10 May 2016

Ambedkar, Megh Bhagats and 'Woh' - अंबेडकर, मेघ भगत और 'वो'

ताराराम जी ने एक और ‘मेघ भगत’ को खोज निकाला जो दिल्ली में रहते थे और दिल्ली में मेट्रोपॉलिटन कॉउंसिल के मेंबर (MLA) थे. उनका नाम भगत अमींचंद था. वे अंबेडकर का विरोध करने वाले आर्यसमाजियों में से थे. अभी तक मिली जानकारी के अनुसार कम से कम दो मेघ भगत - श्री हंसराज भगत और श्री संतराम बी.. ऐसे लोगों में थे जिन्होंने डॉक्टर अंबेडकर के साथ या उनकी लाइन पर का किया और उनके कार्य की अहमियत जानते-समझते थे. इधर मेघ भगत समाज के बहुत कम लोगों ने उस समय डॉक्टर अंबेडकर को सही रूप में समझा क्योंकि इस समुदाय में आमतौर पर यह भरम फैला था कि 'डॉ. अंबेडकर चमार जाति से हैं' यानि अंबेडकर को स्वीकार करने में रुकावट खड़ी कर दी गई थी. इस बीच चमार समुदाय आज राजनीतिक और सामाजिक रूप से मेघों के मुकाबले मज़बूत दिखता है.

अब इस बात को भारत भर के लोग जानते हैं कि डॉक्टर अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ महिला समाज की आज़ादी के लिए बहुमूल्य कार्य किया. इतना ही नहीं बल्कि वे उस आज़ादी के लिए संविधान में ज़रूरी बातें जोड़ भी गए ताकि उनकी आज़ादी सुरक्षित रहे. दूसरी तरफ वही डॉ. अंबेडकर हैं जिनके नाम को मेघ भगत समुदाय के मन में जगह बनाने में इतना समय लग गया. इस बीच अंबेडकर दुनिया के बड़े विद्वानों में शामिल कर लिए गए. लोग उन्हें 'विश्वरत्न' तक कहने लगे हैं.

शुरुआती तौर पर आर्य समाज ने मेघों की शिक्षा का इंतज़ाम किया जो तारीफ़ के लायक काम था लेकिन आगे चलकर उसी आर्यसमाज ने मेघ भगतों का इस्तेमाल अपने ब्राह्मणवादी कामों (agenda) के लिए किया. मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू कहा और हिंदू कह कर हिंदू जातियों में सबसे निचले पायदान पर रख दिया. इससे उनके सामाजिक स्तर में कोई बढ़ौतरी नहीं हुई. लेकिन पूना पैक्ट के तहत हुए समझौते के अनुसार अंग्रेज़ों द्वारा दिए जा रहे नुमाइंदगी (representation) के अधिकार की वजह से और आगे चल कर अंबेडकर के द्वारा भारतीय संविधान में किए गए नुमाइंदगी (आरक्षण) के प्रावधान के तहत जो हक़ मिले उनकी मदद से मेघ भगत रक्की कर पाए.  

हिंदुओं की जाति व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने वाले डॉक्टर अंबेडकर का रास्ता रोकना ब्राह्मणवादी आर्यसमाज का लक्ष्य था जिसका सबूत संतराम बीए द्वारा गठित ‘जातपात तोड़क मंडल’ के तत्वाधान में प्रस्तावित सेमिनार के रद्द होने के इतिहास में दर्ज है.

मेघ भगतों में पैठ बना चुके आर्यसमाज ने मेघ जाति में से बनाए अपने आर्यसमाजी पंडितों (पुरोहितों) का इस्तेमाल डॉक्टर अंबेडकर (जो ख़ुद मेघवंशी थे) के ख़िलाफ़ प्रचार करने के लिए किया. वे डॉक्टर अंबेडकर के काम और उसके असर से बौखलाए हुए थे. इस संदर्भ में डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ (अध्याय-3) में इस बात का विशेष उल्लेख किया है कि आर्यसमाज ने मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू दायरे में लाने का कार्य इसलिए किया था ताकि सियालकोट के इलाक़े में मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं की संख्या बढ़ी हुई दिखा कर अंग्रेजों से कुछ फ़ायदा उठा लिया जाए. यह हवाला कई मायनों में अहमियत रखता है. ख़ैर! कुछ मेघ पुरोहित जाने-अनजाने आर्यसमाज की उस योजना का हिस्सा बने और कुछ ने बेहतर जानकारी मिलने के बाद अपना रास्ता अलग भी किया. उन्होंने भारतीय समाज में आ रही व्यापक चेतना के साथ जुड़ने में अपनी भलाई समझी. नेता टाइप कुछ लोगों के लिए देरी हो चुकी थी. कुछ ने महसूस किया कि उन्होंने आर्यसमाज और मेघ समाज की दो-दो नावों में पाँव रखा हुआ था.


कहा जाता है कि भगत अमीचंद पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन वे भाषण बहुत अच्छा करते थे. चूँकि वे मेघ जाति से जुड़े थे इससे सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनकी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि कमज़ोर थी. लेकिन कांग्रेस और आर्यसमाज से जुड़े होने के कारण वे MLA बने. राजनीति में आने के बाद उन्हें आय के दूसरे ज़रिए मिल गए इसके संकेत मिलते हैं. आर्यसमाजियों द्वारा लिखे साहित्य में उसका विस्तृत उल्लेख संभावित है. श्री अमींचंद जी डॉ. अंबेडकर से निजी तौर पर मिले थे और उन्होंने डॉ. अंबेडकर का विरोध करने के लिए माफी माँगी थी, इसका उल्लेख सोहन लाल शास्त्री की पुस्तक 'बाबा साहब के संपर्क में 25 वर्ष' में मिलता है.

(विशेष नोट : श्री आर.एल. गोत्रा ने मैसेंजर के द्वारा यह जानकारी भी भेजी हैः- "Factors that might have influenced the behavior of Amin Chand:-
I had heard that Congressites who were also associated with Jaat-Paat Torhak Mandal had arranged his marriage with a Brahmin lady whose thinking (perhaps) might have had some impact over Amin Chand. He was jailed for some period for participating in the 'Bharart Chhorho Movement' launched by Gandhi in 1942.
For information.")
श्री अमीं चंद भगत सन 1952 के आम चुनावों में निर्विरोध दिल्ली सीट से चुने गए थे.
सुना है कि श्री अमीं चंद को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला था. (इसकी पुष्टि बाकी है).

(उक्त जानकारी के संयोजन में श्री ताराराम, श्री रतनलाल गोत्रा और भगत गोपी चंद जी के पुत्र (श्री मोहिंदर पॉल) और गोपीचंद जी के दामाद श्री रामचंद्र का योगदान है. इन सभी का हृदय से आभार)