30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया वह या तो भक्ति साहित्य की समीक्षा के नाम पर लिखा गया था या फिर जातिवाद के आधार पर. कुल मिला कर कबीर के साहित्य पर आचार्यत्व थोपा गया था जबकि ज़रूरत थी उस विश्लेषण की जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो कबीर का लिखा हो ही नहीं सकता.


उल्लेखनीय है कि उस समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही भी बताया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया. दूसरी ओर वे समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और उनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में मान्य जातिवाद का विरोध था. उनका वो नज़रिया निम्न जातियों में व्यापक स्तर पर फैला. उन्हें भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पीछे धकेलने की एक कोशिश थी जो धीरे-धीरे नाकाम होती रही. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में भक्तिकाल कहा जाता है वह वास्तव में मुक्तिकाल था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संत जान पर खेल गए. 'आवाज़ इंडिया' और अन्य जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. उनके ऐसा करने के पीछे 'अदृश्य' कारण हो सकते हैं.


हालाँकि सभी अनुसूचित जातियों के अपने धार्मिक आइकॉन के रूप में उनके अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं शताब्दी के कबीर को 20 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अंगीकार किया. इसका कारण मेरी समझ के अनुसार यह है कि ये व्यवसाय से बुनकर थे. इस दृष्टि से कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. कबीर की वाणी में इन्होंने अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख दोनों महसूस किए. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार मुख्यतः आर्यसमाजी और थोड़े-बहुत कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पाते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि क्या मेघ ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा

23 March 2017

Advertise Your Megh - अपने मेघ का विज्ञापन करें

यदि आप काम तो बहुत उम्दा कर रहे हैं फिर भी कोई आपको और आपके काम को नहीं जानता तो इसका कारण विज्ञापन की कमी हो सकता है. आप बंदे तो बहुत अच्छे हैं लेकिन दूसरों के बीच आपका वैसा इंप्रेशन नहीं बन पा रहा तो पक्की बात है कि आपने अपना विज्ञापन नहीं किया. यदि आप सोचते हैं कि आपके भीतर बहुत बढ़िया विचारों, भावनाओं, जज़्बातों, उम्मीदों का ख़ज़ाना भरा हुआ है और दूसरे लोग उसे ख़ुद-ब-ख़ुद जान जाएँगे तो आप ग़लती पर हैं.


विज्ञापन की ख़ासियत है कि रिपीट होते रहने पर वो अपना एक ख़ास अर्थ देने लगता है. फिर उस अर्थ के रूप में दूसरों के मन का हिस्सा बन जाता है. थोड़े में कहें तो आप अपने विज्ञापन के ज़रिए दूसरे के दिल-दिमाग़ में जगह बनाते हैं और आगे चल कर आपको उसका फ़ायदा होने लगता है. यह बेहतरीन हो जाता है जब विज्ञापन सही सूचना और अच्छा इंप्रेशन दें. विज्ञापन रोचक, भयानक, आकर्षक और मनोरंजक होते हैं यह आपने देखा ही होगा.


मेघ समाज अपने ख़ुद के विज्ञापन के प्रति कमोबेश उदासीन रहा है और अब उसे बहुत सचेत रहने की ज़रूरत है. यह समाज ग़रीबी के बावजूद इंसानियत और मानवीय गुणों से भरपूर रहा. विपरीत हालात में जीने की ताक़त और जीवट (adventure) में इस समाज के लोग किसी से कम नहीं. ये शिक्षित हुए तो अपनी ज्ञान-बुद्धि और सूझ-बूझ से कामयाबी की ऊँचाइयों तक पहुँचे. सेना में गए तो अपनी प्रोफेशनल क्षमता की निशानियां छोड़ आए. व्यापार में उन्होंने सफलता हासिल की.


तो मेघ सर, आप ही बताएँ कि आप अपनी ख़ासीयतों का अच्छे से विज्ञापन क्यों नहीं करते? शुरू कीजिए. विज्ञापन की इस दुनिया में आइए. अब तो आपके पास सोशल मीडिया है. आपके बनाए हुए कबीर मंदिर हैं जो आपका सशक्त विज्ञापन हैं. और आपको मज़बूत पहचान देते हैं.


एक विज्ञापन देखा था जिसमें पहले परिवारों की खुशहाली, शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं, खेल-खिलाड़ी, संस्कृति विकास आदि की बात है. आखिर में एक छोटी-सी लाइन है- “इस्पात भी हम बनाते हैं”. यह टाटा स्टील का है. अपने कार्य के बारे में दूसरों को बताना और अंत में सलीके से अपनी तारीफ़ का ठंडा सिक्का दूसरे के हाथ में थमा देना अपना और अपने समाज का बढ़िया विज्ञापन होता है.

