25 July 2017

Excessive thinking - अति सोच


किसी भी उड़ने वाले और छोटे दिखने वाले पक्षी को चिड़िया कह दिया जाता है. दूसरे प्रकार की अभिव्यक्ति में ‘ब्राह्मणी चिड़िया’ जैसा शब्द है. कभी-कभी मैं भी ‘मेघनी चिड़िया’ कह देता हूं. यह प्रेम और मासूमियत की देन है. चिड़िया एक छोटी-सी चोंच भी हो सकती है और एक ‘पिद्दी’ का शोरबा भी.
एक अन्य संदर्भ में चिड़िया 'विचार' है. तनाव (टेंशन) को लेकर एक मैनेजमेंट गुरु ने इस तरह समझाया था, “इंसान का दिमाग़ एक घोंसले की तरह है जिस के आसपास विचारों की चिड़ियाएँ उड़ती रहती हैं. आपस में झगड़ती हैं अपनी जगह बनाने के लिए. क्योंकि दिमाग़ का घोंसला आपका है इसलिए आपकी मर्ज़ी है कि किस चिड़िया को आप वहाँ बैठने देते हो. चिड़िया अधिक हो गई तो आप के घोंसले में घमासान मचेगा. टेंशन हो जाएगी. इसलिए उसी चिड़िया को वहां बैठने दो जिसे आप वहाँ बैठने देना चाहते हो.”
बहुत सुकून मिला था ऐसे गुर (गुरु) की प्राप्ति पर. लेकिन रिटायर हो कर हम फँस गए गुरु जी. मोबाइल टावर लगने के बाद शहर की सारी चिड़िया लुप्त हो गई. दूसरी ओर टावर के ज़रिए फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप्प के तहत जैसे चिड़ियों के अनगिनत ब्रीडिंग सेंटर खुल गए. अब दिमाग में चीं-चीं, चैं-चैं, कैं-कैं चलता ही रहता है. ख़बरिया चैनल, फिल्मी चैनल और विज्ञापन ग्ड़ैं-ग्ड़ैं करते रहते हैं. अब गुरु जी का कहना है कि केवल ब्लॉगिंग पर ध्यान दो. ठीक है, जैसी मैनेजमेंट गुरु की आज्ञा !

तो वाट्सएप्प उड़, ट्विटर उड़, फेसबुक उड़. यूट्यूब उड़ ! 🕺

22 July 2017

Our Social Organisations - हमारी सामाजिक संस्थाएँ


सामाजिक संस्थाओं का बहुत महत्व होता है. समाज के विकास में उनकी एक सशक्त भूमिका होती है जब वे बहुत ही जीवंत और सक्रिय रूप से स्पष्ट नज़रिए और बड़े लक्ष्य के लिए कार्य कर रही हों.
अनुभव में आया है कि किसी भी सामाजिक संस्था के सभी सदस्य एक साथ इकाई के रूप में कार्य नहीं करते. सक्रिय सदस्य बहुत कम होते हैं. उनमें से भी ऐसे सदस्य बहुत कम होते हैं जो स्वतःस्फूर्त (Self Motivated) हों. मैनेजमेंट के अध्ययन बताते हैं कि ख़ुद ही आगे बढ़ कर कार्य करने वाले सदस्यों की संख्या लगभग 5% होती है.
मेघ समाज में कार्य कर रही अधिकतर संस्थाओं की गतिविधियां बहुत कम है. वैसे भी उनकी रिपोर्टिंग एक तो कम होती है दूसरे जो होती भी है उसमें पर्याप्त विवरण नहीं होता. यही कारण है कि वे डिफंक्ट-सी नजर आती हैं. दूसरी ओर उनका नज़रिया इतना तंगदिली वाला है कि वे किसी भी मक़सद से एक दूसरे के साथ अपना मंच साझा करने से कतराती हैं. उनकी चौधराहट कितनी भी मरियल क्यों न हो वो अपने खोल में खुश है.  इससे मेघ समाज की युवा पीढ़ी बेचैन है. कुछ युवाओं ने टेलीफोन पर अपनी भावनाएं बताई हैं.
किसी सामाजिक संस्था के पदाधिकारी के तौर पर मेरा अनुभव बहुत कम है. लेकिन मैंने कुछ सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को नजदीकी से देखा है. उनके सक्रिय कार्यकर्ता अधिकतर साठ पार के होते हैं और नए आइडियाज़ को लेकर उनकी रफ्तार बहुत धीमी होती है. वे नई टेक्नोलॉजी और उसके प्रयोग से वाकिफ़ नहीं होते जो प्रतिदिन बदल रही है. वे उससे बचते हुए निकलते हैं. इसमें उनका दोष नहीं. आखिर उम्र भी कोई चीज है.
युवाओं की समस्याओं का स्वरूप बदल चुका है. वे कई कारणों से पुराने लोगों के साथ नहीं चलते, नहीं चल सकते. उनका जीवन संघर्ष पहले के मुकाबले बहुत अधिक है और उसके नए आयाम (डायमेंशंस) हैं. सीधी बात है कि सामाजिक कार्य के लिए वे समय एफ्फोर्ड नहीं कर सकते. दूसरे आजकल वे जिस प्रकार के वातावरण में रह रहे हैं उसमें उन्हें मानद (honorary) सामाजिक कार्य की प्रासंगिकता दिखाई नहीं देती. जो कुछ उन्होंने पढ़ा है वो भोजन बन जाए यही उनकी प्राथमिकता होगी. सीनियर्स और युवाओं के बीच तालमेल हमेशा से मुश्किल रहा है. ऐसी हालत में सीनियर्स सामाजिक कार्य के लिए अधिक उपयोगी हो जाते हैं.
वैसे तो पचास पार के व्यक्तियों में अक्सर कुछ महत्वाकांक्षाएँ (एंबिशंस) उभर आती हैं जो उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं. कुछ तो बड़ी सामाजिक/राजनीतिक महत्वाकांक्षा के मालिक होते हैं, कुछ के लिए यह टाइमपास होता है और कुछ गंभीर कार्य में विश्वास वाले होते हैं. लेकिन एक फैक्टर उन पर तब भारी पड़ता है जब उनका साथ देने वाले कार्यकर्ता कम रह जाएँ. इससे हौसला कम होता जाता है और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है. लेकिन वे संस्थाएँ ऐसे हालात में भी बेहतर काम कर पाती हैं जो अपना रिकार्ड सिस्टेमैटिक तरीके से रखती हैं और कार्य को नियमित बनाती हैं. इससे कार्यकर्ताओं पर बोझ कम पड़ता है.
एक अन्य बात भी अक्सर देखी गई है कि सामाजिक संस्थाएँ अपने लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित कर लेती हैं जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी उन्हें नहीं होती. ये लक्ष्य कई बार ऐसे होते हैं जिनमें अग्रिम रूप से विशेषज्ञ प्लानिंग की दरकार होती है. यानि लक्ष्य की साध्यता के बारे में विचारों की स्पष्टता ज़रूरी होती है. कई बार बड़ी संख्या में सदस्यों से प्राप्त भावुकता भरे सुझावों को लक्ष्य बना लिया जाता है जिसके पीछे व्यावहारिक नज़रिया नहीं होता. इससे बाद में निराशा पैदा होती है.
सच यह भी है कि बड़े सपने बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की बड़ी वजह बन जाते हैं.🙏

