25 December 2017

The World of Kelly Lane - कैली लेन का संसार

   
Kelly Lane is 11 years old and he has a passion for reading and writing. I  came to know about him through his father Dr. David C. Lane. I have never met them but I have been familiar with the work of Dr. Lane regarding Indian Sage Baba Faqir Chand for the past few decades.
Kelly is an example which explains the importance of scientific attitude in education. He has been provided opportunities by his parents to read and write and develop in various dimensions of life. Both parents are professors of philosophy. You might think why I chose an American child to underline the importance of education. Keep reading, you will understand. Kelly has visited India and seen Agra, Amritsar etc.
Here in India we are taught religious, mythological and devotional literature which settles in the mind of the children and it is done in the name of literature, history and moral education. We all know that a child's brain is like raw material which becomes manufactured product for the society and finally makes the society itself. If we do not develop scientific temperament in children then you can imagine what  would be the finished product.
We have here a complete arrangement to keep the scientific thinking undeveloped, though Indian constitution resolves to develop scientific temperament. We are quite behind in the race of scientific inventions and knowledge. Science has created new areas of employment opportunities and our young generation is not much aware of it. One of those new areas pertains to ​​Artificial Intelligence (A.I., Artificial Intelligence) (including robotics and automation), that has changed the role of humans in production and services.
During British regime, Lord Macaulay's education policy ensured actual spread of education in India. As  a result a large number of youngsters from different levels of society got an opportunity to get basic education and India, thereafter, got better connected with rest of the world. Many reforms took place. A class with scientific knowledge emerged and that resulted in change in people's traditional thinking about religion and society. To be precise, human rights were introduced. Still many changes are awaited before common man can understand the new developments in science, specially Artificial Intelligence.
11-year-old Kelly has known about this artificial intelligence and has completed a project on it - ‘WHEN COMPUTERS BECOME HUMAN: A KID'S GUIDE TO THE FUTURE OF ARTIFICIAL INTELLIGENCE’. It is in many formats - completely colorful paperback, kindle e-book and a film (embedded below). His teachers and parents must have played their role in the project. However, for me, what important is that Kelly is being prepared to know various aspects of artificial intelligence and also philosophical thought related to it. Kelly is fond of reading and writing. But that does not mean that Kelly has become a child engaged only in books. A family friend of Lanes’, Glenda Fields, told me via Facebook, "Have you met Kelly? I met him a few months ago. He is a very delightful, happy young man! Huge, huge, smile!" That tells about the family atmosphere in which Kelly is growing up.
Recently, Dr. David C. Lane told about a recent proposal from a Chinese publisher to publish the above mentioned book in Chinese language and distribute it in China. Congratulations to Kelly and his parents.
Watch the video below. You will find that this book raises a question in your mind as to how long artificial intelligence and human consciousness would continue to dwell separately? Will artificial intelligence envelop or overshadow human consciousness? Hopefully these questions will be answered by Kelly and children like him when they grow up.

कैली (Kelly Lane) 11 साल का है और पढ़ने-लिखने वाला बच्चा है. मैंने उसे उसके पिता डॉ. डेविड सी. लेन के माध्यम से जाना है. दोनों से मैं कभी नहीं मिला लेकिन डॉ. लेन के कार्य से मैं कई दशकों से परिचित हूँ. उन्नत शिक्षा के महत्व का एक अच्छा उदाहरण मिडल स्कूल में पढ़ने वाला कैली है. उसे पढ़ने-लिखने और जीवन के कई आयामों को विकसित करने का अवसर उसे माता-पिता ने उपलब्ध कराया है. वे दोनों दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं. आप सोचते होंगे कि मैंने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करने के लिए एक अमेरिकन बच्चे को ही क्यों चुना. पढ़ते रहिए, समझ जाएँगे. कैली भारत में आगरा, अमृतसर घूम चुका है. हमारे यहाँ साहित्य, इतिहास, नैतिक शिक्षा के नाम पर धार्मिक, मिथिकल और भक्ति साहित्य बच्चे के दिमाग़ में ठूँस दिया जाता है. बच्चे का दिमाग़ एक तरह का कच्चा माल होता है जिससे समाज के लिए तैयार माल बनता है और ख़ुद समाज भी बनता है. जब वैज्ञानिक समझ नहीं बनेगी तो समझ लीजिए कि हमारे तैयार माल और समाज का स्वरूप कैसा होगा या है. हमारे यहाँ वैज्ञानिक सोच को अविकसित रखने का पूरा इंतज़ाम रहा है बावजूद इसके कि संविधान वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात करता है. हम वैज्ञानिक खोजों की रेस में काफी पीछे हैं. विज्ञान ने रोज़गार के ऐसे कई नए क्षेत्र विकसित किए हैं जिनके बारे में हमारा एक बड़ा युवा वर्ग कम जानता है. उन क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (A.I., कृत्रिम बुद्धिमत्ता) (इसमें रोबोटिक्स और ऑटोमेशन शामिल है) का नया और विस्तृत क्षेत्र है जिसने उत्पादन और सेवाओं में मानव की भूमिका को बदल दिया है. लॉर्ड मैकॉले (Lord Macaulay) की शिक्षा नीति ने भारत में शिक्षा का प्रसार किया. आगे चल कर एक बड़ा पढ़ा-लिखा वर्ग पैदा हुआ. कुछ सुधार हुए वैज्ञानिक सोच वाला एक वर्ग बना और धर्म के बारे में लोगों की परंपरागत सोच में परिवर्तन हुआ. अभी भी बहुत से परिवर्तन अपेक्षित हैं ताकि हम विज्ञान के अद्यतन स्वरूप को समझ सकें जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक है. 
कैली अपनी पसंदीदा जगह पर

11 वर्षीय कैली ने इसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विषय में जाना है और उस पर एक प्रोजेक्ट पूरा किया है - WHEN COMPUTERS BECOME HUMAN: A KID'S GUIDE TO THE FUTURE OF ARTIFICIAL INTELLIGENCE (यानि - जब कंप्यूटर इंसान बन जाते हैं: आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के भविष्य के बारे में एक बच्चे की मार्गदर्शिका). यह कई फार्मेट्स में है- पूरी तरह रंगीन पेपर बैक, किंडल ई-बुक और फिल्म के रूप में जिसे मैंने नीचे एंबेड कर दिया है. इस प्रोजेक्ट में उसके अध्यापकों और माता-पिता की भूमिका रही है. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि 11 साल का कैली कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित दर्शन (फिलासफी) के बारे में कार्य करने के लिए तैयार हो रहा है. कैली बहुत पढ़ता और लिखता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह कंप्यूटर जैसा हो गया है. नहीं. उनकी पारिवारिक मित्र ग्लैंडा फील्ड्स (Glenda Fields) ने फेसबुक पर मुझे कहा, “Have you met Kelly? I met him a few months ago. He is a very delightful, happy young man! Huge, huge, smile!” मतलब कि वो मनोहर और ख़ुश दिल बच्चा है. ग्लैंडा उनके पारिवारिक माहौल की बहुत प्रशंसा करती है जिसमें Kelly पला-बढ़ा है. हाल ही में डॉ. डेविड लेन ने बताया कि उन्हें एक ख़बर मिली कि चीन के एक प्रकाशक ने उक्त पुस्तक को चीनी भाषा में छापने और चीन में वितरित करने की अनुमति मांगी है. कैली और उसके माता-पिता को बधाई नीचे का वीडियो देखिए. आप जान जाएँगे कि यह पुस्तक एक सवाल आपके दिमाग़ में छोड़ जाती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंसानी चेतना आखिर कहाँ तक अलग-अलग चलेंगी? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानी चेतना को आच्छादित कर लेगी? उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब कैली और उसके जैसे बच्चों से मिलेगा जब वे बड़े हो जाएँगे.


नासा के वर्तमान छह AI प्रोजेक्ट्स

08-02-2018


15 December 2017

Self Pride and Self Respect - आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान


आत्मगौरव और स्वाभिमान एक दूसरे पर निर्भर हैं लेकिन स्वाभिमान से पहले आत्मगौरव का स्थान है जिसका निर्माण करना पड़ता है. आगे चलकर उसी पर स्वाभिमान का मज़बूत ढांचा खड़ा होता है.
गरीब समुदाय अपने आत्मगौरव की निशानियां वहाँ भी ढूंढते हैं जहाँ उसके मिलने की उम्मीद बहुत कम होती है. लेकिन आत्मगौरव के पायदान चढ़ने के लिए जरूरी नहीं है कि बड़े-बड़े युद्ध जीतने ज़रूरी हों. बुद्ध ने कोई युद्ध नहीं जीता लेकिन दुनिया भर के सभी धर्मों के मूल में कहीं ना कहीं बुद्ध की विचारधारा स्थापित है. जहाँ धर्म और आस्तिकता नहीं भी है वहाँ भी व्यक्ति के विकास के लिए बुद्ध के विचारों का ख़ज़ाना मौजूद है. इससे सिद्ध हो जाता है कि जिन विचारों और विचार-युक्तियों से हम इंसानी जीवन को खूबसूरत बना सकें वो विचार हमारे लिए गर्व की बात हो सकती है. और जब वो गर्व की बात बन जाती है तब वो हमारे आत्मगौरव का आधार बन जाती है. आत्मगौरव एक विचार है और इसके तल में कई अन्य विचारों की अदृष्य धारा बहती रहती है.
कभी किसी समुदाय पर ऐसी परिस्थितियां आ सकती हैं जिससे उसके आत्मगौरव निशानियां किसी कारण से गुम हो जाएं, उनके शांतिपूर्ण अहं को कुचल दिया जाए, उनकी सभ्यता को नेस्तनाबूद कर दिया जाए या उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को मिटा दिया जाए. यदि उस समुदाय का जहाज़ समय के थपेड़े खाता हुआ अपने जर्जर मस्तूल और फटे हुए पाल के साथ अपनी यात्रा करता रहता है तो मानना चाहिए कि उस समुदाय में कोई ना कोई ऐसा आत्मगौरव और स्वाभिमान है जो उसे चलने की शक्ति देता आ रहा है. यह पाल और मस्तूल और कुछ नहीं, उस समाज या समुदाय के अंदर रचे-बसे ऐसे मानवीय मूल्य (human values) हैं जो जिंदगी नाम की चीज़ को हर हाल में बचाए रखते हैं और उसे खूबसूरत अहसासों से भरते रहते हैं.
आत्मगौरव एक भावात्मक धौंकनी है जो हमारी जीवनी शक्ति को प्राणवान बनाए रखती है. आत्मगौरव स्वाभिमानी मानसिकता का एक स्ट्रक्चर है जिसका निर्माण करना पड़ता है. निर्माण के बाद उसका रखरखाव करना होता है और उसकी रक्षा तो ज़रूरी है ही. देखा गया है कि जो समुदाय आत्मगौरव से ओतप्रोत होते हैं वे स्वतः ही अपने भीतर आत्मविश्वास से भरे हुए जन-समूहों की सृष्टि करते हैं.
अपनी निंदा आप करना बुरी बात है. अपने समुदाय की निंदा करना तो बहुत ही बुरी बात है. यह दूसरों को आपके ख़िलाफ़ बोलने का भरपूर मौका देती है. तुलसीदास ब्राह्मण थे. उन्होंने अपने समुदाय के लोगों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- “पूजिए विप्र जदपि गुण हीना, ना पूजिए अन्य गुण ज्ञान प्रवीना”- अर्थात ब्राह्मण में यदि कोई गुण ना भी हो तो भी वह पूजनीय है. दूसरा कोई गुण और ज्ञान में बहुत प्रवीण हो भी तो भी वो पूजनीय नहीं है. ध्यान रहे कि यह बात तुलसीदास ने अपने समुदाय के लिए कही थी. किसके मुँह से कहलवाई इसका भी कोई महत्व नहीं. तुलसीदास अपने समुदाय की प्रशंसा करना जानते थे और उसी सिलसिले में वे अपने समुदाय के लिए ‘राम-चरित-मानस’ जैसी रचना दे गए. आज की स्थिति यह है कि उनका समुदाय ‘राम-चरित-मानस’ को और तुलसी बाबा को अपने सिर पर उठाए-उठाए फिरता है. ये आत्मगौरव की सीढ़ियाँ हैं. गर्व किसका? जो आपका है, अपना है.
गौरव 'गर्व' से जुड़ा शब्द है. गर्व यदि ज़रूरत से अधिक हो जाए, तर्क से परे हो जाए, कारण-परिणाम की सीमाएँ लाँघ जाए या कह लीजिए कि उजड्ड हो जाए तो उसे अहंकार या दुरहंकार मान लिया जाता है. इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि आत्मगौरव दरअसल एक तरह का अपने प्रति, अपनों के प्रति और अपने जीवन मूल्यों के प्रति आदर है जो साधारण भाषा में आत्मसम्मान कहलाता है. इसे अहंकार नहीं कहा जाता. इस आत्मसम्मान में आदमी की अपनी हैसियत, योग्यताएँ, माल-असबाब, पुरखों की शिक्षा, उसके अपने समुदाय और उसके क्षेत्र की परंपराएँ, प्रणालियाँ, त्योहार, नैतिक मूल्य यहाँ तक कि उसके निजी और उसके समुदाय से संबंधित उत्पाद, कलाएँ, पूजा-स्थल, कारीगर, लोक-गीत, लोक-कलाकार, साहित्य, साहित्यकार, रंगकर्मी, भाषा-बोली, बुद्धिजावी, राजनेता, नौकरशाह, समाज-सेवी  आदि बहुत कुछ होता है. इनका विकास कीजिए, इनको समर्थन दीजिए.
आपका आत्मसम्मान कोई यूँ-ही-सी चीज़ नहीं और यूँ ही नहीं बन जाती. यह प्रेम से सजाई गई उस मूर्ति की तरह है जिसे सजाते-सजाते आप अनजाने में उसकी पूजा करने लगने लगते हैं.

02 December 2017

Megh Chetna - मेघ-चेतना (सितंबर 2017)

ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ऑनलाइन पढ़ी जा सकती है. नीचे के लिंक पर क्लिक कीजिए.



19 November 2017

Divorce? - तलाक?

एक समय था जब हमारे समाज में तलाक़ जैसे मामले नाममात्र के ही थे. वैसे भी वे अदालतों में नहीं जाते थे. पत्नी से संतान नहीं हुई, पति संतान नहीं दे सका, या जीवन साथी किसी भयंकर बीमारी का शिकार हो गया - ऐसे कारणों से शादीशुदा महिलाएँ और पुरुष एक दूसरे से अलग होते रहे हैं. बुज़ुर्ग कहते रहे हैं कि अगर मियां-बीवी में नहीं ही बनती है तो बेहतर है अलग हो जाओ. समाज बहुत समझदार होता है.

लेकिन पिछले चार-पाँच दशकों से तलाक़ के मामले बढ़े हैं. हिंदू मैरिज एक्ट ने मानसिकता को काफ़ी बदला है. तलाक़ के चल रहे एक मामले में मैंने परेशान पति से पूछा कि क्या उसकी पत्नी हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला देती है? उसने हामी भरी. मेरे मुँह से निकल गया कि ‘देन विश यू ऑल द बेस्ट’. उनमें तलाक़ हो गया. यदि किसी के हाथ में हिंदू मैरिज एक्ट की कापी दिख जाए तो उसे ख़तरे की घंटी समझें 😜.

अब बच्चे बहुत पढ़-लिख गए हैं इसलिए किसी उपदेश की ज़रूरत नहीं. लेकिन कुछ संकेत कर देना ठीक होगा. अधिकतर मन-मुटाव छोटी-छोटी बातों पर होते हैं जैसे किसी बात पर वाद-विवाद करना और अपने विचार एक-दूसरे पर थोपने की कोशिश करना, अपने ‘कहने का मतलब’ समझाना वगैरा. ये गुस्से की वजह बन सकते हैं. लेकिन ज़रूरी नहीं कि वहाँ आपसी प्रेम की कमी ही हो. जयशंकर प्रसाद ने लिखा है-
जिसके हृदय सदा समीप है
वही दूर जाता है,
और क्रोध होता उस पर ही
जिससे कुछ नाता है.

झगड़े बढ़ भी सकते हैं. पत्नी मायके चली जाती है और बच्चे टुकुर-टुकुर पप्पा की ओर देखते हैं. प्यार की पप्पी, लाड़-दुलार की झप्पी काम नहीं करती. नाटककार भुवनेश्वर ने कहा है कि यदि शादी के एक वर्ष के अंदर पति-पत्नी का झगड़ा नहीं होता तो उन्हें मनोचिकित्सक (psychiatrist) से सलाह करनी चाहिए. उनके ऐसे असामान्य (abnormal) व्यवहार का इलाज ज़रूरी है. आपसी झगड़े और रार आमतौर पर नार्मल होती है. बस, उसे खींचना नहीं चाहिए.


यदि आप दोनों मियाँ-बीवी आपस में बहसबाज़ी करते हैं, झगड़ते हैं तो बधाई ले लीजिए. मनोचिकित्सकों ने आपकी पीठ थपथपाई है. वे कहते हैं कि जो प्यार दिल (💓) और तितलियों (🦋) से शुरू होता है वो वाद-विवाद (😈) तक स्वभाविक ही पहुँच जाता है. दरअसल यह आपसी संप्रेषण (communication) विकसित होने की प्रक्रिया (process) है. इसमें कुछ चुनौतियाँ हैं. प्रेम, एक-दूसरे का सम्मान ज़रूरी शर्त है. वो बरकरार रहना चाहिए. मनोचिकित्सकों का कहना है कि जो जोड़े तर्क-वितर्क, बहस करते हैं वास्तव में वे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं. एक आलेख का लिंक नीचे दिया है इसे पढ़ लीजिए और आपसी समझ बढ़ाइए.


15 November 2017

It is enough - इतना काफ़ी है

चलिए थोड़े में बात करते हैं. आपके पास भी टाइम कम है और मेरे पास भी.
इंसान धरती पर चला धरती के इतिहास में यह पुरानी घटना नहीं. भाषा, धर्म, उधार लेने की शुरुआत, पूंजी बनाना और पूँजीवादी व्यवस्था तो एकदम नई बातें हैं. इंसान ने कृषिपालन किया या कृषि कार्य ने इंसान को पालतू बना दिया यह विषय सुनने में कठिन ज़रूर लगता है लेकिन भारत में किसानों की लग़ातार आत्महत्याओं ने इस विषय को बेहतर तरीके से समझा दिया है. अनाज पैदा करने और इकट्ठा करके रखने की आदत में इंसानी मुसीबतों की जड़ें देखी गई हैं. पूँजीवाद भी उस आदत को अपना पुरखा मानता है.
हम फैक्ट्रियों में बना भोजन खाने लगे हैं. ऑर्गेनिक खेती नया सेहतमंद नारा है और उसकी ओर लपकना हमारा नया शौक हालाँकि यह महँगा है. कृषि और फैक्टरी से आ रही खाने-पीने की चीज़ों में कैमिकल्ज़ का इस्तेमाल बढ़ा है. वो परिंदों, चरिंदों के साथ-साथ इंसानी शरीर की कैमिस्ट्री पर भारी है. चीनी और फैट्स ने शारीरिक मोटापा दिया. सूचना उद्योग यानि पुस्तकों, अख़बारों, पत्रिकाओं, पोर्नोग्राफ़ी, टीवी, इंटरनेट वग़ैरा ने हमें अच्छा-ख़ासा दिमाग़ी मोटापा गिफ़्ट किया है. जंक फूड यू नो, आप जानते हैं.
हमें बताया गया है कि चिकित्सा-विज्ञान मनुष्य के लिए अमरत्व के तारे तोड़ कर लाएगा. हर देश में युद्ध की तैयारी है. कृषि क्रांति और औद्योगिक क्रांति के साइड इफैक्ट्स एक धोखाधड़ी का अहसास कराते हैं.
प्रकृतिवाद गहरी शिकायत भरी नज़र से पूँजीवाद को घुड़कता है. पूँजीवाद उसे यह कह कर रिलैक्स हो लेता है कि जनसंख्या बढ़ने से जो बोझ पड़ता है उसे पृथ्वी झेल पाए उसका इकलौता उपाय मैं हूँ. मार्क्सवाद गुर्राता है, "मैं यहीं हूँ." पूँजीवाद मुस्करा देता है, "खड़ा रह. अपनी कीमत बता."
सरकारों के सरोकार अलग हैं. वे योजना भिड़ाती हैं कि क्या किया जाए. जनसंख्या पर लोग नियंत्रण नहीं रखते, नहीं रखना चाहते तो क्यों न उन्हें वहाँ छोड़ दिया जाए जहाँ वे सस्ते मज़दूरों की लाइन में हमेशा बने रहें, बाज़ार की उम्मीदी-नाउम्मीदी के खेल में वे ज़िंदगी भर भक्ति और प्रार्थनाएँ पेलते रहें. कुछ पैसा मिलता रहे, कुछ जाता रहे, उधारी-चुकौती चलती रहे. बाज़ार ख़ुश. बहुत हुआ तो हिंदू-मुसलमान-सिख-ईसाई, कांग्रेसी-भाजपाई की बारह गोटी की तरह वे बिछते रहें. धर्म और सियासत ख़ुश. ज़िदगी पार हो गई. आदमी ख़ुश. आबादी पर लोग कंट्रोल न करना चाहें न करें उसे प्रगति के साइड इफ़ैक्ट्स पर छोड़ दें.
आपको नहीं लगता कि दुनिया ठीक-ठाक चल रही है? मुझे तो लगता है. मैं ख़ुश हूँ.



