16 August 2019

भाषाशास्त्र में समाजशास्त्र की मिलावट है - Philology is adulterated with Sociology

कहते हैं कि माँ बोली (मातृभाषा) सबसे मीठी और प्यारी भाषा होती है. जब भाषाविज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया गया कि संस्कृत उत्तर भारत की सब भाषाओं की जननी है और बाकी सब भाषाएं भ्रष्ट (अपभ्रंश) भाषाएँ हैं तो अजीब-सा लगा था. पंजाबी को जिस वर्ग में रखा गया उस वर्ग का नाम ही ‘पैशाची’ रखा गया. कारण समझ में नहीं आता था कि देश भर की इतनी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. क्या ‘संस्कृत से इतर’ भाषाएँ या ‘भारत में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ’ कह कर नहीं पढ़ाया जा सकता था? वैदिक संस्कृत का भी विकास हुआ है. कालिदास आदि की उस विकसित संस्कृत को ‘अपभ्रंश संस्कृत’ कहने की युक्ति और उक्ति नहीं सूझी और न ही हिंदी साहित्य को ‘अपभ्रंश साहित्य’ कहा गया.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाषा विज्ञान में नई खोजों के सदके जानकारी में आया कि संस्कृत भारत की सब भाषाओं की तो क्या किसी एक अन्य भाषा की भी जननी नहीं है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा प्रमाणित हो चुकी है जिसकी बोलियों में पाली, मागधी आदि आती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले ऐतिहासिक और पुरातत्त्वशास्त्रीय (आर्कियॉलोजिकल) संदर्भ और प्रमाण उपलब्ध हैं.

भारत की अन्य भाषाओं के लिए पूर्ववर्ती भाषा विज्ञानियों ने हीनार्थक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? कहीं उन शब्दों में सामाजिक संरचना में व्याप्त उच्चता-हीनता की भावना का कोई कोड (कूट) तो नहीं था या यह किन्हीं भाषाओं में शूद्रता स्थापित करने की युक्ति तो नहीं थी?

पिछले दिनों डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ पढ़ी. भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब दे रहा है कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है. वास्तव में भाषाई स्थापनाओं (उदाहरण के लिए ‘अपभ्रंश भाषा’ जैसी स्थापना) के कुछ विकृत रूप इतने अधिक प्रचारित कर दिए गए हैं कि उनमें कुछ भी नया जोड़ना या उसमें सुधार की बात उठाना हो तो बहुत से तार्किक सबूतों की ज़रूरत होती है. इसकी भी जांच करनी होगी कि संस्कृत के नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र और महिला पात्र प्राकृत में और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत में ही क्यों बात करते हैं. पात्रों के बीच भाषा की यह दूरी क्या संकेत करती है इसकी ईमानदार व्याख्या होनी चाहिए.

भाषा में निहित समाजशास्त्र को समाजशास्त्र के नज़रिए से ही परखना पड़ेगा कि वो ‘तत्सम’ और ‘तद्भव’ वाला मकड़जाल क्या है. कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘तद्भव’ शब्द ही वास्तव में ‘तत्सम’ हैं और उन्हें संस्कृत में अनूदित करके उनके संस्कृत रूप को ‘तत्सम’ बता दिया गया हो?

भारत में मुंडा भाषाओं का अपना एक परिवार है जिसमें लैंगिक नस्लवाद नहीं है यानि उनमें प्रत्येक शब्द का लिंग निर्धारण नहीं किया जाता. लेकिन संस्कृत और उसके संपर्क में आई भाषाओं में यह घुसा है. “ईंट या कंप्यूटर ऐसी चीजें नहीं है जिनकी पूँछ उठाकर उनका लिंग निर्धारण किया जाए कि यह शब्द पुलिंग है या स्त्रीलिंग.” 

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह स्पष्ट मत है कि ‘धातुओं का निर्णय शब्दों को मथने के बाद किया गया है. यानी शब्द उसकी धातु की खोज से पहले विद्यमान थे. इसलिए शब्दों की बनावट की व्याख्या करने वाला ‘धातु’ नामक तत्त्व प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है.’

समाजशास्त्रीय संदर्भों में संस्कृति और अतीत का गौरव उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय हो सकता है जिनको व्यवस्था ने बहुत सुख सुविधाएं दे रखी थीं और दी हुई हैं. वंचित लोग किसी सांस्कृतिक गौरव को नहीं ढोते. वे तिरस्कार को ढोते रहे हैं.