मेघ सर, सुबह हो गई है. अख़बार देखिए. दुनिया विज्ञापनमय है. उसमें अपनी हाज़िरी तो दर्ज कीजिए.




19 March 2017

Casteism - Expectations of worker castes - जातिवाद - कमेरी जातियों की उम्मीदें

यह जानकर खुशी होती है कि हमारे मेघ समुदाय के लोग अन्य जातियों के साथ बेहतर आपसी व्यवहार स्थापित कर रहे हैं. यह भी देखा गया है कि उनमें रोटी-बेटी का संबंध बना है चाहे अभी वो व्यापक स्तर पर नहीं है. (ऑफ कोर्स मैं इंटरकास्ट मैरिजिज़ की बात कर रहा हूँ). निश्चित रूप से भारतीय समाज में एक परिवर्तन देखने को मिला है जो स्वागत योग्य है.


अब सीधे आरएसएस की विचारधारा पर आते हैं. आरएसएस का दीर्घाकालिक लक्ष्य सत्ता रहा जिसका रास्ता हिंदुत्व से हो कर गुज़रता है. हिंदुत्व का आधार एक संदेहास्पद अवधारणा पर आधारित है. जब स्वामी दयानंद द्वारा प्रयुक्त ‘आर्य’ शब्द अधिक नहीं चल सका तो उसके बाद हेडगेवार, सावरकर जैसे चिंतकों ने हिंदुत्व का नाम और एजेंडा प्रस्तावित किया जिस पर आरएसएस चल निकला. हिंदुत्व का अर्थ क्या होगा जब हम उसे ‘हिंदू धर्म’ शब्द के साथ जोड़कर देखेंगे. संभव है कि आरएसएस के एजेंडा में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू धर्म’ में अंतर हो लेकिन आम आदमी के लिए हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक ही बात है. हिंदू धर्म की कई विशेषताएं हैं जिसमें समाज का जातिगत ढांचा एक प्रमुख लक्षण है जिसे जातपात कहा जाता है. इसमें कमेरी और श्रमिक जातियां सबसे नीचे आती हैं और अन्य जातियां सवर्ण कहलाती हैं. नोट करें कि सवर्ण जातियां खुद को जातिगत ढांचे के अंतर्गत नहीं मानतीं.


अब रहा हिंदू धर्म. इसका आधार ऐसे ग्रंथ माने जाते हैं जो मुख्यतः वैदिक ब्राह्मणों ने लिखे हैं. इन ग्रंथों ने जातिवाद और अस्पृश्यता जैसी  बुराइयों  का आधार तैयार किया, उसे निरंतरता दी. ये आज भी उस नफ़रत पैदा करने वाली मानव व्यवस्था को मान्यता देते हैं. हिंदुत्व के ध्वजाधरों ने कभी भी इन ग्रंथों के बारे में खुल कर नहीं बोला कि ऐसे ग्रंथ जो जातिगत घृणा फैलाते हैं वो उन्हें मान्य नहीं हैं या वे उन ग्रंथों का खंडन करते हैं, कम से कम जातिवाद के संदर्भ में.


हिंदूधर्म की कोई स्पष्ट परिभाषा अभी तय नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट ने उसे जीवनशैली कहकर कहीं रख दिया हुआ है. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता. हिंदुत्ववादी संगठन मनुस्मृति आदि धर्म ग्रंथों की भावना को कभी मरने नहीं देते. वे उसे धार्मिक सत्संगों, सम्मेलनों तक में घसीट कर ले आते हैं और लोगों के मन पर जातिवाद की जो तस्वीरें बनी हुई हैं उन्हें धुंधला नहीं होने देते.


संघी विचारधारा से प्रभावित कुछ मेघ कहते दिखे हैं कि हम अन्य जातियों की जातपात संबंधी समस्या को अपना ढोल समझ कर बजाते हैं तो यह हमारी ग़लती है. यह बात हज़म नहीं होती क्योंकि यह समस्या सभी कमेरी और श्रमिक जातियों की है. इन दिनों उन जातियों में जो एकता का भाव पैदा हुआ है उससे संघ जैसे संगठनों में बेचैनी हुई है लेकिन अधिक नहीं क्योंकि वे अभी तक सत्ता में हैं. सवर्ण व्यवस्था ने इस देश की बहुसंख्यक आबादी को मनुस्मृति के संविधान के तहत सदियों तक अशिक्षित रखा इसलिए वे किसी न किसी प्रकार से सत्ता में आने का जुगाड़ कर लेती हैं. पहले यह कार्य कांग्रेस के माध्यम से हुआ अब भाजपा ने उसकी जगह ले ली है.