07 November 2017

Myth of Sudama - सुदामा का मिथ

कृष्ण और सुदामा का प्रसंग जो भक्ति साहित्य ने दिया है वो भावुकता भरा है इसीलिए अविश्वसनीय है. एक शक्तिशाली राजा अपने पुराने सहपाठी (क्लासफैलो) की आवभगत करने के लिए भावविह्वल हो कर रोता हुआ,भागता हुआ बाहर आए और उसे अपने सिंहासन पर बिठाकर उसके पांव धोए ऐसा संबंध सहपाठियों में तो नहीं देखा जाता. कथा में कुछ लोचा है. कुछ लोचा कवि सूरदास के पदों में भी है जहाँ वे कृष्ण और सुदामा के मिलन प्रसंग का वर्णन ऐसे करते हैं :-
अब हम जानी तुमहिं वो मूरख
कहाँ रहे तुम कहाँ बसत हो
सुधरे हो या निरे भगत हो।
घरबार संगहिं तुमहिं रहत हो
करम से का तुम अभहिं बचत हो
(अर्थ - अब मैं पहचान गया हूं कि तुम वही मूर्ख हो. बताओ, अब तक तुम कहाँ रहे और अभी कहाँ रहते हो. तुम्हारे अंदर कुछ सुधार हुआ है या अब भी तुम केवल भक्त ही हो. तुम घर-परिवार के संग ही रहते हो या नहीं. और परिश्रम से क्या तुम अभी पहले की ही तरह बचते हो?)
बात समझ में आती है. सुदामा ब्राह्मण था इसलिए कई बातें संकेत रूप में समझ आ जाती हैं. लेकिन शक्तिशाली यदुवंशी राजा कृष्ण उसके पाँव आखिर क्यों धोएगा? नए संदर्भों में यादव यह सवाल पूछने लगे हैं. इसे भी टटोलने की जरूरत है कि सूरदास ने सुदामा को ‘निरे भगत’ क्यों कह दिया. अगर भक्त सूरदास का यह हाल है तो बाक़ी भक्तों का क्या होगा. कबीर को तो मैं 'भक्त' नहीं मानता बल्कि 'मुक्त' मानता हूँ. उनका समय 'मुक्तिकाल' था.
सूरदास का पद Mahendra Yadav जी ने उद्धृत किया है और यह उन्हीं की पोस्ट का पश्चप्रभाव (After effect) है.

02 November 2017

Advocate Hans Raj Bhagat - Some records - एडवोकेट भगत हंसराज - कुछ रिकार्ड


श्री आर एल गोत्रा जी ने ही सबसे पहले एडवोकेट हंसराज भगत जी के बारे में जो बताया था वो मैंने यहाँ दर्ज कर दिया था. जो छुटपुट बातें अन्य से प्राप्त हुई उसे भी साथ ही दर्ज कर दिया. पहला रिकार्ड लुधियाना के श्री सुरजीत सिंह भगत से मिला. उन्होंने तब की पंजाब विधानसभा के सदस्यों की एक फोटो उपलब्ध कराई थी. उन्होंने यह भी बताया कि उनको मिली जानकारी के अनुसार भगत हंसराज जी का बेटा इंडियन एयरलाइंस में था. आज (01-11-2017) को जोधपुर से ताराराम जी ने एक पुस्तक के कुछ पृष्ठों की फोटो प्रतियां भेजी हैं जिनमें तब की पंजाब विधान सभा का कुछ रिकार्ड उपलब्ध है. उससे पता चलता है कि एडवोकेट भगत हंसराज उस विधान सभा के मंत्रीमंडल में पार्लियामेंट्री प्राईवेट सेक्रेटरी रहे थे. नई जानकारी के संदर्भ में आज फिर गोत्रा जी से बात हुई. उन्होंने बताया कि भगत हंसराज भगत का उल्लेख अमेरिका के महान विद्वान मार्क योर्गन्समायर (Mark Juergensmeyer) की पुस्तक ‘रिलीजियस रिबेल्स ऑफ पंजाब’ में भी आया है. उन्होंने यह भी कहा कि जालंधर के कुछ आर्यसमाजी मेघ कहते हैं कि भगत हंसराज ने मेघों को आर्यनगर की ज़मीन का वाजिब हक़ दिलाने के लिए जो मुक़द्दमा किया था उस पर अदालती निर्णय न हो कर बाहर ही समझौता हो गया था. इसकी पुष्टि की जानी बाकी है. कुछ और विवरण ताराराम जी से प्रतीक्षित है.








गज़ट के नीचे बाईं ओर भगत जी के नोटरी के तौर पर नियुक्त होने की बात का उल्लेख है.
This is screenshot from the book 'Religious Rebels of Punjab' written by Mark Juergensmeyer

08 October 2017

Were the Meghs Asuras? - क्या मेघ असुर थे?


अरे नहीं भाई, नहीं थे. वे हमारे आपके जैसे ही इंसान थे. वे वैसे बिलकुल नहीं थे जैसा आपने असुरों के बारे में कथा-कहानियों में पढ़ा-सुना है, या किताबों और कॉमिक्स में छपी तस्वीरों में देखा है. मेघ प्राणवान और शक्तिशाली थे इसमें कोई शक नहीं.

जब मैं छठी क्लास में गया तब 'दैनिक हिंदुस्तान' अखबार पढ़ने की आदत पड़ी. मेरे लिए 'दैनिक हिंदुस्तान' का अर्थ दुनिया से जुड़ाव, दुनिया को देखने की एक बड़ी खिड़की और एक भरी-पूरी संस्कृति था. साथ ही स्कूली सिलेबस, अन्य पुस्तकों और कॉमिक्स (पराग और चंदामामा) आदि के ज़रिए रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं की एक बाढ़ आई जिसका मेरे मन पर प्रभाव पड़ा. उनमें से सागर-मंथन की कहानी इतनी प्रभावशाली थी कि मैं मानने लगा कि मैं जो दुनिया में टिका हुआ हूं इसलिए टिका हुआ हूं क्योंकि मैं सुर या देवता था. अज्ञानता और मूढ़ता कुछ समय के लिए वरदान हो सकती है.

बड़ा होने पर पता चला कि मैं अनुसूचित जाति से हूं और कि मेरे पुरखों से छुआछूत होती रही थी. अब खटका सा होने लगा कि कुछ तो गड़बड़ है. मेरा सामाजिक स्टेटस वैसा नहीं है जैसा समझा था. स्कूल, कॉलेज पूरा हुआ और यूनिवर्सिटी का समय भी अज्ञानता और मूढ़ता में कट गया. नौकरी में आने के बाद एक प्रकार का कन्फ्यूज़न छा गया जब देखा कि दफ्तर में काम करने वाले अन्य लोगों का मेरे साथ व्यवहार ठीक-ठाक है लेकिन आरक्षण की बात उठते ही उनकी नजरों में अचानक कड़ुवाहट उभर आती है. उन दिनों ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं था लेकिन उन जातियों के लोगों के प्रति कइयों का व्यवहार आमतौर पर उतना सम्मानजनक नहीं था. सब से बुरी ख़बर तब मिली जब वर्ष 2010 और 2011 के दौरान मैंने कहीं पहली बार पढ़ा कि आज की अनुसूचित जातियों के लोगों को ही पौराणिक कथाओं में असुर या राक्षस कहा गया है. मेरे लिए यह एक तरह का झटका था जिसने मुझे सोच के एक अलग धरातल पर ला खड़ा किया. जब तक यह जानकारी लिखित और बड़े रूप में मुझ तक पहुँची तब तक मेरे जीवन के 60 साल निकल चुके थे और मैं एक पिछड़ा हुआ बच्चा था. ख़ैर, इस बीच यह भी पता चला कि भारत में एक आदिवासी (मूलनिवासी) असुर जाति है जो बंगाल, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश में मिलती है.

