23 April 2017

Your vote determines your fate - आपका वोट आपके नसीब को तय करता है

2014 का चुनाव भारत की राजनीति के इतिहास में एक दुर्घटना के तौर पर भी जाना जाएगा जिसमें विपक्ष अपंग हो गया. उसके बाद की स्थितियां ऐसी हैं कि हिंदू-मुसलमान, गौमाता, लव-जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जोर पकड़ते नजर आए जिसे आम नागरिक गौर से देख रहा है. जाहिर है हिंसक ब्यानबाज़ी इसलिए की जाती है ताकि आम पब्लिक की नसें सर्द पड़ जाएँ. जिस जातपात के अंधेरे ने देश की बहुसंख्य आबादी को आज़ादी की रोशनी से दूर रखा है उसे हटाने की बात कोई नहीं करता. इन हालात में भी कुछ अनुभवी आवाजें और ख़्याल बुलंद होते रहते हैं.

105 लाख करोड़ रुपया कितना होता है मैं नहीं जानता. राजनीति के प्रखर दार्शनिक और राजनीतिज्ञ शरद यादव ने कहा है कि हर वोट की कीमत 105 लाख करोड़ रुपए होती है. हर वोट सरकार को इतना पैसा खर्च करने के लिए शक्ति देता है.

देश में अनपढ़ता और गरीबी इतनी है कि चुनाव में लोग सौ रुपए, पाँच सौ रुपए में या दारू की बोतल के बदले अपना वोट बेच देते हैं और फिर उन्हें शिकायत भी होती है कि उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. होता कैसे? वे अपना वोट ऐसे व्यक्ति को नहीं देते जो उनके सामाजिक हालात सुधारने और देश के आर्थिक स्रोतों में उनके हिस्से को सुनिश्चित करने के लिए काम करे. प्रत्यक्षतः इसमें बड़ी बाधा जातपात है और नेता जातपात के चलते रहने में अपनी भलाई देखते हैं. इस लिए वोट दान में या उपहार में न दें. इसे व्यवस्था परिवर्तन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करें.

इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि भारत में गरीबी का इंडेक्स जाति के इंडेक्स जैसा है. नीचे की जातियां गरीब हैं और ऊपर की जातियां अमीर. तिस पर भ्रष्टाचार गरीबों को अधिक गरीब बनाता है. 'गरीबी हटाओ' का नारा लगा कर इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता. हाल ही में गरीबों का नाम लेकर केंद्र में नई सरकार बनी. लेकिन गरीबों को अपने जीवन स्तर में कोई सुधार होता नजर नहीं आता. ज़ाहिरा तौर पर इसका बड़ा कारण जातपात है. जातिवाद सुनिश्चित करता है कि सस्ते मज़दूरों की सप्लाई न रुके और निशाने पर श्रमिक यानि निम्न जातियाँ होती है. महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा ग़रीबी को और भी बढ़ा देती है.

(“याद रखना कि जातिव्यवस्था के कूड़े पर....कचरे पर हर तरह का कीड़ा पलता है -करप्शन का....भ्रष्टाचार का....अन्याय का....सब तरह का. जात है तो न्याय नहीं मिल सकता. इंसाफ धरती पर सब जगह आ जाएगा लेकिन हिंदुस्तान में नहीं आ सकता. - शरद यादव”)

17 April 2017

Nag, Nagvanshi and Ichhadhari - नाग. नागवंशी और इच्छाधारी

तो ‘इच्छाधारी नाग’ की कथा बाकी रह गई थी.

उस कथा की जड़ ज़रूर पौराणिक कथाओं में रही होगी जो भारत के वंचित समाजों को मूर्ख बनाने के लिए लिखी गई थीं. ऐसा बहुत से विद्वानों का मानना है. यदि ये प्रतीकात्मक कथाएँ किसी भी तरह से नागवंशियों को लक्ष्य करके लिखी गई हैं तो उसके कुछ स्पष्ट अर्थ भी ज़रूर होंगे.

एक तेलुगु फिल्म का डॉयलाग था कि ‘पुलि’ के मुकाबले ‘गिलि’ अधिक खतरनाक होता है. मतलब ‘शेर-वेर’ में से ‘वेर’ अनदेखा है और खतरनाक है. यानि ‘नाग’ को हम जानते हैं लेकिन ‘इच्छाधारी नाग’ एक अनजाना शत्रु है. उसका भय काल्पनिक है इसी लिए बड़ा है. लेकिन वो आइने (भ्रम) में से दिख जाएगा (आपको नहीं, फिल्म बनाने वाले को). तो उस नकली भय से बचाव ज़रूरी है जो मंत्र-ताबीज़, टोने-टोटके, सँपेरे-बीन, यज्ञ-हवन से लेकर पुलिस-फौज आदि से संभव हो सकता है, ऐसा फिल्मकार दिखाते हैं. वैसे फिल्म में एक आस्तिक-से आदमी की मौजूदगी और उसकी सहायता तो न्यूनतम शर्त है ही. कुल मिला कर इन फिल्मों का सार यह होता है कि नाग को या नाग-जैसी किसी चीज़ को कहीं भी मार डालना अत्मरक्षा-जैसा होगा. यह नागों जैसे भोले-भाले जीवों के लिए खतरे की घंटी रही है जो वैसे भी इंसानों से डरे-छिपे फिरते हैं.

नागो और नागवंशियो, अमां जाओ यार! तुम इन कथाओं से पीछा नहीं छुड़ा सकते. हाँ, एनिमल प्रोटेक्शन के नाम पर कुछ कार्य हुआ है जो केवल एनिमल्ज़ के लिए है. नागिन का श्राप लोगों पर पड़ता दिखाया जाता है लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में नागों का श्राप फिल्मकारों पर नहीं पड़ता.

पुराने ज़माने में नागवंशियों को पत्थरों पर उकेरा जाता था लेकिन अब फोटो शॉप का श्राप पड़ा है. कह लो, क्या कहते हो?


12 April 2017

Naag, Nagas and Nagmani - नाग, नागवंशी और नागमणि

नागों, संपेरों और बीन पर आधारित दर्जनों फिल्में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने दी हैं. उनमें से एक टी-सीरीज की बनाई हुई फिल्म ‘नागमणि’ देखने का सुखद अवसर मिला. यह अच्छे ग्रेड की फिल्मों में नहीं है. Anyhow.....

अब मनोरंजन इंडस्ट्री की क्रिएटिविटि देखिए. ‘नागमणि’ में 'नाग जाति' का स्पष्ट उल्लेख है. स्क्रीन पर एक उजड़ा हुआ मंदिर है (वैसे आज भी नाग जातियों के अधिकांश मंदिर उजड़े हुए ही हैं) और नाग पंचमी के दिन वहाँ नाग जाति के लोग आकर शिव की पूजा करते हैं. इस बात पर कई संदर्भ याद हो आए जैसे इतिहासकार नवल वियोगी की लिखी पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’, आर.एल गोत्रा का आलेख - The Meghs of India जिसमें ऋग्वेद में उल्लिखित एक पात्र ‘वृत्र’ को ‘अहिमेघ’ यानि ‘नाग मेघ’ बताया गया है. फिलहाल आप संपेरों और उनकी बीन पर नज़र जमाए रखें.

इस फिल्म में एक मज़ेदार डायलॉग है - ‘नागराज जब बीन सुनते हैं तो वो नाचे बगैर नहीं रह सकते’. Very interesting. नाग जाति के हवाले से संपेरा कौन है इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए लेकिन बीन को अलग से समझना ज़रूरी है. ‘बीन’ मेंटल कंडिशनिंग भी हो सकती है और मनोरंजन की लत भी (है वो भी मेंटल कंडिशनिंग). तो या तो नाग जातियों की मेंटल कंडिशनिंग कर दी गई या उन्हें मनोरंजन के मायाजाल में फाँस लिया गया. बाकी कहानी अंडरस्टुड है.