जहाँ तक शब्द भंडार का सवाल है पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने एक बार कॉफी पीते हुए मुझे कहा था कि ‘किसी गाँव में तरखाण (बढ़ई) के पास जाओ. वो बताएगा कि कौन-सी लकड़ी की किस गंध को क्या कहते हैं’. इससे ही अहसास हो जाता है कि बढ़ई के पास जो शब्द भंडार है वो संस्कृत और नागर संस्कृति वाली साहित्यिक भाषाओं में नज़र नहीं आता. दरअसल वो भाषाएँ श्रमसंस्कृति के शब्द भंडार के मुकाबले बहुत दरिद्र हैं. ज़़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और बताइए कि बढ़ई या तरखाण (कारपेंटर) को संस्कृत में क्या कहते होंगे?

संस्कृत की धारा से अलग विकसित भारत की मुख्य भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंषता’ की हीन दृष्टि क्यों? मूल पंजाबी भाषा का पता पूछना हो तो वह साहित्यक पंजाबी में या पंजाबी व्याकरण की किताबों में नहीं मिलेगा. उसे बहुत ध्यानपूर्वक पंजाब के रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दों और ध्वनियों में से चुन-चुन कर इकट्ठा करना पड़ेगा. इस विषय में कार्य करते हुए आप जल्दी ही जान जाएँगे कि पंजाबी संस्कृत और पर्शियन से प्रभावित तो हुई है (उनके कई शब्द यहाँ बस गए हैं) लेकिन पंजाबी का मूल स्वरूप प्राकृत और पाली भाषा वाला है. तुहाड्डा (तुम्हारा), थोड्डा (तुम्हारा) शब्द इसके उदाहरण हैं. पंजाबी में दुद्द (जिसे ‘दुद’ की तरह भी उच्चारित किया जाता है) बोलना पारंपरिक रूप से आसान है. दुग्ध नकली शब्द है लेकिन पढ़ाया यह गया कि दुग्ध से बिगड़ कर दुद्द हो गया है. संस्कृत के ‘दुग्ध निर्मित’ शब्द और ‘दुद्दों बण्या’ (दूध से बना) या ‘दुद्द तों बण्या’ (दूध से बना) शब्दों का विकास एक ही पटरी पर नहीं है. ‘दुग्ध निर्मित’ की पटरी अलग है. पंजाब की बोलियों के मूल में बैठे प्राकृत और पाली के शब्द ही ‘तत्सम’ हैं, इसमें संदेह कैसा?

(इस आलेख का प्रेरणा स्रोत डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र है.’ डॉ. सिंह का हृदय से आभार.)

यह लिंक भी देखें :-


10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बसह करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी) जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे, ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (मुज़फ्फ़राबाद के पास) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नाम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रह सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के भीतर विभाजन करके उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.

02 August 2019

Megh Organisations, Siwan (Kaithal) - मेघ संगठन, सीवन (कैथल)

पिछले दिनों सुनने में आया था कि भगत महासभा नामक संगठन ने पेहोवा, हरियाणा में समुदाय का सम्मेलन किया था. संगठन के तौर पर भगत महासभा का हरियाणा में यह पहला सम्मेलन था. उसी कार्यक्रम में फैसला किया गया कि अगला कार्यक्रम मेघ जन की बड़ी आबादी वाले शहर सीवन में 28-7-2019 को किया जाएगा.

समझ नहीं आता कि इसे इत्तेफाक कहा जाए या पहचानने की चूक कि 28 जुलाई 2019 को सीवन के जिस सम्मेलन में हम पहुंचे वह भगत महासभा का था जिसमें इस सभा के ऑल इंडिया प्रेसिडेंट राजकुमार प्रोफेसर खुद मुख्य अतिथि थे. बैनर पर उस दिन की तारीख के साथ "आर्य (मेघ) सभा सीवन और मेघ महासम्मेलन" लिखा था. भगत महासभा की इकाई यहां सक्रिय थी जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. जो मेहरबान मुझे चंडीगढ़ से सीवन ले गए थे उनके साथ मैं सबसे अगली पंक्ति के कोने में बैठ गया. वहाँ से बिना रुकावट बने फोटो लिए जा सकते थे. थोड़ी देर के बाद भगत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार अपनी टीम आई जिसमें जम्मू, पंजाब, हरियाणा से कई और 1-2 राजस्थान से आए हुए सज्जन थे. उनके गले में हार थे और उन्होंने अगली कतार में बैठे हम सभी से प्रेम पूर्वक हाथ मिलाया. फिर उसके बाद हमें डिस्टर्ब किए बिना उनकी टीम के लिए सबसे आगे कुर्सियों की कतार लगाई गई. एक गणमान्य सज्जन ने मुझे भी आगे की कतार में आने के लिए कहा. मैंने मना किया. ('वहां गले में हार पड़ने का खतरा है,'' यह बात मैंने धीरे से अपने प्रिय मित्र ओमप्रकाश गडगाला जी के कान में कही थी. तब तक हमारे लिए "जाते थे जापान पहुँच गए चीन" जैसी स्थिति थी. 

