07 May 2017

Megh and Aryasamaj - मेघ और आर्यसमाज

मेघ होने के नाते ख़ुद को सियालकोट और आर्यसमाज के नाम से प्रभावित महसूस करता रहा हूँ. पिता जी ने मुझे मेघों के उत्थान में आर्यसमाज की भूमिका के बारे में बताया था. तब पिता जी से अधिक सवाल करने की आदत नहीं थी. आज वे होते तो उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ता.

कई मेघों को कहते सुना है कि मेघ मूलतः ब्राह्मण हैं. उनके रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं. वो कैसे मिलते-जुलते हैं मुझे पता नहीं. आर्यसमाज में प्रवेश मिलने से पहले उनके कौन से रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों जैसे थे यह बात बहस का विषय हो सकती है. एक मुख्य उदाहरण मेघों की देरियों का दे सकता हूँ जो मेघ-सभ्यता का रेखांकित उदाहरण है और उनके ब्राह्मणीकल मूल को झुठलाता जाता है.  लेकिन तर्क के तौर पर यदि श्री भीमसेन विद्यालंकार द्वारा लिखित “आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास” नामक पुस्तक से संदर्भ लिया जाए तो एक बात-जैसी बात निकलती दिखती है. उसमें उल्लेख है कि आर्यसमाज ने "मेघ और उनकी शुद्धि " नामक पुस्तक सन् 1936 में प्रकाशित की थी जिसमें मेघों को ब्राह्मण घोषित किया गया था. इस पुस्तक में उल्लेख है कि भक्त पूर्ण के सुपुत्र श्री रामचंद्र मेघ जाति से प्रथम स्नातक (ग्रेजुएट) हुए. उन्हें सियालकोट आर्यसमाज ने गुरुकुल में शिक्षा दिलाई. पुस्तक के पृष्ठ 172 पर दर्ज किया गया है कि सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया. उस समय इन मेघों का ‘हिंदुओं के साथ’ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था. ज़ाहिर है कि आर्यसमाज का ‘समाज’ ने विरोध किया. यह समझने की ज़रूरत है कि आर्यसमाज का किस समाज ने विरोध किया लेकिन आर्यसमाज ने मेघों को ‘शुद्ध’ करने का विचार किया यह बड़ी बात है. सन् 1903 में आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव पर मेघ बिरादरी के चौधरियों को एकत्रित करके उनका शुद्धिकरण किया गया.

उन्हीं दिनों या उसके आसपास - “लाला गणेशदास ने ‘मेघ और उनकी शुद्धि’ नाम का ट्रैकट (ट्रैक्ट के हिंदी/अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्द हैं - निबंध, Dissertation, treatise, thesis, tractate, system, method, mode, channel, manner.) प्रकाशित किया और मेघ जाति को ब्राह्मण जाहिर करके उनके पतन के कारण लिखे और उनकी शुद्धि शास्त्रोक्त करार दी.” - यह बात ध्यान खींचती है. यह आलेख सुरक्षित रखा गया है तो मुझे हैरानगी होगी और यदि वह उपलब्ध हो तो वह संदर्भ देने योग्य ज़रूर होगा क्योंकि आज भी बहुत से मेघ मानते हैं कि वे ब्राह्मण हैं या फिर ब्राह्मणों से निकले या फिर निकाले हुए हैं. वहीं एक और वाक्य है कि - “सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया.” ‘आर्य-भक्त’ शब्द कई अर्थ देता है. आर्य एक रेस (वंश) है और रेस मानव-विज्ञान का एक ऐसा घटक है जो अपरिवर्तनशील है जिसमें डीएनए स्थिर खड़ा है. आर्यों (ब्राह्मणों) का वंश कभी नहीं बदला यह सामाजिक तथ्य है. ब्राह्मणों की जाति बदली है ऐसा सुना है लेकिन जब तक वो जाति समूह ख़ुद इसे स्वीकार न करे तब तक उसे उदाहरण के रूप में नहीं रखा जा सकता.  दूसरा शब्द ‘भक्त’ है. कहा जाता है कि इसी शब्द को ‘भगत’ के रूप में मेघों ने अपनाया. लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं होता. ‘आर्य-भक्त’ शब्द को समास पद्धति से लिखा गया है जिसका एक अर्थ है ‘आर्यों का भक्त’, जैसे ‘राम-भक्त’ शब्द है. अब ‘भक्त’ की परिभाषा करें तो यह भारत की गुलामी-प्रथा तक खिंचने की क्षमता रखता है. ‘भक्त’ उसे कहा जाता रहा है जो अपने समाज से टूट कर आर्यों के पाले में चला गया जैसे विष्णु-भक्त प्रह्लाद, राम-भक्त विभीषण, भक्त हनुमान आदि. संस्कृत में ‘भक्त’ शब्द की धातु ‘भज्’ इसी ओर संकेत करती है.   

उक्त संदर्भ में यह बात भी उभर कर सामने आती है कि - “मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.” वो आखिर आश्चर्यजनक क्यों था? वाक्य एक पुरानी बहस की ओर इशारा करता है कि क्या मेघ हिंदू थे? कल नहीं थे तो आज कैसे? मेघ समाज में इस पर (ख़ास कर सोशल मीडिया पर) बहस होती रहती है. बहस होना एक अच्छा संकेत है जिससे मेघों में आई जागरूकता का पता चलता है.

अंत में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर का उक्त प्रकाशन के लिए आभार और ताराराम जी का आभार जिन्होंने उक्त प्रकाशन के संदर्भित पृष्ठों की फोटो भेजी है.

'भक्त' शब्द की एक व्याख्या. संदर्भ है जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'भारत की खोज' (Discovery of India) :-