦੇਸ਼ ਦੇ ਵੱਖਰੇ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿੱਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਨਾਵਾੰ ਨਾਲ ਜੀਵਨ ਜੀਣ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਲੱਭਣ ਵਿੱਚ ਲੱਗੇ. ਇਸ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਾਮਾਜਕ ਸੰਗਠਨ ਵੀ ਵਿੱਖਰ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਹ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜਾਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਘੁਲਦੇ-ਮਿਲਦੇ ਗਏ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮੁੱਖ ਪੇਸ਼ਾ ‘ਕਤਾਈ-ਬੁਣਾਈ‘ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਉਹ ਖੇਤ-ਖਲਿਹਾਨ ਦੇ ਧੰਥੇ ਉੱਤੇ ਵੀ ਹੋਰ ਜ਼ਿਆਦਾ ਨਿਰਭਰ ਹੋਣ ਲੱਗੇ. ਮੇਘ ਸਮਾਜ ਦੀ ਹਾਲਤ ਜਿੱਥੇ ਇੱਕ ਤਰਫ ਸਾਮਾਜਕ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਿਮਨ ਹੋਈ, ਉਹ ਆਪਣਿਆਂ ਧਾਰਮਿਕ ਅਤੇ ਸਾਮਾਜਕ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ ਉੱਤੇ ਵੀ ਦ੍ਰੜ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕੇ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਾਮਾਜਕ, ਧਾਰਮਿਕ ਰੀਤੀ-ਰਿਵਾਜਾਂ ਅਤੇ ਪਰੰਪਰਾਵਾਂ ਉੱਤੇ ਨਿੱਤ ਚੋਟ ਹੁੰਦੀ ਰਿਹੀ. ਉਸ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਜਾਤੀ-ਪੰਚਾਇਤਾਂ ਵਿੱਚ ਹਲਚਲ ਸੀ.

ਹਾਰੇ ਹੋਏ ਮੇਘ ਰਾਜਿਆਂ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਜਾ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਦੂਜੇ ਰਸਤੇ ਘੱਟ ਸਨ. ਇਤਹਾਸ ਗਵਾਹ ਹੈ ਕਿ ‘ਮੇਘਵੰਸ਼‘ ਨੇ ਆਪਣੀ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤੀ ਨੂੰ ਅਖੰਡ ਬਣਾ ਕੇ ਰੱਖਣ ਲਈ ਅਣਮਨੁੱਖੀ ਸ਼ਰਤਾਂ ਦੇ ਅਧੀਨ ਰਹਿਨਾ ਵੀ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ, ਪਰ ਵੈਦਿਕ ਕਰਮ-ਕਾਂਡ ਅਤੇ ਬਰਾਹਮਣੀ-ਫਜ਼ੂਲ ਤੋੰ ਦੂਰ ਰਹੇ. ਇਸ ਸਬੰਧ ' ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਜਾਂਚ ਸਾਡੇ ਇਤਹਾਸ ਨੂੰ ਸੱਮਝਣ ਵਿੱਚ ਮਹੱਤਵਪੂਰਣ ਹੋਵੇਗੀ.

ਦਾਸਾਂ ਨੂੰ ਅਪਨੇ ਸਵਾਮੀ ਦਾ ਨਾਮ-ਗੋਤਰ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਸੀ. ਊਸਮੇਂ ਦੀ ਸਾਮਾਜਕ ਅਤੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਵਿਵਸਥਾ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਦਾਸਾਂ ਨੂੰ ਸਵਾਮੀ ਦੀ ਜਾਤੀ-ਗੋਤਰ ਨਾਲ ਹੀ ਬੁਲਾਯਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ. ਇਸ ਸਮਾਜ ਦੇ ਲੋਕ ਨਾ ਤੇ ਆਪਣੀ ਇੱਛਿਆ ਨਾਲ ਦਾਸ ਬਣੇ ਸਨ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਵੈਦਿਕ ਵਿਵਸਥਾ ਦੇ ਅੰਗ ਸਨ, ਪਰ ਹਾਰੇ ਹੋਏ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਸਮੂਹ ਸੀ ਜਾਂ ਯੁੱਦ ਬੰਦੀ ਅਤੇ ਦਾਸ ਸਨ. ਜਿਨ੍ਹਾਂਦੀ ਦਾਸਤਾ ਦੀਆੰ ਬੇੜੀਆਂ ਉਦੋਂ ਟੁੱਟ ਸਕਦਿਆੰ ਸਨ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੱਖ ਦੀ ਫਤਹਿ ਹੋਵੇ. ਅਜਿਹੇ ਖ਼ਾਸ ਹਾਲਾਤ ਦੀ ਆਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਇਹ ਲੋਕ ਏਧਰ-ਉੱਧਰ ਬਿਖਰਨ ਲੱਗ ਗਏ ਅਤੇ ਸੰਪੂਰਣ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਫੈਲ ਗਏ. ਸ਼ਾਯਦ ਮੇਘਾਂ ਦਾ ਪਲਾਇਨ ਰਾਜਸਥਾਨ ਵਿੱਚ ਰਾਜਪੂਤਾਂ ਤੋੰ ਪਹਿਲਾੰ ਦਾ ਹੀ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇਗਾ, ਕਿਉਂ ਕਿ ਜਿੱਥੇ-ਜਿੱਥੇ ਰਾਜਪੂਤ ਗਏ, ਉੱਥੇ-ਉੱਥੇ ਇਹ ਲੋਕ ਵੀ ਅੱਗੇ-ਪਿੱਛੇ ਭਟਕਦੇ ਰਹੇ ਹਨ. ਰਾਜਪੂਤਾਂ ਅਤੇ ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਉਸ ਸਮੇਂ ਇੱਕੋ ਜਿਹੀ ਰਹੀ ਹੋਵੇਗੀ, ਪਰ ਰਾਜਪੂਤਾਂ ਨੇ ਸ਼ਕਤੀ ਇਕੱਠੀ ਕਰ ਕੇ ਰਾਜਸਥਾਨ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਠਿਕਾਣੀਆਂ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕਰਣੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੀ, ਉਥੇ ਹੀ ਮੇਘਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਬਿਖਰਾਓ ਦੀ ਹਾਲਤ ਦੇ ਕਾਰਨ ਇਸ ਨਵੇਂ ਕਸ਼ਤਰਪਾੰ (Satrap) ਦੇ ਅਧੀਨ ਆਪਣੇ ਨੂੰ ਮੰਨਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ. ਮਾਰਵਾੜ ਵਿੱਚ ਰਾਜਪੂਤਾਂ ਅਤੇ ਮੇਘਾਂ ਦੇ ਸੰਬੰਧ ਕਈ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਰਹੇ ਹਨ, ਜੋ ਇਸ ਸੱਚਾਈ ਨੂੰ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕਰਦੇ ਹਨ.

ਕਤਾਰਿਏ-ਮੇਘਵਾਲ

ਮੇਘ-ਸੱਤਾ ਦੀ ਅਵਨਤੀ ਦੇ ਬਾਅਦ ਸ਼ਾਸਨ-ਸੱਤਾ ਦਾ ਕੋਈ ਕੇਂਦਰ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਜਾਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਕਈ ਵਪਾਰਕ ਮਾਰਗਾਂ ਉੱਤੇ ਮੇਘਾਂ ਦਾ ਬੋਲਬਾਲਾ ਸੀ. ਰਾਜਸਥਾਨ ਵਲੋਂ ਹੋਕੇ ਨਿੱਕਦੇਹਨਾੰ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਵਪਾਰਕ ਮਾਰਗਾਂ ਉੱਤੇ ਅੱਜ ਵੀ ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਦੀਆੰ ਸੰਘਣਿਆੰ ਬਸਤੀਆਂ ਹਨ, ਜੋ ਇਸ ਗੱਲ ਨੂੰ ਪ੍ਰਮਾਣਿਤ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ 18ਵੀਂ ਅਤੇ 19ਵੀਂ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਤੱਕ ਕਈ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਮਾਰਗਾਂ ਉੱਤੇ ਕਿਸੇ ਨ ਕਿਸੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਮੇਘਾਂ ਦਾ ਘੱਟ ਜਾਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਬੋਲਬਾਲਾ ਜਾਂ ਦਬਦਬਾ ਬਣਿਆ ਰਿਹਾ. ਪਰ ਹਰ ਜਗ੍ਹਾ ਅਤੇ ਹਰ ਸਮਾਂ ਇਹ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਸੀ. ਇਸ ਤਰਾੰ ਅਜਿਹੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਫਰਜ ਵਿੱਚ ਕਈ ਵਾਰ ਉਨ੍ਹਾਂਨੂੰ ਮਿਹਨਤਾਨਾ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਅਤੇ ਕਈ ਵਾਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋੰ ਵਗਾਰ ਕਰਾਈ ਜਾਂਦੀ ਸੀ.

