27 September 2014

Dr. B.R. Ambedkar was a Meghvanshi and also a Kabirpanthi - डॉ. भीमराव अंबेडकर मेघवंशी हैं और कबीरपंथी भी

डॉ. अंबेडकर महार समुदाय से थे. आमतौर पर शाम के समय अपनी मस्ती में कबीर के शब्द गाया करते थे.

महार बुनकर (जुलाहों) की जमात योद्धा और जुझारू रही है जिसे क्षत्रिय भी कहा गया है. बहुत कम 'मेघ भगत' जानते होंगे कि अंबेडकर कबीरपंथी थे और महार समुदाय का मुख्य व्यवसाय कपड़ा बुनना रहा है. इसके अलावा मेघों के लिए आज की तारीख में विश्वास कर पाना कठिन है कि 'महार' समाज वास्तव में 'मेघ' समाज ही है. मेरे ऐसा कहने का आधार नीचे दिए संदर्भित लिंक्स हैं जिससे मालूम पड़ेगा कि मेघ और महार एक ही जाति समूह है और कि डॉ. अंबेडकर कबीरपंथी परिवार से थे.

हमारे बुद्धिजीवी इस बात पर भी गर्व कर सकते हैं कि भारतीय संविधान पर मानवधर्म के जिन सिद्धांतों की छाप है उसके मूल में कहीं बुद्ध, कबीर, राष्ट्रपिता फुले, अंबेडकर और मेघ परंपराओं का प्रखर दर्शन है. दूसरे शब्दों में इसी का नाम ''नमो बुद्धाय'', ''जय कबीर'', ''जय भीम'' और ''जय मेघ'' है. सत्यशोधक समाज के संस्थापक ज्योतिराव फुले ने विशेषकर महार या मेघ समाज को संगठित करने का कार्य किया और 1903 में इनका पहला सम्मेलन मुंबई में कराया.

अब प्रश्न है कि पंजाब और जम्मू-कश्मीर का 'मेघ भगत' समाज समय के अनुसार अंबेडकर को क्यों नहीं समझ पाया. अशिक्षा एक कारण रहा. दूसरे, आर्यसमाज ने जहाँ एक ओर इस समाज को शिक्षा के क्षेत्र में दाखिल होने का मौका दिया वहीं आर्यसमाजी विचारधारा ने इनके लिए ऐसी ब्राह्मणवादी वैचारिक अड़चनें भी पैदा कर दीं जिससे न तो ये मुग्गोवालिया के आदधर्म आंदोलन से जुड़ पाए न ही अंबेडकर की विचारधारा से. श्री रतन गोत्रा, जो विद्वान और काफी वरिष्ठ नागरिक हैं, ने अपना अनुभव बताया कि जब भी वे अपने मेघ समाज में अंबेडकर की बात करते थे तो लोगों की पहली प्रतिक्रिया होती थी कि अंबेडकर तो चमार समाज से थे. कई अन्य वरिष्ठ नागरिकों के साथ भी यही अनुभव हुआ जिनमें मैं भी एक हूँ. धार्मिक संस्थाओं के प्रोपेगंडा से प्रभावित लोगों ने मेघ और चमार के बीच में ऊँच-नीच का सवाल बनाया हुआ है. शिक्षा के प्रसार के साथ अब स्थिति बदल रही है और पढ़ा-लिखा मेघ समाज वास्तविकता को समझने लगा है.

इसी जानकार वर्ग के लिए शुभकामनाएँ.

संदर्भित लिंक्स


(उक्त सभी लिंक 27-09-2014 को देखे गए हैं.)

13 September 2014

Megh Warriors – मेघ योद्धा

Bheema Koregaon Victory Pillar
मेघों को मेघों से पूछते सुना है कि क्या मेघों ने कभी कोई युद्ध लड़ा है. मेघों ने ज़रूर युद्ध लड़े हैं. इसके पक्ष में पहला साधारण तर्क तो यह है कि कोई भी जातीय समूह वीरों से विहीन नहीं होता. यदि कोई वीर होने के साथ सभ्य भी है तो वह असभ्य और क्रूर जातीय समूह (जैसे आर्य या अन्य) से पराजित भी हो सकता है. संभवतः अपनी इसी कमज़ोरी के कारण मेघवंशियों ने युद्ध हारे हैं. लेकिन मेघवंशी वीरों का कभी भी सर्वथा अभाव नहीं रहा.

अब सूचना प्रणाली में आई तेज़ी और नए दृष्टिकोण ने उस इतिहास के अर्धसत्य को पूर्णता प्रदान करने के प्रयास तेज़ किए हैं. बताया जाने लगा है कि आधुनिक इतिहास में दलितों के सहयोग से लड़ा गया पहला प्लासी का युद्ध था जिसे दुसाध (पासवान) वीरों के सहयोग से जीता गया. दूसरा भीमा कोरेगाँव का युद्ध है जो पेशवाओं के खिलाफ था और म्हारों के सहयोग से जीता गया था. इस युद्ध ने भारत से पेशवा राज को समाप्त कर दिया. इतिहासकारों ने म्हारों और मेघों को एक ही जाति समूह का माना है. महारों के इतिहास की झांकी इस इस लिंक पर देख सकते हैं.

अंग्रेज़ों ने मेघवंशी योद्धाओं की मदद से दो युद्ध जीते. उनके बारे में लिखते हुए इतिहासकारों को प्रत्यक्षतः काफी संकोच हुआ और इतिहास में उनका विस्तृत उल्लेख नहीं किया. उन दोनों युद्धों को जीतने के कारण ही अंग्रेज़ों को भारत में अपना राज्य स्थापित करने में मदद मिली. इऩ युद्धों के बहाने से देश के दलितों को अंग्रेज फौज में भर्ती होने का अवसर मिला और उन्होंने अपनी युद्ध योग्यता का प्रमाण दिया. आगे चल कर अंग्रेज़ों ने दलितों के हित में कई कदम उठाए. लॉर्ड मैकाले ने अपने लगभग तीन वर्ष के कार्यकाल में नई शिक्षा प्रणाली शुरू की जिसने दलितों के लिए शिक्षा के रास्ते खोल दिए और भारत को Indian Penal Code और Criminal Procedure Code दे कर मनुस्मृति की काली छाया को हमेशा के लिए हटा दिया.

भीमा-कोरेगाँव युद्ध पर एक विस्तृत आलेख 


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