21 September 2015

A gist of history of Meghs - मेघों के इतिहास का सार


मेघ वंश की जातियों के लोग आपस में पूछते रहे हैं कि भाई, हमारा इतिहास क्या है? उत्तर मिलता है कि - पता नहीं.

कुछ पुराने ऐतिहासिक सवाल हैं -
मेघों का इतिहास है तो उन्हें कहीं युद्ध भी लड़ना पड़ा होगा. इसके पर्याप्त सबूत हैं कि मेघ और मेघ-भगत योद्धा रहे हैं हालाँकि उनके अधिकतर इतिहास का लोप कर दिया गया है. नवल वियोगी जैसे इतिहासकारों ने नए तथ्यों के साथ इतिहास को फिर से लिखा है और बताया है कि इस देश के प्राचीन शासक नागवंशी थे. मेघ ऋषि को वेदों में 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया है.

''मेघ वंश'' एक मानव समूह है जिसके बारे में माना जाता है कि यह उस कोलारियन ग्रुप से संबंधित है जो मध्य एशिया से ईरान के रास्ते इस क्षेत्र में आया था. इसका रंग गेहुँआ (wheetish) है.

कुछ विद्वानों का मानना है कि मेघ या मेघ उपाधि वाले राजा उस काल में सत्ता में रहे जिसे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) कहा जाता था. लेकिन के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री (जिन्होंने मेघ राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया) और आर.बी. लाथम ऐसे इतिहासकार हैं जिनकी खोज ने उस समय का इतिहास खोजा. आज इतिहास में कोई 'अंधकार काल' नहीं है.

ऐसी कई ऐतिहासिक कड़िया मिलती है जो बताती हैं कि मेघ (रेस) ने मेडिटेरेनियन साम्राज्य की स्थापना की थी जो सतलुज और झेलम तक फैला था. पर्शियन राज्य की स्थापना के बाद वो समाप्त हो गया. उसके बाद मेदियन साम्राज्य के लोग कई क्षेत्रों में बिखरे.

आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग 'मेघ ऋषि' जिसे 'वृत्र' भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे. उसका उल्लेख ऋग्वेद में आता है. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका आधिपत्य (Suzerainty) था. सप्तसिंधु का अर्थ है सात दरिया यानि सिंध, सतलुज, ब्यास, रावि, चिनाब, झेलम और यमुना. आर्य ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व आए और मेदियन साम्राज्य ईसा से 600 वर्ष पूर्व अस्तित्व में था. इस दौरान आर्य बड़ी संख्या में आए और इस क्षेत्र में मेघ आदि शासक कबीलों के साथ लगभग 500 वर्ष चले लंबे संघर्ष या युद्धों के बाद आर्य जीत गए. यह संघर्ष मुख्यतः दरियाओं के पानी और उपजाऊ ज़मीन के लिए था.

आर.एल. गोत्रा जी ने अपने आलेख Meghs of India में लिखा है कि 'वैदिक साहित्य के अनुसार मेघ या वृत्र से जुड़े लगभग 8 लाख लोगों की हत्या की गई थी'. धीरे-धीरे आर्य अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगे रहे. यह प्रक्रिया बुद्ध के बाद पुष्यमित्र शुंग के द्वारा बहुत से बौधों की हत्या तक चली जिसमें बौधधर्म के मेघ वंश के प्रचारक शामिल थे. कालांतर में आर्यों की ब्राह्मणीकल व्यवस्था स्थापित हुई, मनुस्मृति जैसा धार्मिक-राजनीतिक संविधान पुष्यमित्र ने स्मृति भार्गव से लिखवाया. जात-पात निर्धारित हुई और मेघ वंश का बुरा समय शुरू हुआ.

मेघों का प्राचीन इतिहास भारत में कम और पुराने पड़ोसी देशों के इतिहास में अधिक है.
आगे चल कर आर्य ब्राह्मणों की बनाई हुई जाति व्यवस्था में शामिल होने से मेघ वंश से कई जातियाँ बनीं. पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मेघ-भगत उनमें से एक जाति है. तथापि मेघ वंश से राजस्थान के मेघवाल भी निकले हैं और गुजरात के मेघवार भी. कई अन्य जातियाँ भी मेघवंश से निकली हैं जिनकी सटीक पहचान हम नहीं कर पाते. लेकिन पहचानने की कोशिशें तेज़ हुई हैं.
जाति और गोत्र व्यवस्था
गोत्र में किसी जाति या उपजाति का कुछ न कुछ इतिहास छिपा रहता है. गोत्र उनके सामाजिक स्तर की कहानी तक कहता है. गोत्र बता देता है कि कौन किस जाति का है और जाति ख़ुद बता देती है कि जाति व्यवस्था में वो ऊपर या नीचे कहाँ पर है. गोत्र परंपरा की खासियत है कि गोत्र किन्हीं कारणों से बदलते रहते हैं और उनकी संख्या में बढ़ने की प्रवृत्ति देखी गई है.

