27 April 2017

Ghosts and God - भूत और ईश्वर

मनोविज्ञान इस बात को मानता है कि भूत एक काल्पनिक शत्रु है और ईश्वर एक काल्पनिक मित्र है. जो लोग इच्छाशक्ति के साथ अपने कार्य में लगे रहते हैं उनके बारे में देखा है कि वे आमतौर पर भूत-प्रेत से ग्रसित नहीं होते. इसका उलटा भी आप समझ लीजिए. किसी के प्रति घृणा या अतृप्त वासना भी भूत-आत्मा जैसी चीज़ को जन्म देती हैं. लेकिन है वो मन का खेल (प्रोजेक्शंस) ही जिसका सीधा रिश्ता हारमोंस और दिमाग़ की न्यूरल एक्टिविटी से होता है.


भूत और भगवान को लेकर एक बड़ा आर्थिक क्रियाकलाप समाज में है. किसी इमारत को ‘भुतहा इमारत’ मशहूर कर के प्रापर्टी डीलर खरीददारों को डरा देते हैं और इमारत की कीमत गिर जाती है. बाद में उसे ख़ुद प्रापर्टी डीलर या कोई और तिकड़मबाज़ खरीद लेता है. उसे बस हवन-यज्ञ, जगराता आदि कराना होता है और गृहप्रवेश का रास्ता साफ़. गिरी कीमत पर बड़ी जायदाद बुरी नहीं हो सकती. कहीं-कहीं देवीमाँ प्रकट हो जाती है.


हवन-यज्ञ, जगराता क्या है? यह एक काल्पनिक मित्र को याद करना है जो डर पर काबू पाने में सहायता करता है. भूत का इस्तेमाल प्रापर्टी डीलर या प्रापर्टी में हिस्सेदार लोग करते हैं या फिर ईश्वर-भगवान नामक काल्पनिक मित्र का बिज़नेस करने वाले. एक धूर्त काल्पनिक दुश्मन खड़ा करता है तो दूसरा एक काल्पनिक मित्र खड़ा करके अपना बिज़नेस चलाता है. दोनों में आपसी अंडरस्टैंडिंग होती है.🙂


आपने अपनी ज़िंदगी में महसूस किया होगा कि भूत और ईश्वर दोनों कभी किसी से डायरेक्टली पंगा नहीं लेते. पंगा धूर्त ही लेते हैं.

मेघों की देरियों पर जो चौकी दी जाती है वह भी भय और मित्रता का अद्भुत मिश्रण है. इसका स्वरूप ट्राइबल परंपरा जैसा है. बेहतर है कि सच्चाई को समझा जाए.


23 April 2017

Your vote determines your fate - आपका वोट आपके नसीब को तय करता है

2014 का चुनाव भारत की राजनीति के इतिहास में एक दुर्घटना के तौर पर भी जाना जाएगा जिसमें विपक्ष अपंग हो गया. उसके बाद की स्थितियां ऐसी हैं कि हिंदू-मुसलमान, गौमाता, लव-जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जोर पकड़ते नजर आए जिसे आम नागरिक गौर से देख रहा है. जाहिर है हिंसक ब्यानबाज़ी इसलिए की जाती है ताकि आम पब्लिक की नसें सर्द पड़ जाएँ. जिस जातपात के अंधेरे ने देश की बहुसंख्य आबादी को आज़ादी की रोशनी से दूर रखा है उसे हटाने की बात कोई नहीं करता. इन हालात में भी कुछ अनुभवी आवाजें और ख़्याल बुलंद होते रहते हैं.

105 लाख करोड़ रुपया कितना होता है मैं नहीं जानता. राजनीति के प्रखर दार्शनिक और राजनीतिज्ञ शरद यादव ने कहा है कि हर वोट की कीमत 105 लाख करोड़ रुपए होती है. हर वोट सरकार को इतना पैसा खर्च करने की शक्तियाँ प्रदान करता है.

देश में अनपढ़ता और गरीबी इतनी है कि चुनाव में लोग सौ रुपए, पाँच सौ रुपए में या दारू की बोतल के बदले अपना वोट बेचते हैं और फिर उन्हें शिकायत भी रहती है कि उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. होता कैसे? वे अपना वोट ऐसे व्यक्ति को नहीं देते जो उनके सामाजिक हालात सुधारने और देश के आर्थिक स्रोतों में उनके हिस्से को सुनिश्चित करने के लिए काम करे. प्रत्यक्षतः इसमें बड़ी बाधा जातपात है और नेता जातपात के चलते रहने में अपनी भलाई देखते हैं. इस लिए अपना वोट दान में या उपहार में न दें. इसे अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी और व्यवस्था परिवर्तन के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करें.

इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि भारत में गरीबी का इंडेक्स जाति के इंडेक्स के समरूप है. नीचे की सभी (श्रमिक) जातियां गरीब हैं क्योंकि वे मात्र श्रमजीवी हैं और ऊपर की जातियां अमीर क्योंकि देश के सभी स्रोतों का प्रबंधन उनके हाथ में है. तिस पर भ्रष्टाचार गरीबों को अधिक गरीब बनाए रखने का एक ज़रिया बन गया है. 'गरीबी हटाओ' का नारा लगा कर इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता. हाल ही में गरीबों का नाम लेकर केंद्र में नई सरकार बनी. लेकिन गरीबों को अपने जीवन स्तर में कोई सुधार होता नजर नहीं आता. ज़ाहिरा तौर पर इसकी बड़ी वजह जातपात है. जातिवाद सुनिश्चित करता है कि सस्ते मज़दूरों की सप्लाई न रुके और निशाने पर श्रमिक जातियाँ यानि निम्न जातियाँ होती है. महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा ग़रीबी को और भी बढ़ा देती है.

(“याद रखना कि जातिव्यवस्था के कूड़े पर....कचरे पर हर तरह का कीड़ा पलता है -करप्शन का....भ्रष्टाचार का....अन्याय का....सब तरह का. जात है तो न्याय नहीं मिल सकता. इंसाफ धरती पर सब जगह आ जाएगा लेकिन हिंदुस्तान में नहीं आ सकता. -शरद यादव”)

17 April 2017

Nag, Nagvanshi and Ichhadhari - नाग. नागवंशी और इच्छाधारी

तो ‘इच्छाधारी नाग’ की कथा बाकी रह गई थी.

उस कथा की जड़ ज़रूर पौराणिक कथाओं में रही होगी जो भारत के वंचित समाजों को मूर्ख बनाने के लिए लिखी गई थीं. ऐसा बहुत से विद्वानों का मानना है. यदि ये प्रतीकात्मक कथाएँ किसी भी तरह से नागवंशियों को लक्ष्य करके लिखी गई हैं तो उसके कुछ स्पष्ट अर्थ भी ज़रूर होंगे.

एक तेलुगु फिल्म का डॉयलाग था कि ‘पुलि’ के मुकाबले ‘गिलि’ अधिक खतरनाक होता है. मतलब ‘शेर-वेर’ में से ‘वेर’ अनदेखा है और खतरनाक है. यानि ‘नाग’ को हम जानते हैं लेकिन ‘इच्छाधारी नाग’ एक अनजाना शत्रु है. उसका भय काल्पनिक है इसी लिए बड़ा है. लेकिन वो आइने (भ्रम) में से दिख जाएगा (आपको नहीं, फिल्म बनाने वाले को). तो उस नकली भय से बचाव ज़रूरी है जो मंत्र-ताबीज़, टोने-टोटके, सँपेरे-बीन, यज्ञ-हवन से लेकर पुलिस-फौज आदि से संभव हो सकता है, ऐसा फिल्मकार दिखाते हैं. वैसे फिल्म में एक आस्तिक-से आदमी की मौजूदगी और उसकी सहायता तो न्यूनतम शर्त है ही. कुल मिला कर इन फिल्मों का सार यह होता है कि नाग को या नाग-जैसी किसी चीज़ को कहीं भी मार डालना अत्मरक्षा-जैसा होगा. यह नागों जैसे भोले-भाले जीवों के लिए खतरे की घंटी रही है जो वैसे भी इंसानों से डरे-छिपे फिरते हैं.

नागो और नागवंशियो, अमां जाओ यार! तुम इन कथाओं से पीछा नहीं छुड़ा सकते. हाँ, एनिमल प्रोटेक्शन के नाम पर कुछ कार्य हुआ है जो केवल एनिमल्ज़ के लिए है. नागिन का श्राप लोगों पर पड़ता दिखाया जाता है लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में नागों का श्राप फिल्मकारों पर नहीं पड़ता.

पुराने ज़माने में नागवंशियों को पत्थरों पर उकेरा जाता था लेकिन अब फोटोशॉप का शाप पड़ा है. कह लो, क्या कहते हो? फिल्म में इच्छाधारी नागिन की एंट्री बहुत आकर्षक और भयानक होती है. नहीं?


12 April 2017

Naag, Nagas and Nagmani - नाग, नागवंशी और नागमणि

नागों, संपेरों और बीन पर आधारित दर्जनों फिल्में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने दी हैं. उनमें से एक टी-सीरीज की बनाई हुई फिल्म ‘नागमणि’ देखने का सुखद अवसर मिला. यह अच्छे ग्रेड की फिल्मों में नहीं है. Anyhow.....

अब मनोरंजन इंडस्ट्री की क्रिएटिविटि देखिए. ‘नागमणि’ में 'नाग जाति' का स्पष्ट उल्लेख है. स्क्रीन पर एक उजड़ा हुआ मंदिर है (वैसे आज भी नाग जातियों के अधिकांश मंदिर उजड़े हुए ही हैं) और नाग पंचमी के दिन वहाँ नाग जाति के लोग आकर शिव की पूजा करते हैं. इस बात पर कई संदर्भ याद हो आए जैसे इतिहासकार नवल वियोगी की लिखी पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’, आर.एल गोत्रा का आलेख - The Meghs of India जिसमें ऋग्वेद में उल्लिखित एक पात्र ‘वृत्र’ को ‘अहिमेघ’ यानि ‘नाग मेघ’ बताया गया है. फिलहाल आप संपेरों और उनकी बीन पर नज़र जमाए रखें.

इस फिल्म में एक मज़ेदार डायलॉग है - ‘नागराज जब बीन सुनते हैं तो वो नाचे बगैर नहीं रह सकते’. Very interesting. नाग जाति के हवाले से संपेरा कौन है इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए लेकिन बीन को अलग से समझना ज़रूरी है. ‘बीन’ मेंटल कंडिशनिंग भी हो सकती है और मनोरंजन की लत भी (है वो भी मेंटल कंडिशनिंग). तो या तो नाग जातियों की मेंटल कंडिशनिंग कर दी गई या उन्हें मनोरंजन के मायाजाल में फाँस लिया गया. बाकी कहानी अंडरस्टुड है.

जहाँ तक 'मणि' का सवाल है वो नागों के सिर (दिमाग़) में थी और आज तक है. 'मणि' मतलब 'दिमाग़'. जिसके पीछे सँपेरा हाथ धो कर पड़ा होता है. वो या तो नाग को वश में कर के मणि चुरा लेगा या ख़ुद नष्ट हो जाएगा, यह स्क्रिप्ट राइटर पर डिपेण्ड करता है. वैसी स्क्रिप्ट तो आप भी लिख सकते हैं, नहीं? तो हे नागराज! जब आपके पास ज़बरदस्त 'मणि' है तो आप नई स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखते जिसमें आपकी 'मणि' सुरक्षित हो और उसकी चमक सब से बढ़ कर हो.

हाँ, अगर ज़्यादा जानकारी चाहिए तो इस लिंक पर चले जाइए. कुछ और लिंक भी हैं, देख लीजिए.