21 July 2017

Purification Program of Arya Samaj - आर्यसमाज का शुद्धिकरण कार्यक्रम


नीचे दिया गया चित्र मुझे अपने एक मित्र श्री तेजिंदर पाल सिंह कैले के ज़रिए मिला है. इस फोटो के नीचे जो लिखा है उससे पता चलता है कि यह फोटो सन 1901 में लिया गया था जब आर्यसमाज ने सियालकोट में शुद्धीकरण का कार्यक्रम शुरू किया था.  इससे अधिक डिटेल उक्त चित्र में या चित्र के साथ उपलब्ध नहीं है. फिलहाल इस चित्र का महत्व केवल इतना ही है कि यह उस समय के शुद्धिकरण कार्यक्रम की एक तस्वीर पेश करता है. गूगल इमेज सर्च में यह इमेज नहीं मिला. अधिक विवरण प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूँ. उपलब्ध होने पर उसे यहां लिखा जाएगा.

इस चित्र के नीचे अंगरेज़ी में लिखा है - A Shudhikaran Ceremony in Sialkot (1901)



11 July 2017

Social Media and Bhagat Mahasabha - भगत महासभा और सोशल मीडिया

जब मेरे घर पर कंप्यूटर और इंटरनेट आया तो तुरत ‘मेघ’ और ‘भगत’ शब्दों की तलाश की. काफी ढूँढने के बाद ‘भगत महासभा’ की ब्लॉग साइट्स दिखीं जहाँ मेघ-भगत समुदाय की बात थी. इससे मुझे बहुत खुशी हुई. भगत महासभा ने एसएमएस सेवा के माध्यम से भी कार्य किया और जम्मू में बड़े पैमाने पर कबीर जयंती के कार्यक्रम भी आयोजित किए.


सोशल मीडिया पर मेघों की सबसे अधिक सक्रिय सामाजिक संस्था देखें तो भगत महासभा सबसे ऊपर दिख जाती है. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ ने सोशल मीडिया का उपयोग करने में काफी पहलकदमियाँ की हैं. मैं उन्हें युवावस्था से जानता हूँ जब वे पंजाब यूनीवर्सिटी में पोलिटिकल सांइस में एम.ए. कर रहे थे. तब प्यार से हम उन्हें ‘प्रोफेसर’ कह देते थे जो आगे चल कर उनका निकनेम जैसा बन गया - ‘प्रोफेसर’ राजकुमार.  


पंजाब के मेघ भगतों के कई सामाजिक संगठन हैं जिनके बारे में कुछ जानता हूँ और उनके बारे में जब भी कोई जानकारी हाथ लगी उसे मेघनेट पर संजो कर रख लिया. राजकुमार जी की गतिविधियाँ अधिक देखने को मिलीं. इन्होंने अत्यधिक विरोध के बावजूद डॉ. अंबेडकर की विचारधारा पर अपना स्टैंड साफ़ और मज़बूती के साथ रखा है.

पिछली बार 02 जुलाई, 2017 को जब मैं जालंधर में था तो श्री आर.एल. गोत्रा जी के निवास पर उनसे मुलाकात हुई और उनसे हुई औपचारिक बातचीत को मैंने रिकार्ड कर लिया जिसका लिंक यहाँ है.

09 July 2017

History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स

Sh. R.L. Gottra
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.


धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.

देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.

इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.