19 November 2016

Kabir's Struggle - कबीर का संघर्ष

ताराराम जी ने जोधपुर से एक पुस्तक का लिंक भेजा है जो ई. मार्सडेन की एक पुस्तक 'भारतवर्ष का इतिहास' का है. यह पुस्तक 1919 में छपी थी. इस फोटो में दिया स्कैच कबीर की एक अलग छवि पेश करता है. इस पुस्तक में कबीर की आयु 40 वर्ष की बताई गई है. इसमें कोई कंठी, माला, मोरपंख, मुकुट आदि धार्मिक प्रतीक नहीं हैं. एकदम सादा शख़्सियत गढ़ी गई है. इस पुस्तक के अनुसार कबीर का जीवन 40 वर्ष रहा. 

सवाल तो उठता रहेगा कि कबीर की मौत कुदरती थी या ग़ैर-कुदरती. उसकी वजह भी है. कबीर ने यदि केवल ईश्वर, परमेश्वर, राम, अल्लाह का नाम लेकर जीवन बिताया होता तो लोगों के लिए उसके जीवन का आख़िर क्या महत्व हो सकता था? किसी को उसके उस भक्ति के काम से क्या चिढ़ या दुशमनी हो सकती थी? आम लोग आमतौर पर उसे याद रखते हैं जिसने उनके लिए कोई संघर्ष किया हो. वरना ईश्वर, अल्लाह करते-करते करोड़ों-अरबों लोग मर चुके हैं. इतिहास उनका नाम नहीं जानता. कबीर को क्यों याद किया जाता है? कबीर इतिहास की किताबों में क्यों दर्ज है? 

दरअस्ल यह समझने की ज़रूरत है कि कबीर ने ऐसा क्या किया या कहा जिसके लिए उसके समकालीन कुछ लोगों ने उका विरोध किया, आख़िर वे उसके विरोधी क्यों थे और कबीर इतिहासकारों की नज़रों में कैसे आ गया. इतिहासकारों के अनुसार कबीर प्रचार करता था कि इंसानियत पहले और धर्म बाद में आता है. यही बात थी जो धार्मिक या मज़हबी लोगों को रास नहीं आती थी. वो यह भी समझाताहा कि जात-पात और कुछ नहीं सिर्फ़ मेहनत करने वालों को अलग-थलग करने का औज़ार है और से तोड़ना ज़रूरी है. कबीर व्यक्ति की आज़ादी का हिमायती था और विवेक का पैमाना था. उका यह संघर्ष मामूली संघर्ष नहीं था. वो उन ख़तरों से खेल रहा था जो धार्मि और जातिवादी लोग उके लिए के पैदा कर रहे थे. 

भूलना नहीं चाहिए कि दादू दयाल, रविदास, मीरा बाई जैसे कई अन्य संतों की निर्मम हत्याएँ की गई थीं. कबीर के साथ क्या हुआ यह अभी भी खोज का विषय है
  
उक्त पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है. लिंक नीचे दिया है. पीडीएफ है इसलिए सारी पुस्तक खुलने में कुछ समय लगता है.
https://drive.google.com/open?id=0ByMLtxnRDG4mMmFQejltaTJmVUU