ਇਸ ਸਮੇਂ ਵੀ ਮੇਘਵਾਲ ਸਮਾਜ ਦੇ ਕਈ ਪਰਵਾਰ ਅਤੇ ਕਈ ਲੋਕ ਆਪਣੇ ਆਪ ਦਾ ਸਾਰਥਵਾਹ ਰੱਖਦੇ ਸਨ. ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਦੇ ਸਾਰਥਵਾਹ ਵਿੱਚ ਊਂਟਾੰ ਦਾ ਕਾਫਿਲਾ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦਾ ਸੀ. ਊਂਟਾੰ ਤੇ ਸਾਮਾਨ ਲੱਦ ਕੇ ਇਹ ਲੋਕ ਵਰਤਮਾਨ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਹੈਦਰਾਬਾਦ, ਕਰਾਚੀ, ਪੇਸ਼ਾਵਰ ਤੱਕ ਸਾਮਾਨ ਦਾ ਲਿਆਊਣ-ਲੈ ਜਾਣ ਦਾ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਨ. ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਦੇ ਅਜਿਹੇ ਕਾਫਿਲਿਆੰ ਵਿੱਚ ਜੁਡ਼ੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕਤਾਰਿਆ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ. ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਦੇ ਕਈ ਕਤਾਰਿਆ ਪਰਵਾਰ ਸਾਖ ਅਤੇ ਸਾਹੂਕਾਰੀ ਦਾ ਕਾਰਜ ਵੀ ਕਰਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਜੈਸਲਮੇਰ ਅਤੇ ਬਾੜਮੇਰ ਦੇ ਸੀਮਾਵਰਤੀ ਇਲਾਕੀਆਂ ਵਿੱਚ ਇਨਾੰ ਕਤਾਰੀਆਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਪਹਿਚਾਣ ਅਤੇ ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਠਾ ਸੀ.

ਜੈਸਲਮੇਰ, ਬਾੜਮੇਰ ਅਤੇ ਜੋਧਪੁਰ ਆਦਿ ਜਿਲਿਆਂ ਦੀ ਸੀਮਾ ਵਿੱਚ ਵੱਸੇ ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਦੇ ਇਸ ਕਤਾਰਿਆ ਪਰਵਾਰਾਂ ਦੀ ਦੁਰਦਸ਼ਾ ਅੱਜ ਵੀ ਵੇਖੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ. ਜੋ ਕਦੇ-ਕਦੇ ਆਪਣੇ ਦੁੱਖ-ਦਰਦਾਂ ਨੂੰ ਕਹਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਬਿਆਨ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ. ਜਾਗੀਰਦਾਰਾਂ, ਸਾਮੰਤਾਂ, ਮਹਾਜਨਾਂ ਅਤੇ ਹੋਰ ਜੰਗਲੀ ਅਤੇ ਅਸੱਭਯ ਜਾਤੀਆਂ ਦੀ ਠਗੀ ਅਤੇ ਗਠਜੋਡ਼ ਦੇ ਇਹ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਸਨ. ਮਹਾਜਨ ਅਤੇ ਦਲਾਲਾਂ ਨੂੰ ਸਹੂਲਤਾੰ ਅਤੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਮਿਲਣ ਵਲੋਂ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਮੇਘਵਾਲ ਸਮਾਜ ਨੇ ਉਸਤੋਂ ਆਪਣੇ ਨੂੰ ਨਿਵੇਕਲਾ ਕਰ ਲਿਆ.

ਸਾਮੰਤਸ਼ਾਹੀ ਨੇ ਜਿੱਥੇ ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਇਸ ਕਮਾਈ ਦੇ ਸਾਧਨ ਦੀ ਨਜ਼ਰਅੰਦਾਜ਼ੀ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂਨੂੰ ਕਿਸੇ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਹਿਫਾਜ਼ਤ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ, ਉਥੇ ਹੀ ਅੰਗਰੇਜਾਂ ਨੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਸਵਾਰਥ ਦੀ ਪੂਰਤੀ ਲਈ ਮਹਾਜਨਾਂ, ਦਲਾਲਾਂ ਅਤੇ ਬਿਚੌਲੀਆਂ ਨੂੰ ਸ਼ਰਨ ਦੇਕੇ ਮੇਘਾਂ ਦੀ ਇਸ ਕਮਾਈ ਦੇ ਸਾਧਨ ਉੱਤੇ ਬੁਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵਲੋਂ ਚੋਟ ਕੀਤੀ. ਹੁਣ ਉਹ ਸਿਰਫ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਤੱਕ ਸਿਮਟ ਕੇ ਰਹਿ ਗਏ. ਨਾਲ ਹੀ ਉਹ ਛੋਟੇ-ਛੋਟੇ ਮਜਦੂਰੀ ਦੇ ਦੂੱਜੇ ਧੰਧਿਆੰ ਵਿੱਚ ਲੱਗ ਗਏ. ਵੱਖ-ਵੱਖ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਟੈਕਸਾਂ ਨਾਲ ਦੱਬੇ ਮੇਘਵਾਲਾਂ ਉੱਤੇ ਭਾਰ ਬਹੁਤ ਪੈਂਦਾ ਸੀ. ਮਹਾਜਨ ਅਤੇ ਬਿਚੌਲਿਏ ਆਪਣੇ ਸਬੰਧਾਂ ਸਦਕੇ ਇਸ ਵਿੱਚ ਹੇਰ-ਫੇਰ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਸਨ.

ਵਪਾਰ-ਵਣਜ ਦੇ ਇਸ ਕੰਮ ਕਾਜ ਦੇ ਇਲਾਵਾ ਮੇਘਵਾਲ ਕੌਮ ਦੇ ਵਿਅਕਤੀ ਖ਼ਤ-ਪੱਤਰੀ ਲਿਆਉਣ-ਲੈ ਜਾਣ ਦਾ ਵੀ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਨ. ਇਹ ਕਾਰਜ ਵਗਾਰ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਹੀ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ. ਮੇਘਾਂ ਨੇ ਕਈ ਵਾਰ ਇਸਦਾ ਸਾਮੂਹਕ ਵਿਰੋਧ ਵੀ ਕੀਤਾ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਾਂਤਵਨਾ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਤੱਕ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਸੀ. ਇਸ ਤਰਾੰ ਕਈ ਮੇਘਵਾਲ ਰਾਜਸਥਾਨ ਛੱਡ ਕੇ ਹੋਰ ਰਾਜਾਂ ਵਿੱਚ ਜਾ ਵੱਸੇ.

ਧਾਰਮਿਕ ਰੀਤਿ-ਰਿਵਾਜ਼

ਦੇਵਰਾ

ਮੇਘਵਾਲ ਸਮਾਜ ਦੇ ਪੂਜਨੀਕ-ਥਾਂ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਨਾਮ ਨਾਲ ਪੁੱਕਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਕਾਲ ਤੋੰ ਲੈ ਕੇ ਭਗਤੀਕਾਲ ਤੱਕ ਦੇ ਸਮੇਂ ਦਾ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਇਹ ਸਪਸ਼ਟ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਸਮਾਜ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪੂਜਨੀਕ-ਥਾਂ ਨੂੰ ਕਦੇ ਵੀ ਮੰਦਿਰ, ਮਸਜਦ ਜਾਂ ਮੱਠ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਜਾਣਿਆ ਹੈ. ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੰਤ ਪੁਰਸ਼ਾਂ ਜਾਂ ਸਿੱਧਾਂ ਦੇ ‘ਧਿਆਨ-ਵਿਪਸ਼ਿਅਨਾ‘ ਥਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ‘ਧੂਣੀ‘ ਸ਼ਬਦ ਨਾਲ ਬੁਲਾਉਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਅਜਿਹੇ ਪੁਰਸ਼ਾਂ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿੱਚ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਮੰਦਿਰ ਜਾਂ ਮੱਠਨੁਮਾ ਭਵਨ ਨੂੰ ਦੇਵਰਾ ਕਹਿੰਦੇ ਆਏ ਹਨ. ਮੰਦਿਰ ਅਤੇ ਦੇਵਰਾ ਜਾਂ ਦੇਵਰੇ ਦੀ ਪਛਾਣ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਅੰਤਰ ਹੈ. ਦੇਵਰਾ ਜਾਂ ਦੇਵਰੇ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਕਾਲ ਵਿੱਚ ਕਹੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ‘ਸਤੂਪ‘ ਦਾ ਹੀ ਅਰਥ ਦਿੰਦੇ ਹਨ, ਜੋ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਪੂਜਨੀਕ ਥਾਂ ਰਹੇ ਹਨ. ਸਤੂਪ ਜਾਂ ਦੇਵਰੇ ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਕਾਤਮਕ ਰੂਪ ਮੰਨੇ ਗਏ ਹਨ, ਉਥੇ ਹੀ ਮੰਦਿਰ ਵਿੱਚ ਦੇਵ-ਮੂਰਤੀ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਪੱਕੀ ਮੰਨੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ.

ਵਾਸੁਦੇਵ ਸ਼ਰਣ ਅੱਗਰਵਾਲ ਠੀਕ ਹੀ ਲਿਖਦੇ ਹਨ, ਸਤੂਪ ਵਿੱਚ ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਜਾਂ ਬੁੱਧ ਦੀ ਮਾਨਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੰਦਿਰ ਵਿੱਚ ਦੇਵ ਦੀ. ਇਸ ਨਜ਼ਰ ਨਾਲ ਸਤੂਪ ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਦੇ ਨਿਰਵਾਣ ਵਿੱਚ ਚਲੇ ਜਾਣ ਦੇ ਦੁੱਖ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਨਹੀਂ ਸੀ. ਪਰ ਭੌਤਿਕ ਧਰਾਤਲ ਉੱਤੇ ਜ਼ਾਹਰ ਹੋਣ ਅਤੇ ਪੂਰਣ ਆਨੰਦ ਅਤੇ ਜੋਤੀ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੀ. ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਧਰਤੀ-ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਜ਼ਾਹਰ ਹੋਕੇ ਨਿਰਵਾਣ ਜਾਂ ਮੁਕਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਇਹ ਕੋਈ ਦੁੱਖ ਜਾਂ ਰੋਣੇ-ਧੋਣੇ ਦਾ ਕਾਰਣ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਪਰ ਉਹ ਮੂਰਤ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਜ਼ਾਹਰ ਹੁੰਦੇ ਹਨ. ਇਹ ਸਾਰਵਜਨਿਕ ਹਰਸ਼ ਅਤੇ ਕ੍ਰਿਤਗਿਅਤਾ ਦਾ ਕਾਰਨ ਹੈ, ਜਿਸਦੇ ਲਈ ਸਭੀ ਦੇਵ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖ ਪ੍ਰਸੰਨਤਾ ਵਿਅਕਤ ਕਰਦੇ ਹਨ. ਇਹ ਆਨੰਦ ਦਾ ਭਾਵ ਸਤੂਪ ਦੇ ਨਾਲ ਚਲ ਰਹੇ ਸ਼ਿਲਪ ਵਿੱਚ ਬਾਰਬਾਰ ਵੇਖਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ. ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਦਾ ਮਨੁੱਖ ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਆਗਮਨ ਕਿਸੇ ਸੁੰਦਰ-ਜੋਤੀ ਦਾ ਭੂਮੀ ਉੱਤੇ ਅਵਤਰਣ ਹੈ, ਜਿਸਦੀ ਕਿਰਣ ਇਸ ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਰੋਸ਼ਨੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਹਮੇਸ਼ਾ ਮੌਜੂਦ ਰਹੇਗੀ. ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਸਤੂਪ ਉਸਦੇ ਗਿਆਨ ਰੂਪੀ ਜਾਂ ਰੱਬੀ ਜੀਵਨ ਦਾ ਉੱਤਮ ਪ੍ਰਤੀਕ ਮੰਨਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਸਦੀ ਸਵਰਣਮਈ ਜਾਂ ਰਤਨਮਈ ਕਲਪਨਾ ਕੀਤੀ. ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਸਤੂਪ ਵੀ ਪ੍ਰਤੀਕਾਤਮਕ ਮੂਰਤੀ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਬਨਣ ਲੱਗੇ ਅਤੇ ਪੂਜੇ ਜਾਣ ਲੱਗੇ. ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਇਤੀਹਾਸਕਾਰ ਵਾਸੁਦੇਵ ਸ਼ਰਣ ਅੱਗਰਵਾਲ ਅਤੇ ਪ੍ਰੋ. ਰਾਧੇਸ਼ਰਣ ਦੇ ਇਸ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਵਿਵੇਚਨ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਵਲੋਂ ਇਹ ਸਪਸ਼ਟ ਹੈ ਕਿ ਮੇਘਵਾਲ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ’ਦੇਵਰੇ‘ ਦੀ ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਦਾ ਜੋ ਭਾਵ ਹੈ, ਉਹ ਇਸ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਆਧਾਰ ਉੱਤੇ ਹੀ ਹੈ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੂਜਨੀਕ-ਥਾਂ ‘ਦੇਵਰੇ‘ ਕਿਸੇ ਮੰਦਿਰ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਹਨ ਸਗੋਂ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਪੂਜਨੀਕ ਰਹੇ ‘ਸਤੂਪ‘ ਦਾ ਹੀ ਇੱਕ ਰੂਪ ਹੈ. ਇਹਣਾੰ ਦੇਵਰਿਯਾੰ ਵਿੱਚ ਮਹਾਂਪੁਰਖਾਂ ਦੀ ਉਹ ਪ੍ਰਤੀਕਾਤਮਕ ਭਾਵਨਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਜੋ ਇਸ ਸਮਾਜ ਦੀ ਆਤਮਕ ਅਵਧਾਰਣਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ.

