25 May 2017

Mrs, Shashi Bhatia - our pride - श्रीमती शशि भाटिया - हमारा गौरव

पंजाब के मेघ भगत श्री मिल्खीराम भगत, पीसीएस को बहुत आदर से याद करते हैं. उनका व्यक्तित्व बहुत प्रेम भरा था और वे हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहते थे. उनके सभी बच्चे पढ़-लिख कर अच्छे पदों पर गए या समाज-सेवा के कार्य में लगे. 17 मई, 2017 को उनकी बेटी श्रीमती शशि भाटिया केनेडा से आई हुई थीं और ऑल इंडिया मेघ सभा के अनुरोध करने पर उन्होंने चंडीगढ़ में उपस्थित सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा किए. उनके उद्बोधन के ज़रिए उनके जीवन के कई अनजाने पक्ष सामने आए जिन्हें उपस्थितों ने बड़े शौक से सुना और सवाल भी किए. यह बहुत ही सुखद अनुभव रहा. इसके अलावा उन्होंने मुझे एक अलग से इंटरव्यू देना भी स्वीकार किया जिसे वीडियो के तौर पर MEGHnet पाठकों के लिए संभाल कर रख लिया है जिसे आप नीचे यूट्यूब लिंक पर देख सकते हैं.

केनेडियन आर्म्ड फ़ोर्सिस ने शशि भाटिया को एक प्रभावी व्यक्ति के तौर पर भर्ती किया है. “A new commemorative medal was created to mark the 2012 celebration of the 60th anniversary of Her Majesty Queen Elizabeth ll's accession to the Throne as Queen of Canada. Among seven of Durham Region recipients Shashi Bhatia daughter of late Mr. M.R. Bhagat was honored to receive Queen's Elizabeth ll Diamond Jubilee Medal during the Durham Regional Police Service ceremony on September 14, 2012 in Ajax, Ontario Canada.” इस अवसर पर मैडल के साथ उन्हें एक प्रशस्तिपत्र भी दिया गया. मेघ समुदाय उनकी इस उपलब्धि पर गर्व महसूस करता है.





19 May 2017

Megh Civility - मेघ सभ्यता

हमारा जो भी इतिहास मिलता है वो हमने नहीं लिखा दूसरों ने लिखा और वो जो लिखना चाहते थे वो उन्होंने अपने आत्मगौरव (self pride) के लिए लिखा और उसे अपने हक़ में भुनाने के लिए लिखा. इसीलिए क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में हमें अपना कुछ नहीं मिलता. मेघ जाति सदियों तक शिक्षा से वंचित रही. अपना अतीत पूछती रही. दूसरों ने जितना बताया उतना मानती रही. शिक्षित होने के साथ मेघों को नई जानकारियाँ मिलने लगी है. वैज्ञानिक सोच आने लगी है.


मेघों को यदि मानवजाति विज्ञान (Ethnology) के अनुसार देखना हो और मूलनिवासी की कसौटी पर कसना हो तो ऐसे उल्लेख मिल जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि मेघों ने आर्यों से पहले आकर सिंधु दरिया के आसपास अपनी बस्तियाँ बसाईँ. मेघों को कोलारियन ग्रुप का कहा गया है जो सेंट्रल एशिया से इस क्षेत्र में आ कर बसा था. जो समूह सबसे पहले आ कर बसा उसे ईरान में तूरानियन (तूरान नामक स्थान के लोग) कहा गया है. वो तूरानियन ग्रुप मंगोलॉयड था. यह ग्रुप ईरान की ओर से हो कर नहीं आया. 'तूरानियन' को संस्कृत में किरात कहा गया. दूसरा कोलारियन मंगोलॉयड ग्रुप असम की ओर से भारत में आया और उसका संपर्क द्रविड़ियन रेस से हुआ. उस ग्रुप को संस्कृत में निषाद कहा गया. जो उत्तर-पश्चिम में कोलारियन ग्रुप बसा वो आर्यों और मुग़लों के संपर्क में आया. इस कोलारियन ग्रुप के लोगों का रंग आमतौर पर गेहुँआ होता है. लेकिन इनमें बहुत गोरे और काफी साँवले रंग के लोग भी पाए जाते हैं. यह रक्तमिश्रण की कहानी है जो पूरे विश्व में एक फिनॉमिना है. लेकिन कोलारियन एक ऐसा सांस्कृतिक ग्रुप है जिसकी अपनी एक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था थी.


