"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि हमारा मेघ भगत समुदाय किसी ''मेघ ऋषि'' के वंश का माना जाता है. मैंने भी अपने पिता जी से यही सुना था. मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम ने लिखा है कि भारत भर के मेघवंशी अपने वंशकर्ता का नाम ''मेघ ऋषि'' बताते हैंआर.एलगोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघ ऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु का पुरोहित नरेश पाया है जिसकी प्रभुता का प्रभाव झेलम से यमुना और दक्षिण में नर्बदा तक फैला थावे लिखते हैं :-

"The Pre-Aryan people followed or supported the ‘Megh Rishi’, called as 'Vritra' in the Rig-Veda hymns. Vritra became the emperor of 'Sapta Sindhu', as the minor kings in that geographical region stretching from Kabul (Afghanistan) in the North to Narbada River in the South appeared to have accepted his suzerainty. From East to the West, this region extended mostly over the area commanded by seven rivers viz. the Sindh, Satluj, Beas, Ravi, Chenab, Jhelum, and Yamuna."


गोत्रा जी ने इस कथा के सूत्र ऋग्वेद में बताए हैं जिसके पक्ष में उन्होंने वेद मंत्रों का हवाला भी दिया हैमेघों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण पृष्ठ बहुत देर से खाली पड़ा था जो अब धीरे-धीरे भरने लगा है.

मेघ वंश के लोगों का शिक्षा का अधिकार सदियों तक छिना रहा. उनके बारे में जो लिखा वह आर्यों (ब्राह्मणोंने लिखामेघ ऋषि या प्रथम मेघ (राजाअधिपतियानि वृत्र या (नागमेघ के बारे में जो भी लिखा वह मेघ वंश के लोगों ने नहीं बल्कि आर्य ब्राह्मणों ने लिखा और चूँकि उनकी लिखी कथा-कहानियों में मेघ ऋषि को आर्य ब्राह्मणों का शत्रु दिखाया गया है इस लिए मेघ ऋषि के बारे में जो लिखा गया उतना ही लिखा गया और वैसा ही लिखा गया जैसा आर्य ब्राह्मण अपने गौरव के हित में चाहते थेमेघ ऋषि के नाम पर मेघों के पास केवल इतनी ही पूँजी बची कि मेघ ऋषि उनके अग्रणी माने जाते थे जो युद्ध में इंद्र (आर्यों के सेना नायकसे हार गए थे.

सदियों तक शिक्षा से वंचित रहने के बाद अब शिक्षित हो रहे मेघ वंश के लोग अपने पूर्वज मेघ ऋषि की सुध लेने की हालत में आ गए हैं. वैदिक कथा के कुछ अर्थ खोद-खोद कर निकाले गए हैंनई जानकारियाँनए विचार सामने आए हैंजिस प्रकार यादवों ने अपने पूर्वज महिषासुर को पहचाना और उसकी कथा नए सिरे से लिख कर उसका सम्मान करना शुरू किया है वैसे ही कुछ मेघों ने अपने पूर्वज मेघ ऋषि को पहचान कर उसके नए बिंब (imagesखड़े किए हैं जो चमकदार हैं.

मेघ ऋषि को अपना आदि पुरुष मानने वाले मेघ उसकी कल्पना अपने-अपने तरीके से करते रहे हैंकोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं थी लेकिन कल्पना की जाती रही है कि वह कोई जटाधारीभगवा कपड़े पहने एक ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता होगाहमारी इस प्रकार की कल्पना का आधार विभिन्न धार्मिक पुस्तकेंकॉमिक्सया अन्य पुस्तकेंसुनी-सुनाई बातें ही होती हैंआमतौर पर मेघ ऋषि की कल्पना 'मेघयानि बादलया किसी ऋषि के बारे में पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर की जाती है या डिक्शनरी में अर्थ देख कर उसकी कल्पना होती रहेगी क्योंकि उसे देखा तो किसी ने है नहींऐसी ही देखी-दिखाई या काल्पनिक छवियों और इमेजिज़ के आधार पर गढ़ाजालंधर में एक मेघ सज्जन श्री सुदागर मल 'कोमल' ने अपने देवी के मंदिर में मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित की हैउन्होंने बताया है कि उन्होंने एक पौराणिक कथा से प्रेरित हो कर और उसके आधार पर वह मूर्ति बनवा कर लगवाई हैयह मूर्ति एक सिद्ध ऋषिसिद्ध संन्यासी के रूप में है. संभव है इस कथा की जड़ें महाभारत में हों.
Megh Rishi मेघ ऋषि
जयपुरराजस्थान के गोपाल डेनवाल जी ने बिना भगवा वाली मेघ ऋषि की मूर्ति के साथ जयपुर में मेघ ऋषि मंदिर स्थापित किया है जिस पर कुछ वर्ष पूर्व तक कार्य चल रहा है. डेनवाल जी ने बताया था कि तीन-चार अन्य स्थानों पर ऐसे मंदिरों पर काम हो रहा थाहरबंस लाल लीलड़ जी ने अबोहर में एक चौक पर मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जहाँ हर साल 16 दिसंबर को एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है.

यह जान लेना बेहतर होगा कि मेलुक्ख (मुअन जो दाड़ो, मोहंजो दाड़ो) सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए एक पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 .पू. (कुछ विद्वानों ने इसे 1700 वर्ष ई.पूकी बताया हैकी एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियमकराचीमें रखी है उसकी इमेज या छवि का प्रयोग गोपाल डेनवाल ने जयपुर स्थित मेघ मंदिर में किया हैउसी इमेज में मामूली परिवर्तन करके उसे मेघसेना (जो उनका ही संगठन हैके सुप्रीम कमांडर की छवि तैयार की है. चूँकि आधुनिक इतिहासकारों ने मोहंजो दाड़ो सभ्यता और मेघवंश से संबंधित तथ्यों को स्थापित कर दिया है इसलिए मंदिर में स्थापित हो कर मेघ ऋषि की पावनऐतिहासिक और मानव सुलभ पवित्र छवि उभर कर आई है. मेघ ऋषि और मेघ भगवान की आरतियाँमेघ-चालीसामेघ-स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई गई हैं. इस बारे में अग्रणी भूमिका निभाने का श्रेय विशेष तौर पर गोपाल डेनवाल जी और आर.पी. सिंह जी को जाता है.

मेघ रिख पर शोध करके डॉक्टरेट की डिग्री पा चुके कराची के डॉमोहन देवराज थोंट्या ने अपनी खोज पर लिखते हुए इस तथ्य का ज़िक्र किया है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मध्ययुगीन इतिहास के महान मेघवार व्यक्तित्वों के वास्तविक होने पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैंसामान्यतः लोग आस्था रखते हैं कि मेघ रिख (मेघ ऋषि) सभी मेघवारों में एक पूजनीय व्यक्तित्व हैमेघवार ख़ुद को उसी महान संत/ऋषि का वंशज मानते हैंडॉथोंट्या एक आलेख में लिखते हैं:-

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the medieval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned. In this article we will try to understand the historical identity of Megh Rikh and Megh Dharu. There is a common belief that Megh Rikh was the prime ancestor of Meghwar. In the Meghwar traditional literature and oral stories, he is considered as the most revered personality among all the Meghwars alike. Meghwar consider themselves as the descendants of this great saint."

हालाँकि ऐसा देखा नहीं गया कि उत्तर-पश्चिम भारत में आमतौर पर कहीं मेघ ऋषि की पूजा होती हो लेकिन गुजरात के मेघवारों के बारमतिपंथ में मेघ रिख (ऋषिएक पूजित विभूति के रूप में सदियों से मौजूद रहे हैंवहाँ की मान्यता के अनुसार मेघ रिख का अस्तित्वकाल चाहे विवादित हो लेकिन मेघ रिख उनकी पूजा पद्धतियों में है इसमें संदेह नहींबावजूद इसके परंपरा मान्य इतिहास पुरुष मेघ रिखमेघ धारु यहाँ तक कि मेघवार पर भी सवाल उठाए जाते हैं सिर्फ इसलिए कि उसके बारे में कहीं न कहीं कोई एक धुँधली (शायद शरारती-सी भी) पौराणिक कथा विद्यमान है. उस पर कुछ इतिहासकारों ने पौराणिक कथा और इतिहास का ऐसा घाल-मेल कर दिया है कि मेघ रिख की साफ़-साफ़ निशानदेही मुश्किल हो गई है. इसलिए सवाल तो रहेंगेलेकिन अपने पूर्वजों का सम्मान करने का हक सभी को हैइस बात से कौन इंकार कर सकता है.