ਦੇਵਰਿਯਾੰ ਦੀ ਇਹ ਪਰੰਪਰਾ ਪੱਕੇ ਤੌਰ ਤੇ ਸਤੂਪ ਦੀ ਅਵਧਾਰਣਾ ਉੱਤੇ ਹੀ ਬਣੀ ਹੈ. ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਨੇ ਇਸ ਅਵਧਾਰਣਾ ਦੇ ਪ੍ਰਸਫੁਟਨ ਦਾ ਸਮਾਂ ਵੀ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦਾ ਸਮਕਾਲੀ ਮੰਨਿਆ ਹੈ. ਇਤੀਹਾਸਕਾਰ ਪ੍ਰੋ. ਰਾਧੇਸ਼ਰਣ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ "ਪ੍ਰਤੀਕਾਤਮਕ ਸਤੂਪ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਮਹਾਂਪੁਰਖ ਦੇ ਅਸਥਿਯਾੰ ਆਦ ਨਹੀਂ, ਪਰੰਤੂ ਉਹ ਪ੍ਰਤੀਕ ਭਾਵਨਾ ਹੁੰਦੀ ਸੀ, ਜੋ ਵਿਅਕਤੀ-ਮਾਨਸ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਤ ਹੁੰਦੀ ਸੀ. ਬੌੱਧ ਅਚਾਰਿਆੰ ਨੇ ਸਤੂਪ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਦੇ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਸ਼ਖਸੀਅਤ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਰੂਪ ਮੰਨ ਲਿਆ ਸੀ. ਅੱਗੇ ਚਲ ਕੇ ਮਹਾਨ ਬੌੱਧ ਚਾਰਿਆੰ ਦੇ ਹੱਡ-ਅਵਸ਼ੇਸ਼ਾਂ ਉੱਤੇ ਵੀ ਸਤੂਪ ਬਣੇ. ਣਾ ਸਾਰੇ ਸਤੂਪਾਂ ਵਿੱਚ ਉਹੀ ਪ੍ਰਤੀਕ ਭਾਵਨਾ ਵਿਆਪਤ ਸੀ. ਥੇਰਵਾਦੀਆਂ ਨੇ ਮੂਰਤੀ ਦੀ ਆਸ਼ਾ ਸਤੂਪ ਪੂਜਾ ਨੂੰ ਜਗਹ ਦਿੱਤੀ. ਊਹਣਾ ਬੌੱਧਾੰ ਨੇ ਪੂਜਾ ਭਾਵ ਸੰਕਲਪਿਤ ਸਤੂਪਾਂ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੀ. ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਸੰਕਲਪਿਤ ਸਤੂਪਾਂ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਚੱਲੀ. ਸੰਕਲਪਿਤ ਸਤੂਪਾਂ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਸ਼ਾਇਦ ਸ਼ਕ-ਕੁਸ਼ਾਣ ਕਾਲ ਤੋੰ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਜੋ ਸ਼ਾਇਦ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਵੀ ਚੱਲਦੀ ਰਹੀ. ਸਾਨੂੰ ਦੇਉਰ ਕੁਠਾਰ ਵਿੱਚ 46 ਸੰਕਲਪਿਤ ਸਤੂਪਾਂ ਦੇ ਖੰਡਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਏ ਹਨ". (ਪ੍ਰੋ. ਰਾਧੇਸ਼ਰਣ, ਵਰਕਾ 165). ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਚੰਗੀ ਤਰਾੰ ਪਤਾ ਹੈ ਕਿ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦਾ ਕਾਲ ਕੁਸ਼ਾਣੋਂ ਦੇ ਬਾਅਦ ਦੇ ਕਾਲ ਦਾ ਸਮਕਾਲੀ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਮੇੰ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸਤੂਪ ਦੀ ਅਵਧਾਰਣਾ ਵਿਅਕਤੀ-ਮਾਨਸ ਵਿੱਚ ਉਭਰੀ ਅਤੇ ਜਿੱਥੇ-ਜਿੱਥੇ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਵਾਰਿਸ ਗਏ ਆਪਣੇ ਪੂਜਾ ਥਾਂ ਦੀ ਇਹ ਅਵਧਾਰਣਾ ਨਾਲ ਲੈ ਗਏ.

ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਪੂਜਾ

'ਕੁਲ' ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਸਿੱਧਾਂ ਦੀ ਪੂਜਨੀਕ ਪਰੰਪਰਾ ਦੀ ਖ਼ਾਸੀਅਤ ਹੈ, ਜਿਨੂੰ ਇਹ ਸਮਾਜ ਮੰਨਦਾ ਆਇਆ ਹੈ. ਪਦਚਿੰਹਾੰ (ਪੈਰਾੰ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ) ਦੀ ਪੂਜਾ ਦੇ ਇਲਾਵਾ ਮੇਘਵਾਲ ਪਰਵਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਜਾਂ ਇਸ਼ਟ ਦੇਵੀ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਅਰਾਧਨਾ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਵੀ ਪ੍ਰਚੱਲਤ ਹੈ. ਹਰ ਇੱਕ ਮੇਘਵਾਲ ਕੁਨਬੇ ਦੀ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਰਥਾਤ ਹਰ ਇੱਕ ਖਾਪ ਦੀ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ. ਦੇਵੀ ਨੂੰ ਇਹ ਲੋਕ ਜੋਤ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਚੜਾਵਾ ਵੀ ਚਡਾੰਦੇ ਹਨ.

ਇੱਕ ਹੀ ਕੁਨਬੇ ਜਾਂ ਇੱਕ ਹੀ ਖਾਪ ਦੇ ਲੋਕ ਸਾਰੇ ਮੰਗਲ-ਕਾਰਜ ਲਈ ਆਪਣੀ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਨੂੰ ਚੜਾਵਾ ਚੜਾਤੇ ਹਨ. ਕਈ ਖਾਪਾੰ ਵਿੱਚ ਉਹ ਆਪਣੀ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਨੂੰ ਬੱਕਰੇ ਦੀ ਕੁਰਬਾਨੀ ਵੀ ਦੇੰਦੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਕਈ ਖਾਪਾੰ ਆਪਣੀ ਕੁਲਦੇਵੀ ਨੂੰ ‘ਚੂਰਮਾ‘ ਆਦਿ ਮਿੱਠਾ ਪ੍ਰਸਾਦ ਚੜਾਦਿਆਂ ਹਨ. ਕੁੜੀ ਦੇ ਘਰ ਵਲੋਂ ਵਿਦਾ ਹੋਣ ਉੱਤੇ ਅਤੇ ਆਉਣ ਉੱਤੇ 'ਗਵਾਡੀ' ਵਿੱਚ ਪਰਵੇਸ਼ ਕਰਦਿਆੰ ਹੋਇਆੰ ਸਭਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਦੇ ਪੂਜਨੀਕ-ਥਾਂ ਉੱਤੇ ਧੋਕ (ਪੂਜਾ-ਅਰਚਨਾ) ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਬਹੁ ਵੀ ਆਪਣੇ ਸਹੁਰੇ-ਘਰ ਦੀ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਨੂੰ ਧੋਕ ਦਿੰਦੀ ਹੈ. ਉਹ ਵੀ ਪੇਕੇ ਜਾਣ ਤੋੰ ਪਹਿਲਾਂ ਅਤੇ ਸਹੁਰੇ-ਘਰ ਆਉਣ ਉੱਤੇ ਸਭਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੁਲ ਦੇਵੀ ਦੇ ਪੂਜਨੀਕ ਥਾਂ ਤੇ ਪੂਜਾ ਕਰਦੀ ਹੈ.


ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਪੂਜਾਗ੍ਰਹ
 
ਮੇਘਵਾਲ ਸਮਾਜ ਇੱਕ ਅਧਿਆਤਮ ਪ੍ਰਵਰ ਸਮਾਜ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਇਸ ਸਮਾਜ ਦੇ ਆਦਮੀਆਂ ਦੀ ਪੂਜਾ-ਅਰਾਧਨਾ ਦੀ ਵਿਧੀਆਂ ਜਾਂ ਤਰੀਕੇ ਹੋਰ ਸਮਾਜਾਂ ਦੇ ਅਜਿਹੇ ਤਰੀਕਿਆੰ ਵਲੋਂ ਕਈ ਅਰਥਾਂ ਵਿੱਚ ਭਿੰਨ ਹਨ. ਸਾਰੇ ਮੇਘਵਾਲ ਪਰਵਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਪੂਜਾ-ਘਰ ਹੁੰਦੇ ਹਨ. ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਆਕ੍ਰਿਤੀ ਚੈਤਿਆਕਾਰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ. ਪਰਵਾਰਾਂ ਦੇ ਇਸ ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਪੂਜਾ-ਗ੍ਰਹਾਂ ਵਿੱਚ ਪਦਚਿਹਨ, ਆਪਣੇ ਆਪਣੇ ਇਸ਼ਟ-ਦੇਵ ਦੀ ਪ੍ਰਤੀਮਾ, ਪੂਜਾ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਿਉਕਤ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਵਿਵਿਧ ਸਮੱਗਰੀ ਜਿਵੇਂ ਮਾਲਾ, ਧੂਪ, ਦੀਵਾ ਆਦਿ ਰੱਖੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਹ ਪਰਵਾਰ ਨਿੱਤ ਸਵੇਰੇ-ਸ਼ਾਮ ਆਪਣੇ ਇਸ਼ਟ-ਦੇਵਾਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਹਨ.

ਇਸਦੇ ਇਲਾਵਾ ਕਿਤਾਬ ਵਿੱਚ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਦੇ ਵਰਤ-ਉਪਵਾਸ, ਵੇਸ਼ਭੂਸ਼ਾ, ਉਜੋਵਣਾ-ਸੱਦਾ, ਸਾੱਖਾ ਜਾਂ ਸਾਕਿਆ, ਮਰਣਾਸੰਨ ਮਾਨਤਾਵਾਂ, ਅੰਤਰਾਭਵ, ਸ਼ੰਖੋੱਧਾਰ ਜਾਂ ਸੰਕੋੜਾਲ, ਵਸਾਖ ਇਸਨਾਨ ਅਤੇ ਸਾਂਸਕ੍ਰਿਤੀਕ ਮੁੱਲਾਂ (ਖਾਣ-ਪੀਣ, ਭੋਜਨ-ਨਿਯਮ, ਪਗਡ਼ੀ ਧਾਰਨ, ਗਹਿਣਾ, ਗ੍ਰਹਨਿਰਮਾਣ ਪਰੰਪਰਾ, ਵਾਜਾ ਯੰਤਰ, ਰੋਸ਼ਨੀ, ਸਫਾਈ-ਪਾਣੀ ਦੀ ਵਿਵਸਥਾ, ਪੀਲਾ ਔੜਨਾ ਆਦਿ ਦਾ ਵੀ ਮਨਭਾਉਂਦਾ ਵਰਣਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ.
Sh. Tararam

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