31 January 2017

Megh Manavta Dharm and Constitutional Religion - मेघ मानवता धर्म और संवैधानिक धर्म

संविधान को लागू हुए 67 वर्ष हो चुके हैं लेकिन हर पढ़ा-लिखा नागरिक महसूस करता है कि भारतीय समाज संविधान की भावना के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है. जात-पात (जिसमें रंगभेद शामिल है), लिंग भेद, धर्म भेद, अवैज्ञानिक नज़रिया आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनसे समाज पार नहीं पा रहा है. कुछ विचारधाराएँ समाज में हैं जो संविधान को ऐसे रूप में बदल लेना चाहती हैं जो साफ़ तौर पर वर्तमान संविधान के विरुद्ध दिखाई देता है.

उक्त पुस्तक ‘संविधान धर्म’ के सिद्धांत का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है. धर्म के नाम पर लोग बहुत भावुक हो उठते हैं. जो भी उनकी धार्मिक वृत्ति या पसंद है उससे अलग कोई धर्म उनके समक्ष रखा जाए तो वे आशंकित हो उठते हैं कि कहीं उन पर कोई नया धर्म तो नहीं थोपा जा रहा या किसी नए विचार से उनका धर्म प्रदूषित तो नहीं हो जाएगा, वगैरा-वगैरा. ये ख़तरे हम तब भी महसूस करते हैं जबकि हम भारत के नागरिकों ने ख़ुद को एक बहुत बढ़िया और मज़बूत संविधान दिया हुआ है.

कुछ वर्ष पहले मेरे एक पुराने मित्र श्री जी. एल. भगत, आयकर आयुक्त (सेवानिवृत्त) ने ‘Scheduled Castes As A Separate Religion’ के नाम से एक आलेख Part-1 और Part-2 मुझे भेजा था जिसे मैंने पढ़ा तो था लेकिन उसकी अवधारणा (concept) तब मेरी समझ में नहीं आई थी. तीन दिन पहले वे खुद चंडीगढ़ आए. उन्होंने बामसेफ के कुछ पदाधिकारियों से उक्त आलेख में बताए गए ‘मेघ मानवता धर्म’ की अवधारणा पर बातचीत की. मैं भी उस बातचीत का हिस्सा बना.

पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी प्रस्तुत अवधारणा पर बहुत कार्य किया है और एक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ नाम से एक पुस्तक अंग्रेज़ी में तैयार की है जिसमें ‘मेघ मानवता सोशियो कल्चरल सोसाइटी’ नामक संस्था के गठन का उल्लेख है जिसका एक संविधान बनाया है. उन्होंने बताया कि इस सोसाइटी की विचारधारा का विस्तार केरल, तमिलनाडु, गुजरात आदि राज्यों में भी किया है. सोसाइटी का रजिस्टर्ड कार्यालय मुंबई में है. इस सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी (Socio-Cultural Society) का मुख्य उद्देश्य भारत में ऐसे समाज का निर्माण करना है जो भारत के संविधान के अनुसार जन-जन में ऐसा मानवीय व्यवहार विकसित करें जो संविधान सम्मत हो और साथ ही उसकी रक्षा करने के क़ाबिल हो. ज़ाहिर है कि इस सोसाइटी का वैचारिक परिप्रेक्ष्य (Ideological Perspective) बहुत बड़ा है. इस संबंध में दो विरोधाभासी मत देखने को मिलते हैं. कोई कहता है कि जो संविधान को मानता है उसे किसी अलग धर्म की कोई जरूरत नहीं. दूसरा कह देता है कि संविधान कोई धर्म नहीं है. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विचार भी इस बारे में अंतर्विरोधों (internal contradictions) से भरे हो सकते हैं आखिर वे भी सामाजिक प्राणी हैं. परस्पर विरोधी दिखने वाले इन विचारों से एक बात स्पष्ट है कि संविधान में धर्म जैसी कोई चीज है तो ज़रूर और अगर नहीं है तो भी उसके अपने संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values) तो हैं ही जो किसी धर्म से कम नहीं हैं बशर्ते कि संविधान की भावना को धारण कर लिया जाए. क्या हमारे वर्तमान समाज में उसकी काबलियत है?

उक्त पुस्तक में ‘मेघ मानवता’ शब्द के अर्थ की पृष्ठभूमि को भी स्पष्ट किया गया है. बताया गया है कि ‘मेघ मानवता’ शब्द भारत में प्रचलित जजमानी प्रथा से पहले की सभ्यता से संदर्भित है. ‘मेघ मानवता’ बुद्ध से पहले अस्तित्व में थी. आज उसी धर्म को सत्यमत, बुद्धिज्म का नाम दिया गया है. मैगी (Magis) और शाक्य बुद्ध से पहले भी अस्तित्व में थे और बुद्ध उस धर्म के नायक हुए. पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि महावीर मेघ समुदाय से थे और नवल वियोगी ने उल्लेख किया है कि महावीर जैन की एक बहन मेघ परिवार में ब्याही गई थी.

लेखक ने बताया है कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी बुद्ध, कबीर, नानक, रविदास, घासीदास, फुले, अंबेडकर और अन्य संतों, सूफी संतों और सामाजिक क्रांतिकारियों, वीर नारायण सिंह और अन्य दबाए गए कबीलों के योद्धाओं की विचारधारा को मानती है.

पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि हिंदू धर्म विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं का जुड़ाव है इसी लिए उसे ‘जीवन-शैली (Way of Life)’ कहना पड़ता है. लेकिन यह ‘जीवन शैली’ शब्द चंद जाति समूहों के लिए सुविधाजनक है तो कुछ के लिए नहीं है. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के अधिकार पर पुस्तक काफी स्पष्ट होकर अपनी बात कहती है. इस सोसाइटी का स्वरूप धार्मिक कैसे है और ‘संवैधानिक धर्म’ शब्द इस्तेमाल क्यों किया गया है उसे स्पष्ट करने के लिए ‘थियोसोफिकल सोसायटी ऑफ वर्ल्ड’ में दी गई शर्तों की बात पुस्तक में की गई है. दावा किया गया है कि उन शर्तों की नींव पर ही ‘मेघ मानवता सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी’ का गठन हुआ है।

इसी संदर्भ में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक सिद्धांतों की तर्ज़ पर सोसाइटी के 52 संकल्पों (Resolutions) का उल्लेख है जो इस सोसाइटी को वैचारिक आधार देते हैं। अंत में हम सबका ख़ुद से यह पूछना तो बनता है कि एक सोसाइटी, जिसका आकार चाहे फिलहाल सीमित-सा हो, वह संविधान में उदित होते एक धर्म का अस्तित्व क्यों नहीं देख सकती जो पूरे भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी हो?