30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया वह या तो भक्ति साहित्य की समीक्षा के नाम पर लिखा गया था या फिर जातिवाद के आधार पर. कुल मिला कर कबीर के साहित्य पर आचार्यत्व थोपा गया था जबकि ज़रूरत थी उस विश्लेषण की जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो कबीर का लिखा हो ही नहीं सकता.


उल्लेखनीय है कि उस समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही भी बताया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया. दूसरी ओर वे समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और उनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में मान्य जातिवाद का विरोध था. उनका वो नज़रिया निम्न जातियों में व्यापक स्तर पर फैला. उन्हें भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पीछे धकेलने की एक कोशिश थी जो धीरे-धीरे नाकाम होती रही. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में भक्तिकाल कहा जाता है वह वास्तव में मुक्तिकाल था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संत जान पर खेल गए. 'आवाज़ इंडिया' और अन्य जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. उनके ऐसा करने के पीछे 'अदृश्य' कारण हो सकते हैं.


हालाँकि सभी अनुसूचित जातियों के अपने धार्मिक आइकॉन के रूप में उनके अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं शताब्दी के कबीर को 20 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अंगीकार किया. इसका कारण मेरी समझ के अनुसार यह है कि ये व्यवसाय से बुनकर थे. इस दृष्टि से कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. कबीर की वाणी में इन्होंने अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख दोनों महसूस किए. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार मुख्यतः आर्यसमाजी और थोड़े-बहुत कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पाते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि क्या मेघ ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा