21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि मेघ जाति मेघ ऋषि से निकली है. आगे चल कर जानकारी मिली कि भारत भर के मेघ वंश के लोग अपने वंशकर्ता या प्रथम मेघ का नाम मेघ ऋषि बताते हैं. लगता है कि इसका आधार पौराणिक कथा-कहानियाँ हैं और वास्तविकता से इसका लेना-देना नहीं है.

श्री आर.एल. गोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु के पुरोहित नरेश जैसा पाया है. यह एक अध्ययन इस नज़रिए से महत्वपूर्ण है कि इसमें एक वैदिक-पौराणिक पात्र की छवि को इतिहास से जुड़ता देखा गया है. पुराण जिस स्टाइल में लिखे गए हैं उसे इतिहास मान लेना समस्याएँ पैदा करता है. इस आदत से बचना ही होगा. दूसरी ओर यह प्रमाणित हो चुका है कि सिंधुघाटी सभ्यता, जिसके सांकेतिक अर्थों में गोत्रा जी ने मेघ ऋषि को इतिहास से जुड़ता पाया है वो वास्तव में बौध सभ्यता थी. यह भूलना नहीं चाहिए को श्री गोत्रा वेद में उल्लिखित मेघ, मेद जैसे शब्दों और उनकी पौराणिक परंपरा में प्रयुक्त प्रतीकात्मक बिंबों के ज़रिए इतिहास में मेघ शब्द की व्याख्या का अध्ययन कर रहे थे जिसके कई सांकेतिक अर्थ निकल सकते थे - कुछ मनरंजक, कथात्मक और कुछ ऐतिहासिक. इधर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने माना है कि सिंधुघाटी के पुरोहित नरेश की जो मूर्ति मिली है वो बुद्ध की है.

किसी ने देखा तो नहीं लेकिन मैं और मेरा बाल-मन मेघ ऋषि की कल्पना कॉमिक्स में देखे चित्रों के आधार पर करता था. जो पढ़ा वो पौराणिक कथाओं से था जिनमें आर्यों के प्रतिनिधि लड़ाके इंद्र के साथ हुए युद्ध में मेघ ऋषि भयानक शस्त्रों (कृपया शब्द जाल में फँसें) का प्रयोग करते दिखते हैं. मेघ ऋषि को शिक्षित विद्वान होने के कारण ब्राह्मण भी कहा गया और योद्धा होने के कारण क्षत्रिय भी बताया गया. कोई इतने बड़े पैमाने पर युद्ध करता है तो वो क्षत्रिय रहा ही होगा. ब्राह्मणों के साहित्य में उसे 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया ऐसी परंपरा दुनिया भर में रही है. इसे मूलनिवासी और आर्यों के युद्ध का संदर्भ कहा जा सकता है जिसे शब्दों के साथ फुलाया गया है और उसकी बड़ी छवि तैयार की गई है. कुछ ऋषियों को गोरा और कुछ को साँवला चित्रित किया गया है. यह भी किसी के वंश (मूलनिवासी या आर्य) को दर्शाने का तरीका है.

मेघ ऋषि से संबंधित कोई पूजा पद्धति सामान्यतः देखने को नहीं मिलती थी लेकिन गुजरात के मेघवारों की धार्मिक पूजा-पद्धतियों में 'मेघ-रिख' या 'मेघ ऋषि' है. वहाँ सात मेघों (संभवतः मेघ वंश के राजाओं) की पूजा की जाती है. राजस्थान और पंजाब में कुछ लोगों का ध्यान इस ओर गया है. लेकिन मिथ पर आधारित आस्था का रास्ता इतना आसान नहीं जैसा कि 'मेघ रिख' पर शोध करने वाले डॉ. मोहन देवराज थोंट्या ने कहा है.

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into the mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the mediaeval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned."

जयपुर के श्री गोपाल डेनवाल और पंजाब में श्री सुदागरमल 'कोमल' ने अपने-अपने तरीके से मेघ ऋषि को एक रूप-रंग दिया है. डेनवाल जी ने मोहंजो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश की 2500 (कुछ इसे 1700 मानते हैं) वर्ष ईसा पूर्व की एक मूर्ति की छवि का प्रयोग मेघ ऋषि के लिए किया है और जालंधर के सुदागरमल कोमल ने ऋषि की परंपरागत भगवाधारी छवि को अपनाया है.

नीचे दिया गया वीडियो आप देख सकते हैं. (इस वीडियो का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन नहीं है.)





24 November 2015

Religious Branding - धर्म के ब्रांड

किसी भी आध्यात्मिक गुरु के कम से कम तीन दायरे होते हैं. पहला उसके करीबी हमख्यालों का. दूसरा ऐसे लोगों का जो धर्म के व्यवसायी होते हैं और डेरे-आश्रम की कमाई में से अपने सुख की चाँदी  काटते हैं. तीसरा दायरा सत्संगियों का होता है जो गुरु-ज्ञान के बदले में डेरे-आश्रम को चढ़ावा और अपना समय देते हैं. यह तीसरा दायरा उपजाऊ जमीन की तरह होता है जिस पर सभी अपना-अपना हल चलाने आ जाते हैं. गंदी राजनीति भी अपने हिस्से की फसल काटने के लिए बाड़ तोड़ कर यहाँ घुस पड़ती है.

भक्तजनों! नहीं जानते तो जान लीजिए कि धर्म के धंधे में गला काट प्रतियोगिता है. सत्संगियों को वोटर की तरह कोई ब्रैंड कर सकता है तो उसकी दुकान पर कोई 'देशद्रोही' के इश्तेहार भी चिपका सकता है. जिसे आप 'स्वर्ग' मानते हैं उस पर कोई 'नरक' का साइनबोर्ड लगा कर चंपत हो जाता है. सारा खेल ब्रांडिंग का है जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं. कुछ समझा करो यार. तुम शांति, संपत्ति, संपन्नता की तलाश में पद्मासन लगा कर कहीं बैठते हो और कोई तुम पर अपना स्टिकर चस्पाँ करके निकल लेता है.

सत्संगों से बाहर निकलते अधिकतर लोग गरीब और वंचित जातियों या जनजातियों के होते हैं. इन्हें लगता है कि इन्हें गुरुओं की या ईश्वर की सख्त ज़रूरत है. लेकिन आर्थिक खुशहाली माँगने से नहीं सरकार की नीतियों से मिलती है. भक्तजनों!! उम्मीद है ट्यूशन की यह एक क्लास काफी है. ख़ुश रहो आबाद रहो


22 October 2015

A Culture with # tags - # टैग वाली एक संस्कृति

अक्तूबर आते ही फेस बुक पर रावण और महिषासुर के चित्र आने लगते हैं. रावण के बारे में एक कविता काफी वायरल हुई है जिसमें माँ अपनी बेटी से पूछती है कि तुझे कैसा भाई चाहिए तो बेटी का उत्तर होता है - ''रावण जैसा''. आपने भी पढ़ी होगी. रावण के बहुत से गुण रामायण में कहे गए हैं. राम के मुँह से भी रचनाकार ने उसकी प्रसंशा कराई है. दूसरे, महिषासुर को यादव अपना पूर्वज बताते हैं. संथाल लोग तथा और भी कई समुदाय उसे अपना पूर्वज मानते हैं. इतने वर्षों से इनकी हत्या/मृत्यु का जो सांस्कृतिक जश्न मनाया जाता रहा है उसके प्रति एक प्रतिकार की भावना ज़ोर पकड़ रही है.

महिषासुर के वंशजों का कहना है कि वह अपने क्षेत्र का राजा था जिसे धोखे से मारा गया और उसका राज्य छीन लिया गया. असुर जाति या कबीला आज भी भारत में बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्र में बसा है और एकदम मानवीय छवि वाला है. उनका मुख्य पेशा कभी भैंसपालन रहा होगा. ब्राह्मणों समेत कई कबीले रावण पर अपना अधिकार जताते हैं कि "वो हमारा बंदा था". अब दशहरा का सीज़न आता है तो उसकी मृत्यु के जश्न पर काफी सवाल उठने लगते हैं. इस समारोह की तुलना विजयी सैनिकों के नृत्य से की जाती है. लेकिन रावण के फ़ैन कहते हैं कि यदि यह विजयी सैनिकों का एक बार का नाच होता तो बात समझ में आती. यह तो संस्कृति के नाम पर किया जा रहा मनोरंजन है और उनके वंशजों का अपमान है.

मन में सवाल तो आता है कि भारतीयों ने कभी निश्चित मुहूर्त पर अयूब ख़ान, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो या माओ त्से तुंग या चाओ एन लाई का पुतला नहीं जलाया. वे तो ज्ञात आक्रमणकारी शत्रु थे. लेकिन रावण भारतीय जनमानस के लिए 'अपना बंदा' है. उसे अहंकार का प्रतीक बना कर फूँकना भी उचित नहीं लगता क्योंकि अहंकार मनुष्य के अस्तित्व का ज़रूरी अंग है. बहरहाल रावण दहन काफी लोगों को आहत करता है.

