15 November 2017

It is enough - इतना काफ़ी है

इंसान का धरती पर चलना धरती के इतिहास में बहुत पुरानी घटना नहीं है. भाषा का विकास, धर्म का उदय, उधार लेने का प्रचलन, पूंजी निर्माण और पूँजीवादी व्यवस्था को तो एकदम आधुनिक ही कहा जाएगा. इंसानों ने कृषि की या कृषि ने इंसानों को पालतू बना लिया यह विषय सुनने में कठिन ज़रूर लगता है लेकिन किसानों की आत्महत्याओं ने इसे सरल बना दिया है. कृषि और अनाज संग्रहण में इंसान की बहुत-सी समस्याओं की जड़ें मौजूद हैं. पूँजीवाद भी अपनी शुरुआत वहीं से मानता है.
आजकल हम फैक्ट्रियों में बना हुआ भोजन खाने लगे हैं. ऑर्गेनिक खेती के उत्पादों की ओर लपकना नया शौक है चाहे महँगा है. कृषि और फैक्टरी से आ रही खाने-पीने की चीज़ों में कैमिकल्ज़ का इस्तेमाल बढ़ाया गया है जो चरिंदों, परिंदों के साथ-साथ इंसानी शरीर की कैमिस्ट्री पर भारी पड़ रहा है. चीनी और फैट्स ने शारीरिक मोटापा दिया. दूसरी ओर सूचना उद्योग (यानि पुस्तकों, अख़बारों, पत्रिकाओं, पोर्न, टीवी, इंटरनेट) ने हमें अच्छा-ख़ासा दिमाग़ी मोटापा बख़्शा है. जी हाँ, वही जंक फूड, आप जानते ही हैं.
सुना है चिकित्सा-विज्ञान मनुष्य के लिए अमरत्व के तारे तोड़ कर ला रहा है. लेकिन हर देश में युद्धों की तैयारियाँ हो रही हैं इस पर हैरानगी बिलकुल नहीं होती. कृषि और औद्योगिक क्रांति के साइड इफैक्ट्स अब इंसानियत के साथ धोखाधड़ी के तौर पर देखे जा रहे हैं.
प्रकृतिवाद अपनी शिकायत भरी नज़र से पूँजीवाद को तरेरता है. पूँजीवाद यह कह कर पल्ला झाड़ लेता है कि जनसंख्या बढ़ने से धरती पर जो जीवन का बोझ बढ़ता है उसे धरती झेल पाए उसका इकलौता उपाय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है. मार्क्सवाद उसके आसपास मंडराता रहता है, "मैं अभी यही हूँ." पूँजीवाद हँस कर जवाब देता है, "भाई, खड़ा रह, मुझे क्या."
अब सरकारें सोचती है कि वे क्या करें सिवाय इसके कि अगर लोग जनसंख्या पर ख़ुद नियंत्रण नहीं रखते तो क्यों न उन्हें वहाँ छोड़ दिया जाए जहाँ शिक्षा और चिकित्सा खर्चीली हो, सस्ते मज़दूर हमेशा उपलब्ध रहें, बाज़ार के आशा-निराशा के खेल में वे जीवन भर भक्ति और दर्शन पेलते रहें. कुछ पैसा मिलता रहे, जाता रहे, उधारी-चुकौती चलती रहे. इतना बहुत होता है आम आदमी के लिए. रह गया जनसंख्या नियंत्रण का काम, बंदा न करे तो उसे औद्योगिक और कृषि क्रांतियों के साइड इफ़ैक्ट्स पर छोड़ दिया जाए. प्राकृतिक आपदाएँ कुछ मदद कर देंगी. हथियार और बिगड़ता पर्यावरण भी आबादी कम करने में योगदान देगा. कुपोषण के अलावा इंसान का शारीरिक और दिमाग़ी मोटोपा भी सहायक होगा. तो फिर समस्या किस बात की है? सारा इंतज़ाम तो हुआ पड़ा है. बस ख़ुश रहा करो.