हालाँकि कबीर, रविदास आदि संतों, ज्योतिबा फुले, पेरियार, अंबेडकर आदि बहुतों को पौराणिक हेराफेरी (फ़्रॉड) की जानकारी थी लेकिन मेरे परिवार और पुरखों को नहीं थी. न ही वैसी कोई जानकारी उनके ज़रिए मुझे मिल पाई. हमारा मेघ भगत परिवार था जो निपट भगत था. मूलनिवासी होने वाली बात बहुत देरी से पता चली. लेकिन उसकी डिटेल स्पष्ट नहीं थी. अपनी अधूरी जानकारी का प्रयोग मैंने कुछ जगह किया लेकिन उसके साथ यह उल्लेख ज़रूर किया कि पुराणों में असुरों और राक्षसों का वो चित्रण भारत के मूलनिवासियों का है जो जातिवादी घृणा से प्रेरित है. इधर सोशल मीडिया से पता चला कि मेरे समुदाय के कुछ लोगों ने यह बात फैला दी कि मैंने मेघों को असुर या राक्षस बताया है. यह सच नहीं था. अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी की भद्दी छवि बनाने का काम तो पौराणिकों और वैसी कहानियाँ लिखने वालों का था. सच यह भी है कि मुझे असुर शब्द की कम जानकारी थी. अन्य की तरह मैं मानता था कि जो 'सुर' (देवता) नहीं है वह 'असुर' है, उसके दांत बाहर को निकले हुए लंबे-लंबे होते हैं, उसके सिर पर सींग होते हैं, उसके नाखून बड़े-बड़े और उसकी नाक मोटी होती है, वो काला और मोटा होता है, उसके पैर की हड्डियाँ बेढब होती हैं, वो मनुष्यों को खा जाता है, भयानक दिखता है वगैरा. वैसे पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि पुराणों में किए गए ऐसे चित्रण के पीछे स्वार्थ भरी घृणा है.

वो 'असुर' वाला विषय मेरी पिछली पोस्ट ‘मुअन जो दाड़ो से मेलुख्ख तक’ के सिलसिले में फिर से उभरा जब एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में कहा कि - "Sir according respected RIGVEDA Vritra Was a asura ab iska matlab ki hum sab megh asur hain reply if possible" ('सर, सम्मानित वेदों के अनुसार वृत्र असुर था अब इसका मतलब कि हम मेघ असुर हैं. मुमकिन हो तो जवाब दें'). किस्मत अच्छी थी कि अभी हाल ही में 'असुर' शब्द के बारे में नई जानकारी मुझे मिली थी जिसके आधार पर उस पाठक को उत्तर दिया. लेकिन महसूस किया कि वो जानकारी मेघनेट पढ़ने वालों को एक ही बार में बेहतर तरीके से दे दी जाए.

कई मेघ किसी 'वृत्र', 'वृत्रासुर' (वृत्र+असुर), जिसे ऋग्वेद में 'प्रथम मेघ' (या मेघऋषि) भी कहा गया है, उसके होने या उसका वंशज होने में विश्वास नहीं रखते. वेरिगुड. उनको 'असुर' शब्द से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. जिनके लिए समस्या है वे इसे आगे पढ़ते रहें.

असुर का पुराना और सही अर्थ राक्षस जैसी छवि का नहीं है. वैदिक कोश में लिखा है कि असुर वो है जो असु (प्राण, जीवन) दे, जो प्राणवान हो. संस्कृत के विद्वान और डिक्शनरी लिखने वाले वी.एस. आप्टे ने 'असु' का अर्थ 'प्राण' किया है. वेद में इंद्र देवता को 'असुर' कहा गया है. कृष्ण को भी असुर कहा गया है. असुर में "अ" को उपसर्ग समझ लेने की वजह से एक ग़लतफ़हमी में 'सुर' शब्द पैदा हुआ है. हाँ, असु+र होगा. अ+सुर नहीं होगा. 'सुर' शब्द का कोई अपना अलग अस्तित्व नहीं था। (असली शब्द असु+र है न कि अ+सुर. ऐसा प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का कहना है.) असुर शब्द की भद्दी व्याख्याएँ वेदों की रचना के बाद लिखी गई हैं. वैसे यह कहना भी मुश्किल है कि पिछले 2000 या 1600 साल में वेदों में कितनी बार और कितने परिवर्तन किए गए हैं.

इस लिए इसे साफ़ तौर पर समझ लेना चाहिए कि अगर किसी भी अर्थ या संदर्भ में मेघों या किसी अन्य (असुर जनजाति सहित) के साथ 'असुर' शब्द आ जुड़ता है या जुड़ता हुआ प्रतीत होता है तो उसका अर्थ प्राणवान या शक्तिमान के अर्थ में लिया जाना चाहिए. 'बादल' के अर्थ में 'मेघ' शब्द का अर्थ धरती में जान-प्राण डालने वाला और 'जगत का प्राण' भी होता है. असुर शब्द के अर्थ से संबंधित प्रमाण नीचे दे दिए गए हैं.



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27 September 2017

From Mohanjodaro to Melukhkh - मोहनजोदड़ो से मेलुख्ख तक

कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं होता. लगातार पढ़ने, लिखने और शोध करने से वह समृद्धि होता है.
जिसे कभी हम 'सिंधुघाटी सभ्यता' के नाम से पढ़ते थे उसे अब आर्कियोलॉजिस्ट 'हड़प्पा सभ्यता' कहना पसंद करते हैं. पहले जिसे हम स्कूल के दिनों में 'मोहनजोदड़ो' शहर के नाम से पढ़ते थे उसमें परिवर्तन हुआ है. शोधकर्ताओं ने बताया कि वह शब्द वास्तव में मोहनजोदड़ो न हो कर ‘मुअन जो दाड़ो’ है जिसका अर्थ होता है ‘मुर्दों का टीला’ या 'मरे हुओं का टीला'. ‘मुअन’ शब्द पंजाबी के ‘मोए’ और हिंदी के ‘मुए’ शब्द का लगभग समानार्थी है. इस शहर को यह नाम शायद इसलिए दिया गया कि वहां बहुत से लोग मर गए थे या मार डाले गए थे. लेकिन अब आगे खोज बता रही है कि 'मुअन जो दाड़ो' भी उसका असली नाम नहीं था. प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सिंह (यह फेसबुक का लिंक है) ने बताया है कि उस शहर का नाम ‘मेलुख्ख’ था. यह शब्द मेसोपोटामियाई अभिलेखों और साहित्य से प्रकाश में आया है.
हमने कभी पढ़ा था कि सिंधुघाटी सभ्यता के क्षेत्र में खुदाई के दौरान मोहनजोदड़ो के निशान मिले हैं लेकिन अब नई खोज है कि सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में जहां बौद्ध स्तूप मिला था उस स्तूप के नीचे की खुदाई में 'मुअन जो दाड़ो' शहर मिला और कि उसी शहर का असली नाम ‘मेलुख्ख’ था.
यह सब इसलिए नोट कर लिया है क्योंकि भारत के लगभग सभी मूलनिवासी लोग जब अतीत की यात्रा पर निकलते हैं तो वे सिंधुघाटी, हड़प्पा, मुअन जो दाड़ो तक ज़रूर पहुँचते हैं. अब वे मेलुख्ख शहर से भी ग़ुज़रेंगे.

इतिहास रुका हुआ पानी नहीं है. यह प्रवाहमान है. यायावरी है.

