17 September 2017

Social boycott, A Social Evil - सामाजिक बहिष्कार, एक सामाजिक बुराई

कबीलाई संसार में सामाजिक बहिष्कार की सज़ा को सबसे बड़ी सज़ा माना जाता था. वैसे तो दुनिया के कुछ भागों में पत्थर मार-मार कर मार डालने या ऐसी ही अमानवीय सज़ाएं देने की प्रथा थी. लेकिन मानवाधिकारों को मान्यता मिलने के बाद से उन कबीलाई परंपराओं में काफ़ी सुधार आया है. हालाँकि सामाजिक बहिष्कार, हुक्का-पानी बंद करने जैसी प्रताड़ना देने का रिवाज़ खापों और शासकीय प्रणाली का हिस्सा कहलाने वाली पंचायतों में आज भी किसी न किसी रूप में खुले या चोरी-छिपे से जारी है. कई बार तो ये संस्थाएँ न्यायालयों का मज़ाक उड़ाती दिखती हैं. मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रियता आने की वजह से अब ऐसी सज़ाएँ देने वाली संस्थाएँ कुछ शर्माने लगी हैं.
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ऐसी अमानवीय रीतियों के ख़िलाफ़ धार्मिक और दक्षिणपंथी राजनीतिक संस्थाओं ने कभी आंदोलन किया हो याद नहीं पड़ता. इन्हें परंपरा को ढोने वाली संस्थाओं के रूप में अधिक जाना जाता है. इनकी रुचि समाज सुधार में कम और अपने व्यवसाय को चलाए रखने में अधिक होती है. सामंतवाद इसी परंपरा का वाहक है और जनक भी. यह सामाजिक बहिष्कार जैसे मारक हथियार का प्रयोग अपने हित में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाता है. सामाजिक बहिष्कार के शिकार अधिकतर ग़रीब, दलित और महिलाएँ होती हैं. वे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए किसी पर निर्भर होते हैं. यदि वे अपने सामान्य से अधिकार के लिए मांग उठाते हैं तो सामाजिक बहिष्कार का सांप उनकी आँखों के सामने कर दिया जाता है. उसे डराया जाता है कि उसके अपने ही उसे ख़ुद से दूर कर देंगे. ग़रीब के ख़िलाफ़ ग़रीब, दलित के ख़िलाफ़ दलित और महिला के ख़िलाफ़ महिला को खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. ऐसे में आर्थिक और सामाजिक रूप से ‘अपनों’ पर निर्भर व्यक्ति अपने आप अपने अंतर में मरने लगता है. सामंतों और उनके गुंडों के प्रभाव में जीने वाले लोग काफी मजबूर होते हैं.
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याद रहे कि जातिवाद सामाजिक बहिष्कार की देन है. यही कारण है कि सामंतवादी परंपराओं के कुप्रभावों से टक्कर लेने और सामाजिक बहिष्कार जैसी परंपराओं के विरुद्ध लड़ने में वामपंथियों ने ही कुछ कार्य किया है.
आज के वैज्ञानिक युग और लोकतंत्र में सामाजिक बहिष्कार जैसी अमानवीय प्रथाओं का विरोध सभ्य और शिक्षित समाज करना पड़ेगा. ख़तरा छोटा नहीं है. पिछले तीन साल के राजनीतिक माहौल ने जातिवाद और सामाजिक बहिष्कार के भय को बढ़ाया है. जाति और जातिवाद के इस्तेमाल को लेकर तो सभी सियासी पार्टियों और मीडिया ने अपने कपड़े उतार फेंके.
ध्यान रहे कि सामाजिक बहिष्कार और शुद्धिकरण एक कुचक्र है. छुआछूत, ग़रीबी, और भ्रष्टाचार इसके मुख्य उत्पाद (major product) हैं. इनका सिलसिला तब तक नहीं टूटता जब तक चालू व्यवस्था को पूरी तरह तहस-नहस करके नई व्यवस्था न बनाई जाए. इसके लिए बड़े सामूहिक प्रयास की ज़रूरत होती है.
सामाजिक बहिष्कार पर काबू पाने के लिए महाराष्ट्र की सरकार ने क़ानून बनाया है और छत्तीसगढ़ की सरकार इस दिशा में कदम उठाने जा रही है. क़ानून बनाना बहुत आसान है. उसे लागू करने वाली एजेंसियों का क्या कीजिएगा जिनके भीतर जातिवाद (सामाजिक बहिष्कार) भरा हुआ है? ख़ैर, पहले तो क़ानून बनाने का स्वागत करना चाहिए.
एक समाचार का लिंक.
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“सामाजिक बहिष्कार मृत्युदंड से भी बड़ी सज़ा है.” - डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर.

01 September 2017

A reference from Dr. Naval Viyogi - डॉ. नवल वियोगी से एक संदर्भ

श्री एन.सी. भगत ने कई वर्ष तक ऑल इंडिया मेघ सभा की पत्रिका ‘मेघ चेतना’’ का कार्यभार देखा है और पत्रिका को चलाए रखा है. उनसे डॉक्टर नवल वियोगी की पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’ के बारे में बातचीत हो रही थी. उस उस पुस्तक में मेघों के बारे में जिक्र है और यह उस काल से संबंधित है जिसे पहले ‘अंधकारकाल’ के नाम से इतिहास में पढ़ाया जाता था. सौभाग्य से भगत जी के पास यह पुस्तक उपलब्ध थी. उन्होंने वह पुस्तक मुझे दी. इस पुस्तक में दो जगह मेघों का उल्लेख है. पुस्तक के उन दोनों पृष्ठों की फोटो नीचे दी गई है. इसमें क्या लिखा है पढ़ लीजिए. यह उन लोगों के लिए अधिक लाभकारी होगा जो मानते हैं कि मेघों का अतीत बहुत पुराना नहीं है और कि वे जम्मू और स्यालकोट से होते हुए भारत विभाजन के बाद जालंधर, अमृतसर आदि जगहों पर आ बसे थे. इससे अधिक टिप्पणी की आवश्यकता नहीं.