कार्यक्रम शुरू होने पर अतिथियों का परिचय दिया गया तब स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम का आयोजन भगत महासभा की पेहोवा-सीवन की स्थानीय इकाई ने किया था. चंडीगढ़ से चल कर सीवन के ओम पैलेस में जा बैठने तक मुझे जिस आयोजक संस्था के आयोजन स्थल के पते के बारे में जो पता था उसका पता भी यही था (वेरी सॉरी कह रहा हूँ). यहां ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के कार्यकर्ता मौजूद थे. सब को एक साथ देख कर मुझे अच्छा ही लगा.

एक बात शुरू में कहता चलूं कि हॉल पूरा भरा हुआ था (लगभग तीन-चार सौ की केपेसिटी रही होगी). महिला सहभागियों का काफी संख्या में आना उत्साहवर्धक था. महिलाओं की सहभागिता और ज़्यादा होनी चाहिए. मंच पर केवल डायस और माइक था और मंच संचालक की कुर्सी थी. वक्ता लोग श्रोताओं के साथ या आगे की कतार में बैठे थे. नाश्ते और भोजन का भी अच्छा प्रबंध था.

भगत महासभा जम्मू में सक्रिय सामाजिक संगठन है. पंजाब में इसकी गतिविधियां समय-समय पर देखी गई हैं. वक्ताओं ने इस अवसर पर जो कहा उसका सार नीचे दिया गया है :-

मेघ समाज के लोग एक गत्यात्मक (डायनेमिक) संगठन की जरूरत महसूस करते हैं जो सारे मेघ समाज को (इस संदर्भ में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़) में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व दे सके. मेघ समाज विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों में बंटा हुआ है. जैसे मेघ, भगत, आर्य मेघ, आर्य भगत, कबीरपंथी, जुलाहा आदि. धर्म के नजरिए से मेघ आर्यसमाजी, कबीरपंथी, सिख, राधास्वामी, निरंकारी, सनातनी, डेरे, गद्दियां आदि में बँटे हुए दिखते हैं. वक्ताओं ने अपने समुदाय में शिक्षा के प्रसार के लिए और अधिक जोर देने के साथ-साथ धार्मिक नजरिए से बंटे दिख रहे समाज को सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस प्रकार जोड़े रखने की जरूरत पर बल दिया कि समाज अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के लिए हर हाल में इकट्ठा रहे. धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएं जो समाज की एकता को खंडित करती हैं उसके बारे में समुदाय को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए ताकि अपेक्षित सियासी लाभ मिल सके. इस संदर्भ में एक वक्ता ने 'मेघ-धर्म' का भी उल्लेख किया जिसकी अवधारणा (कन्सेप्ट) की व्याख्या ज़रूरी है (इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी बहस हो चुकी है.)

जो मेघ छात्र शहरों में पढ़ने जाते हैं उनके रहने की व्यवस्था के लिए धर्मशालाएं बनाने की बात उठी. लुधियाना में उपलब्ध ऐसी धर्मशाला का उदाहरण दिया गया. सीवन में किए जा रहे ऐसे प्रयास की जानकारी दी गई जिसका मामला काफी आगे तक पहुँचा हुआ है.

कुछ वक्ताओं ने बताया कि समाज के लोग अक्सर पूछते हैं कि मेघ कौन होते हैं. कई वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर दिया. एक वक्ता ने कहा कि 3000 साल पहले हमारे मकान पक्के होते थे, आज बहुत से मकान कच्चे हैं. ऐसा क्यों और कैसे हुआ इसकी संक्षेप में जानकारी दी गई.

