15 February 2017

The size of a Voter - वोटर का आकार

फोटो bhaskar.com के साभार
हर चुनाव अपने पीछे कुछ सामाजिक मुद्दे, रंजिशें और नफ़रतें छोड़ जाता है. लोग कहने लगे हैं कि अब पार्टियों से ऊपर उठकर सोचना शुरू करो. वे महसूस करते हैं राजनीतिक पार्टियाँ समाज के सामान्य ताने-बाने को तबाह करती हैं. इसे ठीक होना ही चाहिए लेकेिन यह होगा कैसे? राजनीतिक पार्टियों ने अपना महिमाजाल इतना फैलाया हुआ है कि छोटी पार्टियाँ या छोटे समूह अपना एजेंडा नहीं बना ही नहीं पाते. उसे लागू करना तो दूर की बात है. कोई नया विचार या विचारधारा लेकर आए तो बड़ी पार्टियाँ तुरत उसे अपने चुनावी घोषणापत्र में थोड़े से अतिरिक्त शब्दों के साथ शामिल करके उसे हाइजैक कर लेती हैं. दरअसल वे हाइजैक नहीं करती बल्कि थोड़ा-बहुत शोर मचा कर उसे डिफ्यूज़ कर देने की ताकत रखती हैं. यह कार्य मीडिया के माध्यम से आसानी से हो जाता है जो बड़ी पार्टियों के नियंत्रण में होता है.

वैसे तो हरेक आदमी अपने, अपने परिवार या समाज के लिए जो भी सामान्यतः कर रहा होता है वह अनेक प्रकार से देश हित में होता है. लेकिन वो दिखता नहीं. जिसके पास पैसा और सत्ता है वो देश के लिए काम करता हुआ दिखता है और वो अपना विज्ञापन करता हुआ चलता है. नया चलन है कि वो अपने राजनीतिक विरोधी पर देशद्रोही का इल्ज़ाम लगाने से ग़ुरेज़ नहीं करता. अब लोग कहने लगे हैं कि "पार्टियों से ऊपर उठ कर" कार्य करो. पार्टियाँ अपनी वैचारिक लाइन से ऊपर उठ कर काम करेंगी ऐसा नहीं लगता.

तो फिर मतदाता क्या करे. लोकतंत्र में मतदाता इस कार्य की सूक्ष्मतम इकाई है. बहुत ही छोटी. उसकी उम्मीदें और प्रयास भी छोटे होते हैं. इसलिए उसे बड़ा सुझाव कोई दे भी तो क्या दे. वोटर की नियति है कि वह ‘मत दान’ कर के अपना ‘मत त्याग’ देता है. उसकी पहली होशियारी इतनी-सी हो सकती है कि भई ‘अपने मत को दान में न दे कर मत का सही उपयोग किया जाए’. अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की आदत डाली जाए. वादे के मुताबिक काम नहीं करता तो उसे पकड़ा जाए. आम वोटर जाति के सवाल पर तो फिलहाल कुछ नहीं कर सकता लेकिन धर्म के नाम पर हो रही राजनीति को वो दुत्कार सकता है.

आम वोटर की देशभक्ति असंदिग्ध है.