सिर्फ़ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जातपात मर चुकी है. कमेरी और श्रमिक जातियाँ संघ जैसे संगठनों से यह उम्मीद क्यों न करें कि वे जातिवाद को स्थापित करने वाले उन धार्मिक ग्रंथों के अर्थ तय करें और उनमें भरे जातिवाद को अपने स्तर से अमान्य कहने की स्वस्थ परंपरा डालें. शायद इससे देश में व्याप्त जातिवादी नज़रिया बदल जाए. धर्मग्रंथों के अलावा शब्दकोशों, मुहावरा कोशों आदि को अलग से देखा जा सकता है. राजनीतिक पार्टियाँ भी जातिवाद को अपनी तरह से ज़िंदा रखती हैं. वे भी 'टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज ज़रूरी' वाले सिद्धांत पर कार्य करती नहीं दिखतीं.

14 March 2017

Caste Identity and Unity - जाति पहचान और एकता


यह संसार 'नाम' और 'रूप' का बना है. जातियाँ नाम और रूप के आधार पर बनी है और इनकी खासियत यह है इनकी अपनी परंपराएँ और रूढ़ियाँ हैं जो इनकी पहचान है. जातियों की ख़ासियत है कि वे अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं. परिपक्व होते लोकतंत्र में यह सवाल खड़ा हुआ है कि वंचित जातियां आपस में एकता कैसे स्थापित करें ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन कर सकें. दूसरी ओर एक राष्ट्रवाद खड़ा हो रहा है जो जातिवाद का विरोध करता तो नहीं दिखता लेकिन जातिवाद को समाप्त मान कर बात करता है.


कुछ मेघजन इस आइडिया के साथ खेलते हैं कि क्या कबीर को इष्ट मानने वाले या कबीर को बुनकरों की प्रतिनिधि विचारधारा मानने वाले समुदायों का एक सामान्य नाम ‘कबीरपंथी’ रखा जा सकता है ताकि उन जातियों में एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक एकता स्थापित हो जाए?


हाल ही में एक उदाहरण मेरे सामने आया है. राजस्थान में एक सरकारी नोटिफिकेशन के ज़रिए बलाई आदि अनेक जातियों को अनुमति दी गई थी कि वे ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं. उसके पीछे कोई राजनीतिक एकता की मंशा रही होगी ऐसा मानना मुश्किल है लेकिन यह भावना ज़रूर थी कि चमड़े का कार्य करने वाली जातियाँ अपने व्यवसाय से जोड़े गए घृणा के भाव से मुक्ति पा जाएँ. इसके बाद वहाँ 'मेघवंश' और 'मेघवाल' शब्दों के साथ नई जागरूकता का संकेत देते हुए कम से कम एक संगठन बना जिसने बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए. कुछ जातियों ने सरनेम के तौर पर ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. इस पर बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र के मेघवालों को आपत्ति थी क्योंकि वे  व्यवसाय से चर्मकार नहीं बल्कि बुनकर थे. अनजाने में ही सही लेकिन चर्मकारों के व्यवसाय से जुड़ी घृणा उन्हें ख़ुद तक पहुँचती महसूस हुई.


जैसा कि मैंने पहले कहा है - जातियाँ अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं और हाल ही में मेरी जानकारी में आया है कि कई चर्मकार जातियों ने मेघवाल शब्द का प्रयोग करने से इंकार भी कर दिया. कहने का मतलब यह है कि कानून के द्वारा किन्हीं जातियों को एक नाम देना उनमें एकता होने की गारंटी नहीं देता. एकता को लेकर जो बेचैनी है वो राजनीतिक है और उसका समाधान राजनीति के सिद्धांतों के अंतर्गत होगा. समाज सदियों से बँटा हुआ है और वह जल्दी सुधरने वाला नहीं है. अनुसूचित जातियों का आपस में रोटी-बेटी का व्यापक और खुला दिखने वाला संबंध नहीं है और न ही वह एकदम से स्थापित हो सकता है. इसमें भौगोलिक,आर्थिक और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं.

बेहतर आंदोलन यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के आदमी को जल्दी से सुधार ले. समाज को बदलने में समय लगता है. ‘समय’ कहकर किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहता. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी ही होती है. अब वंचित जातियों में शिक्षा का प्रसार हो रहा है जिससे उनकी मानसिक रुकावटों के पिघलाव की गति तेज हो सकती है. इससे उम्मीद जगती है. इसे हाल ही में उभरे राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखने की ज़रूरत होगी जिस पर समाजशास्त्री प्रकाश डालेंगे.

11 March 2017

The icon of my political expectations - Sharad Yadav - मेरी राजनीतिक अपेक्षाओं का आइकॉन:शरद यादव


माननीय शरद यादव जी को कई बार संसद में बोलते सुना है और हर बार लगा है कि वे भारत के जन-जन की आवाज़ और आकांक्षाओं को वो अभिव्यक्ति दे रहे हैं जिसकी वे हकदार हैं लेकिन जिनका हक़ हर बार मारा गया है. सत्ता ने भारत की जनता के लिए कितना किया है और कितना नहीं किया गया या करना ही नहीं चाहती वो सब उनके शब्दों और स्वर की खनखनाहट में स्पष्ट झलकता है. एक राजनीतिक विचारक के रूप मेरी नज़र में वे बेजोड़ हैं. उनका हाल ही का एक वीडियो लोकसभा टीवी पर रखा गया है जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ. मेघनेट के पाठकों से इस अनुरोध के साथ कि आप इसे देखें. इससे आपको भारत के उस पक्ष को समझने में मदद मिलेगी जो अकसर हमारी पकड़ से बाहर होता है.


05 March 2017

King Preist of Indus Valley - सिंधु घाटी का पुरोहित नरेश


अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भाषाविज्ञानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने भाषा के नज़रिए से इतिहास पर समीक्षात्मक नज़र डाली है. उन्होंने नई बातें सामने ला दी हैं जो अभी तक लिखे गए इतिहास पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं साथ ही कई मान्यताओं को भी प्रभावित करती हैं.


मेघ ऋषि को अपना वंशकर्ता मानने वाले कुछ मेघवंशियों ने मेघऋषि के रूप की कल्पना सिंधुघाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) से मिली पुरोहित नरेश की मूर्ति के आधार पर की और उसका अच्छा प्रचार किया है. वैदिक या पौराणिक कथाओं में वर्णित किसी ऋषि की कल्पना उसके लिए प्रयुक्त शब्दों से मन पर उभरती छवियों के आधार पर होती है. मेघ ऋषि का कोई प्रामाणिक चित्र तो है नहीं फिर भी मेघ ऋषि का एक रूप बना कर उस में आस्था पिरोई जा सकती है. दूसरी ओर वैज्ञानिक खोज हमारी आस्था आधारित अवधारणआओं को प्रभावित करती चलती है.


डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह जी ने उक्त पुरोहित नरेश की मूर्ति के माथे पर लगे गोल अलंकरण के बारे में बताया है कि:-


“पालि का एक शब्द है - ककुध. ककु अर्थात शिखर. ककुसन्ध बुद्ध इसी से संबंधित हैं. ककुध के तीन रूप हैं - ककुध, ककुभ और ककुद. ककुध के तीन अर्थ प्रमुख हैं - शीर्ष, राजचिह्न और वृषभ का कूबड़. विशेषण के अर्थ में यह उत्तम पुरुष का द्योतक है - अध्यात्म के क्षेत्र में भी और सत्ता के क्षेत्र में भी.


सिंधु घाटी सभ्यता में सेलखड़ी पत्थर की बनी जिस प्रतिनिधि पुरुष की मूर्ति को इतिहासकारों ने पुरोहित नरेश या कोई शक्ति केंद्रित पुरुष की मूर्ति बताई है, उसके मस्तक पर गोल अलंकरण है, वह ककुध है. कई सील-चित्रों पर कूबड़दार वृषभ का अंकन है और जिनके बारे में इतिहासकारों की राय है कि उनकी पूजा होती होगी, उनकी पीठ के शीर्ष भाग पर ककुध है. गौतम बुद्ध के मस्तक पर जो उठी हुई गोलाई है, यदि आप उसे टीका या मांसपिंड समझते हैं तो यह गलतफहमी है. बौद्ध मत में इसे ककुध कहा जाता है. ककुध की परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता को बौद्ध सभ्यता से जोड़ती है.”

यानि सिंधुघाटी सभ्यता ख़ुद के बौध सभ्यता होने का पर्याप्त संकेत देती है. मैंने उक्त मूर्ति के लिए प्रयुक्त शब्द ‘King Preist’ का हिंदी अनुवाद ‘राज पुरोहित’ किया था जो ग़लत था. डॉ. राजेंद्र जी द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘पुरोहित नरेश’ सही और सटीक शब्द है.