मेघों का आर्यसमाज में आना-जाना हुआ तो उन्होंने वेदों का गुणगान सुना और माना. धर्म में वेदों-पुराणों की इतनी महिमा गाई गई कि हम आदतन अपना पिछोकड़ (इतिहास) वहीं ढूँढने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक बात को समझने की ज़रूरत है कि आर्य ब्राह्मणों ने जो साहित्य लिखा वो अपने आत्मगौरव के लिए लिखा है. उसमें दूसरों की जगह कम है. यह बात भी समझ लेनी ज़रूरी है कि यदि वेदों-पुराणों में इतिहास ढूँढने की बात करनी हो तो पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि वेद लिखे कब गए थे. अब भाषाविज्ञानी इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि संस्कृत भारत की सब से पुरानी भाषा नहीं है. दूसरे यह भी जानना पड़ेगा कि वेदों में नायक कौन है और खलनायक कौन है. वेदों में इंद्र आर्यों का हीरो है. उसके विरोध में जो लोग खड़े हैं वे असुर और राक्षस हैं जिन्हें आजकल मूलनिवासी कहा जाता है. मूलनिवासियों को वैदिक और पौराणिक कथाओं में निहायत गंदे तरीके से दिखाया गया. वे मूलनिवासी लोग यूरेशिया की ओर से आए आक्रमणकारी आर्यों से अपने दरियाओं के पानी, जंगलों और ज़मीन की हिफाज़त कर रहे थे. वे नए दुश्मन का सामना कर रहे थे जो बहुत बर्बर था. कहते हैं कि लगभग 500-600 वर्ष तक चले युद्धों के बाद वे आर्य यहाँ के दरियाओं और उसके आसपास की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गए और हारे हुए लोगों को उन्होंने गुलाम बना लिया जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था. उस जीत का बखान और अपना गौरवगान आर्यों ने वेदों और उसके बाद लिखे अपने ग्रंथों में दर्ज किया. हारे हुए लोगों में मेघवंशी भी थे. वेदों में बताई गई उन कथाओं की पड़ताल करके हमारे अपने समाज के श्री आर.एल. गोत्रा ने एक लंबा आर्टिकल ‘Meghs of India’ शीर्षक से लिखा जिसकी तारीफ़ ताराराम जी भी करते हैं जिन्होंने ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है.


Meghs of India में किया गया अध्ययन बताता है कि आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र के लोग एक ‘वृत्र’ नाम के पुरोहित नरेश के अनुगामी थे या उसके प्रभाव-क्षेत्र में बसे थे. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका प्रभाव था. ऋग्वेद में उसे प्रथम मेघ, अहिमेघ भी कहा गया है. बहुत से मेघवंशी वृत्र को अपना वंशकर्ता मानते हैं. एक जाट नेता मनोज दूहन ने भी कहीं लिखा था कि वृत्र उनका वंशकर्ता है. क्योंकि वृत्र को अहि यानि नागमेघ भी कहा गया इससे पता चलता है कि मेघवंशियों और नागवंशियों का कभी निकट संबंध रहा होगा.


मेघऋषि को लेकर एक समस्या सोशल मीडिया पर उभरी है. लोगों में मेघवंश और मेघवंशी जातियों को लेकर शंकाएँ हैं. हो सकता है यह समस्या नहीं होती अगर हिंदू व्यवस्था के तहत जातियाँ न होतीं. लेकिन हिंदू व्यवस्था (वास्तव में ब्राह्मणीकल व्यवस्था) के लागू होने के कारण वंश या रेस का कई जातियों में बँटवारा हुआ. आज मेघवंश के तहत आने वाली मेघवाल, मेघवार, मेघ आदि जातियाँ निश्चित रूप से जाति के रूप में अलग-अलग हैं. नागवंशी जातियों की भी काफी बड़ी संख्या है.


दूसरी समस्या मेघऋषि की पूजा और उसके नाम पर हाल ही में स्थापित मंदिर हैं. जो लोग सनातनी परंपरा से प्रभावित हैं वे मेघऋषि को पूज्य देव के रूप में स्थापित रहे हैं. अन्य विचारधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे. इस समस्या का समाधान नहीं सुझाया जा सकता. भारतीय संविधान से मशविरा करना पड़ेगा.


इतिहास में लिखे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि आधुनिक इतिहासकारों के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री ने ऐसे राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया है जिनके नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द सरनेम की तरह लगाया जाता था. ‘मेघ’ सरनेम वाले जो राजा थे उनसे पहले और बाद के राजाओं का इतिहास मिला लेकिन ‘Megh’ सरनेम वाले राजाओं का इतिहास नहीं मिला. उनके शासनकाल को अंधकार काल कहा गया. ज़ाहिर है कि परंपरावादी इतिहासकार उन राजाओं के बारे में लिखना ही नहीं चाहते थे. लेकिन आधुनिक और ईमानदार इतिहासकार इस पर और अधिक रोशनी डाल रहे हैं.


अपने पिछोकड़ के बारे में जानना हो तो लोकगीत उसमें मदद करते हैं. अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ समुदाय के अपने लोकगीत नहीं हैं. इसका ज़िक्र डॉ. ध्यान सिंह ने अपने थीसिस में किया है. एक बार श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया था कि हमारे एक लोकगायक राँझाराम हुए हैं जो कथावाचक थे और कई कथाओं के साथ-साथ मेघों की कथा भी सुनाते थे. इसकी पुष्टि कर्नल तिलकराज जी ने भी की. राँझाराम जी मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ते थे. कैसे जोड़ते थे, वो कथा क्या थी उसका रिकार्ड नहीं मिलता. फिलहाल इस बात का इतना महत्व तो है कि मेघों की कथा में सिकंदर है. सैनी और जाट सहित कई समुदाय पोरस को अपना आदमी बताते हैं. और तथ्य यह भी है कि सिकंदर के रास्ते में मेघों की घनी बस्तियाँ थीं. उस युद्ध में मेघों की कोई भूमिका न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता. बाकी आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूँ. अच्छी कल्पना कीजिएगा. प्रसंगवश हमारे कमाल के लोकगायक राँझाराम जो थे वो श्री सुदेश कुमार, आईएएस के पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे.


