14 March 2017

Caste Identity and Unity - जाति पहचान और एकता


यह संसार 'नाम' और 'रूप' का बना है. जातियाँ नाम और रूप के आधार पर बनी है और इनकी खासियत यह है इनकी अपनी परंपराएँ और रूढ़ियाँ हैं जो इनकी पहचान है. जातियों की ख़ासियत है कि वे अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं. परिपक्व होते लोकतंत्र में यह सवाल खड़ा हुआ है कि वंचित जातियां आपस में एकता कैसे स्थापित करें ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन कर सकें. दूसरी ओर एक राष्ट्रवाद खड़ा हो रहा है जो जातिवाद का विरोध करता तो नहीं दिखता लेकिन जातिवाद को समाप्त मान कर बात करता है.


कुछ मेघजन इस आइडिया के साथ खेलते हैं कि क्या कबीर को इष्ट मानने वाले या कबीर को बुनकरों की प्रतिनिधि विचारधारा मानने वाले समुदायों का एक सामान्य नाम ‘कबीरपंथी’ रखा जा सकता है ताकि उन जातियों में एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक एकता स्थापित हो जाए?


हाल ही में एक उदाहरण मेरे सामने आया है. राजस्थान में एक सरकारी नोटिफिकेशन के ज़रिए बलाई आदि अनेक जातियों को अनुमति दी गई थी कि वे ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं. उसके पीछे कोई राजनीतिक एकता की मंशा रही होगी ऐसा मानना मुश्किल है लेकिन यह भावना ज़रूर थी कि चमड़े का कार्य करने वाली जातियाँ अपने व्यवसाय से जोड़े गए घृणा के भाव से मुक्ति पा जाएँ. इसके बाद वहाँ 'मेघवंश' और 'मेघवाल' शब्दों के साथ नई जागरूकता का संकेत देते हुए कम से कम एक संगठन बना जिसने बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए. कुछ जातियों ने सरनेम के तौर पर ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. इस पर बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र के मेघवालों को आपत्ति थी क्योंकि वे  व्यवसाय से चर्मकार नहीं बल्कि बुनकर थे. अनजाने में ही सही लेकिन चर्मकारों के व्यवसाय से जुड़ी घृणा उन्हें ख़ुद तक पहुँचती महसूस हुई.


जैसा कि मैंने पहले कहा है - जातियाँ अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं और हाल ही में मेरी जानकारी में आया है कि कई चर्मकार जातियों ने मेघवाल शब्द का प्रयोग करने से इंकार भी कर दिया. कहने का मतलब यह है कि कानून के द्वारा किन्हीं जातियों को एक नाम देना उनमें एकता होने की गारंटी नहीं देता. एकता को लेकर जो बेचैनी है वो राजनीतिक है और उसका समाधान राजनीति के सिद्धांतों के अंतर्गत होगा. समाज सदियों से बँटा हुआ है और वह जल्दी सुधरने वाला नहीं है. अनुसूचित जातियों का आपस में रोटी-बेटी का व्यापक और खुला दिखने वाला संबंध नहीं है और न ही वह एकदम से स्थापित हो सकता है. इसमें भौगोलिक,आर्थिक और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं.

बेहतर आंदोलन यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के आदमी को जल्दी से सुधार ले. समाज को बदलने में समय लगता है. ‘समय’ कहकर किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहता. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी ही होती है. अब वंचित जातियों में शिक्षा का प्रसार हो रहा है जिससे उनकी मानसिक रुकावटों के पिघलाव की गति तेज हो सकती है. इससे उम्मीद जगती है. इसे हाल ही में उभरे राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखने की ज़रूरत होगी जिस पर समाजशास्त्री प्रकाश डालेंगे.