02 March 2017

Via Spirituality - बारास्ता रूहानियत

इन दिनों देख रहा हूँ कि व्हाट्सएप्प ग्रुपों में लामबंद हुए मेघों में कई बार धर्म को लेकर बहस छिड़ती है और दिखने लगता है कि वे डेरों और गद्दियों को लेकर बहुत जज़्बाती हैं. ग्रुप में मेघ मधाणी (मथनी) अक्ल के दही को रिड़कने लगती है. मैं इससे परेशान नहीं होता बल्कि अच्छा लगता है कि जो बहिष्कृत समाज धार्मिक स्थलों में प्रवेश नहीं कर सकता था अब उसके लिए डेरा प्रमुखों और गद्दीधारियों ने अध्यात्म और भक्ति के रास्ते खोले हैं. यह उन्हें मुख्यधारा में होने का जैसा भी है लेकिन एक अहसास दिलाता है.


जब बहिष्कृत समाज का कोई बंदा मुख्यधारा में आता है तो इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि वह एक शरणागत (रिफ्यूजी) की हैसियत से आगे न बढ़े. उसे कई तरीकों से डेरे और गद्दी के अनुशासन में बाँध दिया जाता है और यदि वो स्वभाव से ही भक्त है तो वो बँध भी जाता है. भक्ति चाहे गुलामी की सबसे बदतर हालत में ही क्यों न ले जाए वो भक्ति पाप नहीं कहलाती. धर्म ने यह व्यवस्था पहले ही कर रखी है.


वंचित जातियों ने अध्यात्म की खोज के लिए आधुनिक डेरों आदि का निर्माण किया है जहाँ जात-पात की संकरी गली से हो कर भी पहुँचा जा सके. कई डेरे अनुसूचित जातियों के अनुरूप सजाए गए हैं. वहाँ समता और मानवता का बैनर ले कर कोई गुरु या उसका पीए खड़ा रहता है. एक जैसी जातीय पहचान वाले समूह वहाँ सुकून से बैठ सकते हैं, एकदम टेंशन फ़्री. इस लिए डेरों को जब भी देखें सबसे पहले जाति के नज़रिए से देख लें. इससे सुविधा होगी. डेरे पर आपका चढ़ावा महत्वपूर्ण है. डेरों और धार्मिक स्थलों के संचालकों में चढ़ावे को लेकर आपस में एक संघर्ष, कभी-कभी ख़ूनी संघर्ष भी चलता रहता है. उनकी पृष्ठभूमि को एक बार देख लेना आपके हित में होगा.


जितने भी संत हुए हैं कबीर, रविदास, पीपा, पलटू आदि ये सभी वंचित जातियों से हुए हैं और इनकी जात-पात विरोधी विचारधारा का बहुजन में खूब प्रचार-प्रसार हुआ. होना ही था क्योंकि जात-पात उनके लिए घाटे की गारंटी थी वो भी बेमीयादी. जब संतों के नाम से डेरे बने और चल निकले तो वहां निम्न जातियों के लोगों से चढ़ावा आने लगा. ये डेरे एक तरह से सामाजिक संगठन का काम करते थे. यहाँ से आस्था का व्यवसाय भी साथ-साथ चल निकला इसलिए उनका अन्य के साथ कंपीटीशन होना तय था और वो हो गया.


प्रसंगवश, आस्था के व्यवसाय में पैसा है, आध्यात्मिक ग्लैमर है और नैतिकता की घूरती आँख भी है. पहले इस पर ब्राह्मणों का प्रभाव था. इसे देख कर पढ़े-लिखे कायस्थ समुदाय के प्रबुद्धजनों ने आगरा में 'राधास्वामी' नाम से डेरे का निर्माण किया जिस पर कायस्थों का प्रभाव है. वहां से प्रेरणा लेकर अमृतसर के पास ब्यास में राधास्वामी डेरा बनाया गया जिस पर जाटों का प्रभाव है. यहाँ इतनी बड़ी गुरु शिष्य परंपरा है कि आदमी देखता रह जाए. जाटों का इतिहास बताता है कि उनकी धार्मिक विचारधारा ओबीसी से उभरे संतों से बहुत प्रभावित है.

कई डेरे-गद्दी वालों ने राजनीतिक और सामाजिक रौब-दाब की कमाई की है जो उनकी सामाजिक संगठन तैयार करने की गहरी समझ का सबूत है. उनका राजनीतिक महिमामंडल साफ दिखता है. राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें वोट बैंक के तौर पर दुलारती हैं. इनसे आपका अपना चिंतन प्रभावित हो सकता है.

सभी डेरों को जाति के नज़रिए से परखिए. समझने में आसानी होगी....और हाँ....ज़रा रुकिए....सोचिए.... कि क्या आप उनके बिना भी बेहतर ज़िंदगी बिता सकते हैं?