दक्षिण भारतीय फिल्म ‘नागमणि’


'इच्छाधारी नाग' की बात अलग से करूँगा. उसका मामला ज़रा टेढ़ा है. 😂


07 April 2017

Creativity and Entertainment - रचनात्मकता और मनोरंजन

मनोरंजन की दुनिया भी बहुत निराली है. बचपन से रामायण-महाभारत की कथाएं सुनते आए हैं. तर्क की दृष्टि से उनमें लिखी बातें असंभव और अंतर्विरोधों से भरी लगती हैं. सोशल मीडिया पर छोटी उम्र के बच्चे उनके बारे में तार्किक बातें करने लगे हैं और ऐसा वे चुटकुलों के माध्यम से कर रहे हैं. इसे आप बच्चों की क्रिएटिव डिवाइस कह सकते हैं.

बचपन में जो फिल्में देखी थीं वो तस्वीर की तरह ज़हन में बसी हैं. वे आज भी सच्चाई सरीखी महसूस होती हैं. जानता हूं कि फिल्में एक तरह का नाटक या स्टेज शो होता है जिसे कैमरे में क़ैद कर लिया जाता है और फिर उन्हें एडिट कर के ऐसे सजाया जाता है कि अलग-अलग फ्रेम इकट्ठे होकर एक चलती कहानी का रूप ले लेते हैं. कहानी और विज़ुअल्ज़ को इतना उदात्त (बड़ा) बनाया जाता है कि दर्शक का भावनात्मक संसार प्रेरित हो कर उसके साथ-साथ आंदोलित होने लगता है. ऐसे अनुभव दिमाग पर छप कर उसका हिस्सा बन जाते हैं और दिमाग़ की मौत तक उसमें रहते हैं. इन्हें हम संस्कार भी कह देते हैं.

जब फिल्में नहीं बनती थीं तब ऐसी कहानियां शब्दों, नाटकों, गीतों के माध्यम से यात्रा करती थीं. कथावाचक (किस्सागो) कह कर या गा कर लोगों को कथाएँ सुनाता था. उसका इम्प्रेशन (संस्कार) पाठक-श्रोता के मन पर बैठता जाता था ठीक वैसा जैसा फिल्म देखने पर होता है. मनोरंजन का बाज़ार आकर्षक होता है जिसकी ओर हम मर्ज़ी से खिंचते हैं. कुछ श्रेय कलाकार को भी जाता है. मँजा हुआ लेखक या कलाकार किसी की मृत्यु के अवसर को जश्न में बदल सकता है. रावण दहन इसका एक उदाहरण है.

एक सिलेबस की किताब में पढ़ा था कि श्रम करने के बाद मजदूरों को मनोरंजन की तलब होती है. वे गाना-बजाना करके अपनी थकान उतारते हैं. क्योंकि दुनिया में मेहनतकशों की संख्या सबसे अधिक है तो मनोरंजन का सबसे बड़ा बाजार वहीं है. बाज़ार के खिलाड़ी इस बात को जानते हैं. इस दृष्टि से जातक कथाएँ, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य विस्तारित साहित्य जैसे गीत-गोविंद या पंचतंत्र आदि, ऐसी रचनाएं हैं जो किसान-कमेरों, कारीगरों, शिल्पियों को लुभाती चली आ रही हैं. सदियों से अशिक्षित समाजों ने उन ग्रंथों, कथाओं को तर्क की दृष्टि से नहीं देखा. वे मनोरंजित और धन्य होते रहे. शिक्षित युवा अब तर्क के नजरिए से भी उस कथा-साहित्य को देखने लगे हैं.

आज रचनात्मकता के इतने साधन उपलब्ध हैं कि चाहे कोई भी मनोरंजन की एक दुनिया बना ले, चाबी दे कर उसे चलने के लिए ज़मीन पर छोड़ दे, वो चलती जाएगी. आप भी बनाइए और देखिए, वो सदियों तक चल सकती है.


"अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना ज़रूरी है."