मेघों के अतीत का एक और महत्वपूर्ण पन्ना है उनका आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण. अब पढ़े-लिखे लोग हँस कर पूछते हैं कि क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे जो हमारा शुद्धिकरण किया गया. पिछले दिनों श्री ताराराम जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक के एक सफ़े की फोटोकापी मुझे भेजी जिस पर ऐसा कुछ लिखा था जो चौंकाने वाला था. लिखने वाला सही था या नहीं, पता नहीं, उसमें लिखा है, “1901 में पहली बार आर्य-भक्त भाइयों ने समाज में आना प्रारंभ किया. उस समय इन मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर एक स्थान पर संध्या-हवन आदि में सम्मिलित होना आश्चर्यजनक था.” मेघों के शुद्धिकरण की बात वहाँ की गई है. इससे एक सवाल तो खड़ा होता है कि क्या शुद्धिकरण से पहले मेघों का धर्म कुछ और था कि उनका हिंदुओं के साथ बैठना आश्चर्यजनक हो गया? इस विषय को एक सवालिया निशान के साथ यहीं छोड़ रहा हूँ. आर्यसमाज ने मेघों की शिक्षा के लिए जो शुरुआती प्रबंध किया उससे मेघों को बहुत फायदा हुआ इसमें शक नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि नैतिकता (Morality) और सभ्य व्यवहार से क्या कोई समुदाय ख़ाली हो सकता है चाहे उसकी पहचान किसी धर्म से न भी हो? क्या नैतिकता सिखाने का हक़ सिर्फ़ धर्म को ही है? मेरा विचार है कि जब हमारे पुरखों को किसी धार्मिक स्थान में जाने नहीं दिया जाता था तो उन्हें नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाता था. हमारे समाज में उन दिनों माताएँ किस धर्म के आधार पर अपने बच्चों को सिखाती थीं कि झूठ मत बोलो, पशु-पक्षियों पर दया करो, दिल में करुणा रखो, बूढ़ों-बुज़ुर्गों की सेवा करो वगैरा वगैरा. वो कौन-सी सभ्यता (civility) थी जो हमारे पुरखों के ख़ून में रची-बसी थी? यहाँ धर्म और सभ्यता को इसलिए अलग-अलग कर के देख रहा हूँ क्योंकि सभ्य व्यवहार धर्म के माध्यम से ही आए यह ज़रूरी नहीं. हमारी पृष्ठभूमि में कोई तो सभ्यता ज़रूर रही होगी जिसने सदियों से हमें सभ्य व्यवहार सिखाया है. थोड़ा याद कीजिए कि क्या हमारे समाज में महिलाओं को सती कर डालने की परंपरा थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ विधवा विवाह की कोई समस्या थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ दहेज हत्याओं की कोई समस्य़ा थी? नहीं. मैंने कई साल पहले पढ़ा था कि मेघ अदालतों में नहीं जाते. वजह थी कि हमारी एक अपनी पंचायत जैसी न्याय प्रणाली थी. कभी सुना नहीं कि उस व्यवस्था के अधीन किसी को क्रूर सज़ा सुनाई गई हो. अगर हुक्कापानी बंद करने की बात छोड़ दें तो मेघ अपनी न्याय प्रणाली से संतुष्ट थे. इन सभी ख़ासियतों को आप ‘मेघ-सभ्यता’ कह सकते हैं. ऐसी ‘मेघ-सभ्यता’ जिसमें इंसानियत सबसे सुंदर रंगों में खड़ी दिखाई देती है.


अब कुछ बेसिक से सवालों पर अपनी राय दे रहा हूँ. क्या मेघऋषि से ही हमारा वंश चला? बच्चा भी कहेगा कि मेघऋषि का भी कोई बाप ज़रूर रहा होगा. हाँ भई ज़रूर रहा होगा. बच्चे की बात में सच्चाई है और उसे मान लेने में भलाई है. वैसे भी मेघऋषि हारे हुए पुरोहित नरेश की कहानी है. आप चाहें तो मेघऋषि के प्रति आँखें मूँद कर चलते रह सकते हैं.


बड़ा मशहूर डायलॉग है कि ‘मेघों में एकता नहीं हो सकती’. यह सच्चाई है कि सियासी पार्टियाँ और धर्म या डेरे बनाने वाले लोग यह काम लोगों में एका लाने के लिए नहीं करते. उन्हें वोट, पैसा और आपकी सेवा चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टियाँ और धर्म-डेरे आपको आपस में बाँट लें. आप जिसके यहाँ जाते हैं उसका ठप्पा या स्टिकर जाने-अनजाने में आप पर लग जाता है. जब ठप्पे और स्टिकर अलग-अलग हो गए तो पहचान अपने आप अलग हो गई और एकता की भैंस भी पानी में चली गई. मेघों के अपने कई छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बने हुए हैं. सभी चौधरी हैं. वे इकट्ठे नहीं हो सकते. चलिए इस बात को एक ही बार में मान लें कि बिरादरी के तौर पर मेघों में एकता नहीं हो सकती. तो क्या कोई दूसरा रास्ता है? हाँ है जिसे अपनाया जाना चाहिए. मेघों में कार्य कर रही सियासी पार्टियों और सामाजिक संगठनों को आपसी कंपिटीशन और गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिएँ. इससे निश्चय ही बेहतर रिज़ल्ट निकलेगा और वो मेघ-भगत समाज के लिए लाभकारी होगा. शुभकामनाएँ.