जहाँ तक 'मणि' का सवाल है वो नागों के सिर (दिमाग़) में थी और आज तक है. 'मणि' मतलब 'दिमाग़'. जिसके पीछे सँपेरा हाथ धो कर पड़ा होता है. वो या तो नाग को वश में कर के मणि चुरा लेगा या ख़ुद नष्ट हो जाएगा, यह स्क्रिप्ट राइटर पर डिपेण्ड करता है. वैसी स्क्रिप्ट तो आप भी लिख सकते हैं, नहीं? तो हे नागराज! जब आपके पास ज़बरदस्त 'मणि' है तो आप नई स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखते जिसमें आपकी 'मणि' सुरक्षित हो और उसकी चमक सब से बढ़ कर हो.

हाँ, अगर ज़्यादा जानकारी चाहिए तो इस लिंक पर चले जाइए. कुछ और लिंक भी हैं, देख लीजिए.


दक्षिण भारतीय फिल्म ‘नागमणि’


'इच्छाधारी नाग' की बात अलग से करूँगा. उसका मामला ज़रा टेढ़ा है. 😂


07 April 2017

Creativity and Entertainment - रचनात्मकता और मनोरंजन

मनोरंजन की दुनिया भी बहुत निराली है. बचपन से रामायण-महाभारत की कथाएं सुनते आए हैं. तर्क की दृष्टि से उनमें लिखी बातें असंभव और अंतर्विरोधों से भरी लगती हैं. सोशल मीडिया पर छोटी उम्र के बच्चे उनके बारे में तार्किक बातें करने लगे हैं और ऐसा वे चुटकुलों के माध्यम से कर रहे हैं. इसे आप बच्चों की क्रिएटिव डिवाइस कह सकते हैं.

बचपन में जो फिल्में देखी थीं वो तस्वीर की तरह ज़हन में बसी हैं. वे आज भी सच्चाई सरीखी महसूस होती हैं. जानता हूं कि फिल्में एक तरह का नाटक या स्टेज शो होता है जिसे कैमरे में क़ैद कर लिया जाता है और फिर उन्हें एडिट कर के ऐसे सजाया जाता है कि अलग-अलग फ्रेम इकट्ठे होकर एक चलती कहानी का रूप ले लेते हैं. कहानी और विज़ुअल्ज़ को इतना उदात्त (बड़ा) बनाया जाता है कि दर्शक का भावनात्मक संसार प्रेरित हो कर उसके साथ-साथ आंदोलित होने लगता है. ऐसे अनुभव दिमाग पर छप कर उसका हिस्सा बन जाते हैं और दिमाग़ की मौत तक उसमें रहते हैं. इन्हें हम संस्कार भी कह देते हैं.

जब फिल्में नहीं बनती थीं तब ऐसी कहानियां शब्दों, नाटकों, गीतों के माध्यम से यात्रा करती थीं. कथावाचक (किस्सागो) कह कर या गा कर लोगों को कथाएँ सुनाता था. उसका इम्प्रेशन (संस्कार) पाठक-श्रोता के मन पर बैठता जाता था ठीक वैसा जैसा फिल्म देखने पर होता है. मनोरंजन का बाज़ार आकर्षक होता है जिसकी ओर हम मर्ज़ी से खिंचते हैं. कुछ श्रेय कलाकार को भी जाता है. मँजा हुआ लेखक या कलाकार किसी की मृत्यु के अवसर को जश्न में बदल सकता है. रावण दहन इसका एक उदाहरण है.

एक सिलेबस की किताब में पढ़ा था कि श्रम करने के बाद मजदूरों को मनोरंजन की तलब होती है. वे गाना-बजाना करके अपनी थकान उतारते हैं. क्योंकि दुनिया में मेहनतकशों की संख्या सबसे अधिक है तो मनोरंजन का सबसे बड़ा बाजार वहीं है. बाज़ार के खिलाड़ी इस बात को जानते हैं. इस दृष्टि से जातक कथाएँ, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य विस्तारित साहित्य जैसे गीत-गोविंद या पंचतंत्र आदि, ऐसी रचनाएं हैं जो किसान-कमेरों, कारीगरों, शिल्पियों को लुभाती चली आ रही हैं. सदियों से अशिक्षित समाजों ने उन ग्रंथों, कथाओं को तर्क की दृष्टि से नहीं देखा. वे मनोरंजित और धन्य होते रहे. शिक्षित युवा अब तर्क के नजरिए से भी उस कथा-साहित्य को देखने लगे हैं.

आज रचनात्मकता के इतने साधन उपलब्ध हैं कि चाहे कोई भी मनोरंजन की एक दुनिया बना ले, चाबी दे कर उसे चलने के लिए ज़मीन पर छोड़ दे, वो चलती जाएगी. आप भी बनाइए और देखिए, वो सदियों तक चल सकती है.


"अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना ज़रूरी है."

30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया वह या तो भक्ति साहित्य की समीक्षा के नाम पर लिखा गया था या फिर जातिवाद के आधार पर. कुल मिला कर कबीर के साहित्य पर आचार्यत्व थोपा गया था जबकि ज़रूरत थी उस विश्लेषण की जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो कबीर का लिखा हो ही नहीं सकता.


उल्लेखनीय है कि उस समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही भी बताया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया. दूसरी ओर वे समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और उनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में मान्य जातिवाद का विरोध था. उनका वो नज़रिया निम्न जातियों में व्यापक स्तर पर फैला. उन्हें भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पीछे धकेलने की एक कोशिश थी जो धीरे-धीरे नाकाम होती रही. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में भक्तिकाल कहा जाता है वह वास्तव में मुक्तिकाल था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संत जान पर खेल गए. 'आवाज़ इंडिया' और अन्य जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. उनके ऐसा करने के पीछे 'अदृश्य' कारण हो सकते हैं.


हालाँकि सभी अनुसूचित जातियों के अपने धार्मिक आइकॉन के रूप में उनके अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं शताब्दी के कबीर को 20 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अंगीकार किया. इसका कारण मेरी समझ के अनुसार यह है कि ये व्यवसाय से बुनकर थे. इस दृष्टि से कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. कबीर की वाणी में इन्होंने अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख दोनों महसूस किए. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार मुख्यतः आर्यसमाजी और थोड़े-बहुत कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पाते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि क्या मेघ ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा

23 March 2017

Advertise Your Megh - अपने मेघ का विज्ञापन करें

यदि आप काम तो बहुत उम्दा कर रहे हैं और कोई आपको और आपके काम को नहीं जानता तो इसका कारण विज्ञापन की कमी हो सकता है. आप बंदे तो बहुत अच्छे हैं लेकिन दूसरों के बीच आपका वैसा इंप्रेशन नहीं बन पा रहा तो पक्की बात है कि आपने अपना विज्ञापन नहीं किया. यदि आप सोचते हैं कि आपके भीतर बहुत बढ़िया विचारों, भावनाओं, जज़्बातों, उम्मीदों का ख़ज़ाना भरा हुआ है और दूसरे लोग उसे ख़ुद-ब-ख़ुद जान जाएँगे तो आप ग़लती पर हैं. आपको बोलने और अपना विज्ञापन करने की ज़रूरत है.


विज्ञापन की ख़ासियत है कि रिपीट होते रहने पर वो अपना एक ख़ास अर्थ देने लगता है. फिर उस अर्थ के रूप में दूसरों के मन का हिस्सा बन जाता है. थोड़े में कहें तो आप अपने विज्ञापन के ज़रिए दूसरे के दिल-दिमाग़ में जगह बनाते हैं और आगे चल कर आपको उसका फ़ायदा होने लगता है. यह बेहतरीन हो जाता है जब विज्ञापन सही सूचना और अच्छा इंप्रेशन दें. विज्ञापन रोचक, भयानक, आकर्षक और मनोरंजक होते हैं यह आपने देखा होगा.


मेघ समाज अपने ख़ुद के विज्ञापन के प्रति कमोबेश उदासीन रहा है और अब उसे बहुत सचेत रहने की ज़रूरत है. यह समाज ग़रीबी के बावजूद इंसानियत और मानवीय गुणों से भरपूर रहा. विपरीत हालात में जीने की इच्छाशक्ति और जीवट में इस समाज के लोगों का जवाब नहीं. वे शिक्षित हुए तो अपनी ज्ञान-बुद्धि और सूझ-बूझ से कामयाबी की ऊँचाइयों तक पहुँचे. सेना में गए तो अपनी प्रोफेशनल क्षमता की निशानियां छोड़ आए. व्यापार में उन्होंने सफलता हासिल की.