(विशेष नोट :मेघ वंश एक व्यापक अर्थ वाला और अनेकार्थी शब्द हैमेघ वंश में कई अलग-अलग जातियाँ हैंउन जातियों में मेघ ऋषि एक लोक-स्मृति (पब्लिक मेमोरी) के रूप में विद्यमान एक साझा पूर्वज हैमेघ ऋषि की पहचान करने में डॉध्यान सिंह, श्री नवीन भोइया (गुजरात) कर्नल तिलक राज ने सहायता कीउनका आभार.)

(इस पेज/ब्लॉग का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन करना नहीं है.)

24 November 2015

Religious Branding - धर्म के ब्रांड

किसी भी आध्यात्मिक गुरु के कम से कम तीन दायरे होते हैं. पहला उसके करीबी हमख्यालों का. दूसरा ऐसे लोगों का जो धर्म के व्यवसायी होते हैं और डेरे-आश्रम की कमाई में से अपने सुख की चाँदी  काटते हैं. तीसरा दायरा सत्संगियों का होता है जो गुरु-ज्ञान के बदले में डेरे-आश्रम को चढ़ावा और अपना समय देते हैं. यह तीसरा दायरा उपजाऊ जमीन की तरह होता है जिस पर सभी अपना-अपना हल चलाने आ जाते हैं. गंदी राजनीति भी अपने हिस्से की फसल काटने के लिए बाड़ तोड़ कर यहाँ घुस पड़ती है.

भक्तजनों! नहीं जानते तो जान लीजिए कि धर्म के धंधे में गला काट प्रतियोगिता है. सत्संगियों को वोटर की तरह कोई ब्रैंड कर सकता है तो उसकी दुकान पर कोई 'देशद्रोही' के इश्तेहार भी चिपका सकता है. जिसे आप 'स्वर्ग' मानते हैं उस पर कोई 'नरक' का साइनबोर्ड लगा कर चंपत हो जाता है. सारा खेल ब्रांडिंग का है जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं. कुछ समझा करो यार. तुम शांति, संपत्ति, संपन्नता की तलाश में पद्मासन लगा कर कहीं बैठते हो और कोई तुम पर अपना स्टिकर चस्पाँ करके निकल लेता है.

सत्संगों से बाहर निकलते अधिकतर लोग गरीब और वंचित जातियों या जनजातियों के होते हैं. इन्हें लगता है कि इन्हें गुरुओं की या ईश्वर की सख्त ज़रूरत है. लेकिन आर्थिक खुशहाली माँगने से नहीं सरकार की नीतियों से मिलती है. भक्तजनों!! उम्मीद है ट्यूशन की यह एक क्लास काफी है. ख़ुश रहो आबाद रहो


22 October 2015

A Culture with # tags - # टैग वाली एक संस्कृति

अक्तूबर आते ही फेस बुक पर रावण और महिषासुर के चित्र आने लगते हैं. रावण के बारे में एक कविता काफी वायरल हुई है जिसमें माँ अपनी बेटी से पूछती है कि तुझे कैसा भाई चाहिए तो बेटी का उत्तर होता है - ''रावण जैसा''. आपने भी पढ़ी होगी. रावण के बहुत से गुण रामायण में कहे गए हैं. राम के मुँह से भी रचनाकार ने उसकी प्रसंशा कराई है. दूसरे, महिषासुर को यादव अपना पूर्वज बताते हैं. संथाल लोग तथा और भी कई समुदाय उसे अपना पूर्वज मानते हैं. इतने वर्षों से इनकी हत्या/मृत्यु का जो सांस्कृतिक जश्न मनाया जाता रहा है उसके प्रति एक प्रतिकार की भावना ज़ोर पकड़ रही है.

महिषासुर के वंशजों का कहना है कि वह अपने क्षेत्र का राजा था जिसे धोखे से मारा गया और उसका राज्य छीन लिया गया. असुर जाति या कबीला आज भी भारत में बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्र में बसा है और एकदम मानवीय छवि वाला है. उनका मुख्य पेशा कभी भैंसपालन रहा होगा. ब्राह्मणों समेत कई कबीले रावण पर अपना अधिकार जताते हैं कि "वो हमारा बंदा था". अब दशहरा का सीज़न आता है तो उसकी मृत्यु के जश्न पर काफी सवाल उठने लगते हैं. इस समारोह की तुलना विजयी सैनिकों के नृत्य से की जाती है. लेकिन रावण के फ़ैन कहते हैं कि यदि यह विजयी सैनिकों का एक बार का नाच होता तो बात समझ में आती. यह तो संस्कृति के नाम पर किया जा रहा मनोरंजन है और उनके वंशजों का अपमान है.

मन में सवाल तो आता है कि भारतीयों ने कभी निश्चित मुहूर्त पर अयूब ख़ान, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो या माओ त्से तुंग या चाओ एन लाई का पुतला नहीं जलाया. वे तो ज्ञात आक्रमणकारी शत्रु थे. लेकिन रावण भारतीय जनमानस के लिए 'अपना बंदा' है. उसे अहंकार का प्रतीक बना कर फूँकना भी उचित नहीं लगता क्योंकि अहंकार मनुष्य के अस्तित्व का ज़रूरी अंग है. बहरहाल रावण दहन काफी लोगों को आहत करता है.

महिषासुर के साथ मूलनिवासी राजा होने का एक हैशटैग लग गया है. उसकी हत्या करने वाली दुर्गा कौन थी इस पर विवाद है. उसके साथ कई हैश टैग लग गए हैं. कई क्षेत्रों में लोगों ने 'महिषासुर शहादत दिवस' मनाना शुरू कर दिया है.

कुल मिला कर सांस्कृतिक टकराव दस्तक दे रहा है. आगे क्या होगा पता नहीं.

यह सच्चाई है कि हम सभी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं. यह हमारे मन पर पड़े संस्कारों और प्रभावों के कारण होता है जिन्हें हम सच मानते हैं और जो जानकारी बढ़ने के साथ बदलते रहते हैं. इससे मिथों की निरंतरता प्रभावित होती है. कुछ टीवी कार्यक्रमों ने पुराने मिथकों में नए अर्थ जोड़े हैं जो कई बार ऐतिहासिक या फिर अनैतिहासिक होते हैं. इस क्रम में पौराणिक कथाओं के साथ नए हैशटैग जुड़ गए हैं. इसने इस विचार को स्पेस दिया है कि मानवीय टकराव की जगह सांस्कृतिक परंपराओं और रूढ़ियों को कुछ ढीला करने पर विचार किया जा सकता है.

अब संस्कृति में सभ्यता एडजस्ट होने को है.

21 September 2015

A gist of history of Meghs - मेघों के इतिहास का सार


मेघ वंश की जातियों के लोग आपस में पूछते रहे हैं कि भाई, हमारा इतिहास क्या है? उत्तर मिलता है कि - पता नहीं.

कुछ पुराने ऐतिहासिक सवाल हैं -
मेघों का इतिहास है तो उन्हें कहीं युद्ध भी लड़ना पड़ा होगा. इसके पर्याप्त सबूत हैं कि मेघ और मेघ-भगत योद्धा रहे हैं हालाँकि उनके अधिकतर इतिहास का लोप कर दिया गया है. नवल वियोगी जैसे इतिहासकारों ने नए तथ्यों के साथ इतिहास को फिर से लिखा है और बताया है कि इस देश के प्राचीन शासक नागवंशी थे. मेघ ऋषि को वेदों में 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया है.

''मेघ वंश'' एक मानव समूह है जिसके बारे में माना जाता है कि यह उस कोलारियन ग्रुप से संबंधित है जो मध्य एशिया से ईरान के रास्ते इस क्षेत्र में आया था. इसका रंग गेहुँआ (wheetish) है.

कुछ विद्वानों का मानना है कि मेघ या मेघ उपाधि वाले राजा उस काल में सत्ता में रहे जिसे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) कहा जाता था. लेकिन के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री (जिन्होंने मेघ राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया) और आर.बी. लाथम ऐसे इतिहासकार हैं जिनकी खोज ने उस समय का इतिहास खोजा. आज इतिहास में कोई 'अंधकार काल' नहीं है.

ऐसी कई ऐतिहासिक कड़िया मिलती है जो बताती हैं कि मेघ (रेस) ने मेडिटेरेनियन साम्राज्य की स्थापना की थी जो सतलुज और झेलम तक फैला था. पर्शियन राज्य की स्थापना के बाद वो समाप्त हो गया. उसके बाद मेदियन साम्राज्य के लोग कई क्षेत्रों में बिखरे.

आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग 'मेघ ऋषि' जिसे 'वृत्र' भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे. उसका उल्लेख ऋग्वेद में आता है. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका आधिपत्य (Suzerainty) था. सप्तसिंधु का अर्थ है सात दरिया यानि सिंध, सतलुज, ब्यास, रावि, चिनाब, झेलम और यमुना. आर्य ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व आए और मेदियन साम्राज्य ईसा से 600 वर्ष पूर्व अस्तित्व में था. इस दौरान आर्य बड़ी संख्या में आए और इस क्षेत्र में मेघ आदि शासक कबीलों के साथ लगभग 500 वर्ष चले लंबे संघर्ष या युद्धों के बाद आर्य जीत गए. यह संघर्ष मुख्यतः दरियाओं के पानी और उपजाऊ ज़मीन के लिए था.

आर.एल. गोत्रा जी ने अपने आलेख Meghs of India में लिखा है कि 'वैदिक साहित्य के अनुसार मेघ या वृत्र से जुड़े लगभग 8 लाख लोगों की हत्या की गई थी'. धीरे-धीरे आर्य अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगे रहे. यह प्रक्रिया बुद्ध के बाद पुष्यमित्र शुंग के द्वारा बहुत से बौधों की हत्या तक चली जिसमें बौधधर्म के मेघ वंश के प्रचारक शामिल थे. कालांतर में आर्यों की ब्राह्मणीकल व्यवस्था स्थापित हुई, मनुस्मृति जैसा धार्मिक-राजनीतिक संविधान पुष्यमित्र ने स्मृति भार्गव से लिखवाया. जात-पात निर्धारित हुई और मेघ वंश का बुरा समय शुरू हुआ.

मेघों का प्राचीन इतिहास भारत में कम और पुराने पड़ोसी देशों के इतिहास में अधिक है.
आगे चल कर आर्य ब्राह्मणों की बनाई हुई जाति व्यवस्था में शामिल होने से मेघ वंश से कई जातियाँ बनीं. पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मेघ-भगत उनमें से एक जाति है. तथापि मेघ वंश से राजस्थान के मेघवाल भी निकले हैं और गुजरात के मेघवार भी. कई अन्य जातियाँ भी मेघवंश से निकली हैं जिनकी सटीक पहचान हम नहीं कर पाते. लेकिन पहचानने की कोशिशें तेज़ हुई हैं.
जाति और गोत्र व्यवस्था
गोत्र में किसी जाति या उपजाति का कुछ न कुछ इतिहास छिपा रहता है. गोत्र उनके सामाजिक स्तर की कहानी तक कहता है. गोत्र बता देता है कि कौन किस जाति का है और जाति ख़ुद बता देती है कि जाति व्यवस्था में वो ऊपर या नीचे कहाँ पर है. गोत्र परंपरा की खासियत है कि गोत्र किन्हीं कारणों से बदलते रहते हैं और उनकी संख्या में बढ़ने की प्रवृत्ति देखी गई है.

लोगों को जन्म-मरण, विवाह के संस्कारों के समय होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में अपना गोत्र छिपाते हुए आपने देखा होगा. वे केवल ऋषि गोत्र से काम चलाते देखे गए हैं. वे जानते हैं कि गोत्र बता कर वे अपनी जाति और अपने सामाजिक स्तर की घोषणा ख़ुद कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा नहीं लगता. गोत्र की परंपरा का बोलबाला देख कर मेघों ने भी ख़ुद को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस गोत्र व्यवस्था को अपनाया था ऐसा मेघवंश इतिहास और संस्कृति के लेखक ताराराम जी ने बताया है. गोत्र ब्राह्मणिकल परंपरा है.

आमतौर पर ब्राह्मणिकल परंपरा में गोत्र को रक्त-परंपरा (अपना ख़ून) और वंश, किन्हीं मायनों में वर्ण भी, के तौर पर लिया जाता है. इसलिए ब्राह्मण हमेशा ब्राह्मण ही रहेगा. मेघवंशी मेघवंशी ही रहेगा. वह आर्य या ब्राह्मण नहीं बन सकता. एक अन्य परंपरा के अनुसार मेघों की पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती थी. इसलिए सारे भारत में मेघ वाशिष्ठी, वशिष्टा या वासिका नाम से जाने गए. फिर कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया.

आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष, वंशकर्ता के रूप में किसी मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैं. यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ता) है. इसे सभी मेघ वंशी मानते हैं.

