29 December 2019

National poet Kabir - राष्ट्रकवि कबीर


कबीर एक फैलता हुआ फिनॉमिना रहा है इसमें संदेह नहीं. पूर्वी उत्तरप्रदेश से यह पूरे भारत में फैला. उत्तर पश्चिम भारत में इसे फैलाने का कार्य ख़ासकर नाथपंथियों ने किया. लेकिन कबीर केवल भारत में ही नहीं रुका. कबीर पर विदेशियों की पारखी नज़र पड़ी और वे कबीर का अनुवाद करके उसे अपने यहाँ ले गए.

मार्को डेला टोम्बा (1726 - 1803) सबसे पहले इटैलियन भाषा में इसका अनुवाद किया. फिर कबीर को इंग्लैंड और फ्रांस तक जाते देखा जा सकता है. इस कार्य की शुरुआत कैप्टन डब्ल्यू. प्राइस (1780 - 1830) और जनरल हैरियट (1780- 1839) के ज़रिए हुई. हैरियट ने 1832 में कबीर का फ्रेंच में अनुवाद किया. कबीर को वैज्ञानिक नज़रिए से पढ़ने-गुनने का काम एच. एच. विल्सन ने किया. विल्सन (1786- 1860) पूर्वी जीवन-दर्शन को समझते थे. 1828 तथा 1832 में उनका किया कार्यहिंदू सैक्ट्सशीर्षक से एशियाटिक रिसर्चिज़ में छपा.

ऊपर उल्लिखित विद्वानों की सामग्री के आधार पर गार्सां तासी ने फ़्रैंच भाषा में पहला हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा. उनकी पुस्तक "इस्त्वार लितरेत्यूर ऐंदूई ऐंदूस्तानी" (प्रथम भाग 1839, दूसरा भाग 1847) प्रकाशित हुई. इस पुस्तक में कबीर को तुलसी दास के मुकाबले डेढ़ गुणा अधिक स्थान दिया गया. जब भारत के हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले लोग कबीर को मुश्किल से ही स्थान दे रहे थे तब विदेश में कबीर का बेहतर मूल्यांकन हो रहा था. कबीर को पाठ्यक्रमों में शायद ही कहीं जगह मिल रही होगी. सिखों के पवित्र ग्रंथ (1604) श्री गुरुग्रंथ साहिब में कबीर है लेकिन तुसलीदास नहीं है. इस ग्रंथ का जब अन्य भाषाओं में अनुवाद (अर्नेस्ट ट्रंप, 1877 और मैक्स आर्थर मेकलिफ, 1909)  हुआ तो कबीर की ओजस्वी वाणी कई अन्य देशों में पहुँची. यह कार्य अठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में बढ़ता दिखता है. जर्मन प्रोफेसर अर्नेस्ट ट्रंप जब कबीर की कुछ कविताओं का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे लगभग उसी समय दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश (1875) में कबीर के बारे में जो लिख रहे थे वह कबीर की सच्चाई से बहुत दूर था. ज़ाहिर है कि भारत में एक मानसिकता ऐसी भी थी जो कबीर पर अनुसंधान की राह में रोड़े अटका रही थी. कबीर के बारे में जो कार्य आधुनिक शिक्षा कर रही थी उसे लेकर वो मानसिकता गालियाँ बक रही थी. मध्ययुगीन साहित्य के चिंतक कवियों में से सबसे अधिक कार्य कबीर पर ही हुआ है. गुई सोरमन ने तो अपनी 2001 में प्रकाशित पुस्तकदि जीनियस ऑफ़ इंडियामें कबीर को राष्ट्रकवि कहा है. यह साहित्य और आलोचना साहित्य में एक बड़ी घटना है. ज़ाहिर है कबीर राष्ट्रनिर्माता हैं.