जय मेघ, जय भारत.
भारत भूषण भगत, चंडीगढ़.


(यह आलेख डॉ. शिवदयाल माली द्वारा गठित 'मेघ जागृति मंच' के 21-05-2017 को आयोजित कार्यक्रम के लिए लिखा गया था. मैं चाहते हुए भी कारणवश इसमें भाग नहीं ले सकूँगा. रिकार्ड के लिए इसे यहाँ रख लिया है.)

विशेष नोट - इसी तरह का एक सेमिनार 30 अगस्त, 2015 को जालंधर में हुआ था जिसकी शुरुआत मैंने इस प्रकार की थी, "पहली बात यह है कि मैं इतिहासकार नहीं हूँआपकी तरह अपना इतिहास जानने में मेरी रुचि थीमैंने जो पढ़ा उसके नोट्स बनाता रहामेरे नोट्स इतिहासकारों की देन हैंआपका इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं हैये नोट्स अब आपकी सेवा में हैं." ऊपर प्रस्तुत जानकारी पर भी मेरी यह टिप्पणी उसी प्रकार से लागू है.

11 May 2017

Remote Memory - पुरानी याद


अमृतसर के नवांकोट मोहल्ले और कैंब्रिज कालेज की यादों के अलावा एक फिल्म की कुछ यादें ज़हन में गहरी बैठी थीं जो इन दिनों उभर आईं. बचपन में पहली (शायद पहली) फिल्म पिता जी दिखाने ले गए थे. नाम याद है - ‘नौशेरवान-ए-आदिल’. यह नाम पिता जी से ही सुना था याद रह गया. उस फिल्म का एक ही डायलॉग याद है जो हीरो ने ठसक भरी आवाज़ में चुनौती देते हुए बोला था - ‘तो हम…..की हिफ़ाज़त के लिए न जाएँ?’. बाकी कुछ याद नहीं सिवाय एक गाने के - ‘तारों की ज़ुबां पर है मोहब्बत की कहानी.....’ - हो सकता है फिल्म देखते हुए मैं सो गया होऊँ. तब 6-7 साल का था (जन्म जनवरी 1951, अरे बाप रे! अब मैं सीनियर सिटिज़न हो गया हूँ🙊).

बचपन में इश्क-मुश्क की जितनी समझ हो सकती थी उतनी तो ज़रूर थी. लेकिन गाने की जो तर्ज़ ताज़ा दिमाग़ पर बैठ गई थी वो पिछले दिनों ज़ोर-शोर से याद हो आई. भला हो यूट्यूब का जहाँ लोगों ने पुराने गानों का ख़ज़ाना संभाल कर रखा है. जो चाहे, जब चाहे खोल कर देख ले. बुलो सी. इरानी के संगीत का वो हीरा नीचे रखा है. गीत के पूरे बोल यूट्यूब पर अब होश में सुने हैं जो कभी बचपन में एक सोते हुए बच्चे ने सुने होंगे.


कहते हैं जिसे चाँदनी है नूर-ए-मोहब्बत
तारों से सुनहरी है हमेशा तेरी किस्मत
जा जा के पलट आती है फिर तेरी जवानी
ए चाँद मुबारक हो तुझे रात सुहानी


हम हों न हों दुनिया यूँ ही आबाद रहेगी
ये ठंडी हवा और ये फ़िज़ा याद रहेगी
रह जाएगी दुनिया में मोहब्बत की निशानी
ए चाँद मुबारक हो तुझे रात सुहानी




07 May 2017

Megh and Aryasamaj - मेघ और आर्यसमाज

मेघ होने के नाते ख़ुद को सियालकोट और आर्यसमाज के नाम से प्रभावित महसूस करता रहा हूँ. पिता जी ने मुझे मेघों के उत्थान में आर्यसमाज की भूमिका के बारे में बताया था. तब पिता जी से अधिक सवाल करने की आदत नहीं थी. आज वे होते तो उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ता.

कई मेघों को कहते सुना है कि मेघ मूलतः ब्राह्मण हैं. उनके रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं. वो कैसे मिलते-जुलते हैं मुझे पता नहीं. आर्यसमाज में प्रवेश मिलने से पहले उनके कौन से रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों जैसे थे यह बात बहस का विषय हो सकती है. एक मुख्य उदाहरण मेघों की देरियों का दे सकता हूँ जो मेघ-सभ्यता का रेखांकित उदाहरण है और उनके ब्राह्मणीकल मूल को झुठलाता जाता है.  लेकिन तर्क के तौर पर यदि श्री भीमसेन विद्यालंकार द्वारा लिखित “आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास” नामक पुस्तक से संदर्भ लिया जाए तो एक बात-जैसी बात निकलती दिखती है. उसमें उल्लेख है कि आर्यसमाज ने "मेघ और उनकी शुद्धि " नामक पुस्तक सन् 1936 में प्रकाशित की थी जिसमें मेघों को ब्राह्मण घोषित किया गया था. इस पुस्तक में उल्लेख है कि भक्त पूर्ण के सुपुत्र श्री रामचंद्र मेघ जाति से प्रथम स्नातक (ग्रेजुएट) हुए. उन्हें सियालकोट आर्यसमाज ने गुरुकुल में शिक्षा दिलाई. पुस्तक के पृष्ठ 172 पर दर्ज किया गया है कि सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया. उस समय इन मेघों का ‘हिंदुओं के साथ’ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था. ज़ाहिर है कि आर्यसमाज का ‘समाज’ ने विरोध किया. यह समझने की ज़रूरत है कि आर्यसमाज का किस समाज ने विरोध किया लेकिन आर्यसमाज ने मेघों को ‘शुद्ध’ करने का विचार किया यह बड़ी बात है. सन् 1903 में आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव पर मेघ बिरादरी के चौधरियों को एकत्रित करके उनका शुद्धिकरण किया गया.