मेघों का धर्म
क्या मेघों का अपना कोई पुराना धर्म है? इतिहास धर्म का भी रिकार्ड देखता है. आज के मेघ समुदायों में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर है. जम्मू के एक उत्साही युवा सतीश विद्रोही ने सोशल मीडिया में इस विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी जहाँ बहुत-सी बातें उभर कर आईं. वह मंच किसी निर्णय पर पहुँचाने वाला नहीं था. धर्म नितांत व्यक्तिगत चीज़ है.

राजस्थान के बहुत से मेघ वंशी अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव (ध्यान रहे कि राम शब्द की परंपरा बौध परंपरा से आती है) में आस्था रखते हैं. गुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषि और ममई देव के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके अपने मंदिर हैं, पाकिस्तान में भी हैं. प्रसंगवश 'मातंग' शब्द का अर्थ 'मेघ' ही है. मेघवार अपने सांस्कृतिक त्योहारों में सात मेघों की पूजा करते हैं. संभव है वे सात मेघ पूर्ववर्ती राजा रहे हों. ममैदेव महेश्वरी मेघवारों के पूज्य हैं जो मातंग देव या मातंग ऋषि के वंशज हैं. ममैदेव का मक़बरा जिस कब्रगाह में है उसे यूनेस्को ने विश्वधरोहर (World Heritage) के रूप में मान्यता दी है. इस प्रकार एक मेघ वंशी का निर्वाण स्थल विश्वधरोहर में है.

स्वतंत्र भारत में मेघ कई अन्य धर्मों/पंथों में गए जैसे राधास्वामी, निरंकारी, ब्राह्मणीकल सनातन धर्म, सिखिज़्म, आर्यसमाज, ईसाईयत, विभिन्न गुरुओं की गद्दियाँ, डेरे आदि. सच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानता' का बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर गए. लेकिन उनका सामाजिक स्तर नहीं बदला. धार्मिक दृष्टि से उनकी अलग और सशक्त पहचान नहीं बन पाई. मेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.

पंजाब की मेघ जाति जिससे से मैं संबंधित हूँ उसके बारे में यह उल्लेख ज़रूरी है कि बीसवीं शताब्दी के शुरू में आर्यसमाज के शुद्धिकरण आंदोलन के दौरान उनका शुद्धिकरण होने के बाद मेघों का आत्मविश्वास जागा, उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा बढ़ी और स्थानीय राजनीति में सक्रियता की उनकी इच्छा को बल मिला. वे म्युनिसपैलिटी जैसी संस्थाओं में अपनी नुमाइंदगी की माँग करने लगे. शुरुआती तौर पर आर्यसमाजी इससे परेशान हुए. कितने मेघों का शुद्धिकरण हुआ इसे लेकर विवाद है.

जम्मू-पंजाब के मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकी है. ईसाइयत और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी है. बड़े पैमाने पर कोई धर्मांतरण नहीं हुआ है. जालंधर और अमृतसर के आसपास के मेघों की बड़ी जनसंख्या राधास्वामी मत की ओर गई है. आगे चल कर यह मेघों के धार्मिक इतिहास में दर्ज हो सकता है. मेघों में संशयवादी (skepticism) विचारधारा के लोग भी हैं जो ईश्वर-भगवान, मंदिर, धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रतीकों आदि पर सवाल उठाते हैं और उनकी आवश्यकता महसूस नहीं करते. मेघों की देरियाँ (छोटे-छोटे स्मारक स्ट्रक्चर) भी उनके पूजास्थल हैं जो अधिकतर जम्मू में और दो-चार पंजाब में हैं. लेकिन यहाँ नियमित रूप से किसी प्रकार का सामूहिक कार्यक्रम नहीं होता. वर्ष में दो बार वहाँ मेल (gathering) होता है. सामूहिक कार्यक्रम नियमित रूप से अधिक होने लगें तो मेघों के गोत्रों (खापों) की मज़बूत पहचान बन सकती है.