तो मेघ सर, आप अपनी ख़ासीयतों का अच्छे से विज्ञापन क्यों नहीं करते? शुरू कीजिए. इस दुनिया में आइए. अब तो आपके पास सोशल मीडिया है. आपके बनाए हुए कबीर मंदिर हैं जो आपका विज्ञापन हैं. ये आपको पहचान देते हैं.


एक विज्ञापन है जिसमें पहले परिवारों की खुशहाली, शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं, खेल-खिलाड़ी, संस्कृति विकास आदि की बात है. आखिर में एक छोटी-सी लाइन है- “इस्पात भी हम बनाते हैं”. यह टाटा स्टील का है. अपने कार्य के बारे में दूसरों को बताना और सलीके से की गई ख़ुद की तारीफ़ अपना और अपने समाज का बढ़िया विज्ञापन होता है.

मेघ सर, सुबह हो गई है. अख़बार देखिए. दुनिया विज्ञापनमय है. उसमें अपनी हाज़िरी दर्ज कीजिए.




19 March 2017

Casteism - Expectations of worker castes - जातिवाद - कमेरी जातियों की उम्मीदें

यह जानकर खुशी होती है कि हमारे मेघ समुदाय के लोग अन्य जातियों के साथ बेहतर आपसी व्यवहार स्थापित कर रहे हैं. यह भी देखा गया है कि उनमें रोटी-बेटी का संबंध बना है चाहे अभी वो व्यापक स्तर पर नहीं है. (ऑफ कोर्स मैं इंटरकास्ट मैरिजिज़ की बात कर रहा हूँ). निश्चित रूप से भारतीय समाज में एक परिवर्तन देखने को मिला है जो स्वागत योग्य है.


अब सीधे आरएसएस की विचारधारा पर आते हैं. आरएसएस का दीर्घाकालिक लक्ष्य सत्ता रहा जिसका रास्ता हिंदुत्व से हो कर गुज़रता है. हिंदुत्व का आधार एक संदेहास्पद अवधारणा पर आधारित है. जब स्वामी दयानंद द्वारा प्रयुक्त ‘आर्य’ शब्द अधिक नहीं चल सका तो उसके बाद हेडगेवार, सावरकर जैसे चिंतकों ने हिंदुत्व का नाम और एजेंडा प्रस्तावित किया जिस पर आरएसएस चल निकला. हिंदुत्व का अर्थ क्या होगा जब हम उसे ‘हिंदू धर्म’ शब्द के साथ जोड़कर देखेंगे. संभव है कि आरएसएस के एजेंडा में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू धर्म’ में अंतर हो लेकिन आम आदमी के लिए हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक ही बात है. हिंदू धर्म की कई विशेषताएं हैं जिसमें समाज का जातिगत ढांचा एक प्रमुख लक्षण है जिसे जातपात कहा जाता है. इसमें कमेरी और श्रमिक जातियां सबसे नीचे आती हैं और अन्य जातियां सवर्ण कहलाती हैं. नोट करें कि सवर्ण जातियां खुद को जातिगत ढांचे के अंतर्गत नहीं मानतीं.


अब रहा हिंदू धर्म. इसका आधार ऐसे ग्रंथ माने जाते हैं जो मुख्यतः वैदिक ब्राह्मणों ने लिखे हैं. इन ग्रंथों ने जातिवाद और अस्पृश्यता जैसी  बुराइयों  का आधार तैयार किया, उसे निरंतरता दी. ये आज भी उस नफ़रत पैदा करने वाली मानव व्यवस्था को मान्यता देते हैं. हिंदुत्व के ध्वजाधरों ने कभी भी इन ग्रंथों के बारे में खुल कर नहीं बोला कि ऐसे ग्रंथ जो जातिगत घृणा फैलाते हैं वो उन्हें मान्य नहीं हैं या वे उन ग्रंथों का खंडन करते हैं, कम से कम जातिवाद के संदर्भ में.


हिंदूधर्म की कोई स्पष्ट परिभाषा अभी तय नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट ने उसे जीवनशैली कहकर कहीं रख दिया हुआ है. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता. हिंदुत्ववादी संगठन मनुस्मृति आदि धर्म ग्रंथों की भावना को कभी मरने नहीं देते. वे उसे धार्मिक सत्संगों, सम्मेलनों तक में घसीट कर ले आते हैं और लोगों के मन पर जातिवाद की जो तस्वीरें बनी हुई हैं उन्हें धुंधला नहीं होने देते.


संघी विचारधारा से प्रभावित कुछ मेघ कहते दिखे हैं कि हम अन्य जातियों की जातपात संबंधी समस्या को अपना ढोल समझ कर बजाते हैं तो यह हमारी ग़लती है. यह बात हज़म नहीं होती क्योंकि यह समस्या सभी कमेरी और श्रमिक जातियों की है. इन दिनों उन जातियों में जो एकता का भाव पैदा हुआ है उससे संघ जैसे संगठनों में बेचैनी हुई है लेकिन अधिक नहीं क्योंकि वे अभी तक सत्ता में हैं. सवर्ण व्यवस्था ने इस देश की बहुसंख्यक आबादी को मनुस्मृति के संविधान के तहत सदियों तक अशिक्षित रखा इसलिए वे किसी न किसी प्रकार से सत्ता में आने का जुगाड़ कर लेती हैं. पहले यह कार्य कांग्रेस के माध्यम से हुआ अब भाजपा ने उसकी जगह ले ली है.

सिर्फ़ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जातपात मर चुकी है. कमेरी और श्रमिक जातियाँ संघ जैसे संगठनों से यह उम्मीद क्यों न करें कि वे जातिवाद को स्थापित करने वाले उन धार्मिक ग्रंथों के अर्थ तय करें और उनमें भरे जातिवाद को अपने स्तर से अमान्य कहने की स्वस्थ परंपरा डालें. शायद इससे देश में व्याप्त जातिवादी नज़रिया बदल जाए. धर्मग्रंथों के अलावा शब्दकोशों, मुहावरा कोशों आदि को अलग से देखा जा सकता है. राजनीतिक पार्टियाँ भी जातिवाद को अपनी तरह से ज़िंदा रखती हैं. वे भी 'टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज ज़रूरी' वाले सिद्धांत पर कार्य करती नहीं दिखतीं.

14 March 2017

Caste Identity and Unity - जाति पहचान और एकता


यह संसार 'नाम' और 'रूप' का बना है. जातियाँ नाम और रूप के आधार पर बनी है और इनकी खासियत यह है इनकी अपनी परंपराएँ और रूढ़ियाँ हैं जो इनकी पहचान है. जातियों की ख़ासियत है कि वे अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं. परिपक्व होते लोकतंत्र में यह सवाल खड़ा हुआ है कि वंचित जातियां आपस में एकता कैसे स्थापित करें ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन कर सकें. दूसरी ओर एक राष्ट्रवाद खड़ा हो रहा है जो जातिवाद का विरोध करता तो नहीं दिखता लेकिन जातिवाद को समाप्त मान कर बात करता है.


कुछ मेघजन इस आइडिया के साथ खेलते हैं कि क्या कबीर को इष्ट मानने वाले या कबीर को बुनकरों की प्रतिनिधि विचारधारा मानने वाले समुदायों का एक सामान्य नाम ‘कबीरपंथी’ रखा जा सकता है ताकि उन जातियों में एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक एकता स्थापित हो जाए?


हाल ही में एक उदाहरण मेरे सामने आया है. राजस्थान में एक सरकारी नोटिफिकेशन के ज़रिए बलाई आदि अनेक जातियों को अनुमति दी गई थी कि वे ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं. उसके पीछे कोई राजनीतिक एकता की मंशा रही होगी ऐसा मानना मुश्किल है लेकिन यह भावना ज़रूर थी कि चमड़े का कार्य करने वाली जातियाँ अपने व्यवसाय से जोड़े गए घृणा के भाव से मुक्ति पा जाएँ. इसके बाद वहाँ 'मेघवंश' और 'मेघवाल' शब्दों के साथ नई जागरूकता का संकेत देते हुए कम से कम एक संगठन बना जिसने बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए. कुछ जातियों ने सरनेम के तौर पर ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. इस पर बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र के मेघवालों को आपत्ति थी क्योंकि वे  व्यवसाय से चर्मकार नहीं बल्कि बुनकर थे. अनजाने में ही सही लेकिन चर्मकारों के व्यवसाय से जुड़ी घृणा उन्हें ख़ुद तक पहुँचती महसूस हुई.


