17 August 2015

Meghendra and 'Megh' - मेघेंद्र और 'मेघ'

जब मैंने श्री मुंशीराम की पुस्तक ''मेघ-माला'' पढ़ी थी तब इस बात से मैं सहमत था कि कई कबीलों के नाम प्राकृतिक शक्तियों के नाम पर भी रखे गए हैं. हालाँकि मध्य एशिया में 'कबीला (Tribe)' शब्द का पर्यायवाची शब्द 'मेघ (Megh)' उपलब्ध है. तथापि, प्राचीन शब्द 'मेघ' बादलों का भी पर्यायवाची है. 'हिन्दी पर्याय कोष' में कहा गया है कि 'मेघ' और 'जगजीवन' दोनों एक ही अर्थ के दो शब्द हैं. हिन्दी राष्ट्रभाषा कोष में 'मेघ' का अर्थ लिखा है - ''जगजीवन - जगत का आधारजगत का प्राणईश्वरजलमेघ.'' इसका सीधा सा अर्थ है - 'जग के लिए कल्याणकारी'.

जब हम 'इंद्र' शब्द पर विचार करते हैं तो वैदिक-पौराणिक मिथकों की भरमार दिखती है जो कहीं ले नहीं जाती बल्कि उलझाती है. भाषा की दृष्टि से इसका सीधा अर्थ 'शक्ति' और 'उर्वरता' है. इस दृष्टि से जब हम बुद्ध के लिए प्रयुक्त शब्द मेघेंद्र पर विचार करते हैं तो उसका अर्थ ''मेघों की शक्ति और उर्वरता'' से है. मेघों के 'इंद्र' अर्थात् भीतरी शक्ति (उदारहणतः श्रवणेंद्रिय आदि) तक इसका अर्थ विस्तार है. यानि जो अंदर से/भीतर से शक्ति देता है. इस दृष्टि से ''मेघों का राजा'' के अर्थ में भी यह शब्द एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है और 'मेघों का कल्याणकर्ता' तक इसकी अर्थ-छटा छाई है

मेघवंश के इतिहासकार ताराराम ने एक जगह लिखा है कि - 'इसकी संभावना सबसे अधिक है कि हमारे पास मेघ कबीले का नाम डियोनाइसियस (Dionysius) के मेगारसस (Megarsus) नदी में सुरक्षित है. दोनों नामों की आपस में तुलना करने पर, मेरे अनुसार संभव है कि मूल शब्द मेगान्ड्रोस (Megandros) हो जो संस्कृत के शब्द मेगाद्रु, या मेघों का दरिया, के समतुल्य होगा.' जाँच करने की आवश्यकता है कि "मेगांद्रोज़ (Megandros)' शब्द के 'मेघेंद्र' शब्द के निकट होने की संभावना कितनी है. 'मेघेंद्र' शब्द बुद्ध के लिए प्रयोग हुआ है. इस संदर्भ से ऊपर आए सभी अर्थ बुद्ध से स्वतः संबद्ध हो जाते हैं.

जहाँ तक ''मेघेंद्र'' शब्द की प्रयुक्ति का प्रश्न है यह शब्द 14वीं शताब्दि में लामा तारानाथ विरचित 'भारत में बौध्द धर्म का इतिहास' (हिंदी अनुवाद) के पृष्ठ 1 पर आया है और ताराराम जी की पुस्तक 'मेघवंश - इतिहास और संस्कृति, पृष्ठ-142' पर भी है. दोनों के संदर्भित पृष्ठों की फोटो नीचे दी गई हैं.


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MEGHnet
 


11 August 2015

Megh Caste - मेघ जाति

इस साइट पर अधिकतर मेघवंश के इतिहासिक और कहीं-कहीं उससे जुड़ी पौराणिक कहानियों की बात की गई है. मेघवंश मूलतः एक रेस (Race) है जिसमें से बहुत-सी जातियाँ निकली हैं जो भारत के लगभग सभी प्रदेशों में बसी हैं. उनके कई नाम ऐसे हैं जिन्हें भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में रहने वाले और ख़ुद को मेघ कहने वाले लोग स्वीकार ही नहीं कर पाते. इसकी वजह यह मालूम पड़ती है कि इस बारे में कोई जानकारी उन्हें तत्काल नहीं मिल पाती. लेकिन मेघवंश तो अन्य देशों में भी विद्यमान है.  गूगल करने पर कुछ न कुछ जानकारी मिल जाती है. वैसे 'मेघ' शब्द का एक अर्थ 'कबीला (Tribe)' भी है.

भारत में बसे कई 'वंशों' का 'जातियों' में बँटवारा ब्राह्मणीकल व्यवस्था की देन है. मेघवंश का एक टुकड़ा यानि 'मेघ जाति' उसी व्यवस्था से बनी है जो अधिकतर जम्मू और पंजाब में बसी है. हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल और यूपी में भी इस जाति के लोग बसे हैं.

पंजाब और जम्मू-कश्मीर में बसी 'मेघ जाति' पर पहली विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी मुझे डॉ. ध्यान सिंह के शोध ग्रंथ के रूप में उपलब्ध हुई जिसे आप इन लिंक्स पर क्लिक करके या गूगल सर्च में Kabirpanthis's of Punjab या Dr. Dhian Singh - History of Meghs/Bhagats टाइप करके ढूँढ सकते हैं. श्री एम.आर. भगत की लिखी पुस्तक मेघमाला Meghmala दूसरी पुस्तक है. इसे हम मेघ जाति का इतिहास चाहे न कह पाएँ लेकिन इसमें मेघ जाति के बारे में काफी जानकारी मिल जाती है. जम्मू के एक अन्य सज्जन ने मेघों की स्थिति पर एक आलेख की रचना ''इस्तगासा--राष्ट्रपति'' के नाम से की थी. लेकिन इसे देखने का सौभाग्य मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ.

श्री आर.एल. गोत्रा के लिखे लंबे आलेख Meghs of India में मेघवंश के प्राचीन इतिहास के साथ-साथ पंजाब-जम्मू-कश्मीर की मेघ जाति का कुछ आधुनिक इतिहास आपको मिल जाएगा.



अन्य संबंधित जानकारियों के लिंक:-

मेघ और आर्यसमाज
मेघ और अछूतपन से मुक्ति आंदोलन

सर एलेग्ज़ांडर कन्निंघम और मेघ

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति - पुस्तक-सार





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06 August 2015

Simon Commission - साइमन कमिशन

Dr. Ambedkar with the members of Simon Commission. Sir.Simon is seen on the right of Dr. Ambedkar.
हमें स्कूलों में पढ़ाया जाता था कि साइमन कमिशन का विरोध इस लिए किया गया था कि इस कमिशन के सदस्यों में कोई भारतीय नहीं था. लेकिन यह उससे भी बड़ा सच है कि भारत के पिछड़ों और अछूतों को अंग्रेज़ों के प्रस्तावित संविधान के तहत उचित प्रतिनिधित्व देना उस कमिशन के विचाराधीन था. इसी लिए साइमन कमिशन के साथ-साथ डॉ. अंबेडकर के खिलाफ भी नारे लगे थे जिनकी बात कमिशन ने सुनी थी. हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में लाला लाजपत राय हीरो थे लेकिन अब नई तस्वीरें सामने आ रही हैं. लाजपत राय का नायकत्व पतला पड़ता दिखता है.
 
अंबेडकर पर बनी फिल्म का एक अंश नीचे दिया है. इसमें आए ऐतिहासिक तथ्यों को अभी तक किसी ने चुनौती नहीं दी है.

Link - Simon Commission

नीचे दी गई यह पोस्ट फेसबुक पर मिली है. इसके सारे नेरेशन की मैं पुष्टि नहीं करता लेकिन इसमें पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाए जा रहे अधूरे सच की बात ध्यान खींचती है. -भूषण

(क्या था *साईमन कमीशन*?
जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर विदेश से पढकर भारत में बडौदा नरेश के यहां नौकरी करने लगे तो उनके साथ बहुत ज्यादा जातिगत भेदभाव हुआ। इस कारण उन्हें 11 वें दिन ही नौकरी छोड़कर बडौदा से वापस बम्बई जाना पड़ा। उन्होंने अपने समाज को अधिकार दिलाने की बात ठान ली।
उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर depressed class की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार देने की माँग की।
बाबा साहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढकर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है। बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक् रह गई और 1927 में depressed class की स्थिति के अध्ययन के लिए मिस्टर साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया।
जब कांग्रेस व महत्मा गांधी को कमीशन के भारत आगमन की सूचना मिली तो उन्हें लगा कि यदि यह कमीशन भारत आकर depressed class की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर लेगा तो उसकी रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजी हुकूमत इस वर्ग के लोगों को अधिकार दे देगी। कांग्रेस व महत्मा गांधी ऐसा होने नहीं देने चाहते थे।
अतः 1927 में जब साईमन कमीशन अविभाजित भारत के लाहौर पहुंचा तो पूरे भारत में कांग्रेस की अगुवाई में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हुआ और लाहौर में मिस्टर साईमन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए गए। बाबा साहेब स्वयं मिस्टर साईमन से मिलने लाहौर पहुंचे और उन्हें 400 पन्नों का प्रतिवेदन देकर depressed class की स्थिति से अवगत कराया। कांग्रेस ने मिस्टर साईमन की आँखों में धूल झोंकने के लिए उनके सामने ब्राह्मणों को depressed class के लोगों के साथ बैठ कर भोजन करवाया (बाद में ब्राह्मण अपने घर जाकर गोमूत्र पीकर उससे नहाये)। यह सब पाखण्ड देखकर बाबा साहेब मिस्टर साईमन को गांव के एक तालाब पर ले गये। उनके साथ एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता अपने स्वभाव के मुताबिक सबके सामने उस तालाब में डुबकी लगाकर नहा कर बाहर आया। तब बाबा साहेब ने एक depressed class के व्यक्ति को तालाब का पानी पीने के लिए कहा। उस व्यक्ति ने घबराते हुए जैसे ही पानी पिया तो आसपास के ब्राह्मणों ने हमला बोल दिया। *आखिरकार बाबा साहेब सहित अन्य व्यक्तियों को पास की एक मुस्लिम बस्ती में शरण लेकर अपना बचाव करना पड़ा।*
मिस्टर साईमन को सब कुछ समझ में आ गया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को वस्तु स्थिति रिपोर्ट सौंप दी। बाबा साहेब भी बार-बार पत्राचार करते रहे और उन्होंने लंदन जाकर अंग्रेजी हुकूमत के वरिष्ठ अधिकारियों व राजनेताओं को बार-बार भारत की depressed class को अधिकार देने की मांग की।
बाबा साहेब के तर्कों को अंग्रेजी हुकूमत नकार नहीं सकी और उसने भारत की depressed class को अधिकार देने के लिए 1930 में communal award (संप्रदायिक पंचाट) पारित किया।
*हमें विद्यालय में यह पढाया गया था कि कांग्रेस ने साईमन कमीशन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए। परंतु उसने वास्तव में ऐसा क्यों किया, यह नहीं पढाया गया।*
*जागते रहो! जगाते रहो!!*) - फेसबुक से प्रीतम सिंह के साभार