21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि मेघ जाति मेघ ऋषि से निकली है. आगे चल कर जानकारी मिली कि भारत भर के मेघ वंश के लोग अपने वंशकर्ता या प्रथम मेघ का नाम मेघ ऋषि बताते हैं. लगता है कि इसका आधार पौराणिक कथा-कहानियाँ हैं और वास्तविकता से इसका लेना-देना नहीं है.

श्री आर.एल. गोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु के पुरोहित नरेश जैसा पाया है. यह एक अध्ययन इस नज़रिए से महत्वपूर्ण है कि इसमें एक वैदिक-पौराणिक पात्र की छवि को इतिहास से जुड़ता देखा गया है. पुराण जिस स्टाइल में लिखे गए हैं उसे इतिहास मान लेना समस्याएँ पैदा करता है. इस आदत से बचना ही होगा. दूसरी ओर यह प्रमाणित हो चुका है कि सिंधुघाटी सभ्यता, जिसके सांकेतिक अर्थों में गोत्रा जी ने मेघ ऋषि को इतिहास से जुड़ता पाया है वो वास्तव में बौध सभ्यता थी. यह भूलना नहीं चाहिए को श्री गोत्रा वेद में उल्लिखित मेघ, मेद जैसे शब्दों और उनकी पौराणिक परंपरा में प्रयुक्त प्रतीकात्मक बिंबों के ज़रिए इतिहास में मेघ शब्द की व्याख्या का अध्ययन कर रहे थे जिसके कई सांकेतिक अर्थ निकल सकते थे - कुछ मनरंजक, कथात्मक और कुछ ऐतिहासिक. इधर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने माना है कि सिंधुघाटी के पुरोहित नरेश की जो मूर्ति मिली है वो बुद्ध की है.

किसी ने देखा तो नहीं लेकिन मैं और मेरा बाल-मन मेघ ऋषि की कल्पना कॉमिक्स में देखे चित्रों के आधार पर करता था. जो पढ़ा वो पौराणिक कथाओं से था जिनमें आर्यों के प्रतिनिधि लड़ाके इंद्र के साथ हुए युद्ध में मेघ ऋषि भयानक शस्त्रों (कृपया शब्द जाल में फँसें) का प्रयोग करते दिखते हैं. मेघ ऋषि को शिक्षित विद्वान होने के कारण ब्राह्मण भी कहा गया और योद्धा होने के कारण क्षत्रिय भी बताया गया. कोई इतने बड़े पैमाने पर युद्ध करता है तो वो क्षत्रिय रहा ही होगा. ब्राह्मणों के साहित्य में उसे 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया ऐसी परंपरा दुनिया भर में रही है. इसे मूलनिवासी और आर्यों के युद्ध का संदर्भ कहा जा सकता है जिसे शब्दों के साथ फुलाया गया है और उसकी बड़ी छवि तैयार की गई है. कुछ ऋषियों को गोरा और कुछ को साँवला चित्रित किया गया है. यह भी किसी के वंश (मूलनिवासी या आर्य) को दर्शाने का तरीका है.

मेघ ऋषि से संबंधित कोई पूजा पद्धति सामान्यतः देखने को नहीं मिलती थी लेकिन गुजरात के मेघवारों की धार्मिक पूजा-पद्धतियों में 'मेघ-रिख' या 'मेघ ऋषि' है. वहाँ सात मेघों (संभवतः मेघ वंश के राजाओं) की पूजा की जाती है. राजस्थान और पंजाब में कुछ लोगों का ध्यान इस ओर गया है. लेकिन मिथ पर आधारित आस्था का रास्ता इतना आसान नहीं जैसा कि 'मेघ रिख' पर शोध करने वाले डॉ. मोहन देवराज थोंट्या ने कहा है.

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into the mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the mediaeval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned."

जयपुर के श्री गोपाल डेनवाल और पंजाब में श्री सुदागरमल 'कोमल' ने अपने-अपने तरीके से मेघ ऋषि को एक रूप-रंग दिया है. डेनवाल जी ने मोहंजो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश की 2500 (कुछ इसे 1700 मानते हैं) वर्ष ईसा पूर्व की एक मूर्ति की छवि का प्रयोग मेघ ऋषि के लिए किया है और जालंधर के सुदागरमल कोमल ने ऋषि की परंपरागत भगवाधारी छवि को अपनाया है.

नीचे दिया गया वीडियो आप देख सकते हैं. (इस वीडियो का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन नहीं है.)