ऊपर दी गई सभी जानकारियाँ श्री सुभाष चंद्र कुशवाहा की पुस्तक "कबीर हैं कि मरते नहीं" (2020) में मिलती हैं जो अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज से छपी है. किताब में उन्होंने कबीर से जुड़ी अनेक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया है - मिसाल के तौर पर कबीर का जन्म और मृत्यु, कबीर के माँ-बाप और धर्म, उनके गुरु की गुत्थी आदि. लेखक ने 19 सदी के विदेशी अखबारों में छपे लेख और समाचारों का सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत किया है. ऐसा विवरण अभी तक किसी आलोचक ने नहीं प्रस्तुत किया है.

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने लिखा है कि 1841 से कबीर के बारे में ब्रिटिश अखबारों में लेख और समाचार छपने लगे थे. उन्होंने इस संदर्भ में ब्राडफोर्ड ऑर्ब्ज़वर (9 सितंबर 1841) को उद्धृत किया है, जिसमें . लंगलोज का लंबा लेख है और लंगलोज ने इस लेख में कबीर को भारत का महान समाज सुधारक और 15 वीं सदी का नायक कहा है. फिर तो आलोचक ने 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध के अनेक ब्रिटिश अखबारों के अनेक पन्नों को प्रस्तुत किया है. कोई दो दर्जन अखबारों का हवाला है, जिनमें कबीर से संबंधित लेख हैं, खबरें हैं.

एलेन्स इंडियन मेल (2 नवंबर, 1848), अर्मघ गार्डियन (1 जनवरी, 1853), मार्निग एडवर्टाइजर (10 मार्च, 1865), दि स्काॅटमैन (5 जुलाई, 1872), बरमिंघम डेली पोस्ट (15 अगस्त, 1879), डंडी एडवर्टाइजर (30 नवंबर, 1881), दि होमवर्ड मेल (23 जनवरी, 1882), लंदन डेली न्यूज (24 मार्च, 1883), यार्कशायर गज़ट (17 जून, 1893) और दि पाॅल माॅल गजट (18 अक्तूबर, 1894) से लेकर शेफिल्ड डेली टेलीग्राफ (3 अप्रैल, 1915), ग्लोब (24 अप्रैल, 1915), दि लीड मरक्यूरी (20 मार्च, 1930) तथा लीवरपूल इको (14 अप्रैल, 1942) तक दो दर्जन पश्चिम के अखबारों का हवाला है. पश्चिम के वे अखबार जिनमें कबीर मौजूद हैं. कहीं कबीर की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद है, कहीं उन पर लेख है, कहीं कबीर पंथ की जानकारी है, कहीं डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर की पुस्तक की समीक्षा है, कहीं रुडयार्ड किपलिंग लिखित कबीर का गीत प्रसंग है और कहीं रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कबीर की कविताओं की खबरें हैं.

यह नए साल 2020 में कबीर का नए परिप्रेक्ष्य में स्वागत है.

(पुस्तक का परिचय कराने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का हृदय से आभार)




18 December 2019

Megh Rishi Divas - मेघ ऋषि दिवस



पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जालंधर में 'मेघ ऋषि दिवस' मनाने को लेकर चर्चा रही. 'मेघ ऋषि' की बात मेघ समाज के लिए नई नहीं है. मेघ ऋषि का नाम मैंने ख़ुद बहुत बचपन में माता-पिता से सुना. उसके बाद जो जाना वह इस ब्लॉग पर कुछ जगह पहले से दर्ज है. अब चूँकि इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी चर्चा रही है तो इस इवेंट की ओर अधिक लोगों का ध्यान ज़रूर गया होगा.

हम अपने प्राचीन काल के मेघ ऋषि जैसे नायकों की तलाश करते रहते हैं जिनके कारण हमारे समाज का और हमारा नाम जिंदा है. मेघ ऋषि का नाम वृत्र या प्रथम मेघ (यानि मेघ कबीले का राजा या मुखिया) के तौर पर ऋग्वेद और संस्कृत में लिखे अन्य ग्रंथों में अपने समय के 10 महान योद्धाओं में शामिल हैं. ऐसे नायकों की तलाश हमारी प्यास है और उनकी पुनर्स्थापना हमारे गौरव की ज़रूरत है.