उन्हीं दिनों या उसके आसपास - “लाला गणेशदास ने ‘मेघ और उनकी शुद्धि’ नाम का ट्रैकट (ट्रैक्ट के हिंदी/अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्द हैं - निबंध, Dissertation, treatise, thesis, tractate, system, method, mode, channel, manner.) प्रकाशित किया और मेघ जाति को ब्राह्मण जाहिर करके उनके पतन के कारण लिखे और उनकी शुद्धि शास्त्रोक्त करार दी.” - यह बात ध्यान खींचती है. यह आलेख सुरक्षित रखा गया है तो मुझे हैरानगी होगी और यदि वह उपलब्ध हो तो वह संदर्भ देने योग्य ज़रूर होगा क्योंकि आज भी बहुत से मेघ मानते हैं कि वे ब्राह्मण हैं या फिर ब्राह्मणों से निकले या फिर निकाले हुए हैं. वहीं एक और वाक्य है कि - “सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया.” ‘आर्य-भक्त’ शब्द कई अर्थ देता है. आर्य एक रेस (वंश) है और रेस मानव-विज्ञान का एक ऐसा घटक है जो अपरिवर्तनशील है जिसमें डीएनए स्थिर खड़ा है. आर्यों (ब्राह्मणों) का वंश कभी नहीं बदला यह सामाजिक तथ्य है. ब्राह्मणों की जाति बदली है ऐसा सुना है लेकिन जब तक वो जाति समूह ख़ुद इसे स्वीकार न करे तब तक उसे उदाहरण के रूप में नहीं रखा जा सकता.  दूसरा शब्द ‘भक्त’ है. कहा जाता है कि इसी शब्द को ‘भगत’ के रूप में मेघों ने अपनाया. लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं होता. ‘आर्य-भक्त’ शब्द को समास पद्धति से लिखा गया है जिसका एक अर्थ है ‘आर्यों का भक्त’, जैसे ‘राम-भक्त’ शब्द है. अब ‘भक्त’ की परिभाषा करें तो यह भारत की गुलामी-प्रथा तक खिंचने की क्षमता रखता है. ‘भक्त’ उसे कहा जाता रहा है जो अपने समाज से टूट कर आर्यों के पाले में चला गया जैसे विष्णु-भक्त प्रह्लाद, राम-भक्त विभीषण, भक्त हनुमान आदि. संस्कृत में ‘भक्त’ शब्द की धातु ‘भज्’ इसी ओर संकेत करती है.   

उक्त संदर्भ में यह बात भी उभर कर सामने आती है कि - “मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.” वो आखिर आश्चर्यजनक क्यों था? वाक्य एक पुरानी बहस की ओर इशारा करता है कि क्या मेघ हिंदू थे? कल नहीं थे तो आज कैसे? मेघ समाज में इस पर (ख़ास कर सोशल मीडिया पर) बहस होती रहती है. बहस होना एक अच्छा संकेत है जिससे मेघों में आई जागरूकता का पता चलता है.

अंत में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर का उक्त प्रकाशन के लिए आभार और ताराराम जी का आभार जिन्होंने उक्त प्रकाशन के संदर्भित पृष्ठों की फोटो भेजी है.

'भक्त' शब्द की एक व्याख्या. संदर्भ है जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'भारत की खोज' (Discovery of India) :-

27 April 2017

Ghosts and God - भूत और ईश्वर

मनोविज्ञान इस बात को मानता है कि भूत एक काल्पनिक शत्रु है और ईश्वर एक काल्पनिक मित्र है. जो लोग इच्छाशक्ति के साथ अपने कार्य में लगे रहते हैं उनके बारे में देखा है कि वे आमतौर पर भूत-प्रेत से ग्रसित नहीं होते. इसका उलटा भी आप समझ लीजिए. किसी के प्रति घृणा या अतृप्त वासना भी भूत-आत्मा जैसी चीज़ को जन्म देती हैं. लेकिन है वो मन का खेल (प्रोजेक्शंस) ही जिसका सीधा रिश्ता हारमोंस और दिमाग़ की न्यूरल एक्टिविटी से होता है.


भूत और भगवान को लेकर एक बड़ा आर्थिक क्रियाकलाप समाज में है. किसी इमारत को ‘भुतहा इमारत’ मशहूर कर के प्रापर्टी डीलर खरीददारों को डरा देते हैं और इमारत की कीमत गिर जाती है. बाद में उसे ख़ुद प्रापर्टी डीलर या कोई और तिकड़मबाज़ खरीद लेता है. उसे बस हवन-यज्ञ, जगराता आदि कराना होता है और गृहप्रवेश का रास्ता साफ़. गिरी कीमत पर बड़ी जायदाद बुरी नहीं हो सकती. कहीं-कहीं देवीमाँ प्रकट हो जाती है.