23 September 2017

Megh Matrimonial - मेघ मैट्रिमोनियल

जब से मेघ समाज में शिक्षा का लेवल बढ़ा है तब से शादियों के लिए रिश्ते ढूंढने में लोगों को कठिनाई महसूस होने लगी है.  यह कठिनाई तब से और बढ़ी है जब से सरकारी नौकरियां कम हो गई हैं.
इस समस्या को कम करने के लिए लोग अपने-अपने तरीके से जुगत करने की सोचते हैं. कई वर्ष पहले ‘मेघ चेतना’ पत्रिका ने मैट्रिमोनियल सेवा देने का कार्य शुरू किया था. इससे काफ़ी लोगों को लाभ हुआ. आगे चलकर कुछ उत्साही लोगों ने इंटरनेट पर ब्लॉग, फ़ेसबुक आदि के माध्यम से मैट्रिमोनियल सेवा दी. इससे भी लोगों को फ़ायदा हुआ. पिछले डेढ़ साल के दौरान WhatsApp पर मैट्रिमोनियल ग्रुपों को लेकर काफी खींचतान देखने में आई थी. कई लोग 'एडमिन-एडमिन' खेल में कूद पड़े. पूरे के पूरे ग्रुप हाइजैक हो गए या फिर किडनैप कर लिए गए. उनमें जो हुआ अच्छा-बुरा, खट्टा-मीठा उसमें मैं नहीं पड़ता. उसे सेवा करने का अति उत्साह मानता हूँ. एक अच्छा परिणाम यह सामने आया कि बाबू भगत गोपीचंद जी की दोह्ती (दुहिता) और दिल्ली में एडवोकेट सुनीता भगत ने एक भरी-पूरी वेबसाइट बनाई जो काफ़ी यूज़र फ्रेंडली है. एडवोकेट सुनीता भगत की वेबसाइट का लिंक ऊपर पेजेस में Megh Matrimonial नाम से लगा दिया है. यदि और भी ऐसी कोई यूज़र फ्रेंडली वेबसाइट मिली तो उसे भी लिंक किया जा सकता है.
रिश्ते न मिलने की कठिनाइयों के कई कारण हैं जिनमें से एक यह भी है कि सरकारी नीतियों के कारण रोज़गार पैदा होने की जो उम्मीदें हैं उनके पूरा होने में समय लग रहा है. आगे चल कर क्या होगा पता नहीं, लेकिन नौजवानों में बेचैनी और गुस्सा बढ़ा है. कई युवाओं की शादी इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि वे ऐसी प्राइवेट नौकरियों या कंट्रेक्ट बेसिस वाली नौकरियों में हैं जहाँ नाममात्र का मानदेय दिया जाता है. हमारे कुछ उद्यमियों ने व्यापार में कदम रखा है और सफल रहे हैं. भविष्य में प्राइवेट नौकरियों और अपने कारोबार की राह युवाओं को पकड़नी होगी.
पूरे भारतीय समाज में आर्थिक असुरक्षा का वातावरण बना है. रोज़गार की निरंतरता की कोई गारंटी नहीं. जीवनसाथी मिलने के बाद साथी और बच्चों का क्या होगा इसका ख़्याल पढ़े-लिखे समाज को आएगा ही. युवा तबका शादियों का विचार टालने लगा है. जब उनके हारमोंस सिर को चढ़ेंगे तो वे कहाँ-कहाँ तोड़-फोड़ मचाएँगे पता नहीं. यह माहौल भविष्य में हमारे सामाजिक मूल्यों को पूरी तरह बदल डालने की ताक़त रखता है. बेहतर है कि रिश्ते ढूँढते समय नए हालात को स्वीकार करते हुए आगे चलें. यह कठिनाई सब की है.

17 September 2017

Social boycott, A Social Evil - सामाजिक बहिष्कार, एक सामाजिक बुराई

कबीलाई संसार में सामाजिक बहिष्कार की सज़ा को सबसे बड़ी सज़ा माना जाता था. वैसे तो दुनिया के कुछ भागों में पत्थर मार-मार कर मार डालने या ऐसी ही अमानवीय सज़ाएं देने की प्रथा थी. लेकिन मानवाधिकारों को मान्यता मिलने के बाद से उन कबीलाई परंपराओं में काफ़ी सुधार आया है. हालाँकि सामाजिक बहिष्कार, हुक्का-पानी बंद करने जैसी प्रताड़ना देने का रिवाज़ खापों और शासकीय प्रणाली का हिस्सा कहलाने वाली पंचायतों में आज भी किसी न किसी रूप में खुले या चोरी-छिपे से जारी है. कई बार तो ये संस्थाएँ न्यायालयों का मज़ाक उड़ाती दिखती हैं. मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रियता आने की वजह से अब ऐसी सज़ाएँ देने वाली संस्थाएँ कुछ शर्माने लगी हैं.
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ऐसी अमानवीय रीतियों के ख़िलाफ़ धार्मिक और दक्षिणपंथी राजनीतिक संस्थाओं ने कभी आंदोलन किया हो याद नहीं पड़ता. इन्हें परंपरा को ढोने वाली संस्थाओं के रूप में अधिक जाना जाता है. इनकी रुचि समाज सुधार में कम और अपने व्यवसाय को चलाए रखने में अधिक होती है. सामंतवाद इसी परंपरा का वाहक है और जनक भी. यह सामाजिक बहिष्कार जैसे मारक हथियार का प्रयोग अपने हित में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाता है. सामाजिक बहिष्कार के शिकार अधिकतर ग़रीब, दलित और महिलाएँ होती हैं. वे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए किसी पर निर्भर होते हैं. यदि वे अपने सामान्य से अधिकार के लिए मांग उठाते हैं तो सामाजिक बहिष्कार का सांप उनकी आँखों के सामने कर दिया जाता है. उसे डराया जाता है कि उसके अपने ही उसे ख़ुद से दूर कर देंगे. ग़रीब के ख़िलाफ़ ग़रीब, दलित के ख़िलाफ़ दलित और महिला के ख़िलाफ़ महिला को खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. ऐसे में आर्थिक और सामाजिक रूप से ‘अपनों’ पर निर्भर व्यक्ति अपने आप अपने अंतर में मरने लगता है. सामंतों और उनके गुंडों के प्रभाव में जीने वाले लोग काफी मजबूर होते हैं.
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याद रहे कि जातिवाद सामाजिक बहिष्कार की देन है. यही कारण है कि सामंतवादी परंपराओं के कुप्रभावों से टक्कर लेने और सामाजिक बहिष्कार जैसी परंपराओं के विरुद्ध लड़ने में वामपंथियों ने ही कुछ कार्य किया है.
आज के वैज्ञानिक युग और लोकतंत्र में सामाजिक बहिष्कार जैसी अमानवीय प्रथाओं का विरोध सभ्य और शिक्षित समाज करना पड़ेगा. ख़तरा छोटा नहीं है. पिछले तीन साल के राजनीतिक माहौल ने जातिवाद और सामाजिक बहिष्कार के भय को बढ़ाया है. जाति और जातिवाद के इस्तेमाल को लेकर तो सभी सियासी पार्टियों और मीडिया ने अपने कपड़े उतार फेंके.
ध्यान रहे कि सामाजिक बहिष्कार और शुद्धिकरण एक कुचक्र है. छुआछूत, ग़रीबी, और भ्रष्टाचार इसके मुख्य उत्पाद (major product) हैं. इनका सिलसिला तब तक नहीं टूटता जब तक चालू व्यवस्था को पूरी तरह तहस-नहस करके नई व्यवस्था न बनाई जाए. इसके लिए बड़े सामूहिक प्रयास की ज़रूरत होती है.
सामाजिक बहिष्कार पर काबू पाने के लिए महाराष्ट्र की सरकार ने क़ानून बनाया है और छत्तीसगढ़ की सरकार इस दिशा में कदम उठाने जा रही है. क़ानून बनाना बहुत आसान है. उसे लागू करने वाली एजेंसियों का क्या कीजिएगा जिनके भीतर जातिवाद (सामाजिक बहिष्कार) भरा हुआ है? ख़ैर, पहले तो क़ानून बनाने का स्वागत करना चाहिए.
एक समाचार का लिंक.