महिषासुर के साथ मूलनिवासी राजा होने का एक हैशटैग लग गया है. उसकी हत्या करने वाली दुर्गा कौन थी इस पर विवाद है. उसके साथ कई हैश टैग लग गए हैं. कई क्षेत्रों में लोगों ने 'महिषासुर शहादत दिवस' मनाना शुरू कर दिया है.

कुल मिला कर सांस्कृतिक टकराव दस्तक दे रहा है. आगे क्या होगा पता नहीं.

यह सच्चाई है कि हम सभी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं. यह हमारे मन पर पड़े संस्कारों और प्रभावों के कारण होता है जिन्हें हम सच मानते हैं और जो जानकारी बढ़ने के साथ बदलते रहते हैं. इससे मिथों की निरंतरता प्रभावित होती है. कुछ टीवी कार्यक्रमों ने पुराने मिथकों में नए अर्थ जोड़े हैं जो कई बार ऐतिहासिक या फिर अनैतिहासिक होते हैं. इस क्रम में पौराणिक कथाओं के साथ नए हैशटैग जुड़ गए हैं. इसने इस विचार को स्पेस दिया है कि मानवीय टकराव की जगह सांस्कृतिक परंपराओं और रूढ़ियों को कुछ ढीला करने पर विचार किया जा सकता है.

अब संस्कृति में सभ्यता एडजस्ट होने को है.

21 September 2015

A gist of history of Meghs - मेघों के इतिहास का सार

मेघवंशी समुदायों के लोग आपस में एक दूसरे से पूछते रहे हैं कि भाई, हमारा इतिहास क्या है? उत्तर मिलता है कि - पता नहीं.


इतिहास तो बाद की बात है, पहले कुछ ऐतिहासिक सवाल हैं -
मेघों का इतिहास है तो उन्होंने युद्ध भी लड़ा होगा. इसके पर्याप्त सबूत हैं कि मेघवंशी और मेघ-भगत योद्धा रहे हैं हालाँकि उनके अधिकतर इतिहास का लोप कर दिया गया है. नवल वियोगी जैसे इतिहासकारों ने नए तथ्यों के साथ इतिहास को फिर से लिखा है और बताया है कि इस देश के प्राचीन शासक नागवंशी थे. आपने मेघ ऋषि के बारे में सुना होगा उसे वेदों में 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया है.


''मेघवंश'' एक मानव समूह है जो उस कोलारियन ग्रुप से संबंधित है जो मध्य एशिया से ईरान के रास्ते इस क्षेत्र में आया था. इसका रंग गेहुँआ (wheetish) है.


मेघवंशी उसकाल में भी सत्ता में रहे जिसे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) कहा जाता था. लेकिन के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री (जिन्होंने मेघ राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया) और आर.बी. लाथम ऐसे इतिहासकार हैं जिनकी खोज ने उस समय का इतिहास खोजा. आज इतिहास में कोई 'अंधकार काल' नहीं है.


मेघवंशियों (रेस) ने मेडिटेरेनियन साम्राज्य की स्थापना की थी जो सतलुज और झेलम तक फैला था. पर्शियन राज्य की स्थापना के बाद वो समाप्त हो गया और मेदियन साम्राज्य के लोग बिखरे होंगे इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है.


आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग 'मेघ ऋषि' जिसे 'वृत्र' भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे. उसका उल्लेख ऋग्वेद में आता है. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका आधिपत्य (Suzerainty) था. सप्तसिंधु का अर्थ है सात दरिया यानि सिंध, सतलुज, ब्यास, रावि, चिनाब, झेलम और यमुना. आर्यों का आगमन ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व माना जाता है और मेदियन साम्राज्य ईसा से 600 वर्ष पूर्व अस्तित्व में था. इस दौरान आर्यों के बड़ी संख्या में आने की शुरूआत हुई और इस क्षेत्र में मेघवंशियों के साथ लगभग 500 वर्ष तक चले संघर्ष के बाद आर्य जीत गए. यह संघर्ष मुख्यतः दरियाओं के पानी और उपजाऊ जमीन के लिए था.


आर.एल. गोत्रा जी ने अपने आलेख Meghs of India में लिखा है कि 'वैदिक साहित्य के अनुसार मेघ या वृत्र से जुड़े लगभग 8 लाख लोगों की हत्या की गई थी'. धीरे-धीरे आर्य वर्चस्व स्थापित करने में लगे रहे. यह प्रक्रिया बुद्ध के बाद पुष्यमित्र शुंग के द्वारा असंख्य बौधों की हत्या तक चली जिसमें बौधधर्म के मेघवंशी प्रचारक भी बड़ी संख्या में शामिल थे. कालांतर में आर्यों की ब्राह्मणीकल व्यवस्था स्थापित हुई, मनुस्मृति जैसा धार्मिक-राजनीतिक संविधान पुष्यमित्र ने स्मृति भार्गव से लिखवाया. जात-पात निर्धारित हुई और मेघवंशियों का बुरा समय शुरू हुआ.


मेघों का प्राचीन इतिहास भारत में कम और पुराने पड़ोसी देशों के इतिहास में अधिक है. यह एक खोजियों के लिए एक संकेत है.


आगे चल कर आर्य ब्राह्मणों की बनाई हुई जाति व्यवस्था में शामिल होने से मेघवंश से कई जातियाँ निकलीं. पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मेघ-भगत उनमें से एक जाति है. तथापि मेघवंश से राजस्थान के मेघवाल भी निकले हैं और गुजरात के मेघवार भी. कई अन्य जातियाँ भी मेघवंश से निकली हैं जिनकी पहचान हम नहीं कर पाते. लेकिन पहचानने की कोशिशें तेज़ हो रही है.


गोत्र में किसी जाति या उपजाति का कुछ न कुछ इतिहास रहता है और गोत्र उनके सामाजिक स्तर को भी बताता है. गोत्र बता देता है कि वो किस जाति का है और जाति ख़ुद बता देती है कि जाति व्यवस्था में वो ऊपर या नीचे कहाँ पर है.


लोगों को आपने जन्म-मरण, विवाह के संस्कारों के समय होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में अपना गोत्र छिपाते हुए देखा होगा. वे केवल ऋषि गोत्र से काम चलाते देखे गए हैं. वे जानते हैं कि गोत्र बता कर वे अपनी जाति और अपने सामाजिक स्तर की घोषणा ख़ुद कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा नहीं लगता. गोत्र की परंपरा का बोलबाला देख कर मेघों ने भी ख़ुद को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस गोत्र व्यवस्था को अपनाया था ऐसा मेघवंश इतिहास और संस्कृति के लेखक ताराराम जी ने बताया है. गोत्र ब्राह्मणिकल परंपरा है.


आमतौर पर ब्राह्मणिकल परंपरा में गोत्र को रक्त-परंपरा (अपना ख़ून) और वंश, किन्हीं मायनों में वर्ण भी, के तौर पर लिया जाता है. इसलिए ब्राह्मण हमेशा ब्राह्मण ही रहेगा. मेघवंशी मेघवंशी ही रहेगा. वह आर्य या ब्राह्मण नहीं बन सकता. एक अन्य परंपरा के अनुसार मेघों की पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती थी. इसलिए सारे भारत में मेघ वाशिष्ठी, वशिष्टा या वासिका नाम से जाने गए. फिर कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया.


आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैं. यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ता) है. इसे सभी मेघवंशी मानते हैं.


मेघों का धर्म
क्या मेघों का अपना कोई पुराना धर्म है? इतिहास खुली नज़र से इसका भी रिकार्ड देखता है. मेघ समुदाय में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर है. जम्मू के एक उत्साही युवा सतीश विद्रोही ने सोशल मीडिया में इस विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी जहाँ बहुत-सी बातें उभर कर आईं. वह मंच किसी निर्णय पर पहुँचाने वाला नहीं था. धर्म नितांत व्यक्तिगत चीज़ है.


राजस्थान के बहुत से मेघवंशी अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव में आस्था रखते हैं. गुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषि और ममई देव के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके अपने मंदिर हैं, पाकिस्तान में भी हैं. प्रसंगवश मातंग शब्द का अर्थ मेघ ही है. मेघवार अपने सांस्कृतिक त्योहारों में सात मेघों की पूजा करते हैं. संभव है वे सात मेघवंशी पूर्वज राजा रहे हों. ममैदेव महेश्वरी मेघवारों के पूज्य हैं जो मातंग देव या मातंग ऋषि के वंशज हैं. ममैदेव का मक़बरा जिस कब्रगाह में है उसे यूनेस्को ने विश्वधरोहर (World Heritage) के रूप में मान्यता दी है. इस प्रकार एक मेघवंशी का निर्वाण स्थल विश्वधरोहर में है.


मेघ कई अन्य धर्मों/पंथों में गए जैसे राधास्वामी, निरंकारी, ब्राह्मणीकल सनातन धर्म, सिखिज़्म, आर्यसमाज, ईसाईयत, विभिन्न गुरुओं की गद्दियाँ, डेरे आदि. सच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानता' का बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर गए. लेकिन उनका सामाजिक स्तर नहीं बदला. धार्मिक दृष्टि से उनकी अलग और सशक्त पहचान नहीं बन पाई. मेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.


पंजाब की मेघ जाति जिससे से मैं संबंधित हूँ उसके बारे में यह उल्लेख ज़रूरी है कि आर्यसमाज के शुद्धिकरण आंदोलन के दौरान उनके शुद्धकरण के बाद उनका आत्मविश्वास जागा, उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा बढ़ी और स्थानीय राजनीति में सक्रियता की उनकी इच्छा को बल मिला. वे म्युनिसपैलिटी जैसी संस्थाओं में अपनी नुमाइंदगी की माँग करने लगे. शुरुआती तौर पर आर्यसमाजी इससे परेशान हुए.


जम्मू-पंजाब के मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकने लगी है. ईसाइयत और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी है. बड़े पैमाने पर कोई धर्मांतरण नहीं हुआ है. जालंधर और अमृतसर के आसपास के मेघों की बड़ी जनसंख्या राधास्वामी मत की ओर गई है. आगे चल कर यह मेघों के धार्मिक इतिहास में दर्ज हो सकता है. मेघों में संशयवादी (scepticism) विचारधारा के लोग भी हैं जो ईश्वर-भगवान, मंदिर, धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रतीकों आदि पर सवाल उठाते हैं और उनकी आवश्यकता महसूस नहीं करते. मेघों की देरियाँ भी उनके पूजास्थल हैं जो अधिकतर जम्मू में और दो-तीन पंजाब में हैं. लेकिन यहाँ किसी प्रकार का सामूहिक कार्यक्रम नहीं होता. सामूहिक कार्यक्रम होने लगें तो मेघों के गोत्रों (खापों) की मज़बूत पहचान उभरने की भरपूर गुंजाइश है.


इधर ''मेघऋषि'' का मिथ धर्म और पूजा पद्धति में प्रवेश पाने के लिए आतुर है. मेघऋषि की कोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं है लेकिन कल्पना की जाती है कि एक जटाधारी भगवा कपड़े पहने ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता था. इसी पौराणिक इमेज के आधार पर गढ़ा, जालंधर में एक मेघ सज्जन सुदागर मल कोमल ने अपने देवी के मंदिर में मेघऋषि की मूर्ति स्थापित की है. राजस्थान में गोपाल डेनवाल ने मेघ भगवान और मेघ ऋषि के मंदिर बनाने का कार्य शुरू किया है. इसके लिए उन्होंने मुअन जो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 ई.पू. की एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियम, कराची, में रखी है उसकी इमेज या छवि का प्रयोग किया है. मेघ भगवान की आरतियाँ, चालीसा, स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई और बाँटी गई हैं.


कमज़ोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति की वजह से राजनीति के क्षेत्र में मेघों की सुनवाई लगभग नहीं के बराबर है और सत्ता में भागीदारी बहुत दूर की बात है. एक सकारात्मक बात यह है कि पढ़े-लिखे मेघों ने बड़ी तेज़ी से अपना पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता कई अन्य कार्यों/क्षेत्रों में दिखाई और उसमें सफल हुए. व्यापार के क्षेत्र में इनकी बढ़िया पहचान बने इसकी प्रतीक्षा है.


मेघों के इतिहास के ये कुछ पृष्ठ ख़ाली पड़े हैं.


1. अलैक्ज़ेंडर कन्निंघम ने अपनी खोज में मेघों की भौगोलिक स्थिति को सिकंदर के रास्ते (चनाब और झेलम का इलाक़ा) में बताया है. हालाँकि राजा पोरस पर कई जातियाँ अपना अधिकार जताती हैं. तथापि यह देखने की बात है कि उस समय पोरस की सेना में शामिल योद्धा जातियाँ कौन-कौन थीं. भूलना नहीं चाहिए कि उस क्षेत्र में मेघ बहुत अधिक संख्या में थे जो योद्धा थे. कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि पोरस ने ही सिकंदर को हराया था.


2. केरन वाले भगता साध की अगुआई में कई हज़ार मेघों ने मांसाहार छोड़ा. यह एक तरह का एकतरफा करार था. इस करार की शर्तों और पृष्ठभूमि को देखने की ज़रूरत है.


3. कुछ मेघों ने विश्वयुद्धों में, पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हिस्सा लिया है. वे दुश्मन की सामाओं में घुस कर लड़े हैं. उनकी उपलब्धियों के बारे में जानकारी नहीं मिलती.


4. दीनानगर की अनीता भगत ने बताया था कि एक मेघ भगत मास्टर नरपत सिंह, गाँव बफड़ीं, तहसील और ज़िला हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश), (जीवन काल - सन् 1914 से 1992 तक) स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा पा चुके हैं. अनीता ने उनके बारे में जानकारी और फोटोग्राफ इकट्ठे करके भेजे हैं. उस वीर को 1972 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंट किया था. गाँव की पंचायत ने उनके सम्मान में स्मृति द्वार बनवाया है. एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसके शरीर पर गोलियों के छह निशान थे. ऐसे लोग शायद और भी मिलें. देखिए. ढूँढिए.


5. मेघवंश के लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रिकार्ड तैयार करने की भी ज़रूरत है. एडवोकेट हंसराज भगत, रिहैब्लिटेशन ऑफिसर भगत दौलत राम (जम्मू वाले) जी के बारे में कुछ जानकारी मिली है. लेकिन यह सूची अधूरी है.


6. ऐसे ही मेघ समाज के राजनेताओं और समाज के प्रति उनके योगदान की जानकारी अभी इकट्ठी नहीं हो पाई है.


जो अब तक कहा गया है उसे अंत में आप मेघों के इतिहास की हेडलाइन्स समझ कर संतोष करें.


मेघ इतने दमन के बावजूद बेदम नहीं हुए बल्कि आज वे पहले से अधिक रोशन हैं. अन्य जातियों के साथ मिला कर वे देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं. आने वाले समय में इनकी भूमिका बहुत एक्टिव होगी और स्पेस भी अधिक होगा. आपने पिछले इतिहास को थोड़ा-सा जान लिया है. अब अपने आज को सँवारिए और वो भविष्य बनाइए जो आपका है.


जय मेघ, जय भारत.


भारत भूषण भगत

चंडीगढ़.

11 August 2015

Megh Caste - मेघ जाति

इस साइट पर अधिकतर मेघ/मेघ वंश की बात की गई है और कहीं-कहीं उससे जुड़ी पौराणिक कहानियों का उल्लेख किया गया है. मेघ एक वंश (Race) है जिसमें से बहुत-सी जातियाँ निकली हैं जो भारत के लगभग सभी प्रदेशों में बसी हैं. उनके कई नाम ऐसे हैं जिन्हें भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में रहने वाले और ख़ुद को मेघ कहने वाले लोग पहचान नहीं पाते. लेकिन मेघ वंश (Race) तो अन्य देशों में भी है. गूगल करने पर कुछ न कुछ जानकारी मिल जाती है. वैसे 'मेघ' शब्द का एक अर्थ 'कबीला (Tribe)' भी है.

भारत में बसे कई 'वंशों' का 'जातियों' में बँटवारा मनुवादी व्यवस्था की देन है. मेघ वंश का एक टुकड़ा वो 'मेघ जाति' है जो उसी व्यवस्था की देन है. यह जाति अधिकतर जम्मू और पंजाब में बसी है. हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल और यूपी में भी इस जाति के लोग बसे हैं.

पंजाब और जम्मू-कश्मीर में बसी 'मेघ जाति' पर पहली विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी मुझे डॉ. ध्यान सिंह के शोध ग्रंथ के रूप में उपलब्ध हुई जिसे आप इन लिंक्स पर क्लिक करके या गूगल सर्च में Kabirpanthis's of Punjab या Dr. Dhian Singh - History of Meghs/Bhagats टाइप करके ढूँढ सकते हैं. श्री एम.आर. भगत की लिखी पुस्तक मेघमाला Meghmala दूसरी पुस्तक है. इसे हम मेघ जाति का इतिहास चाहे न कह पाएँ लेकिन इसमें मेघ जाति के बारे में काफी जानकारी मिल जाती है

श्री आर.एल. गोत्रा के लिखे लंबे आलेख Meghs of India में मेघ वंश के प्राचीन इतिहास के साथ-साथ पंजाब-जम्मू-कश्मीर की मेघ जाति का कुछ आधुनिक इतिहास आपको मिल जाएगा.



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MEGHnet