हवन-यज्ञ, जगराता क्या है? यह एक काल्पनिक मित्र को याद करना है जो डर पर काबू पाने में सहायता करता है. भूत का इस्तेमाल प्रापर्टी डीलर या प्रापर्टी में हिस्सेदार लोग करते हैं या फिर ईश्वर-भगवान नामक काल्पनिक मित्र का बिज़नेस करने वाले. एक धूर्त काल्पनिक दुश्मन खड़ा करता है तो दूसरा एक काल्पनिक मित्र खड़ा करके अपना बिज़नेस चलाता है. दोनों में आपसी अंडरस्टैंडिंग होती है.🙂


आपने अपनी ज़िंदगी में महसूस किया होगा कि भूत और ईश्वर दोनों कभी किसी से डायरेक्टली पंगा नहीं लेते. पंगा धूर्त ही लेते हैं.

मेघों की देरियों पर जो चौकी दी जाती है वह भी भय और मित्रता का अद्भुत मिश्रण है. इसका स्वरूप ट्राइबल परंपरा जैसा है. बेहतर है कि सच्चाई को समझा जाए.


23 April 2017

Your vote determines your fate - आपका वोट आपके नसीब को तय करता है

2014 का चुनाव भारत की राजनीति के इतिहास में एक दुर्घटना के तौर पर भी जाना जाएगा जिसमें विपक्ष अपंग हो गया. उसके बाद की स्थितियां ऐसी हैं कि हिंदू-मुसलमान, गौमाता, लव-जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जोर पकड़ते नजर आए जिसे आम नागरिक गौर से देख रहा है. जाहिर है हिंसक ब्यानबाज़ी इसलिए की जाती है ताकि आम पब्लिक की नसें सर्द पड़ जाएँ. जिस जातपात के अंधेरे ने देश की बहुसंख्य आबादी को आज़ादी की रोशनी से दूर रखा है उसे हटाने की बात कोई नहीं करता. इन हालात में भी कुछ अनुभवी आवाजें और ख़्याल बुलंद होते रहते हैं.

105 लाख करोड़ रुपया कितना होता है मैं नहीं जानता. राजनीति के प्रखर दार्शनिक और राजनीतिज्ञ शरद यादव ने कहा है कि हर वोट की कीमत 105 लाख करोड़ रुपए होती है. हर वोट सरकार को इतना पैसा खर्च करने की शक्तियाँ प्रदान करता है.

देश में अनपढ़ता और गरीबी इतनी है कि चुनाव में लोग सौ रुपए, पाँच सौ रुपए में या दारू की बोतल के बदले अपना वोट बेचते हैं और फिर उन्हें शिकायत भी रहती है कि उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. होता कैसे? वे अपना वोट ऐसे व्यक्ति को नहीं देते जो उनके सामाजिक हालात सुधारने और देश के आर्थिक स्रोतों में उनके हिस्से को सुनिश्चित करने के लिए काम करे. प्रत्यक्षतः इसमें बड़ी बाधा जातपात है और नेता जातपात के चलते रहने में अपनी भलाई देखते हैं. इस लिए अपना वोट दान में या उपहार में न दें. इसे अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी और व्यवस्था परिवर्तन के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करें.

इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि भारत में गरीबी का इंडेक्स जाति के इंडेक्स के समरूप है. नीचे की सभी (श्रमिक) जातियां गरीब हैं क्योंकि वे मात्र श्रमजीवी हैं और ऊपर की जातियां अमीर क्योंकि देश के सभी स्रोतों का प्रबंधन उनके हाथ में है. तिस पर भ्रष्टाचार गरीबों को अधिक गरीब बनाए रखने का एक ज़रिया बन गया है. 'गरीबी हटाओ' का नारा लगा कर इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता. हाल ही में गरीबों का नाम लेकर केंद्र में नई सरकार बनी. लेकिन गरीबों को अपने जीवन स्तर में कोई सुधार होता नजर नहीं आता. ज़ाहिरा तौर पर इसकी बड़ी वजह जातपात है. जातिवाद सुनिश्चित करता है कि सस्ते मज़दूरों की सप्लाई न रुके और निशाने पर श्रमिक जातियाँ यानि निम्न जातियाँ होती है. महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा ग़रीबी को और भी बढ़ा देती है.

(“याद रखना कि जातिव्यवस्था के कूड़े पर....कचरे पर हर तरह का कीड़ा पलता है -करप्शन का....भ्रष्टाचार का....अन्याय का....सब तरह का. जात है तो न्याय नहीं मिल सकता. इंसाफ धरती पर सब जगह आ जाएगा लेकिन हिंदुस्तान में नहीं आ सकता. -शरद यादव”)

17 April 2017

Nag, Nagvanshi and Ichhadhari - नाग. नागवंशी और इच्छाधारी

तो ‘इच्छाधारी नाग’ की कथा बाकी रह गई थी.

उस कथा की जड़ ज़रूर पौराणिक कथाओं में रही होगी जो भारत के वंचित समाजों को मूर्ख बनाने के लिए लिखी गई थीं. ऐसा बहुत से विद्वानों का मानना है. यदि ये प्रतीकात्मक कथाएँ किसी भी तरह से नागवंशियों को लक्ष्य करके लिखी गई हैं तो उसके कुछ स्पष्ट अर्थ भी ज़रूर होंगे.

एक तेलुगु फिल्म का डॉयलाग था कि ‘पुलि’ के मुकाबले ‘गिलि’ अधिक खतरनाक होता है. मतलब ‘शेर-वेर’ में से ‘वेर’ अनदेखा है और खतरनाक है. यानि ‘नाग’ को हम जानते हैं लेकिन ‘इच्छाधारी नाग’ एक अनजाना शत्रु है. उसका भय काल्पनिक है इसी लिए बड़ा है. लेकिन वो आइने (भ्रम) में से दिख जाएगा (आपको नहीं, फिल्म बनाने वाले को). तो उस नकली भय से बचाव ज़रूरी है जो मंत्र-ताबीज़, टोने-टोटके, सँपेरे-बीन, यज्ञ-हवन से लेकर पुलिस-फौज आदि से संभव हो सकता है, ऐसा फिल्मकार दिखाते हैं. वैसे फिल्म में एक आस्तिक-से आदमी की मौजूदगी और उसकी सहायता तो न्यूनतम शर्त है ही. कुल मिला कर इन फिल्मों का सार यह होता है कि नाग को या नाग-जैसी किसी चीज़ को कहीं भी मार डालना अत्मरक्षा-जैसा होगा. यह नागों जैसे भोले-भाले जीवों के लिए खतरे की घंटी रही है जो वैसे भी इंसानों से डरे-छिपे फिरते हैं.

नागो और नागवंशियो, अमां जाओ यार! तुम इन कथाओं से पीछा नहीं छुड़ा सकते. हाँ, एनिमल प्रोटेक्शन के नाम पर कुछ कार्य हुआ है जो केवल एनिमल्ज़ के लिए है. नागिन का श्राप लोगों पर पड़ता दिखाया जाता है लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में नागों का श्राप फिल्मकारों पर नहीं पड़ता.

पुराने ज़माने में नागवंशियों को पत्थरों पर उकेरा जाता था लेकिन अब फोटोशॉप का शाप पड़ा है. कह लो, क्या कहते हो? फिल्म में इच्छाधारी नागिन की एंट्री बहुत आकर्षक और भयानक होती है. नहीं?


12 April 2017

Naag, Nagas and Nagmani - नाग, नागवंशी और नागमणि

नागों, संपेरों और बीन पर आधारित दर्जनों फिल्में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने दी हैं. उनमें से एक टी-सीरीज की बनाई हुई फिल्म ‘नागमणि’ देखने का सुखद अवसर मिला. यह अच्छे ग्रेड की फिल्मों में नहीं है. Anyhow.....

अब मनोरंजन इंडस्ट्री की क्रिएटिविटि देखिए. ‘नागमणि’ में 'नाग जाति' का स्पष्ट उल्लेख है. स्क्रीन पर एक उजड़ा हुआ मंदिर है (वैसे आज भी नाग जातियों के अधिकांश मंदिर उजड़े हुए ही हैं) और नाग पंचमी के दिन वहाँ नाग जाति के लोग आकर शिव की पूजा करते हैं. इस बात पर कई संदर्भ याद हो आए जैसे इतिहासकार नवल वियोगी की लिखी पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’, आर.एल गोत्रा का आलेख - The Meghs of India जिसमें ऋग्वेद में उल्लिखित एक पात्र ‘वृत्र’ को ‘अहिमेघ’ यानि ‘नाग मेघ’ बताया गया है. फिलहाल आप संपेरों और उनकी बीन पर नज़र जमाए रखें.

इस फिल्म में एक मज़ेदार डायलॉग है - ‘नागराज जब बीन सुनते हैं तो वो नाचे बगैर नहीं रह सकते’. Very interesting. नाग जाति के हवाले से संपेरा कौन है इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए लेकिन बीन को अलग से समझना ज़रूरी है. ‘बीन’ मेंटल कंडिशनिंग भी हो सकती है और मनोरंजन की लत भी (है वो भी मेंटल कंडिशनिंग). तो या तो नाग जातियों की मेंटल कंडिशनिंग कर दी गई या उन्हें मनोरंजन के मायाजाल में फाँस लिया गया. बाकी कहानी अंडरस्टुड है.

जहाँ तक 'मणि' का सवाल है वो नागों के सिर (दिमाग़) में थी और आज तक है. 'मणि' मतलब 'दिमाग़'. जिसके पीछे सँपेरा हाथ धो कर पड़ा होता है. वो या तो नाग को वश में कर के मणि चुरा लेगा या ख़ुद नष्ट हो जाएगा, यह स्क्रिप्ट राइटर पर डिपेण्ड करता है. वैसी स्क्रिप्ट तो आप भी लिख सकते हैं, नहीं? तो हे नागराज! जब आपके पास ज़बरदस्त 'मणि' है तो आप नई स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखते जिसमें आपकी 'मणि' सुरक्षित हो और उसकी चमक सब से बढ़ कर हो.

हाँ, अगर ज़्यादा जानकारी चाहिए तो इस लिंक पर चले जाइए. कुछ और लिंक भी हैं, देख लीजिए.