जैसा कि मैंने पहले कहा है - जातियाँ अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं और हाल ही में मेरी जानकारी में आया है कि कई चर्मकार जातियों ने मेघवाल शब्द का प्रयोग करने से इंकार भी कर दिया. कहने का मतलब यह है कि कानून के द्वारा किन्हीं जातियों को एक नाम देना उनमें एकता होने की गारंटी नहीं देता. एकता को लेकर जो बेचैनी है वो राजनीतिक है और उसका समाधान राजनीति के सिद्धांतों के अंतर्गत होगा. समाज सदियों से बँटा हुआ है और वह जल्दी सुधरने वाला नहीं है. अनुसूचित जातियों का आपस में रोटी-बेटी का व्यापक और खुला दिखने वाला संबंध नहीं है और न ही वह एकदम से स्थापित हो सकता है. इसमें भौगोलिक,आर्थिक और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं.

बेहतर आंदोलन यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के आदमी को जल्दी से सुधार ले. समाज को बदलने में समय लगता है. ‘समय’ कहकर किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहता. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी ही होती है. अब वंचित जातियों में शिक्षा का प्रसार हो रहा है जिससे उनकी मानसिक रुकावटों के पिघलाव की गति तेज हो सकती है. इससे उम्मीद जगती है. इसे हाल ही में उभरे राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखने की ज़रूरत होगी जिस पर समाजशास्त्री प्रकाश डालेंगे.

11 March 2017

The icon of my political expectations - Sharad Yadav - मेरी राजनीतिक अपेक्षाओं का आइकॉन:शरद यादव


माननीय शरद यादव जी को कई बार संसद में बोलते सुना है और हर बार लगा है कि वे भारत के जन-जन की आवाज़ और आकांक्षाओं को वो अभिव्यक्ति दे रहे हैं जिसकी वे हकदार हैं लेकिन जिनका हक़ हर बार मारा गया है. सत्ता ने भारत की जनता के लिए कितना किया है और कितना नहीं किया गया या करना ही नहीं चाहती वो सब उनके शब्दों और स्वर की खनखनाहट में स्पष्ट झलकता है. एक राजनीतिक विचारक के रूप मेरी नज़र में वे बेजोड़ हैं. उनका हाल ही का एक वीडियो लोकसभा टीवी पर रखा गया है जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ. मेघनेट के पाठकों से इस अनुरोध के साथ कि आप इसे देखें. इससे आपको भारत के उस पक्ष को समझने में मदद मिलेगी जो अकसर हमारी पकड़ से बाहर होता है.


05 March 2017

King Preist of Indus Valley - सिंधु घाटी का पुरोहित नरेश


अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भाषाविज्ञानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने भाषा के नज़रिए से इतिहास पर समीक्षात्मक नज़र डाली है. उन्होंने नई बातें सामने ला दी हैं जो अभी तक लिखे गए इतिहास पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं साथ ही कई मान्यताओं को भी प्रभावित करती हैं.


मेघ ऋषि को अपना वंशकर्ता मानने वाले कुछ मेघवंशियों ने मेघऋषि के रूप की कल्पना सिंधुघाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) से मिली पुरोहित नरेश की मूर्ति के आधार पर की और उसका अच्छा प्रचार किया है. वैदिक या पौराणिक कथाओं में वर्णित किसी ऋषि की कल्पना उसके लिए प्रयुक्त शब्दों से मन पर उभरती छवियों के आधार पर होती है. मेघ ऋषि का कोई प्रामाणिक चित्र तो है नहीं फिर भी मेघ ऋषि का एक रूप बना कर उस में आस्था पिरोई जा सकती है. दूसरी ओर वैज्ञानिक खोज हमारी आस्था आधारित अवधारणआओं को प्रभावित करती चलती है.


डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह जी ने उक्त पुरोहित नरेश की मूर्ति के माथे पर लगे गोल अलंकरण के बारे में बताया है कि:-


“पालि का एक शब्द है - ककुध. ककु अर्थात शिखर. ककुसन्ध बुद्ध इसी से संबंधित हैं. ककुध के तीन रूप हैं - ककुध, ककुभ और ककुद. ककुध के तीन अर्थ प्रमुख हैं - शीर्ष, राजचिह्न और वृषभ का कूबड़. विशेषण के अर्थ में यह उत्तम पुरुष का द्योतक है - अध्यात्म के क्षेत्र में भी और सत्ता के क्षेत्र में भी.


सिंधु घाटी सभ्यता में सेलखड़ी पत्थर की बनी जिस प्रतिनिधि पुरुष की मूर्ति को इतिहासकारों ने पुरोहित नरेश या कोई शक्ति केंद्रित पुरुष की मूर्ति बताई है, उसके मस्तक पर गोल अलंकरण है, वह ककुध है. कई सील-चित्रों पर कूबड़दार वृषभ का अंकन है और जिनके बारे में इतिहासकारों की राय है कि उनकी पूजा होती होगी, उनकी पीठ के शीर्ष भाग पर ककुध है. गौतम बुद्ध के मस्तक पर जो उठी हुई गोलाई है, यदि आप उसे टीका या मांसपिंड समझते हैं तो यह गलतफहमी है. बौद्ध मत में इसे ककुध कहा जाता है. ककुध की परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता को बौद्ध सभ्यता से जोड़ती है.”

यानि सिंधुघाटी सभ्यता ख़ुद के बौध सभ्यता होने का पर्याप्त संकेत देती है. मैंने उक्त मूर्ति के लिए प्रयुक्त शब्द ‘King Preist’ का हिंदी अनुवाद ‘राज पुरोहित’ किया था जो ग़लत था. डॉ. राजेंद्र जी द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘पुरोहित नरेश’ सही और सटीक शब्द है.


02 March 2017

Via Spirituality - बारास्ता रूहानियत

इन दिनों देख रहा हूँ कि व्हाट्सएप्प ग्रुपों में लामबंद हुए मेघों में कई बार धर्म को लेकर बहस छिड़ती है और दिखने लगता है कि वे डेरों और गद्दियों को लेकर बहुत जज़्बाती हैं. ग्रुप में मेघ मधाणी (मथनी) अक्ल के दही को रिड़कने लगती है. मैं इससे परेशान नहीं होता बल्कि अच्छा लगता है कि जो बहिष्कृत समाज धार्मिक स्थलों में प्रवेश नहीं कर सकता था अब उसके लिए डेरा प्रमुखों और गद्दीधारियों ने अध्यात्म और भक्ति के रास्ते खोले हैं. यह उन्हें मुख्यधारा में होने का जैसा भी है लेकिन एक अहसास दिलाता है.


जब बहिष्कृत समाज का कोई बंदा मुख्यधारा में आता है तो इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि वह एक शरणागत (रिफ्यूजी) की हैसियत से आगे न बढ़े. उसे कई तरीकों से डेरे और गद्दी के अनुशासन में बाँध दिया जाता है और यदि वो स्वभाव से ही भक्त है तो वो बँध भी जाता है. भक्ति चाहे गुलामी की सबसे बदतर हालत में ही क्यों न ले जाए वो भक्ति पाप नहीं कहलाती. धर्म ने यह व्यवस्था पहले ही कर रखी है.