खुशी हुई जब 15 दिसंबर, 2019 को जालंधर में मेघ ऋषि दिवस का आयोजन 'हिंदुस्तान मेघ सेना' के तत्त्वाधान में किया गया. इसमें मेघ ऋषि की शोभायात्रा भी निकाली गई. इस कार्यक्रम में जालंधर (पश्चिम) के विधायक श्री सुशील रिंकू, आप पार्टी के डॉ. शिवदयाल माली, शिव सेना के श्री सुभाष गोरिया और कई अन्य स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं आदि की उपस्थिति रही जिनका विस्तृत वर्णन नीचे की प्रेस कटिंग में मिल जाएगा. कार्यक्रम से संबंधित मीडिया कवरेज और एक वीडियो का लिंक नीचे दे दिया गया है.


हरियाणा के सीवन में भी मेघ ऋषि दिवस का आयोजन किया गया. संबंधित प्रेस कटिंग नीचे दी गई है.






13 December 2019

Ruler Megh Vansh - शासक मेघ वंश

इतिहास पढ़ते हुए लगता है कि यह कोई सीधी सड़क चलती आ रही है जिसमें लिखा हुआ पूर्ण है और सच है. लेकिन वंचित जातियों के अपने इतिहासकारों और अन्य ईमानदार इतिहासकारों ने समय-समय पर सिद्ध किया है कि सड़क सीधी नहीं है. वो कई जगह उखड़ी हुई है और उसके अगल-बगल में झूठी कहानियों वाले साइनबोर्ड लगा दिए.

इन दिनों डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक इतिहास का मुआयना पढ़ रहा हूँ. उसमें प्रकाशित कई पृष्ठ डॉ. सिंह ने फेसबुक पर शेयर किए थे. फेसबुक पर एक बार मैंने उनसे मेघ वंश पर जानकारी देने के लिए अनुरोध किया था. कल 12-12-2019 को उन्होंने मेघ वंश पर पोस्ट डाली है जिसे ज्यों का त्यों नीचे कॉपी-पेस्ट कर रहा हूँ. इस पोस्ट को श्री ताराराम गौतम और श्री आर.एल. गोत्रा ने भी पढ़ा है.

नागों की राजधानी पद्मावती के दक्षिण - पूरब में मघों का राज्य था. पुराणों में इन्हें मेघ वंश कहा गया है. पहले इस वंश का शासन बघेलखंड में था, फिर कौशांबी तक विस्तृत हुआ और चरमोत्कर्ष के दौर में इस वंश ने फतेहपुर तक फतह कर लिया था. इस वंश ने ईसा की दूसरी और तीसरी सदी में अपना दबदबा बनाए रखा. मघ वंश के सिक्के तथा अभिलेख हमें बंधोगढ़ और कौशांबी से लेकर फतेहपुर तक मिलते हैं. मघ वंश की प्रारंभिक राजधानी बंधोगढ़ में थी, भद्रमघ ने कौशांबी तक और वैश्रमण मघ ने फतेहपुर तक मघ साम्राज्य का विस्तार किए थे. मघ वंश के राजाओं ने बौद्ध धम्म का पताका फहराए और अपने सिक्कों पर बौद्ध प्रतीकों की छाप अंकित कराए. प्रथम सिक्का भद्रमघ का है तथा दूसरा और तीसरा सिक्का नव मघ का है. सिक्कों पर इन राजाओं के नाम लिखे हुए हैं. सिक्कों की लिपि उत्तर कुषाण ब्राह्मी लिपि है तथा भाषा पिजिन संस्कृत है, जिसमें प्राकृत भाषा के ऊपर संस्कृत के वर्ण संकोच का लेयर चढ़ा है.



मघ राजाओं के सिक्कों का उल्लेख संदर्भ सहित ताराराम जी की पुस्तक 'मेघवंश : इतिहास और संस्कृति' में भी आया है.

इतिहास की सड़क के उखड़े हिस्से पर बोर्ड लग चुका है - "कार्य चल रहा है, Work in Progress"