दक्षिण भारतीय फिल्म ‘नागमणि’


'इच्छाधारी नाग' की बात अलग से करूँगा. उसका मामला ज़रा टेढ़ा है. 😂


07 April 2017

Creativity and Entertainment - रचनात्मकता और मनोरंजन

मनोरंजन की दुनिया भी बहुत निराली है. बचपन से रामायण-महाभारत की कथाएं सुनते आए हैं. तर्क की दृष्टि से उनमें लिखी बातें असंभव और अंतर्विरोधों से भरी लगती हैं. सोशल मीडिया पर छोटी उम्र के बच्चे उनके बारे में तार्किक बातें करने लगे हैं और ऐसा वे चुटकुलों के माध्यम से कर रहे हैं. इसे आप बच्चों की क्रिएटिव डिवाइस कह सकते हैं.

बचपन में जो फिल्में देखी थीं वो तस्वीर की तरह ज़हन में बसी हैं. वे आज भी सच्चाई सरीखी महसूस होती हैं. जानता हूं कि फिल्में एक तरह का नाटक या स्टेज शो होता है जिसे कैमरे में क़ैद कर लिया जाता है और फिर उन्हें एडिट कर के ऐसे सजाया जाता है कि अलग-अलग फ्रेम इकट्ठे होकर एक चलती कहानी का रूप ले लेते हैं. कहानी और विज़ुअल्ज़ को इतना उदात्त (बड़ा) बनाया जाता है कि दर्शक का भावनात्मक संसार प्रेरित हो कर उसके साथ-साथ आंदोलित होने लगता है. ऐसे अनुभव दिमाग पर छप कर उसका हिस्सा बन जाते हैं और दिमाग़ की मौत तक उसमें रहते हैं. इन्हें हम संस्कार भी कह देते हैं.

जब फिल्में नहीं बनती थीं तब ऐसी कहानियां शब्दों, नाटकों, गीतों के माध्यम से यात्रा करती थीं. कथावाचक (किस्सागो) कह कर या गा कर लोगों को कथाएँ सुनाता था. उसका इम्प्रेशन (संस्कार) पाठक-श्रोता के मन पर बैठता जाता था ठीक वैसा जैसा फिल्म देखने पर होता है. मनोरंजन का बाज़ार आकर्षक होता है जिसकी ओर हम मर्ज़ी से खिंचते हैं. कुछ श्रेय कलाकार को भी जाता है. मँजा हुआ लेखक या कलाकार किसी की मृत्यु के अवसर को जश्न में बदल सकता है. रावण दहन इसका एक उदाहरण है.

एक सिलेबस की किताब में पढ़ा था कि श्रम करने के बाद मजदूरों को मनोरंजन की तलब होती है. वे गाना-बजाना करके अपनी थकान उतारते हैं. क्योंकि दुनिया में मेहनतकशों की संख्या सबसे अधिक है तो मनोरंजन का सबसे बड़ा बाजार वहीं है. बाज़ार के खिलाड़ी इस बात को जानते हैं. इस दृष्टि से जातक कथाएँ, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य विस्तारित साहित्य जैसे गीत-गोविंद या पंचतंत्र आदि, ऐसी रचनाएं हैं जो किसान-कमेरों, कारीगरों, शिल्पियों को लुभाती चली आ रही हैं. सदियों से अशिक्षित समाजों ने उन ग्रंथों, कथाओं को तर्क की दृष्टि से नहीं देखा. वे मनोरंजित और धन्य होते रहे. शिक्षित युवा अब तर्क के नजरिए से भी उस कथा-साहित्य को देखने लगे हैं.

आज रचनात्मकता के इतने साधन उपलब्ध हैं कि चाहे कोई भी मनोरंजन की एक दुनिया बना ले, चाबी दे कर उसे चलने के लिए ज़मीन पर छोड़ दे, वो चलती जाएगी. आप भी बनाइए और देखिए, वो सदियों तक चल सकती है.


"अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना ज़रूरी है."

30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया वह या तो भक्ति साहित्य की समीक्षा के नाम पर लिखा गया था या फिर जातिवाद के आधार पर. कुल मिला कर कबीर के साहित्य पर आचार्यत्व थोपा गया था जबकि ज़रूरत थी उस विश्लेषण की जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो कबीर का लिखा हो ही नहीं सकता.


उल्लेखनीय है कि उस समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही भी बताया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया. दूसरी ओर वे समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और उनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में मान्य जातिवाद का विरोध था. उनका वो नज़रिया निम्न जातियों में व्यापक स्तर पर फैला. उन्हें भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पीछे धकेलने की एक कोशिश थी जो धीरे-धीरे नाकाम होती रही. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में भक्तिकाल कहा जाता है वह वास्तव में मुक्तिकाल था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संत जान पर खेल गए. 'आवाज़ इंडिया' और अन्य जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. उनके ऐसा करने के पीछे 'अदृश्य' कारण हो सकते हैं.


हालाँकि सभी अनुसूचित जातियों के अपने धार्मिक आइकॉन के रूप में उनके अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं शताब्दी के कबीर को 20 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अंगीकार किया. इसका कारण मेरी समझ के अनुसार यह है कि ये व्यवसाय से बुनकर थे. इस दृष्टि से कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. कबीर की वाणी में इन्होंने अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख दोनों महसूस किए. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार मुख्यतः आर्यसमाजी और थोड़े-बहुत कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पाते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि क्या मेघ ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा