11 May 2017

Remote Memory - पुरानी याद


अमृतसर के नवांकोट मोहल्ले और कैंब्रिज कालेज की यादों के अलावा एक फिल्म की कुछ यादें ज़हन में गहरी बैठी थीं जो इन दिनों उभर आईं. बचपन में पहली (शायद पहली) फिल्म पिता जी दिखाने ले गए थे. नाम याद है - ‘नौशेरवान-ए-आदिल’. यह नाम पिता जी से ही सुना था याद रह गया. उस फिल्म का एक ही डायलॉग याद है जो हीरो ने ठसक भरी आवाज़ में चुनौती देते हुए बोला था - ‘तो हम…..की हिफ़ाज़त के लिए न जाएँ?’. बाकी कुछ याद नहीं सिवाय एक गाने के - ‘तारों की ज़ुबां पर है मोहब्बत की कहानी.....’ - हो सकता है फिल्म देखते हुए मैं सो गया होऊँ. तब 6-7 साल का था (जन्म जनवरी 1951, अरे बाप रे! अब मैं सीनियर सिटिज़न हो गया हूँ🙊).

बचपन में इश्क-मुश्क की जितनी समझ हो सकती थी उतनी तो ज़रूर थी. लेकिन गाने की जो तर्ज़ ताज़ा दिमाग़ पर बैठ गई थी वो पिछले दिनों ज़ोर-शोर से याद हो आई. भला हो यूट्यूब का जहाँ लोगों ने पुराने गानों का ख़ज़ाना संभाल कर रखा है. जो चाहे, जब चाहे खोल कर देख ले. बुलो सी. इरानी के संगीत का वो हीरा नीचे रखा है. गीत के पूरे बोल यूट्यूब पर अब होश में सुने हैं जो कभी बचपन में एक सोते हुए बच्चे ने सुने होंगे.


कहते हैं जिसे चाँदनी है नूर-ए-मोहब्बत
तारों से सुनहरी है हमेशा तेरी किस्मत
जा जा के पलट आती है फिर तेरी जवानी
ए चाँद मुबारक हो तुझे रात सुहानी


हम हों न हों दुनिया यूँ ही आबाद रहेगी
ये ठंडी हवा और ये फ़िज़ा याद रहेगी
रह जाएगी दुनिया में मोहब्बत की निशानी
ए चाँद मुबारक हो तुझे रात सुहानी