“सामाजिक बहिष्कार मृत्युदंड से भी बड़ी सज़ा है.” - डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर.

01 September 2017

A reference from Dr. Naval Viyogi - डॉ. नवल वियोगी से एक संदर्भ

श्री एन.सी. भगत ने कई वर्ष तक ऑल इंडिया मेघ सभा की पत्रिका ‘मेघ चेतना’’ का कार्यभार देखा है और पत्रिका को चलाए रखा है. उनसे डॉक्टर नवल वियोगी की पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’ के बारे में बातचीत हो रही थी. उस उस पुस्तक में मेघों के बारे में जिक्र है और यह उस काल से संबंधित है जिसे पहले ‘अंधकारकाल’ के नाम से इतिहास में पढ़ाया जाता था. सौभाग्य से भगत जी के पास यह पुस्तक उपलब्ध थी. उन्होंने वह पुस्तक मुझे दी. इस पुस्तक में दो जगह मेघों का उल्लेख है. पुस्तक के उन दोनों पृष्ठों की फोटो नीचे दी गई है. इसमें क्या लिखा है पढ़ लीजिए. यह उन लोगों के लिए अधिक लाभकारी होगा जो मानते हैं कि मेघों का अतीत बहुत पुराना नहीं है और कि वे जम्मू और स्यालकोट से होते हुए भारत विभाजन के बाद जालंधर, अमृतसर आदि जगहों पर आ बसे थे. इससे अधिक टिप्पणी की आवश्यकता नहीं.


श्री एन.सी. भगत ने बताया कि डॉ. नवल वियोगी अपनी एक अन्य (संभवतः मेघ समुदाय पर अधिक प्रकाश डालने वाली) पुस्तक का लोकार्पण मेघ समुदाय के एक जन-प्रतिनिधि से कराना चाहते थे. लेकिन वो हो न सका. शायद डॉ. नवल वियोगी उक्त विषय पर एक व्याख्यान देने के भी इच्छुक थे. लगभग दो वर्ष पहले डॉ. नवल का देहावसान हो गया था.



15 August 2017

Bahujan Media - बहुजन मीडिया


पिछले दो दशकों के दौरान लगातार सुनने में आता रहा कि दलित साहित्य की एक अलग श्रेणी बन रही है. फिर दलित साहित्य अकादमी की बात चली. दलित साहित्य के साथ-साथ ओबीसी साहित्य की बात होने लगी. कबीर बहुत ही सुविधापूर्वक खिसक कर ओबीसी साहित्य में चले गए. इसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रमुख भूमिका रही. आख़िर कबीर की वाणी में प्रयुक्त बिंब और प्रतीक मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं.  
अब बात करते हैं दलित मीडिया की. सामान्य तौर पर देखा जा रहा मीडिया चाहे वो इलैक्ट्रॉनिक हो या प्रिंटेड उसमें बहुजन की बात अक्सर नहीं होती. यहां एक बहुत बड़ा गैप था जिसे भरने के लिए कई उत्साही लोग और समूह सामने आए. ऐसे चैनलों में से सबसे पहले ‘नेशनल दस्तक (National Dastak)’ का नाम आता है जिन्होंने YouTube पर अपना मीडिया खड़ा करने का सफल और सशक्त प्रयास किया है. मेरी जानकारी के अनुसार दूसरे नंबर पर आवाज़ इंडिया है जिसके फॉलोअर एक लाख पचपन हज़ार हैं. उनके साथ ही ‘दलित दस्तक’ ने भी YouTube पर अपनी हाजिरी दर्ज कराई. श्वेता यादव ने ‘टेढ़ी उंगली’ नाम से कई राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने का कार्य शुरू किया है. मेघ समुदाय से श्री सतीश ‘विद्रोही’ ने जम्मू से अपना एक यूट्यूब चैनल Young India चलाया है. फिलहाल यह न्यूज़ चैनल नहीं है लेकिन कभी स्थानीय समाचारों और समस्याओं पर खुल कर बोलता है. इन दिनों नेशनल इंडिया न्यूज़ भी उभरा है.
चैनल चलाने के लिए Facebook ने भी 'फेसबुक लाइव' नाम से एक मंच दिया है जिस से कोई भी किसी घटना को सीधे अपने फेसबुक दोस्तों तक लाइव पहुँचा सकता है.
जितना मैंने देखा है फेसबुक के लाइव स्ट्रीम का प्रयोग प्रचार के लिए अधिक हुआ है. नोटबंदी के बाद से MOJO (mobile journalism) का प्रयोग देखा है. ज़रूर कई कैमरामैन बेरोज़गार हुए होंगे. लब्बोलुआब यह कि प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘बहुजन मीडिया’ या ‘बहुजन एंकरों’ और पैनलों में 'बहुजन' की हाजिरी चाहे बहुत कम हो लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुजन मीडिया की मंथर गति ध्यान खींचती है. ऐसा देखने में आया है ‘नेशनल दस्तक’, ‘आवाज़ इंडिया’, ‘पल-पल न्यूज़ (P2N)’ और ‘दलित दस्तक’ ने अपनी पत्रकारिता में परिपक्वता दिखाई है. मेरी नज़र से नेशनल दस्तक काफी ताक़तवर हो कर उभरा है जिसके आज 4 लाख 19 हज़ार से अधिक सब्स्क्राइबर हैं.

बहुजन मीडिया अस्तित्व में आया है यह बड़ी बात है. चलते-चलते और एक बात. सभी चैनलों का लगाव किसी न किसी सियासी पार्टी से होता है. उनके चैनल का रंग भी पार्टी के पसंदीदा रंग से प्रेरित हो सकता है. रंगों के मामले में EO&E (भूल-चूक लेनी-देनी). 🙂

11 August 2017

एक और पड़ाव

मुश्किल तो है पर ऐसी मुश्किल भी नहीं जिसका अनुमान न लग सके या उसे जीया ना जा सके. शरीर एक तरफा (वन वे) टिकट लेकर आया हुआ है उसी दिशा में उसे बढ़ना है. लौटने का रास्ता बना नहीं.
मैंने इंटरनेट पर काफी यात्रा की है. थका हुआ भी महसूस करता हूं लेकिन जो मिशन लेकर चला था उस पर कुछ कार्य किया है, कुछ और कार्य करने का विचार अभी बाकी है. यह एक यायावरी है. सामने रास्ता है तो चलने को दिल करता है. कुछ और आगे दिखता है तो उस ओर बढ़ जाता हूँ. लगता है यह लक्षण ठीक ही है. आने वाले दिनों में आँख का ऑपरेशन है. कुछ दिन चिट्ठाकारिता (ब्लॉगिंग) से दूर रहना होगा. डॉक्टर ऐसी सलाह देते हैं. पहले एक ऑपरेशन करवाया था तो आँख की सीमाओं का पता चला था लेकिन चलने का जुनून खींचता रहा.
आशा है सीमाओं का वो भरम भी मिटता रहेगा. ब्लॉगिंग की यात्रा में मेरे पुराने सहयात्रियों अमृता तन्मय, दिगंबर नासवा और महेंद्र वर्मा जी के लिए शुभकामनाएँ. मुझे ब्लॉगिंग सिखाने वाले श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ का आभार व्यक्त करता हूँ. ब्लॉगिंग की राह अभी बाकी है. जल्दी ही मिलेंगे.

06 August 2017

Social Media a must - सोशल मीडिया एक ज़रूरी चीज़



अधिक जानकारी देने वाला अंग्रेज़ी में लिखा एक आलेख आप ऊपर फोटो पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं..

25 July 2017

Excessive thinking - अति सोच


किसी भी उड़ने वाले और छोटे दिखने वाले पक्षी को चिड़िया कह दिया जाता है. दूसरे प्रकार की अभिव्यक्ति में ‘ब्राह्मणी चिड़िया’ जैसा शब्द है. कभी-कभी मैं भी ‘मेघनी चिड़िया’ कह देता हूं. यह प्रेम और मासूमियत की देन है. चिड़िया एक छोटी-सी चोंच भी हो सकती है और एक ‘पिद्दी’ का शोरबा भी.
एक अन्य संदर्भ में चिड़िया 'विचार' है. तनाव (टेंशन) को लेकर एक मैनेजमेंट गुरु ने इस तरह समझाया था, “इंसान का दिमाग़ एक घोंसले की तरह है जिस के आसपास विचारों की चिड़ियाएँ उड़ती रहती हैं. आपस में झगड़ती हैं अपनी जगह बनाने के लिए. क्योंकि दिमाग़ का घोंसला आपका है इसलिए आपकी मर्ज़ी है कि किस चिड़िया को आप वहाँ बैठने देते हो. चिड़िया अधिक हो गई तो आप के घोंसले में घमासान मचेगा. टेंशन हो जाएगी. इसलिए उसी चिड़िया को वहां बैठने दो जिसे आप वहाँ बैठने देना चाहते हो.”
बहुत सुकून मिला था ऐसे गुर (गुरु) की प्राप्ति पर. लेकिन रिटायर हो कर हम फँस गए गुरु जी. मोबाइल टावर लगने के बाद शहर की सारी चिड़िया लुप्त हो गई. दूसरी ओर टावर के ज़रिए फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप्प के तहत जैसे चिड़ियों के अनगिनत ब्रीडिंग सेंटर खुल गए. अब दिमाग में चीं-चीं, चैं-चैं, कैं-कैं चलता ही रहता है. ख़बरिया चैनल, फिल्मी चैनल और विज्ञापन ग्ड़ैं-ग्ड़ैं करते रहते हैं. अब गुरु जी का कहना है कि केवल ब्लॉगिंग पर ध्यान दो. ठीक है, जैसी मैनेजमेंट गुरु की आज्ञा !

तो वाट्सएप्प उड़, ट्विटर उड़, फेसबुक उड़. यूट्यूब उड़ ! 🕺

22 July 2017

Our Social Organisations - हमारी सामाजिक संस्थाएँ


सामाजिक संस्थाओं का बहुत महत्व होता है. समाज के विकास में उनकी एक सशक्त भूमिका होती है जब वे बहुत ही जीवंत और सक्रिय रूप से स्पष्ट नज़रिए और बड़े लक्ष्य के लिए कार्य कर रही हों.
अनुभव में आया है कि किसी भी सामाजिक संस्था के सभी सदस्य एक साथ इकाई के रूप में कार्य नहीं करते. सक्रिय सदस्य बहुत कम होते हैं. उनमें से भी ऐसे सदस्य बहुत कम होते हैं जो स्वतःस्फूर्त (Self Motivated) हों. मैनेजमेंट के अध्ययन बताते हैं कि ख़ुद ही आगे बढ़ कर कार्य करने वाले सदस्यों की संख्या लगभग 5% होती है.
मेघ समाज में कार्य कर रही अधिकतर संस्थाओं की गतिविधियां बहुत कम है. वैसे भी उनकी रिपोर्टिंग एक तो कम होती है दूसरे जो होती भी है उसमें पर्याप्त विवरण नहीं होता. यही कारण है कि वे डिफंक्ट-सी नजर आती हैं. दूसरी ओर उनका नज़रिया इतना तंगदिली वाला है कि वे किसी भी मक़सद से एक दूसरे के साथ अपना मंच साझा करने से कतराती हैं. उनकी चौधराहट कितनी भी मरियल क्यों न हो वो अपने खोल में खुश है.  इससे मेघ समाज की युवा पीढ़ी बेचैन है. कुछ युवाओं ने टेलीफोन पर अपनी भावनाएं बताई हैं.
किसी सामाजिक संस्था के पदाधिकारी के तौर पर मेरा अनुभव बहुत कम है. लेकिन मैंने कुछ सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को नजदीकी से देखा है. उनके सक्रिय कार्यकर्ता अधिकतर साठ पार के होते हैं और नए आइडियाज़ को लेकर उनकी रफ्तार बहुत धीमी होती है. वे नई टेक्नोलॉजी और उसके प्रयोग से वाकिफ़ नहीं होते जो प्रतिदिन बदल रही है. वे उससे बचते हुए निकलते हैं. इसमें उनका दोष नहीं. आखिर उम्र भी कोई चीज है.
युवाओं की समस्याओं का स्वरूप बदल चुका है. वे कई कारणों से पुराने लोगों के साथ नहीं चलते, नहीं चल सकते. उनका जीवन संघर्ष पहले के मुकाबले बहुत अधिक है और उसके नए आयाम (डायमेंशंस) हैं. सीधी बात है कि सामाजिक कार्य के लिए वे समय एफ्फोर्ड नहीं कर सकते. दूसरे आजकल वे जिस प्रकार के वातावरण में रह रहे हैं उसमें उन्हें मानद (honorary) सामाजिक कार्य की प्रासंगिकता दिखाई नहीं देती. जो कुछ उन्होंने पढ़ा है वो भोजन बन जाए यही उनकी प्राथमिकता होगी. सीनियर्स और युवाओं के बीच तालमेल हमेशा से मुश्किल रहा है. ऐसी हालत में सीनियर्स सामाजिक कार्य के लिए अधिक उपयोगी हो जाते हैं.
वैसे तो पचास पार के व्यक्तियों में अक्सर कुछ महत्वाकांक्षाएँ (एंबिशंस) उभर आती हैं जो उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं. कुछ तो बड़ी सामाजिक/राजनीतिक महत्वाकांक्षा के मालिक होते हैं, कुछ के लिए यह टाइमपास होता है और कुछ गंभीर कार्य में विश्वास वाले होते हैं. लेकिन एक फैक्टर उन पर तब भारी पड़ता है जब उनका साथ देने वाले कार्यकर्ता कम रह जाएँ. इससे हौसला कम होता जाता है और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है. लेकिन वे संस्थाएँ ऐसे हालात में भी बेहतर काम कर पाती हैं जो अपना रिकार्ड सिस्टेमैटिक तरीके से रखती हैं और कार्य को नियमित बनाती हैं. इससे कार्यकर्ताओं पर बोझ कम पड़ता है.
एक अन्य बात भी अक्सर देखी गई है कि सामाजिक संस्थाएँ अपने लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित कर लेती हैं जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी उन्हें नहीं होती. ये लक्ष्य कई बार ऐसे होते हैं जिनमें अग्रिम रूप से विशेषज्ञ प्लानिंग की दरकार होती है. यानि लक्ष्य की साध्यता के बारे में विचारों की स्पष्टता ज़रूरी होती है. कई बार बड़ी संख्या में सदस्यों से प्राप्त भावुकता भरे सुझावों को लक्ष्य बना लिया जाता है जिसके पीछे व्यावहारिक नज़रिया नहीं होता. इससे बाद में निराशा पैदा होती है.
सच यह भी है कि बड़े सपने बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की बड़ी वजह बन जाते हैं.🙏