इधर ''मेघऋषि'' का मिथ धर्म और पूजा पद्धति में प्रवेश पाने के लिए निकल पड़े हैं. मेघऋषि की कोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं है लेकिन कल्पना की जाती है कि कोई जटाधारी, भगवा कपड़े पहने ऋषि रहा होगा जो जंगल में तपस्या करता था. इसी पौराणिक इमेज के आधार पर गढ़ा, जालंधर में एक मेघ सज्जन सुदागर मल कोमल ने अपने देवी के मंदिर में मेघऋषि की मूर्ति स्थापित की है. राजस्थान में गोपाल डेनवाल ने मेघ भगवान और मेघ ऋषि के मंदिर बनाने का कार्य शुरू किया है. इसके लिए उन्होंने मुअन जो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 ई.पू. की एक प्रतिमा (जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियम, कराची में रखी है) की इमेज या छवि का प्रयोग किया है. मेघ भगवान की आरतियाँ, चालीसा, स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई और बाँटी गई हैं.

कमज़ोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति की वजह से राजनीति के क्षेत्र में मेघों की सुनवाई लगभग नहीं के बराबर है और सत्ता में भागीदारी दूर की बात है. एक सकारात्मक बात यह है कि पढ़े-लिखे मेघों ने बड़ी तेज़ी से अपना पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता कई अन्य कार्यों/क्षेत्रों में दिखाई और उसमें सफल हुए. व्यापार के क्षेत्र में इनकी बढ़िया पहचान बने इसकी प्रतीक्षा है.

मेघों के इतिहास के ये कुछ पृष्ठ ख़ाली पड़े हैं.
1. अलैक्ज़ेंडर कन्निंघम ने अपनी खोज में मेघों की भौगोलिक स्थिति को सिकंदर के रास्ते (चनाब और झेलम का इलाक़ा) में बताया है. हालाँकि राजा पोरस पर कई जातियाँ अपना अधिकार जताती हैं. तथापि यह देखने की बात है कि उस समय पोरस की सेना में शामिल योद्धा जातियाँ कौन-कौन थीं. भूलना नहीं चाहिए कि उस क्षेत्र में मेघ बहुत अधिक संख्या में थे जो क्षत्रिय योद्धा थे. कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि पोरस ने सिकंदर को हराया था.

2. केरन वाले भगता साध की अगुआई में कई हज़ार मेघों ने मांसाहार छोड़ा. यह एक तरह का एकतरफा करार था. इस करार की शर्तों और पृष्ठभूमि को देखने की ज़रूरत है.

3. कुछ मेघों ने विश्वयुद्धों में, पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हिस्सा लिया है. वे दुश्मन की सामाओं में घुस कर लड़े हैं. उनकी उपलब्धियों के बारे में जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.

4. दीनानगर की अनीता भगत ने बताया था कि एक मेघ भगत मास्टर नरपत सिंह, गाँव बफड़ीं, तहसील और ज़िला हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश), (जीवन काल - सन् 1914 से 1992 तक) स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा पा चुके हैं. अनीता ने उनके बारे में जानकारी और फोटोग्राफ इकट्ठे करके भेजे हैं. उस वीर को 1972 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंट किया था. गाँव की पंचायत ने उनके सम्मान में स्मृति-द्वार बनवाया है. एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसके शरीर पर गोलियों के छह निशान थे. ऐसे लोग शायद और भी मिलें. देखिए. ढूँढिए.

5. मेघवंश के लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रिकार्ड तैयार करने की भी ज़रूरत है. एडवोकेट हंसराज भगत, रिहैब्लिटेशन ऑफिसर भगत दौलत राम (जम्मू वाले) जी के बारे में कुछ जानकारी मिली है. वास्तव में यह सूची बहुत लंबी है लेकिन उसे रिकार्ड करने की ज़रूरत है.

6. ऐसे ही मेघ समाज के राजनेताओं और समाज के प्रति उनके योगदान की जानकारी अभी इकट्ठी नहीं हो पाई है.

जो अब तक कहा गया है उसे आप मेघों के इतिहास की हेडलाइन्स समझ कर संतोष करें.

कई उतार-चढ़ाव देख चुकी मेघ जाति एक मज़बूत और प्रकाशित हृदय जाति है. अन्य जातियों के साथ मिल कर वे देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं देते रहे हैं. आने वाले समय में इनकी भूमिका बहुत एक्टिव होगी और स्पेस भी अधिक होगा. आप भी अपने आज को सँवारिए और वो भविष्य बनाइए जो आपका है.

जय मेघ, जय भारत.

भारत भूषण भगत
चंडीगढ़.
(दिनांक 27-09-2019 को संशोधित)