10 April 2016

It will pain if the blood is same – जब ख़ून एक है, दर्द तो होगा

ख़बरों से गुम अन्य समुदायों के मुकाबले मेघवाल समाज और मेघवंश से संबंधित अन्य जातियां अपनी कुछ--कुछ पहचान वाली बन गई हैं लेकिन इनकी ''अनेकता में एकता'' वाली पहचान अभी नहीं बनी है.

गांव और शहरों में यदि इनके ख़िलाफ़ कुछ घटित होता है तो उसकी प्रतिक्रिया लगभग नहीं ही होती. ऐसा क्यों है या ऐसा क्यों नहीं है इसके कारणों की व्याख्या मेघवंशी समुदायों के लोग अपने भीतर करते रहते हैं लेकिन खुल कर कभी बाहर नहीं आते. सामूहिक निर्णय लेने का वातावरण ये अभी तक नहीं बना नहीं पाए हैं. अशिक्षा के सन्नाटे को भेदने की हालत में आ रहा यह समाज थोडा और समय माँग रहा है हालांकि समय हाथ से निकलने वाली चीज है.

राजस्थान की बात हैहाँ हाल ही में एक के बाद एक ऐसी घटनाएँटीं जिनमें मेघवाल समाज पर हिंसात्मक हमले हुए जिनके पीछे जातिगत घृणा और जातिगत गरीबी देखी जा सकती है. ये 'डांगावास', 'घेनरी', 'डेल्टा मेघवाल' के नाम से सोशल मीडिया में छाए रहे. एक अव्यस्क छात्रा डेल्टा मेघवाल के बलात्कार, हत्या और उसके शव के साथ हुए अमानवीय व्यवहार का मामला इस दृष्टि से सब से अधिक आंदोलित करने वाला था. डेल्टा की हत्या की पृष्ठभूमि में उस शैक्षणिक संस्था का नाम भी आया जहाँ वह पढ़ रही थी. इससे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या (Institutional murder) का मामला भी जुड़ गया.

इन मामलों को मीडिया ने तभी उठाया जब ये सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके थे. मनुवादी मीडिया की कमीनगी साफ झलक रही थी. उधर डेल्टा मेघवाल का मामला मेघवाल समाज की सीमाओं को तोड़कर बहुत आगे निकल गया जिसे मूलनिवासियों के विभिन्न संगठनों की दीवारों पर पढ़ा जा सकता है. इसे सोशल मीडिया की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जाएगा जिसकी बदौलत ऐसे प्रशासन को हरकत में आना पड़ा जो इस मेघ समाज की उपेक्षा करते हुए बैठा है.

आंदोलन अभी चल रहा है. सभाएं हो रही हैं. अब नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि चल रहा आंदोलन समाज के 'एकता आंदोलन' में कब परिवर्तित होता है जिससे समाज के सदस्यों में सुरक्षा की भावना मज़बूत हो सके.

इस बात को रेखांकित करना ज़रूरी है कि हमेशा की तरह इस समाज के नेताओं की आवाजें इन मामलों में सुनने को नहीं मिलीं. वैसे भी इन नेताओं को अपने समाज की आवाज़ उठाने के लिए माइक पकड़ने की अनुमति राजनीतिक पार्टियां नहीं देतीं. इनके लिए मशहूर हो चुका है कि ये केवल तभी मुँह खोलते हैं जब पार्टी इनके हाथ में कोई टुच्ची-सी स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए पकड़ा देती है या जब इन्हें जम्हाई लेनी होती है.

दूसरी ओर राजस्थान से उठी एक आवाज पर ध्यान जा रहा है जो भँवर मेघवंशी की है. सोशल मीडिया से होती हुई यहवाज़ जनसभाओं तक पहुँची है. इस आवाज़ में मजबूती और राजनीतिक परिपक्वता की बहुत संभावनाएँ दिख रही हैं. मेघ समाज को ऐसी और इसके जैसी बहुत-सी आवाजों की आवश्यकता पड़ेगी.

("मूल निवासियों में फूट डालना यह यूरेशियनों की नीति है, जिसमें भारत का मूलनिवासी अपने हक-अधिकार से वंचित रहे। एक-एक वर्ग को पकड़कर अलग-अलग पीटना यह यूरेशियनों की चाल है। इस चाल को हमें समझना होगा तथा अपने लोगों को समझाना होगा।" -वामन मेश्राम)