वंचित जातियों ने अध्यात्म की खोज के लिए आधुनिक डेरों आदि का निर्माण किया है जहाँ जात-पात की संकरी गली से हो कर भी पहुँचा जा सके. कई डेरे अनुसूचित जातियों के अनुरूप सजाए गए हैं. वहाँ समता और मानवता का बैनर ले कर कोई गुरु या उसका पीए खड़ा रहता है. एक जैसी जातीय पहचान वाले समूह वहाँ सुकून से बैठ सकते हैं, एकदम टेंशन फ़्री. इस लिए डेरों को जब भी देखें सबसे पहले जाति के नज़रिए से देख लें. इससे सुविधा होगी. डेरे पर आपका चढ़ावा महत्वपूर्ण है. डेरों और धार्मिक स्थलों के संचालकों में चढ़ावे को लेकर आपस में एक संघर्ष, कभी-कभी ख़ूनी संघर्ष भी चलता रहता है. उनकी पृष्ठभूमि को एक बार देख लेना आपके हित में होगा.


जितने भी संत हुए हैं कबीर, रविदास, पीपा, पलटू आदि ये सभी वंचित जातियों से हुए हैं और इनकी जात-पात विरोधी विचारधारा का बहुजन में खूब प्रचार-प्रसार हुआ. होना ही था क्योंकि जात-पात उनके लिए घाटे की गारंटी थी वो भी बेमीयादी. जब संतों के नाम से डेरे बने और चल निकले तो वहां निम्न जातियों के लोगों से चढ़ावा आने लगा. ये डेरे एक तरह से सामाजिक संगठन का काम करते थे. यहाँ से आस्था का व्यवसाय भी साथ-साथ चल निकला इसलिए उनका अन्य के साथ कंपीटीशन होना तय था और वो हो गया.


प्रसंगवश, आस्था के व्यवसाय में पैसा है, आध्यात्मिक ग्लैमर है और नैतिकता की घूरती आँख भी है. पहले इस पर ब्राह्मणों का प्रभाव था. इसे देख कर पढ़े-लिखे कायस्थ समुदाय के प्रबुद्धजनों ने आगरा में 'राधास्वामी' नाम से डेरे का निर्माण किया जिस पर कायस्थों का प्रभाव है. वहां से प्रेरणा लेकर अमृतसर के पास ब्यास में राधास्वामी डेरा बनाया गया जिस पर जाटों का प्रभाव है. यहाँ इतनी बड़ी गुरु शिष्य परंपरा है कि आदमी देखता रह जाए. जाटों का इतिहास बताता है कि उनकी धार्मिक विचारधारा ओबीसी से उभरे संतों से बहुत प्रभावित है.

कई डेरे-गद्दी वालों ने राजनीतिक और सामाजिक रौब-दाब की कमाई की है जो उनकी सामाजिक संगठन तैयार करने की गहरी समझ का सबूत है. उनका राजनीतिक महिमामंडल साफ दिखता है. राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें वोट बैंक के तौर पर दुलारती हैं. इनसे आपका अपना चिंतन प्रभावित हो सकता है.

सभी डेरों को जाति के नज़रिए से परखिए. समझने में आसानी होगी....और हाँ....ज़रा रुकिए....सोचिए.... कि क्या आप उनके बिना भी बेहतर ज़िंदगी बिता सकते हैं?

26 February 2017

History of Meghs - some questions - मेघों का इतिहास - कुछ सवाल

कुछ वर्ष पहले की बात है कि तीन युवाओं को सोशल मीडिया पर उलझते हुए देखा था. एक युवा किन्हीं बातों पर सहमत हो रहा था तो दूसरे को उसकी सहमत होने की आदत पर एतराज़ था. उन तीनों में एक युवा का नाम एकमजीत है जिसे सवाल उठाने का नेक है.

पिछले दिनों एकमजीत ने यू-ट्यूब चैनल MEGHnet देखा और उसने कुछ सवाल खड़े कर दिए. सवाल गंभीर थे और जवाब देना बनता था.

पहला सवाल था -  इन सभी वीडियो में बताई गई बातों को सच कैसे माना जाए? ये तो मनोचित्र हैं. मनोचित्र के बारे में मेरा मानना है कि हम जो कुछ भी जानते-मानते हैं वह सारी जानकारी मनोचित्रों के रूप में ही दिमाग़ में इकट्ठी हुई होती है. उसका कुछ हिस्सा हम बाहर प्रकट कर पाते हैं. अब जवाब पर आते हैं. MEGHnet चैनल पर जितने भी वीडियो हैं वो विद्वानों की पुस्तकों और नेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं. उन्हें समेकित (consolidated) रूप में एक जगह रखने का कार्य मैंने किया है और उस कार्य की अपनी सीमाएँ हैं.

मेघ ऋषि संबंधी वीडियो कइयों के मन में सवाल खड़े करता है क्योंकि मेघ ऋषि एक पौराणिक पात्र है जिसे आज के किसी हाड़-मांस के आदमी ने नहीं देखा. मेघ ऋषि की जन्म-मरण की तिथियाँ कैसे मिलेंगी जबकि दो सौ वर्ष पहले तक भारत में जन्म तिथि याद रखने का कोई वैज्ञानिक तरीका प्रचलित नहीं था. मेघ ऋषि के माता-पिता का नाम कहीं लिखा है तो मैं नहीं जानता. वेदों-पुराणों में मेघ ऋषि का कोई स्कैच था या नहीं मुझे नहीं पता. गीताप्रेस गोरखपुर वालों ने बनवाया हो तो भी पता नहीं😀. केवल शब्दों से मनोचित्र बनाए गए हैं. जो कुछ मुझे बताने योग्य लगा मैंने बता दिया. पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि पौराणिक कथाएँ अनपढ़ रखे गए लोगों को भरमाने के लिए लिखी गई थीं.

मेघों और मेघवंशियों के इतिहास का जहाँ तक संबंध है एक बात स्पष्ट करनी ज़रूरी है कि स्वामी गोकुलदास और मेरे पिता श्री मुंशीराम भगत ने अपनी पुस्तकों में बहुत सी जानकारियाँ दी हैं लेकिन ये दोनों महापुरुष इतिहासकार नहीं थे. अलबत्ता आगे चलकर जब कभी कोई मेघों का इतिहास लिखेगा तो इन पुस्तकों से कुछ जानकारी वो ले सकेगा. डॉक्टर ध्यान सिंह ने अपने थीसिस "पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास" में जो रिसर्च कार्य किया है उसमें उक्त दोनों लेखकों को उद्धृत किया है.

एकमजीत जी ने सवाल किया था कि चमार समुदाय का इतिहास उन्हें सिंधुघाटी सभ्यता का बताता है. तो क्या चमार समुदाय भी मेघऋषि का वंशज है. यह बहुत टेढ़ा सवाल है क्योंकि यह मानने की बात अधिक है. हाँ, इतना कहा जा सकता है कि कई शूद्र जातियों और लगभग सभी अनुसूचित जातियों का इतिहास उन्हें सिंधुघाटी का बताता है और अभी हाल ही की खोज ने स्पष्ट किया है कि जिसे हम सिंधुघाटी की सभ्यता कहते हैं वह वास्तव में बौध सभ्यता थी. तो इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि बौध सभ्यता से संबंधित सभी जातियाँ और वंश बौध सभ्यता से थे. (मैं यहाँ बाद में उपजे बौधधर्म की बात नहीं कर रहा). भारत में जितनी भी दलित जातियाँ हैं उनका इतिहास अंग्रेज़ों से पहले लुप्त था. अब शिक्षित हो कर सभी जातियां नई जानकारियों के साथ अपने गौरवपूर्ण इतिहास को ढूंढ कर ला रही हैं और लिख रही हैं. मैंने पढ़ा है कि जाट भी खुद को वृत्र (मेघ ऋषि) का वंशज मानते हैं; उन्होंने अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया है. अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार कई जातियां मेघवंश से निकली हैं और जाति के तौर पर वे अपनी अलग पहचान रखती हैं. उनमें इतनी भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक असमानताएं पैदा हो गई हैं कि वे एक दूसरे को ख़ुद से अलग ही समझती हैं.
एकमजीत जी ने एक रुचिकर बात कही कि 'हमने अपना जो पुराना इतिहास देखा नहीं या समझा नहीं उसे क्यों न छोड़ ही दिया जाए?' इस सवाल से मैं पहले भी रूबरू हो चुका हूँ. ऐसा सवाल दो कारणों से पैदा होता है. 1. हमें पुराणों में दिए गए ऐतिहासिक संकेतों की समझ नहीं आती और 2. यदि आती है तो हम पाते हैं कि हमारे अतीत (गुज़रे इतिहास) को इतने गंदे तरीके से बयान किया गया है कि पढ़ कर गुस्सा आता है. इसलिए हम पूछने लगते हैं कि क्या उस इतिहास को पढ़ने या दोहराने से कोई फ़ायदा है?

एकमजीत जी के इस सवाल को मैं बहुत महत्व देता हूँ. हमारे समाज के बारे में जो इतिहास मिलता है वो हमारे समाज के लोगों ने नहीं लिखा बल्कि अन्य समाजों के लोगों ने लिखा है या फिर उनकी मदद से अंग्रेज़ों या अन्य ने लिखा है. वो जैसा भी लिखा है दूसरे उसे सही मानते-जानते हैं. हमारी मजबूरी है कि हम भी वही पढ़ते हैं. इसलिए अब अनुसूचित जातियों के लोग इस बात का प्रोपेगंडा करने लगे हैं कि पौराणिक कहानियां को इतिहास मानना बंद करो.

आज भारत की सभी अनुसूचित जातियां महसूस कर रही हैं कि उन्हें अपना इतिहास खुद ही लिखना होगा क्योंकि उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा है वह एकतरफा और घृणा से ग्रस्त है. एक तरफ जहाँ चमार, धानक, जाट आदि समुदायों ने अपना इतिहास खुद लिखने के सघन प्रयास शुरू कर दिए हैं दूसरी तरफ मेघ समाज में अभी तक इतिहास के प्रति जागरुकता की बहुत कमी है. कारण है सदियों की अनढ़ता. अभी हमारी दूसरी या अधिक से अधिक तीसरी पीढ़ी के लोग शिक्षित हुए हैं. अभी उम्मीदें जगी हैं. पंजाब के डॉक्टर ध्यान सिंह ने पंजाब के कबीरपंथियों पर रिसर्च की है जो मुख्यतः मेघ समुदाय पर केंद्रित हैं. उनकी रिसर्च में मेघों का पिछले 200 वर्षों का इतिहास मिल जाता है. उसे फिलहाल पूरा इतिहास नहीं कहा जा सकता. आगे चलकर उनसे बेहतर प्रकाशन की उम्मीद है.

अंत में एकमजीत जी का सवाल है कि क्या दलितों द्वारा दलितों के इतिहास पर की गई रिसर्च को मान्यता मिल सकती है? हाँ, मिलेगी, जब वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था बदलेगी. उसके आसार बनने लगे हैं. आखिर नवल वियोगी जैसे कई इतिहासकार हैं जो दबे नहीं. उन्होंने अपने शोध को पुस्तक के रूप में छपवाया. आगे चलकर भारत सरकार ने उसे मान्यता दी और राष्ट्रीय सम्मान भी दिया.


15 February 2017

The size of a Voter - वोटर का आकार

फोटो bhaskar.com के साभार
हर चुनाव अपने पीछे कुछ सामाजिक मुद्दे, रंजिशें और नफ़रतें छोड़ जाता है. लोग कहने लगे हैं कि अब पार्टियों से ऊपर उठकर सोचना शुरू करो. वे महसूस करते हैं राजनीतिक पार्टियाँ समाज के सामान्य ताने-बाने को तबाह करती हैं. इसे ठीक होना ही चाहिए लेकेिन यह होगा कैसे? राजनीतिक पार्टियों ने अपना महिमाजाल इतना फैलाया हुआ है कि छोटी पार्टियाँ या छोटे समूह अपना एजेंडा बना ही नहीं पाते. उसे लागू करना तो दूर की बात है. कोई नया विचार या विचारधारा लेकर आए तो बड़ी पार्टियाँ तुरत उसे अपने चुनावी घोषणापत्र में थोड़े से अतिरिक्त शब्दों के साथ शामिल करके उसे हाइजैक कर लेती हैं. दरअसल वे हाइजैक नहीं करती बल्कि थोड़ा-बहुत शोर मचा कर उसे डिफ्यूज़ कर देने की ताकत रखती हैं. यह कार्य मीडिया के माध्यम से आसानी से हो जाता है जो बड़ी पार्टियों के नियंत्रण में होता है.

वैसे तो हरेक आदमी अपने, अपने परिवार या समाज के लिए जो भी सामान्यतः कर रहा होता है वह अनेक प्रकार से देश हित में होता है. लेकिन वो दिखता नहीं. जिसके पास पैसा और सत्ता है वो देश के लिए काम करता हुआ दिखता है और वो अपना विज्ञापन करता हुआ चलता है. नया चलन है कि वो अपने राजनीतिक विरोधी पर देशद्रोही का इल्ज़ाम लगाने से ग़ुरेज़ नहीं करता. अब लोग कहने लगे हैं कि "पार्टियों से ऊपर उठ कर" कार्य करो. पार्टियाँ अपनी वैचारिक लाइन से ऊपर उठ कर काम करेंगी ऐसा नहीं लगता.

तो फिर मतदाता क्या करे. लोकतंत्र में मतदाता इस कार्य की सूक्ष्मतम इकाई है. बहुत ही छोटी. उसकी उम्मीदें और प्रयास भी छोटे होते हैं. इसलिए उसे बड़ा सुझाव कोई दे भी तो क्या दे. वोटर की नियति है कि वह ‘मत दान’ कर के अपना ‘मत त्याग’ देता है. उसकी पहली होशियारी इतनी-सी हो सकती है कि भई ‘अपने मत को दान में न दे कर मत का सही उपयोग किया जाए’. अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की आदत डाली जाए. वादे के मुताबिक काम नहीं करता तो उसे पकड़ा जाए. आम वोटर जाति के सवाल पर तो फिलहाल कुछ नहीं कर सकता लेकिन धर्म के नाम पर हो रही राजनीति को तो वो दुत्कार ही सकता है.

आम वोटर की देशभक्ति असंदिग्ध है.

10 February 2017

Unity of Meghs - मेघों की एकता



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जब-जब सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों की बात आती है तो यह सवाल मन पर लटक जाता है कि मेघों में एकता क्यों नहीं होती? ऐसी सोच रखने वाला मैं पहला व्यक्ति नहीं हूँ न ही मेघ समाज अकेला ऐसा समाज है.  पहली बात यह कि लंबी अनपढ़ता के कारण बहुत से समुदाय अपने अतीत और वर्तमान का सही विश्लेषण नहीं कर पाते. कुछ कमियां और कमज़ोरियां ऐतिहासिक होती हैं. दूसरे, धर्म की सही समझ न होने से वे समुदाय नहीं समझ पाते कि इंसानों को बांटने वाले तत्वों में धर्म सबसे बदनाम चीज़ है जो इंसान के मन और जीवन में बहुत तोड़-फोड़ मचाता है. कुछ राहत भी देता है इससे इंकार नहीं लेकिन उसके व्यावसायिक और राजनीतिक स्वरूप को समझा जाए.


पंजाब के मेघ भगत लोगों ने तथाकथित मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश में आर्यसमाज से लगन लगा ली. यह कुदरती था क्योंकि उन्हें शिक्षित करने में आर्यसमाज का बहुत रोल था. उन दिनों आर्यसमाज का मतलब था - कांग्रेस. इसलिए धर्म और राजनीति का एक घालमेल मेघों को मिल तो गया लेकिन आगे चल कर राजनीतिक-धार्मिक ताने-बाने और ताने-पेरे को समझने में उनको मुश्किलें आईँ.


1977 में जनता पार्टी के उदय के समय कुछ मेघजन कांग्रेस से छिटकते हुए नज़र आए. जिन्होंने ‘हलधर’ को चुना वे अन्य कांग्रेसी-आर्यसमाजी मेघों की नज़र में बिरादरी के ग़द्दार ठहराए गए. जब पूरा देश जनता पार्टी की लहर में बह रहा था तब मेघों ने कांग्रेस को जिताया. इस दौरान कई मेघ समझ गए कि आर्यसमाज ने उन्हें अपने एजेंडा से निकाल दिया हुआ था. लेकिन वे हवन से संतुष्ट और राजनीतिक नुक़सान से बेख़बर थे. आर्यसमाज-कांग्रेस की जुगलबंदी से वे ऐसा कोई समर्थन नहीं पा सके जो उन्हें विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिला पाता.


मेघ इस ग़लतफ़हमी में रहे कि आरक्षण कांग्रेस ने दिया है. उधर आर्यसमाजियों की स्वाभाविक कोशिश थी कि मेघ डॉ. अंबेडकर की विचारधारा से दूरी बनाए रखें. आज बहुत से मेघ अंबेडकर को मानने लगे हैं लेकिन पुरानी पीढ़ी के कुछ बचे-खुचे बूढ़े आर्यसमाजी आज भी उन्हें अंबेडकरी विचारधारा से दूर रहने की सलाह देते हैं. वे नहीं जानते कि मेघों से अलग दिखने वाले अन्य समुदाय जिन्हें मेघ ख़ुद से कमतर मानते थे वे अंबेडकरी विचारधारा को अपना कर सामाजिक जागृति में पहलकदमी कर पाए और राजनीतिक तौर पर मेघों से आगे निकल गए.


1980-90 के मध्य में मेघों ने अंबेडकर को अपनाना शुरू किया था इसके संकेत मिलते हैं. लेकिन आर्यसमाजियों के विरोध के कारण वे दबाव में आ गए और 14 अप्रैल को ‘मेघ-दिवस’ के तौर पर मनाने की उनकी कोशिश को निराशा मिली. आज अंबेडकरवाद देश में एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर स्थापित हो चुका है.


मेघों में कबीर के प्रति झुकाव का कोई तारीख़वार इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन कहा जाता है कि 1947 तक 2 प्रतिशत मेघजन कबीर को मानते थे और आज 98 प्रतिशत कबीर को मानते हैं. (मेघों ने इतने कबीर मंदिर बना लिए हैं कि अब उन्हें कबीर मंदिरों का बीमा कराना चाहिए🙂). ‘कबीरपंथी मेघ’ होना एक ऐसी पहचान है जिसमें वोट बैंक बनने की भरपूर क्षमता है. एक बार रवीश कुमार ने ऐसा ही संकेत दिया था. तो मान लिया जाए कि मेघों में एक प्रकार की धार्मिक एकता विकसित हो गई है. लेकिन केवल धर्म से काम नहीं चल सकता. सदियों की ग़रीबी से लड़ने के लिए सत्ता में बढ़ती हुई भागीदारी ज़रूरी है.

इस समय चुनाव का समय है. पंजाब में वोटिंग हो चुकी है. मेघों की राय ईवीएम में बंद है. जालंधर (वेस्ट) की सीट के लिए आप पार्टी, भाजपा और शिवसेना ने मेघों को टिकट दिया. 3 उम्मीदवार मैदान में हैं. (पूरे पंजाब में शिवसेना ने 5 मेघों को टिकट दिया है). कांग्रेसी मेघों में बहुत बेचैनी रही. अब वोट बँट जाने का भय भी सताता है. फिर भी मुमकिन है इस बार के चुनाव के नतीजे इस बात को साफ़ कर दें कि मेघों में एकता की बुद्धि विकसित हुई है.


31 January 2017

Megh Manavta Dharm and Constitutional Religion - मेघ मानवता धर्म और संवैधानिक धर्म

संविधान को लागू हुए 67 वर्ष हो चुके हैं लेकिन हर पढ़ा-लिखा नागरिक महसूस करता है कि भारतीय समाज संविधान की भावना के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है. जात-पात (जिसमें रंगभेद शामिल है), लिंग भेद, धर्म भेद, अवैज्ञानिक नज़रिया आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनसे समाज पार नहीं पा रहा है. कुछ विचारधाराएँ समाज में हैं जो संविधान को ऐसे रूप में बदल लेना चाहती हैं जो साफ़ तौर पर वर्तमान संविधान के विरुद्ध दिखाई देता है.

उक्त पुस्तक ‘संविधान धर्म’ के सिद्धांत का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है. धर्म के नाम पर लोग बहुत भावुक हो उठते हैं. जो भी उनकी धार्मिक वृत्ति या पसंद है उससे अलग कोई धर्म उनके समक्ष रखा जाए तो वे आशंकित हो उठते हैं कि कहीं उन पर कोई नया धर्म तो नहीं थोपा जा रहा या किसी नए विचार से उनका धर्म प्रदूषित तो नहीं हो जाएगा, वगैरा-वगैरा. ये ख़तरे हम तब भी महसूस करते हैं जबकि हम भारत के नागरिकों ने ख़ुद को एक बहुत बढ़िया और मज़बूत संविधान दिया हुआ है.

कुछ वर्ष पहले मेरे एक पुराने मित्र श्री जी. एल. भगत, आयकर आयुक्त (सेवानिवृत्त) ने ‘Scheduled Castes As A Separate Religion’ के नाम से एक आलेख Part-1 और Part-2 मुझे भेजा था जिसे मैंने पढ़ा तो था लेकिन उसकी अवधारणा (concept) तब मेरी समझ में नहीं आई थी. तीन दिन पहले वे खुद चंडीगढ़ आए. उन्होंने बामसेफ के कुछ पदाधिकारियों से उक्त आलेख में बताए गए ‘मेघ मानवता धर्म’ की अवधारणा पर बातचीत की. मैं भी उस बातचीत का हिस्सा बना.

पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी प्रस्तुत अवधारणा पर बहुत कार्य किया है और एक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ नाम से एक पुस्तक अंग्रेज़ी में तैयार की है जिसमें ‘मेघ मानवता सोशियो कल्चरल सोसाइटी’ नामक संस्था के गठन का उल्लेख है जिसका एक संविधान बनाया है. उन्होंने बताया कि इस सोसाइटी की विचारधारा का विस्तार केरल, तमिलनाडु, गुजरात आदि राज्यों में भी किया है. सोसाइटी का रजिस्टर्ड कार्यालय मुंबई में है. इस सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी (Socio-Cultural Society) का मुख्य उद्देश्य भारत में ऐसे समाज का निर्माण करना है जो भारत के संविधान के अनुसार जन-जन में ऐसा मानवीय व्यवहार विकसित करें जो संविधान सम्मत हो और साथ ही उसकी रक्षा करने के क़ाबिल हो. ज़ाहिर है कि इस सोसाइटी का वैचारिक परिप्रेक्ष्य (Ideological Perspective) बहुत बड़ा है. इस संबंध में दो विरोधाभासी मत देखने को मिलते हैं. कोई कहता है कि जो संविधान को मानता है उसे किसी अलग धर्म की कोई जरूरत नहीं. दूसरा कह देता है कि संविधान कोई धर्म नहीं है. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विचार भी इस बारे में अंतर्विरोधों (internal contradictions) से भरे हो सकते हैं आखिर वे भी सामाजिक प्राणी हैं. परस्पर विरोधी दिखने वाले इन विचारों से एक बात स्पष्ट है कि संविधान में धर्म जैसी कोई चीज है तो ज़रूर और अगर नहीं है तो भी उसके अपने संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values) तो हैं ही जो किसी धर्म से कम नहीं हैं बशर्ते कि संविधान की भावना को धारण कर लिया जाए. क्या हमारे वर्तमान समाज में उसकी काबलियत है?

उक्त पुस्तक में ‘मेघ मानवता’ शब्द के अर्थ की पृष्ठभूमि को भी स्पष्ट किया गया है. बताया गया है कि ‘मेघ मानवता’ शब्द भारत में प्रचलित जजमानी प्रथा से पहले की सभ्यता से संदर्भित है. ‘मेघ मानवता’ बुद्ध से पहले अस्तित्व में थी. आज उसी धर्म को सत्यमत, बुद्धिज्म का नाम दिया गया है. मैगी (Magis) और शाक्य बुद्ध से पहले भी अस्तित्व में थे और बुद्ध उस धर्म के नायक हुए. पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि महावीर मेघ समुदाय से थे और नवल वियोगी ने उल्लेख किया है कि महावीर जैन की एक बहन मेघ परिवार में ब्याही गई थी.

लेखक ने बताया है कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी बुद्ध, कबीर, नानक, रविदास, घासीदास, फुले, अंबेडकर और अन्य संतों, सूफी संतों और सामाजिक क्रांतिकारियों, वीर नारायण सिंह और अन्य दबाए गए कबीलों के योद्धाओं की विचारधारा को मानती है.

पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि हिंदू धर्म विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं का जुड़ाव है इसी लिए उसे ‘जीवन-शैली (Way of Life)’ कहना पड़ता है. लेकिन यह ‘जीवन शैली’ शब्द चंद जाति समूहों के लिए सुविधाजनक है तो कुछ के लिए नहीं है. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के अधिकार पर पुस्तक काफी स्पष्ट होकर अपनी बात कहती है. इस सोसाइटी का स्वरूप धार्मिक कैसे है और ‘संवैधानिक धर्म’ शब्द इस्तेमाल क्यों किया गया है उसे स्पष्ट करने के लिए ‘थियोसोफिकल सोसायटी ऑफ वर्ल्ड’ में दी गई शर्तों की बात पुस्तक में की गई है. दावा किया गया है कि उन शर्तों की नींव पर ही ‘मेघ मानवता सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी’ का गठन हुआ है।

इसी संदर्भ में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक सिद्धांतों की तर्ज़ पर सोसाइटी के 52 संकल्पों (Resolutions) का उल्लेख है जो इस सोसाइटी को वैचारिक आधार देते हैं। अंत में हम सबका ख़ुद से यह पूछना तो बनता है कि एक सोसाइटी, जिसका आकार चाहे फिलहाल सीमित-सा हो, वह संविधान में उदित होते एक धर्म का अस्तित्व क्यों नहीं देख सकती जो पूरे भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी हो?


26 January 2017

Meghs as per anthropology - मानवशास्त्र के अनुसार मेघ

इंसान जब अपने मूल को ढूँढने निकलता है तो उसे सृष्टि के प्रारंभिक प्राणियों जैसे अमीबा, Comb Jelly, मछली और फिर बंदर में अपना अतीत जल्दी से न दिखता है न हज़म होता है. फिर वो पूछता है कि भाई हम किस मानव स्वरूप पुरुष की संतान हैं जिसे हम अपना पहला पुरुष कह सकें. यही 'पहला' सबसे बड़ी मुसीबत है उनके लिए जो सवाल पूछते हैं. फिर भी वैज्ञानिकों ने और अन्य जानकार लोगों ने मानवशास्त्र-विज्ञान (anthropology), भाषा-विज्ञान (philology) आदि के आधार पर बहुत सी जानकारी दी है. 'पहला' तो नहीं मिलता लेकिन उसकी संतानों के कदमों के निशान पाए जाते हैं कि वे कहाँ से चले होंगे और कहाँ-कहाँ गए और इस समय कहाँ-कहाँ हैं. तो हे मेघजन! आपके लिए कुछ संदर्भ हाज़िर हैं इससे आपको कुछ तसल्ली मिलेगी.

मेघवंश के इतिहासकार ताराराम जी ने हाल ही में श्री मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान, शाखा - देसूरी के घानेराव में दिनांक 03 जनवरी 2017 को एक उद्बोधन दिया था जिसकी एक प्रति उन्होंने अग्रिम रूप से मुझे भेजने की कृपा की थी. उस भाषण का एक अंश आपके मतलब का हो सकता है यदि आप अपनी मानवशास्त्र सम्मत (एंथ्रोपोलोजिकल) पहचान में रुचि रखते हैं.

"किसी समय मारवाड़ और महाराष्ट्र एक ही हुआ करता था और यह ध्यान देने वाली बात है कि इस क्षेत्र का नाम ‘मारवाड़’ और इससे इतर प्रदेश का नाम 'महाराष्ट्र' इन जगहों पर निवास करने वाले एक ही तरह के ‘म्हार’ वा ‘मेग’ लोगों के कारण पड़ा था. कोल-द्रविड़ मूल के ‘मेग’ शब्द के अर्थ जूना, पुरानाप्राचीनफैलना या पसारना, बादलमुख्य या प्रमुख आदि कई होते है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ‘महार’ और ‘मेग’ शब्द की व्युत्पत्ति धातु भी एक ही है. म्हारवाड से मारवाड़ और महार-रटठ से महाराष्ट्र शब्द बना. वाड का अर्थ जगहघेरा या वाड़ से है और रटठ का अर्थ राष्ट्र से है. स्पष्ट यह है कि यह भूमि मेघों और महारों की भूमि रही हैऐसा इसके प्राचीन इतिहास से ज्ञात होता है. इनसे जुडा हुआ मालवा और मालानी भी ‘मल्ल’ लोगों का निवास होने के कारण मालवा और मालानी कहलाया. ये सब तथ्य आज जिस संगठन के बैनर-तले यह कार्यक्रम हो रहा हैउसके लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैक्योंकि मारवाड़ की ‘मेघ’ जाति की उत्पत्ति’ और महाराष्ट्र की ‘म्हार’ नामधारी जाति की उत्त्पति एक ही प्रजाति से हुई है. मल्लमेगम्हार आदि भारत के प्राचीन और मूल वाशिंदे है. इसमें अब कोई संशय नहीं रह गया है और वे कोल-द्रविड़ मूल के है. सिन्धु-घाटी की प्राचीन सभ्यता के सृजनहारों में कई इतिहासकारों ने ‘मेगों’ का उल्लेख किया है और हमारा जो यह प्रदेश हैवह किसी समय सिंध का ही एक हिस्सा था. इसलिए यहाँ निवास करने वाले आज के ‘मेग’ और प्राचीन काल के ‘मेग’ एक ही परंपरा और एक ही प्रजाति के हैइसमें भी कोई संदेह नहीं रह जाता है. सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के आस-पास बसने वाले मेगों का उल्लेख महाभारत आदि ग्रंथों में मद्र और मल्ल के रूप में और कहीं-कहीं बाह्लिक के रूप में हुआ है. विश्व-इतिहास में इन्हें ‘मेडिटेरेनियन’ के रूप में भी रखा है और आस्ट्रिक प्रजाति के साथ वर्णन किया गया है. आज तक की उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट हुआ है कि ये प्रजातिगत रूप से कोल-द्रविड़ मूल के मंगोलियन प्रजाति से निकली हुई जातियां हैजो भारत में वैदिक आर्यों के आक्रमण से पहले यहाँ बस चुकी थीं. वैदिक आर्यों के और यहाँ की मेघ आदि जातियों के बीच 500 वर्ष तक लम्बा संघर्ष चला. समय बीतते-बीतते वैदिक-आर्य सरस्वती नदी के आस-पास बस गए और उस भू-भाग पर कब्ज़ा कर लियाजिसे उन्होनें आर्यावर्त कहा. मेघ लोग सतलजजिसका पुराना नाम ‘मेगाद्रु’ था उसके आस-पास व चेनाब या चंद्रभागा और सिन्धु की अन्य सहायक नदियों के आस-पास बस गए. आर्यों के बाद तूरानी, अरबमंगोलशकहुण और सिदियन आदि लोगों और प्रजातियों के आक्रमण भी हुए. आर्य लोग सरस्वती से विन्ध्य पर्वत तक विस्तृत हुएजिसे उन्होंने ब्रह्मवृत्त नाम दिया. उसके आगे वे नहीं जा सके और गंगा नदी व गांगेय-तटों को अपनी आवास भूमि बनाया. मेग आदि कोल-द्रविड़ मूल की जातियां हिमालय के तलहटी-मैदानों की ओर विस्तृत होती गयी और सिन्धु से लेकर मेघना व ब्रह्मपुत्र नदी तक निवासित हुईं.

अजमेरपालीनागौरजोधपुर और बाड़मेर होते हुए कच्छ में जाकर अरब सागर में मिलने वाली लूनी नदी सिन्धु नदी की सहायक नदी थी. मेग लोग प्राचीन काल में इन क्षेत्रों में भी आकर बस गए."

ताराराम जी की इन कुछ पंक्तियों की पृष्ठभूमि में कई संदर्भ होंगे. दो नीचे दे रहा हूँ ताकि समझने में आसानी रहे. इन पर क्लिक करके आप पढ़ सकते हैं.