श्री एन.सी. भगत ने बताया कि डॉ. नवल वियोगी अपनी एक अन्य (संभवतः मेघ समुदाय पर अधिक प्रकाश डालने वाली) पुस्तक का लोकार्पण मेघ समुदाय के एक जन-प्रतिनिधि से कराना चाहते थे. लेकिन वो हो न सका. शायद डॉ. नवल वियोगी उक्त विषय पर एक व्याख्यान देने के भी इच्छुक थे. लगभग दो वर्ष पहले डॉ. नवल का देहावसान हो गया था.



15 August 2017

Bahujan Media - बहुजन मीडिया


पिछले दो दशकों के दौरान लगातार सुनने में आता रहा कि दलित साहित्य की एक अलग श्रेणी बन रही है. फिर दलित साहित्य अकादमी की बात चली. दलित साहित्य के साथ-साथ ओबीसी साहित्य की बात होने लगी. कबीर बहुत ही सुविधापूर्वक खिसक कर ओबीसी साहित्य में चले गए. इसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रमुख भूमिका रही. आख़िर कबीर की वाणी में प्रयुक्त बिंब और प्रतीक मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं.  
अब बात करते हैं दलित मीडिया की. सामान्य तौर पर देखा जा रहा मीडिया चाहे वो इलैक्ट्रॉनिक हो या प्रिंटेड उसमें बहुजन की बात अक्सर नहीं होती. यहां एक बहुत बड़ा गैप था जिसे भरने के लिए कई उत्साही लोग और समूह सामने आए. ऐसे चैनलों में से सबसे पहले ‘नेशनल दस्तक (National Dastak)’ का नाम आता है जिन्होंने YouTube पर अपना मीडिया खड़ा करने का सफल और सशक्त प्रयास किया है. मेरी जानकारी के अनुसार दूसरे नंबर पर आवाज़ इंडिया है जिसके फॉलोअर एक लाख पचपन हज़ार हैं. उनके साथ ही ‘दलित दस्तक’ ने भी YouTube पर अपनी हाजिरी दर्ज कराई. श्वेता यादव ने ‘टेढ़ी उंगली’ नाम से कई राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने का कार्य शुरू किया है. मेघ समुदाय से श्री सतीश ‘विद्रोही’ ने जम्मू से अपना एक यूट्यूब चैनल Young India चलाया है. फिलहाल यह न्यूज़ चैनल नहीं है लेकिन कभी स्थानीय समाचारों और समस्याओं पर खुल कर बोलता है. इन दिनों नेशनल इंडिया न्यूज़ भी उभरा है.
चैनल चलाने के लिए Facebook ने भी 'फेसबुक लाइव' नाम से एक मंच दिया है जिस से कोई भी किसी घटना को सीधे अपने फेसबुक दोस्तों तक लाइव पहुँचा सकता है.
जितना मैंने देखा है फेसबुक के लाइव स्ट्रीम का प्रयोग प्रचार के लिए अधिक हुआ है. नोटबंदी के बाद से MOJO (mobile journalism) का प्रयोग देखा है. ज़रूर कई कैमरामैन बेरोज़गार हुए होंगे. लब्बोलुआब यह कि प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘बहुजन मीडिया’ या ‘बहुजन एंकरों’ और पैनलों में 'बहुजन' की हाजिरी चाहे बहुत कम हो लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुजन मीडिया की मंथर गति ध्यान खींचती है. ऐसा देखने में आया है ‘नेशनल दस्तक’, ‘आवाज़ इंडिया’, ‘पल-पल न्यूज़ (P2N)’ और ‘दलित दस्तक’ ने अपनी पत्रकारिता में परिपक्वता दिखाई है. मेरी नज़र से नेशनल दस्तक काफी ताक़तवर हो कर उभरा है जिसके आज 4 लाख 19 हज़ार से अधिक सब्स्क्राइबर हैं.

बहुजन मीडिया अस्तित्व में आया है यह बड़ी बात है. चलते-चलते और एक बात. सभी चैनलों का लगाव किसी न किसी सियासी पार्टी से होता है. उनके चैनल का रंग भी पार्टी के पसंदीदा रंग से प्रेरित हो सकता है. रंगों के मामले में EO&E (भूल-चूक लेनी-देनी). 🙂

11 August 2017

एक और पड़ाव

मुश्किल तो है पर ऐसी मुश्किल भी नहीं जिसका अनुमान न लग सके या उसे जीया ना जा सके. शरीर एक तरफा (वन वे) टिकट लेकर आया हुआ है उसी दिशा में उसे बढ़ना है. लौटने का रास्ता बना नहीं.
मैंने इंटरनेट पर काफी यात्रा की है. थका हुआ भी महसूस करता हूं लेकिन जो मिशन लेकर चला था उस पर कुछ कार्य किया है, कुछ और कार्य करने का विचार अभी बाकी है. यह एक यायावरी है. सामने रास्ता है तो चलने को दिल करता है. कुछ और आगे दिखता है तो उस ओर बढ़ जाता हूँ. लगता है यह लक्षण ठीक ही है. आने वाले दिनों में आँख का ऑपरेशन है. कुछ दिन चिट्ठाकारिता (ब्लॉगिंग) से दूर रहना होगा. डॉक्टर ऐसी सलाह देते हैं. पहले एक ऑपरेशन करवाया था तो आँख की सीमाओं का पता चला था लेकिन चलने का जुनून खींचता रहा.
आशा है सीमाओं का वो भरम भी मिटता रहेगा. ब्लॉगिंग की यात्रा में मेरे पुराने सहयात्रियों अमृता तन्मय, दिगंबर नासवा और महेंद्र वर्मा जी के लिए शुभकामनाएँ. मुझे ब्लॉगिंग सिखाने वाले श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ का आभार व्यक्त करता हूँ. ब्लॉगिंग की राह अभी बाकी है. जल्दी ही मिलेंगे.

06 August 2017

Social Media a must - सोशल मीडिया एक ज़रूरी चीज़



अधिक जानकारी देने वाला अंग्रेज़ी में लिखा एक आलेख आप ऊपर फोटो पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं..

25 July 2017

Excessive thinking - अति सोच


किसी भी उड़ने वाले और छोटे दिखने वाले पक्षी को चिड़िया कह दिया जाता है. दूसरे प्रकार की अभिव्यक्ति में ‘ब्राह्मणी चिड़िया’ जैसा शब्द है. कभी-कभी मैं भी ‘मेघनी चिड़िया’ कह देता हूं. यह प्रेम और मासूमियत की देन है. चिड़िया एक छोटी-सी चोंच भी हो सकती है और एक ‘पिद्दी’ का शोरबा भी.
एक अन्य संदर्भ में चिड़िया 'विचार' है. तनाव (टेंशन) को लेकर एक मैनेजमेंट गुरु ने इस तरह समझाया था, “इंसान का दिमाग़ एक घोंसले की तरह है जिस के आसपास विचारों की चिड़ियाएँ उड़ती रहती हैं. आपस में झगड़ती हैं अपनी जगह बनाने के लिए. क्योंकि दिमाग़ का घोंसला आपका है इसलिए आपकी मर्ज़ी है कि किस चिड़िया को आप वहाँ बैठने देते हो. चिड़िया अधिक हो गई तो आप के घोंसले में घमासान मचेगा. टेंशन हो जाएगी. इसलिए उसी चिड़िया को वहां बैठने दो जिसे आप वहाँ बैठने देना चाहते हो.”
बहुत सुकून मिला था ऐसे गुर (गुरु) की प्राप्ति पर. लेकिन रिटायर हो कर हम फँस गए गुरु जी. मोबाइल टावर लगने के बाद शहर की सारी चिड़िया लुप्त हो गई. दूसरी ओर टावर के ज़रिए फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप्प के तहत जैसे चिड़ियों के अनगिनत ब्रीडिंग सेंटर खुल गए. अब दिमाग में चीं-चीं, चैं-चैं, कैं-कैं चलता ही रहता है. ख़बरिया चैनल, फिल्मी चैनल और विज्ञापन ग्ड़ैं-ग्ड़ैं करते रहते हैं. अब गुरु जी का कहना है कि केवल ब्लॉगिंग पर ध्यान दो. ठीक है, जैसी मैनेजमेंट गुरु की आज्ञा !

तो वाट्सएप्प उड़, ट्विटर उड़, फेसबुक उड़. यूट्यूब उड़ ! 🕺

22 July 2017

Our Social Organisations - हमारी सामाजिक संस्थाएँ


सामाजिक संस्थाओं का बहुत महत्व होता है. समाज के विकास में उनकी एक सशक्त भूमिका होती है जब वे बहुत ही जीवंत और सक्रिय रूप से स्पष्ट नज़रिए और बड़े लक्ष्य के लिए कार्य कर रही हों.
अनुभव में आया है कि किसी भी सामाजिक संस्था के सभी सदस्य एक साथ इकाई के रूप में कार्य नहीं करते. सक्रिय सदस्य बहुत कम होते हैं. उनमें से भी ऐसे सदस्य बहुत कम होते हैं जो स्वतःस्फूर्त (Self Motivated) हों. मैनेजमेंट के अध्ययन बताते हैं कि ख़ुद ही आगे बढ़ कर कार्य करने वाले सदस्यों की संख्या लगभग 5% होती है.
मेघ समाज में कार्य कर रही अधिकतर संस्थाओं की गतिविधियां बहुत कम है. वैसे भी उनकी रिपोर्टिंग एक तो कम होती है दूसरे जो होती भी है उसमें पर्याप्त विवरण नहीं होता. यही कारण है कि वे डिफंक्ट-सी नजर आती हैं. दूसरी ओर उनका नज़रिया इतना तंगदिली वाला है कि वे किसी भी मक़सद से एक दूसरे के साथ अपना मंच साझा करने से कतराती हैं. उनकी चौधराहट कितनी भी मरियल क्यों न हो वो अपने खोल में खुश है.  इससे मेघ समाज की युवा पीढ़ी बेचैन है. कुछ युवाओं ने टेलीफोन पर अपनी भावनाएं बताई हैं.
किसी सामाजिक संस्था के पदाधिकारी के तौर पर मेरा अनुभव बहुत कम है. लेकिन मैंने कुछ सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को नजदीकी से देखा है. उनके सक्रिय कार्यकर्ता अधिकतर साठ पार के होते हैं और नए आइडियाज़ को लेकर उनकी रफ्तार बहुत धीमी होती है. वे नई टेक्नोलॉजी और उसके प्रयोग से वाकिफ़ नहीं होते जो प्रतिदिन बदल रही है. वे उससे बचते हुए निकलते हैं. इसमें उनका दोष नहीं. आखिर उम्र भी कोई चीज है.
युवाओं की समस्याओं का स्वरूप बदल चुका है. वे कई कारणों से पुराने लोगों के साथ नहीं चलते, नहीं चल सकते. उनका जीवन संघर्ष पहले के मुकाबले बहुत अधिक है और उसके नए आयाम (डायमेंशंस) हैं. सीधी बात है कि सामाजिक कार्य के लिए वे समय एफ्फोर्ड नहीं कर सकते. दूसरे आजकल वे जिस प्रकार के वातावरण में रह रहे हैं उसमें उन्हें मानद (honorary) सामाजिक कार्य की प्रासंगिकता दिखाई नहीं देती. जो कुछ उन्होंने पढ़ा है वो भोजन बन जाए यही उनकी प्राथमिकता होगी. सीनियर्स और युवाओं के बीच तालमेल हमेशा से मुश्किल रहा है. ऐसी हालत में सीनियर्स सामाजिक कार्य के लिए अधिक उपयोगी हो जाते हैं.
वैसे तो पचास पार के व्यक्तियों में अक्सर कुछ महत्वाकांक्षाएँ (एंबिशंस) उभर आती हैं जो उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं. कुछ तो बड़ी सामाजिक/राजनीतिक महत्वाकांक्षा के मालिक होते हैं, कुछ के लिए यह टाइमपास होता है और कुछ गंभीर कार्य में विश्वास वाले होते हैं. लेकिन एक फैक्टर उन पर तब भारी पड़ता है जब उनका साथ देने वाले कार्यकर्ता कम रह जाएँ. इससे हौसला कम होता जाता है और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है. लेकिन वे संस्थाएँ ऐसे हालात में भी बेहतर काम कर पाती हैं जो अपना रिकार्ड सिस्टेमैटिक तरीके से रखती हैं और कार्य को नियमित बनाती हैं. इससे कार्यकर्ताओं पर बोझ कम पड़ता है.
एक अन्य बात भी अक्सर देखी गई है कि सामाजिक संस्थाएँ अपने लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित कर लेती हैं जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी उन्हें नहीं होती. ये लक्ष्य कई बार ऐसे होते हैं जिनमें अग्रिम रूप से विशेषज्ञ प्लानिंग की दरकार होती है. यानि लक्ष्य की साध्यता के बारे में विचारों की स्पष्टता ज़रूरी होती है. कई बार बड़ी संख्या में सदस्यों से प्राप्त भावुकता भरे सुझावों को लक्ष्य बना लिया जाता है जिसके पीछे व्यावहारिक नज़रिया नहीं होता. इससे बाद में निराशा पैदा होती है.
सच यह भी है कि बड़े सपने बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की बड़ी वजह बन जाते हैं.🙏

21 July 2017

Purification Program of Arya Samaj - आर्यसमाज का शुद्धिकरण कार्यक्रम


नीचे दिया गया चित्र मुझे अपने एक मित्र श्री तेजिंदर पाल सिंह कैले के ज़रिए मिला है. इस फोटो के नीचे जो लिखा है उससे पता चलता है कि यह फोटो सन 1901 में लिया गया था जब आर्यसमाज ने सियालकोट में शुद्धीकरण का कार्यक्रम शुरू किया था.  इससे अधिक डिटेल उक्त चित्र में या चित्र के साथ उपलब्ध नहीं है. फिलहाल इस चित्र का महत्व केवल इतना ही है कि यह उस समय के शुद्धिकरण कार्यक्रम की एक तस्वीर पेश करता है. गूगल इमेज सर्च में यह इमेज नहीं मिला. अधिक विवरण प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूँ. उपलब्ध होने पर उसे यहां लिखा जाएगा.

इस चित्र के नीचे अंगरेज़ी में लिखा है - A Shudhikaran Ceremony in Sialkot (1901)



11 July 2017

Social Media and Bhagat Mahasabha - भगत महासभा और सोशल मीडिया

जब मेरे घर पर कंप्यूटर और इंटरनेट आया तो तुरत ‘मेघ’ और ‘भगत’ शब्दों की तलाश की. काफी ढूँढने के बाद ‘भगत महासभा’ की ब्लॉग साइट्स दिखीं जहाँ मेघ-भगत समुदाय की बात थी. इससे मुझे बहुत खुशी हुई. भगत महासभा ने एसएमएस सेवा के माध्यम से भी कार्य किया और जम्मू में बड़े पैमाने पर कबीर जयंती के कार्यक्रम भी आयोजित किए.


सोशल मीडिया पर मेघों की सबसे अधिक सक्रिय सामाजिक संस्था देखें तो भगत महासभा सबसे ऊपर दिख जाती है. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ ने सोशल मीडिया का उपयोग करने में काफी पहलकदमियाँ की हैं. मैं उन्हें युवावस्था से जानता हूँ जब वे पंजाब यूनीवर्सिटी में पोलिटिकल सांइस में एम.ए. कर रहे थे. तब प्यार से हम उन्हें ‘प्रोफेसर’ कह देते थे जो आगे चल कर उनका निकनेम जैसा बन गया - ‘प्रोफेसर’ राजकुमार.  


पंजाब के मेघ भगतों के कई सामाजिक संगठन हैं जिनके बारे में कुछ जानता हूँ और उनके बारे में जब भी कोई जानकारी हाथ लगी उसे मेघनेट पर संजो कर रख लिया. राजकुमार जी की गतिविधियाँ अधिक देखने को मिलीं. इन्होंने अत्यधिक विरोध के बावजूद डॉ. अंबेडकर की विचारधारा पर अपना स्टैंड साफ़ और मज़बूती के साथ रखा है.

पिछली बार 02 जुलाई, 2017 को जब मैं जालंधर में था तो श्री आर.एल. गोत्रा जी के निवास पर उनसे मुलाकात हुई और उनसे हुई औपचारिक बातचीत को मैंने रिकार्ड कर लिया जिसका लिंक यहाँ है.

09 July 2017

History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स

Sh. R.L. Gottra
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.


धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.

देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.

इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.

19 June 2017

The Profession and Religion - व्यवसाय और धर्म


इस पोस्ट का पॉडकास्ट यहाँ है.

किसी व्यक्ति की पहचान उसके पेशे से भी होती है. उसका पेशा बदल जाए तो भी कई बार उसकी पेशे पर आधारित पहचान नहीं बदलती. ऐसा इसलिए है कि हमारे समाज में पेशे को धर्म की तरह माना जाता है और धर्म नहीं बदलता (?). क्या वाक़ई?

कुछ भी कहिए अब यह विचार एक गलतफ़हमी का रूप लेने लगा है. संविधान बदला है, सरकारी नीतियाँ बदली हैं. लोगों के पेशे और धर्म भी बदले हैं. फिर इन दिनों एक बात लोगों में पहुँच गई है कि यदि पेशा एक धर्म है तो धर्म भी एक पेशा है. इससे सामाजिक सोच बदलती नज़र आ रही है.

भाईजान, पेशा खतरे में हो तो इंसान का वजूद तक ख़तरे में पड़ जाता है. लेकिन जब सरकारी नीतियाँ समाज के करोड़ों की जनसंख्या वाले वर्ग के पेशे को ख़तरे में डाल दें तो समाज में एक बैचैनी तो पनपेगी. पहले जुलाहों के पेशे को अंग्रेज़ सरकार की आर्थिक नीतियों ने तबाह किया जिसका मार्मिक वर्णन शशि थरूर ने अपनी पुस्तक ‘An Era of Darkness’ के संदर्भ में यह खुल कर किया है. थरूर ने बताया है कि किस तरह बुनकरों के अंगूठे ही काट डाले गए ताकि वे अपने पेशे में वापस न जा सकें. स्वतंत्र भारत में अंग्रेज़ों की औद्योगिक नीति जारी रही. नतीजा यह हुआ कि बुनकर जातियाँ के उत्पाद कारख़ानों में बने उत्पादों से होड़ नहीं कर सके. ग्रामीण जुलाहे टेरीलीन के रेशे की माँग करते रहे जो पूरी नहीं हुई. आज की स्थिति नहीं मालूम.

इधर मेघ भगतों की खड्डियाँ पूरी तरह तो नहीं रुकीं लेकिन डूबते हुए पेशे का दबाव उनकी ज़िंदगी के रेशे-रेशे पर भारी पड़ा. वैसे तो श्रमिक जातियाँ स्वभाविक ही एक जगह से उखड़ जाती हैं तो तुरत दूसरा पेशा अपना लेती हैं. जुलाहों ने जुलाहागीरी छोड़ी तो खेत मज़दूर बन गए, खेती का मौसम न हुआ तो ईंटें ढोने लगे, थोड़ा बहुत प्रशिक्षण लिया है तो कारख़ानों में कारीगर बन गए या वहीं सामान ढोने लगे. दुनिया भर का लेबर क्लास यही करती है.

मेघों ने जब-जब ‘मेघ-धर्म’ यानि पेशा बदला तब उन्होंने तरक्की के नए रास्ते ढूँढने में तत्परता दिखाई है. जम्मू से स्यालकोट आए तो उन्होंने कारख़ानों में कारीगरों के रूप में अपनी पहचान बनाई. नियमित आय आनी शुरू हुई तो तुरत अपने बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने ध्यान दिया. भारत विभाजन के बाद मेघों ने अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, मेरठ जैसे शहरों में पेशेवर कुशलता के साथ सर्जीकल और स्पोर्ट्स उद्योग में अपनी जगह बनाई. शिक्षित मेघ युवा अच्छी संख्या में बैंक, बीमा, चिकित्सा, प्रशासनिक सेवाओं में गए और अपनी प्रोफेशनल श्रेष्ठता साबित की. पिछले कई वर्षों से वे व्यापार के क्षेत्र में आ रहे हैं. उन्होंने अपने नए पेशे को धर्म की तरह अपनाया है. उनका व्यापार के क्षेत्र में आना महत्वपूर्ण है.


नई अर्थव्यवस्था की बेवकूफियों और सरकारी नीतियों के कारण लोगों को बच्चों की शिक्षा पर अब बहुत ज़्यादा ख़र्चा करना पड़ेगा. ग़रीब समुदायों के लिए यह और भारी होगा. वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन) और शिक्षा के निजीकरण को आप ‘दो नागों’ का दोहरा हमला कह सकते हैं. अर्थव्यवस्था का तकाज़ा है कि उद्योग के लिए सस्ते मज़दूर चाहिएँ और सरकारी नीतियों की ड्यूटी है कि उस माँग को पूरा करें. अच्छे जीवन स्तर के लिए सस्ते मज़दूरों को शिक्षित-प्रशिक्षित और महँगे मज़दूरों से मुकाबला करना ही होगा. जो जीतेगा वही धरती पर जीवन का सुख भोगेगा.

25 May 2017

Mrs, Shashi Bhatia - our pride - श्रीमती शशि भाटिया - हमारा गौरव

पंजाब के मेघ भगत श्री मिल्खीराम भगत, पीसीएस को बहुत आदर से याद करते हैं. उनका व्यक्तित्व बहुत प्रेम भरा था और वे हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहते थे. उनके सभी बच्चे पढ़-लिख कर अच्छे पदों पर गए या समाज-सेवा के कार्य में लगे. 17 मई, 2017 को उनकी बेटी श्रीमती शशि भाटिया केनेडा से आई हुई थीं और ऑल इंडिया मेघ सभा के अनुरोध करने पर उन्होंने चंडीगढ़ में उपस्थित सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा किए. उनके उद्बोधन के ज़रिए उनके जीवन के कई अनजाने पक्ष सामने आए जिन्हें उपस्थितों ने बड़े शौक से सुना और सवाल भी किए. यह बहुत ही सुखद अनुभव रहा. इसके अलावा उन्होंने मुझे एक अलग से इंटरव्यू देना भी स्वीकार किया जिसे वीडियो के तौर पर MEGHnet पाठकों के लिए संभाल कर रख लिया है जिसे आप नीचे यूट्यूब लिंक पर देख सकते हैं.

केनेडियन आर्म्ड फ़ोर्सिस ने शशि भाटिया को एक प्रभावी व्यक्ति के तौर पर भर्ती किया है. “A new commemorative medal was created to mark the 2012 celebration of the 60th anniversary of Her Majesty Queen Elizabeth ll's accession to the Throne as Queen of Canada. Among seven of Durham Region recipients Shashi Bhatia daughter of late Mr. M.R. Bhagat was honored to receive Queen's Elizabeth ll Diamond Jubilee Medal during the Durham Regional Police Service ceremony on September 14, 2012 in Ajax, Ontario Canada.” इस अवसर पर मैडल के साथ उन्हें एक प्रशस्तिपत्र भी दिया गया. मेघ समुदाय उनकी इस उपलब्धि पर गर्व महसूस करता है.




नीरजा भनोट के भाई अनीश भनोट ने एक काफी टेबल पुस्तक की परिकल्पना की थी जो Inspiring Stories of Successful Indian Personalities Worldwide के नाम से प्रकाशित हुई है. इसमें शशि भाटिया का व्यक्तित्व और उपलब्धियाँ भी शामिल की गई हैं. पुस्तक का यह लोकार्पण कार्यक्रम 17-05-2017 को चंडीगढ़ में आयोजित किया गया था.


19 May 2017

Megh Civility - मेघ सभ्यता

(इस आलेख का Podcast यहाँ उपलब्ध है.)
हमारा जो भी इतिहास मिलता है वो हमने नहीं लिखा दूसरों ने लिखा और वो जो लिखना चाहते थे वो उन्होंने अपने आत्मगौरव (self pride) के लिए लिखा और उसे अपने हक़ में भुनाने के लिए लिखा. इसीलिए क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में हमें अपना कुछ नहीं मिलता. मेघ जाति सदियों तक शिक्षा से वंचित रही. अपना अतीत पूछती रही. दूसरों ने जितना बताया उतना मानती रही. शिक्षित होने के साथ मेघों को नई जानकारियाँ मिलने लगी है. वैज्ञानिक सोच आने लगी है.


मेघों को यदि मानवजाति विज्ञान (Ethnology) के अनुसार देखना हो और मूलनिवासी की कसौटी पर कसना हो तो ऐसे उल्लेख मिल जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि मेघों ने आर्यों से पहले आकर सिंधु दरिया के आसपास अपनी बस्तियाँ बसाईँ. मेघों को कोलारियन ग्रुप का कहा गया है जो सेंट्रल एशिया से इस क्षेत्र में आ कर बसा था. जो समूह सबसे पहले आ कर बसा उसे ईरान में तूरानियन (तूरान नामक स्थान के लोग) कहा गया है. वो तूरानियन ग्रुप मंगोलॉयड था. यह ग्रुप ईरान की ओर से हो कर नहीं आया. 'तूरानियन' को संस्कृत में किरात कहा गया. दूसरा कोलारियन मंगोलॉयड ग्रुप असम की ओर से भारत में आया और उसका संपर्क द्रविड़ियन रेस से हुआ. उस ग्रुप को संस्कृत में निषाद कहा गया. जो उत्तर-पश्चिम में कोलारियन ग्रुप बसा वो आर्यों और मुग़लों के संपर्क में आया. इस कोलारियन ग्रुप के लोगों का रंग आमतौर पर गेहुँआ होता है. लेकिन इनमें बहुत गोरे और काफी साँवले रंग के लोग भी पाए जाते हैं. यह रक्तमिश्रण की कहानी है जो पूरे विश्व में एक फिनॉमिना है. लेकिन कोलारियन एक ऐसा सांस्कृतिक ग्रुप है जिसकी अपनी एक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था थी.


मेघों का आर्यसमाज में आना-जाना हुआ तो उन्होंने वेदों का गुणगान सुना और माना. धर्म में वेदों-पुराणों की इतनी महिमा गाई गई कि हम आदतन अपना पिछोकड़ (इतिहास) वहीं ढूँढने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक बात को समझने की ज़रूरत है कि आर्य ब्राह्मणों ने जो साहित्य लिखा वो अपने आत्मगौरव के लिए लिखा है. उसमें दूसरों की जगह कम है. यह बात भी समझ लेनी ज़रूरी है कि यदि वेदों-पुराणों में इतिहास ढूँढने की बात करनी हो तो पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि वेद लिखे कब गए थे. अब भाषाविज्ञानी इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि संस्कृत भारत की सब से पुरानी भाषा नहीं है. दूसरे यह भी जानना पड़ेगा कि वेदों में नायक कौन है और खलनायक कौन है. वेदों में इंद्र आर्यों का हीरो है. उसके विरोध में जो लोग खड़े हैं वे असुर और राक्षस हैं जिन्हें आजकल मूलनिवासी कहा जाता है. मूलनिवासियों को वैदिक और पौराणिक कथाओं में निहायत गंदे तरीके से दिखाया गया. वे मूलनिवासी लोग यूरेशिया की ओर से आए आक्रमणकारी आर्यों से अपने दरियाओं के पानी, जंगलों और ज़मीन की हिफाज़त कर रहे थे. वे नए दुश्मन का सामना कर रहे थे जो बहुत बर्बर था. कहते हैं कि लगभग 500-600 वर्ष तक चले युद्धों के बाद वे आर्य यहाँ के दरियाओं और उसके आसपास की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गए और हारे हुए लोगों को उन्होंने गुलाम बना लिया जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था. उस जीत का बखान और अपना गौरवगान आर्यों ने वेदों और उसके बाद लिखे अपने ग्रंथों में दर्ज किया. हारे हुए लोगों में मेघवंशी भी थे. वेदों में बताई गई उन कथाओं की पड़ताल करके हमारे अपने समाज के श्री आर.एल. गोत्रा ने एक लंबा आर्टिकल ‘Meghs of India’ शीर्षक से लिखा जिसकी तारीफ़ ताराराम जी भी करते हैं जिन्होंने ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है.


Meghs of India में किया गया अध्ययन बताता है कि आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र के लोग एक ‘वृत्र’ नाम के पुरोहित नरेश के अनुगामी थे या उसके प्रभाव-क्षेत्र में बसे थे. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका प्रभाव था. ऋग्वेद में उसे प्रथम मेघ, अहिमेघ भी कहा गया है. बहुत से मेघवंशी वृत्र को अपना वंशकर्ता मानते हैं. एक जाट नेता मनोज दूहन ने भी कहीं लिखा था कि वृत्र उनका वंशकर्ता है. क्योंकि वृत्र को अहि यानि नागमेघ भी कहा गया इससे पता चलता है कि मेघवंशियों और नागवंशियों का कभी निकट संबंध रहा होगा.


मेघऋषि को लेकर एक समस्या सोशल मीडिया पर उभरी है. लोगों में मेघवंश और मेघवंशी जातियों को लेकर शंकाएँ हैं. हो सकता है यह समस्या नहीं होती अगर हिंदू व्यवस्था के तहत जातियाँ न होतीं. लेकिन हिंदू व्यवस्था (वास्तव में ब्राह्मणीकल व्यवस्था) के लागू होने के कारण वंश या रेस का कई जातियों में बँटवारा हुआ. आज मेघवंश के तहत आने वाली मेघवाल, मेघवार, मेघ आदि जातियाँ निश्चित रूप से जाति के रूप में अलग-अलग हैं. नागवंशी जातियों की भी काफी बड़ी संख्या है.


दूसरी समस्या मेघऋषि की पूजा और उसके नाम पर हाल ही में स्थापित मंदिर हैं. जो लोग सनातनी परंपरा से प्रभावित हैं वे मेघऋषि को पूज्य देव के रूप में स्थापित रहे हैं. अन्य विचारधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे. इस समस्या का समाधान नहीं सुझाया जा सकता. भारतीय संविधान से मशविरा करना पड़ेगा.


इतिहास में लिखे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि आधुनिक इतिहासकारों के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री ने ऐसे राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया है जिनके नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द सरनेम की तरह लगाया जाता था. ‘मेघ’ सरनेम वाले जो राजा थे उनसे पहले और बाद के राजाओं का इतिहास मिला लेकिन ‘Megh’ सरनेम वाले राजाओं का इतिहास नहीं मिला. उनके शासनकाल को अंधकार काल कहा गया. ज़ाहिर है कि परंपरावादी इतिहासकार उन राजाओं के बारे में लिखना ही नहीं चाहते थे. लेकिन आधुनिक और ईमानदार इतिहासकार इस पर और अधिक रोशनी डाल रहे हैं.


अपने पिछोकड़ के बारे में जानना हो तो लोकगीत उसमें मदद करते हैं. अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ समुदाय के अपने लोकगीत नहीं हैं. इसका ज़िक्र डॉ. ध्यान सिंह ने अपने थीसिस में किया है. एक बार श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया था कि हमारे एक लोकगायक राँझाराम हुए हैं जो कथावाचक थे और कई कथाओं के साथ-साथ मेघों की कथा भी सुनाते थे. इसकी पुष्टि कर्नल तिलकराज जी ने भी की. राँझाराम जी मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ते थे. कैसे जोड़ते थे, वो कथा क्या थी उसका रिकार्ड नहीं मिलता. फिलहाल इस बात का इतना महत्व तो है कि मेघों की कथा में सिकंदर है. सैनी और जाट सहित कई समुदाय पोरस को अपना आदमी बताते हैं. और तथ्य यह भी है कि सिकंदर के रास्ते में मेघों की घनी बस्तियाँ थीं. उस युद्ध में मेघों की कोई भूमिका न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता. बाकी आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूँ. अच्छी कल्पना कीजिएगा. प्रसंगवश हमारे कमाल के लोकगायक राँझाराम जो थे वो श्री सुदेश कुमार, आईएएस के पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे.


मेघों के अतीत का एक और महत्वपूर्ण पन्ना है उनका आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण. अब पढ़े-लिखे लोग हँस कर पूछते हैं कि क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे जो हमारा शुद्धिकरण किया गया. पिछले दिनों श्री ताराराम जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक के एक सफ़े की फोटोकापी मुझे भेजी जिस पर ऐसा कुछ लिखा था जो चौंकाने वाला था. लिखने वाला सही था या नहीं, पता नहीं, उसमें लिखा है, “1901 में पहली बार आर्य-भक्त भाइयों ने समाज में आना प्रारंभ किया. उस समय इन मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर एक स्थान पर संध्या-हवन आदि में सम्मिलित होना आश्चर्यजनक था.” मेघों के शुद्धिकरण की बात वहाँ की गई है. इससे एक सवाल तो खड़ा होता है कि क्या शुद्धिकरण से पहले मेघों का धर्म कुछ और था कि उनका हिंदुओं के साथ बैठना आश्चर्यजनक हो गया? इस विषय को एक सवालिया निशान के साथ यहीं छोड़ रहा हूँ. आर्यसमाज ने मेघों की शिक्षा के लिए जो शुरुआती प्रबंध किया उससे मेघों को बहुत फायदा हुआ इसमें शक नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि नैतिकता (Morality) और सभ्य व्यवहार से क्या कोई समुदाय ख़ाली हो सकता है चाहे उसकी पहचान किसी धर्म से न भी हो? क्या नैतिकता सिखाने का हक़ सिर्फ़ धर्म को ही है? मेरा विचार है कि जब हमारे पुरखों को किसी धार्मिक स्थान में जाने नहीं दिया जाता था तो उन्हें नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाता था. हमारे समाज में उन दिनों माताएँ किस धर्म के आधार पर अपने बच्चों को सिखाती थीं कि झूठ मत बोलो, पशु-पक्षियों पर दया करो, दिल में करुणा रखो, बूढ़ों-बुज़ुर्गों की सेवा करो वगैरा वगैरा. वो कौन-सी सभ्यता (civility) थी जो हमारे पुरखों के ख़ून में रची-बसी थी? यहाँ धर्म और सभ्यता को इसलिए अलग-अलग कर के देख रहा हूँ क्योंकि सभ्य व्यवहार धर्म के माध्यम से ही आए यह ज़रूरी नहीं. हमारी पृष्ठभूमि में कोई तो सभ्यता ज़रूर रही होगी जिसने सदियों से हमें सभ्य व्यवहार सिखाया है. थोड़ा याद कीजिए कि क्या हमारे समाज में महिलाओं को सती कर डालने की परंपरा थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ विधवा विवाह की कोई समस्या थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ दहेज हत्याओं की कोई समस्य़ा थी? नहीं. मैंने कई साल पहले पढ़ा था कि मेघ अदालतों में नहीं जाते. वजह थी कि हमारी एक अपनी पंचायत जैसी न्याय प्रणाली थी. कभी सुना नहीं कि उस व्यवस्था के अधीन किसी को क्रूर सज़ा सुनाई गई हो. अगर हुक्कापानी बंद करने की बात छोड़ दें तो मेघ अपनी न्याय प्रणाली से संतुष्ट थे. इन सभी ख़ासियतों को आप ‘मेघ-सभ्यता’ कह सकते हैं. ऐसी ‘मेघ-सभ्यता’ जिसमें इंसानियत सबसे सुंदर रंगों में खड़ी दिखाई देती है.


अब कुछ बेसिक से सवालों पर अपनी राय दे रहा हूँ. क्या मेघऋषि से ही हमारा वंश चला? बच्चा भी कहेगा कि मेघऋषि का भी कोई बाप ज़रूर रहा होगा. हाँ भई ज़रूर रहा होगा. बच्चे की बात में सच्चाई है और उसे मान लेने में भलाई है. वैसे भी मेघऋषि हारे हुए पुरोहित नरेश की कहानी है. आप चाहें तो मेघऋषि के प्रति आँखें मूँद कर चलते रह सकते हैं.


बड़ा मशहूर डायलॉग है कि ‘मेघों में एकता नहीं हो सकती’. यह सच्चाई है कि सियासी पार्टियाँ और धर्म या डेरे बनाने वाले लोग यह काम लोगों में एका लाने के लिए नहीं करते. उन्हें वोट, पैसा और आपकी सेवा चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टियाँ और धर्म-डेरे आपको आपस में बाँट लें. आप जिसके यहाँ जाते हैं उसका ठप्पा या स्टिकर जाने-अनजाने में आप पर लग जाता है. जब ठप्पे और स्टिकर अलग-अलग हो गए तो पहचान अपने आप अलग हो गई और एकता की भैंस भी पानी में चली गई. मेघों के अपने कई छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बने हुए हैं. सभी चौधरी हैं. वे इकट्ठे नहीं हो सकते. चलिए इस बात को एक ही बार में मान लें कि बिरादरी के तौर पर मेघों में एकता नहीं हो सकती. तो क्या कोई दूसरा रास्ता है? हाँ है जिसे अपनाया जाना चाहिए. मेघों में कार्य कर रही सियासी पार्टियों और सामाजिक संगठनों को आपसी कंपिटीशन और गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिएँ. इससे निश्चय ही बेहतर रिज़ल्ट निकलेगा और वो मेघ-भगत समाज के लिए लाभकारी होगा. शुभकामनाएँ.


जय मेघ, जय भारत.
भारत भूषण भगत, चंडीगढ़.


(यह आलेख डॉ. शिवदयाल माली द्वारा गठित 'मेघ जागृति मंच' के 21-05-2017 को आयोजित कार्यक्रम के लिए लिखा गया था. मैं चाहते हुए भी कारणवश इसमें भाग नहीं ले सकूँगा. रिकार्ड के लिए इसे यहाँ रख लिया है.)

विशेष नोट - इसी तरह का एक सेमिनार 30 अगस्त, 2015 को जालंधर में हुआ था जिसकी शुरुआत मैंने इस प्रकार की थी, "पहली बात यह है कि मैं इतिहासकार नहीं हूँआपकी तरह अपना इतिहास जानने में मेरी रुचि थीमैंने जो पढ़ा उसके नोट्स बनाता रहामेरे नोट्स इतिहासकारों की देन हैंआपका इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं हैये नोट्स अब आपकी सेवा में हैं." ऊपर प्रस्तुत जानकारी पर भी मेरी यह टिप्पणी उसी प्रकार से लागू है.