लोगों को जन्म-मरण, विवाह के संस्कारों के समय होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में अपना गोत्र छिपाते हुए आपने देखा होगा. वे केवल ऋषि गोत्र से काम चलाते देखे गए हैं. वे जानते हैं कि गोत्र बता कर वे अपनी जाति और अपने सामाजिक स्तर की घोषणा ख़ुद कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा नहीं लगता. गोत्र की परंपरा का बोलबाला देख कर मेघों ने भी ख़ुद को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस गोत्र व्यवस्था को अपनाया था ऐसा मेघवंश इतिहास और संस्कृति के लेखक ताराराम जी ने बताया है. गोत्र ब्राह्मणिकल परंपरा है.

आमतौर पर ब्राह्मणिकल परंपरा में गोत्र को रक्त-परंपरा (अपना ख़ून) और वंश, किन्हीं मायनों में वर्ण भी, के तौर पर लिया जाता है. इसलिए ब्राह्मण हमेशा ब्राह्मण ही रहेगा. मेघवंशी मेघवंशी ही रहेगा. वह आर्य या ब्राह्मण नहीं बन सकता. एक अन्य परंपरा के अनुसार मेघों की पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती थी. इसलिए सारे भारत में मेघ वाशिष्ठी, वशिष्टा या वासिका नाम से जाने गए. फिर कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया.

आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष, वंशकर्ता के रूप में किसी मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैं. यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ता) है. इसे सभी मेघ वंशी मानते हैं.

मेघों का धर्म
क्या मेघों का अपना कोई पुराना धर्म है? इतिहास धर्म का भी रिकार्ड देखता है. आज के मेघ समुदायों में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर है. जम्मू के एक उत्साही युवा सतीश विद्रोही ने सोशल मीडिया में इस विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी जहाँ बहुत-सी बातें उभर कर आईं. वह मंच किसी निर्णय पर पहुँचाने वाला नहीं था. धर्म नितांत व्यक्तिगत चीज़ है.

राजस्थान के बहुत से मेघ वंशी अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव (ध्यान रहे कि राम शब्द की परंपरा बौध परंपरा से आती है) में आस्था रखते हैं. गुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषि और ममई देव के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके अपने मंदिर हैं, पाकिस्तान में भी हैं. प्रसंगवश 'मातंग' शब्द का अर्थ 'मेघ' ही है. मेघवार अपने सांस्कृतिक त्योहारों में सात मेघों की पूजा करते हैं. संभव है वे सात मेघ पूर्ववर्ती राजा रहे हों. ममैदेव महेश्वरी मेघवारों के पूज्य हैं जो मातंग देव या मातंग ऋषि के वंशज हैं. ममैदेव का मक़बरा जिस कब्रगाह में है उसे यूनेस्को ने विश्वधरोहर (World Heritage) के रूप में मान्यता दी है. इस प्रकार एक मेघ वंशी का निर्वाण स्थल विश्वधरोहर में है.

स्वतंत्र भारत में मेघ कई अन्य धर्मों/पंथों में गए जैसे राधास्वामी, निरंकारी, ब्राह्मणीकल सनातन धर्म, सिखिज़्म, आर्यसमाज, ईसाईयत, विभिन्न गुरुओं की गद्दियाँ, डेरे आदि. सच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानता' का बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर गए. लेकिन उनका सामाजिक स्तर नहीं बदला. धार्मिक दृष्टि से उनकी अलग और सशक्त पहचान नहीं बन पाई. मेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.

पंजाब की मेघ जाति जिससे से मैं संबंधित हूँ उसके बारे में यह उल्लेख ज़रूरी है कि बीसवीं शताब्दी के शुरू में आर्यसमाज के शुद्धिकरण आंदोलन के दौरान उनका शुद्धिकरण होने के बाद मेघों का आत्मविश्वास जागा, उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा बढ़ी और स्थानीय राजनीति में सक्रियता की उनकी इच्छा को बल मिला. वे म्युनिसपैलिटी जैसी संस्थाओं में अपनी नुमाइंदगी की माँग करने लगे. शुरुआती तौर पर आर्यसमाजी इससे परेशान हुए. कितने मेघों का शुद्धिकरण हुआ इसे लेकर विवाद है.

जम्मू-पंजाब के मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकी है. ईसाइयत और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी है. बड़े पैमाने पर कोई धर्मांतरण नहीं हुआ है. जालंधर और अमृतसर के आसपास के मेघों की बड़ी जनसंख्या राधास्वामी मत की ओर गई है. आगे चल कर यह मेघों के धार्मिक इतिहास में दर्ज हो सकता है. मेघों में संशयवादी (skepticism) विचारधारा के लोग भी हैं जो ईश्वर-भगवान, मंदिर, धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रतीकों आदि पर सवाल उठाते हैं और उनकी आवश्यकता महसूस नहीं करते. मेघों की देरियाँ (छोटे-छोटे स्मारक स्ट्रक्चर) भी उनके पूजास्थल हैं जो अधिकतर जम्मू में और दो-चार पंजाब में हैं. लेकिन यहाँ नियमित रूप से किसी प्रकार का सामूहिक कार्यक्रम नहीं होता. वर्ष में दो बार वहाँ मेल (gathering) होता है. सामूहिक कार्यक्रम नियमित रूप से अधिक होने लगें तो मेघों के गोत्रों (खापों) की मज़बूत पहचान बन सकती है.

इधर ''मेघऋषि'' का मिथ धर्म और पूजा पद्धति में प्रवेश पाने के लिए निकल पड़े हैं. मेघऋषि की कोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं है लेकिन कल्पना की जाती है कि कोई जटाधारी, भगवा कपड़े पहने ऋषि रहा होगा जो जंगल में तपस्या करता था. इसी पौराणिक इमेज के आधार पर गढ़ा, जालंधर में एक मेघ सज्जन सुदागर मल कोमल ने अपने देवी के मंदिर में मेघऋषि की मूर्ति स्थापित की है. राजस्थान में गोपाल डेनवाल ने मेघ भगवान और मेघ ऋषि के मंदिर बनाने का कार्य शुरू किया है. इसके लिए उन्होंने मुअन जो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 ई.पू. की एक प्रतिमा (जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियम, कराची में रखी है) की इमेज या छवि का प्रयोग किया है. मेघ भगवान की आरतियाँ, चालीसा, स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई और बाँटी गई हैं.

कमज़ोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति की वजह से राजनीति के क्षेत्र में मेघों की सुनवाई लगभग नहीं के बराबर है और सत्ता में भागीदारी दूर की बात है. एक सकारात्मक बात यह है कि पढ़े-लिखे मेघों ने बड़ी तेज़ी से अपना पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता कई अन्य कार्यों/क्षेत्रों में दिखाई और उसमें सफल हुए. व्यापार के क्षेत्र में इनकी बढ़िया पहचान बने इसकी प्रतीक्षा है.

मेघों के इतिहास के ये कुछ पृष्ठ ख़ाली पड़े हैं.
1. अलैक्ज़ेंडर कन्निंघम ने अपनी खोज में मेघों की भौगोलिक स्थिति को सिकंदर के रास्ते (चनाब और झेलम का इलाक़ा) में बताया है. हालाँकि राजा पोरस पर कई जातियाँ अपना अधिकार जताती हैं. तथापि यह देखने की बात है कि उस समय पोरस की सेना में शामिल योद्धा जातियाँ कौन-कौन थीं. भूलना नहीं चाहिए कि उस क्षेत्र में मेघ बहुत अधिक संख्या में थे जो क्षत्रिय योद्धा थे. कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि पोरस ने सिकंदर को हराया था.

2. केरन वाले भगता साध की अगुआई में कई हज़ार मेघों ने मांसाहार छोड़ा. यह एक तरह का एकतरफा करार था. इस करार की शर्तों और पृष्ठभूमि को देखने की ज़रूरत है.

3. कुछ मेघों ने विश्वयुद्धों में, पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हिस्सा लिया है. वे दुश्मन की सामाओं में घुस कर लड़े हैं. उनकी उपलब्धियों के बारे में जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.

4. दीनानगर की अनीता भगत ने बताया था कि एक मेघ भगत मास्टर नरपत सिंह, गाँव बफड़ीं, तहसील और ज़िला हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश), (जीवन काल - सन् 1914 से 1992 तक) स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा पा चुके हैं. अनीता ने उनके बारे में जानकारी और फोटोग्राफ इकट्ठे करके भेजे हैं. उस वीर को 1972 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंट किया था. गाँव की पंचायत ने उनके सम्मान में स्मृति-द्वार बनवाया है. एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसके शरीर पर गोलियों के छह निशान थे. ऐसे लोग शायद और भी मिलें. देखिए. ढूँढिए.

5. मेघवंश के लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रिकार्ड तैयार करने की भी ज़रूरत है. एडवोकेट हंसराज भगत, रिहैब्लिटेशन ऑफिसर भगत दौलत राम (जम्मू वाले) जी के बारे में कुछ जानकारी मिली है. वास्तव में यह सूची बहुत लंबी है लेकिन उसे रिकार्ड करने की ज़रूरत है.

6. ऐसे ही मेघ समाज के राजनेताओं और समाज के प्रति उनके योगदान की जानकारी अभी इकट्ठी नहीं हो पाई है.

जो अब तक कहा गया है उसे आप मेघों के इतिहास की हेडलाइन्स समझ कर संतोष करें.

कई उतार-चढ़ाव देख चुकी मेघ जाति एक मज़बूत और प्रकाशित हृदय जाति है. अन्य जातियों के साथ मिल कर वे देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं देते रहे हैं. आने वाले समय में इनकी भूमिका बहुत एक्टिव होगी और स्पेस भी अधिक होगा. आप भी अपने आज को सँवारिए और वो भविष्य बनाइए जो आपका है.

जय मेघ, जय भारत.

भारत भूषण भगत
चंडीगढ़.
(दिनांक 27-09-2019 को संशोधित)