29 December 2015

A poem from Pablo Neruda - पाब्लो नेरूदा की एक कविता

मर जाता है वह धीरे धीरे - पाब्लो नेरूदा

मर जाता है वह धीरे धीरे
करता नहीं जो कोई यात्रा
पढ़ता नहीं जो कुछ भी
सुनता नहीं जो संगीत
हँस नहीं सकता जो खुद पर।

मर जाता है वह धीरे धीरे
नष्ट कर देता है जो खुद अपना प्यार
छोड़ देता है जो मदद करना।

मर जाता है वह धीरे धीरे
बन जाता है जो आदतों का दास
चलते हुए रोज एक ही लीक पर
बदलता नहीं जो अपनी दिनचर्या
नहीं उठाता जोखिम जो पहनने का नया रंग
नहीं करता जो बात अजनबियों से।

मर जाता है वह धीरे धीरे
करता है जो नफरत जुनून से
और उसके चक्रवाती जज्बातों से
उनसे जो लौटाते हैं चमक आँखों में
और बचाते हैं अभागे हृदय को।

मर जाता है वह धीरे धीरे
बदलता नहीं जो जीवन का रास्ता
असंतुष्ट होने पर भी अपने काम से या प्रेम से
उठाता नहीं जो जोखिम अनिश्चित के लिए निश्चित का
भागता नहीं जो ख्वाबों के पीछे
नहीं है अनुमति जिसे भागने की
लौकिक मंत्रणा से जिंदगी में कम से कम एक बार।

जियो आज जीवन! रचो आज!
उठाओ आज जोखिम
मत दो मरने खुद को आज धीरे धीरे
मत भूलो खुश रहना !!

अनुवाद - प्रतिभा उपाध्याय

21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि मेघ-भगत समुदाय मेघ ऋषि का अंश-वंश है. आगे चल कर पता चला कि भारत भर के मेघवंशी अपने वंशकर्ता या प्रथम मेघ का नाम मेघ ऋषि बताते हैं.

श्री आर.एल. गोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु का पुरोहित नरेश पाया है. यह एक महत्वपूर्ण अध्ययन है जो एक पौराणिक पात्र को इतिहास तक लाता है. मुमकिन है ऐसे अध्ययन और भी हों.

किसी ने देखा तो नहीं लेकिन मैं भी मेघ ऋषि की कल्पना कॉमिक्स में देखे चित्रों के आधार पर करता था. जो पढ़ा वह पौराणिक कथाओं से था कि आर्यों के प्रतिनिधि लड़ाके इंद्र के साथ हुए युद्ध में मेघ ऋषि भयानक शस्त्रों (कृपया शब्द जाल में फँसें) का प्रयोग करते दिखते हैं. मेघ ऋषि को शिक्षित विद्वान होने के कारण ब्राह्मण भी कहा गया और योद्धा होने के कारण क्षत्रिय भी बताया गया. ब्राह्मणों के साहित्य में उसे 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया जैसा कि किसी भी विरोधी को कहने की भारत में परंपरा रही है. इसे मूलनिवासी और आर्यों के युद्ध का संदर्भ कहा जा सकता है जिसे शब्दों के साथ फुला कर बहुत बड़ा किया गया है. कुछ ऋषियों को गोरा और कुछ को साँवला चित्रित किया गया है. यह भी किसी के वंश (मूलनिवासी या आर्य) को दर्शाने का तरीका है.

मेघ ऋषि से संबंधित कोई पूजा पद्धति सामान्यतः देखने को नहीं मिलती थी अलबत्ता गुजरात के मेघवारों की धार्मिक पूजा-पद्धतियों में 'मेघ-रिख' या 'मेघ ऋषि' है. वहाँ सात मेघों (संभवतः मेघवंशी राजाओं) की पूजा की जाती है. राजस्थान और पंजाब में कुछ लोगों का ध्यान इस ओर गया है. लेकिन मिथ पर आधारित आस्था का रास्ता इतना आसान नहीं जैसा कि 'मेघ रिख' पर शोध करने वाले डॉ. मोहन देवराज थोंट्या ने कहा है.

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the mediaeval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned."

लेकिन राजस्थान के श्री गोपाल डेनवाल और पंजाब में श्री सुदागरमल 'कोमल' ने मेघ ऋषि को एक रूप-रंग दे कर एक शुरुआत की है.

जयपुर में हुए इस कार्य का थोड़ा विवरण देना ठीक रहेगा. मोहंजो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश की 2500 (कुछ इसे 1700 मानते हैं) ईसा पूर्व की एक प्रतिमा है उसका इमेज प्रयोग किया है.

शेष आप नीचे दिए वीडियो में देख सकते हैं कि मैंने मेघ ऋषि को कैसा समझा है.

(इस वीडियो का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन नहीं है.)





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