पूर्व एमएलए श्री बूटा सिंह ने कहा कि लगभग सभी सामाजिक संगठनों के संविधान में लिखा रहता है कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है जबकि सच्चाई यह है कि बिना राजनीतिक (सरकारी) सहायता के समाज का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. राजनीतिक पार्टियों के नाम पर समाज बंट जाता है. दरअसल जरूरत इस बात की होती है कि किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट प्राप्त उम्मीदवार को सामाजिक संगठनों के समर्थन की जरूरत होती है और सामाजिक संगठनों की इसमें समुचित सहभागिता होनी चाहिए. (उनका इशारा इस ओर था कि सामाजिक संगठन बिना अपने संविधान का उल्लंघन किए भी वातावरण बनाने और वोट मोबिलाइज़ करने का कार्य कर सकते हैं और प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) बन सकते हैं.)

जम्मू से आए एक प्रतिनिधि ने कहा कि संगठनों को अपने कार्य और कार्य प्रणाली में इतना मजबूत होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व को उनकी जरूरत महसूस हो. एक सुझाव यह था कि मेघ समाज के जम्मू, पंजाब और हरियाणा में बने सामाजिक संगठनों की एक कन्फेडरेशन बनाई जाए तो लाभ होगा.

भगत महासभा के अध्यक्ष श्री राजकुमार और ऑल इंडिया मेघ सभा के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर पाल, ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के अध्यक्ष राजिंदर सिंह तहसीलदार ने अपने-अपने संगठनों के बारे में जानकारी दी और मेघ समाज के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संकल्प दोहराया.

प्रमुख प्रतिनिधियों की सूची इस प्रकार है :-
(सर्वश्री) बोध राज भगत (राष्ट्रीय उपाधयक्ष, भगत महासभा  जम्मू कश्मीर) पवन भगत (चेयरमैन), मोहिंदर भगत (प्रदेश अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर), तरसेम भगत (सहअध्यक्ष), सीता राम भगत, जय भगत, नरेश भगत, सुशील भगत, भगत महासभा पंजाब के प्रदेश अधयक्ष, राजेश भगत (राजू), प्रो रंजीत भगत, रमेश परम्मानन्द, मोहन लाल हैप्पी, सत पाल भगत, विनय भगत, कुलदीप भगत, दर्शन डोगरा, संतोख भगत, डॉ ध्यान सिंह भगत और भक्ष्य नंद भारती (राजस्थान). अंत में अलग-अलग राज्यों से आए मेघ समाज के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए. (इस अवसर पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी तथापि यह नामों की ऊपर दी गई सूची जम्मू से प्रकाशित न्यूज़ पोर्टल  www.earlyindianews.com से ली गई है जिसका लिंक यहाँ है.)












31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थिान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)


08 July 2019

Your narrative and your theme - आपका कथ्य और आपकी कथा

कुछ जगह ‘मेघ-इतिहास Megh History’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. उसका आशय ‘मेघों का इतिहास’ रहा होगा ऐसा मैं मानता हूँ. ‘मेघ-इतिहास’ का दूसरा अर्थ ‘बड़ा इतिहास’ हो सकता है. यहाँ ‘आर्य-भक्त’ या ‘आर्यों का भक्त’ वाली प्रयुक्ति याद हो आती है. यह समास पद्धति का कमाल है. इन शब्दों के बारे में यह किसी वैयाकरणिक (ग्रामेरियन) का नेरेटिव है. इस बारे में आपके मन में जो चल रहा है यदि उसे आप लिख देते हैं तो वो आपका नेरेटिव होगा. शब्द का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके विभिन्न प्रयोगों की कथा में उसका अर्थ क्या-क्या रहा है. शब्द का वो यात्रा वृत्तांत या ‘कथा’ किसी भाषाविज्ञानी का ‘नेरेटिव’ है. इस बारे में हर व्यक्ति का नेरेटिव अलग हो सकता है. यह तो बात हुई दो-तीन शब्दों के ‘नेरेटिव’ की. इसके आगे अब दूसरी कथा है.

पंजाब में 'आप' पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी डॉ. शिवदयाल माली ने गढ़ा, जालंधर की आर्य-समाज में सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें अपनी बात रखने का मुझे भी मौका मिला. मेरा विषय था- ‘मेघों का पीछोकड़ (अतीत, इतिहास)’. इस विषय पर कहने के लिए काफी कुछ था लेकिन समय की पाबंदी थी, मैंने बात को सीमित रखा. ख़ासकर आर्य-समाज के साहित्य में मेघों के उल्लेख पर मैंने अपनी बात रखी.

मेघों में कहीं-कहीं एक अवधारणा बनी हुई है कि उनके इतिहास का उदय ‘आर्य-समाज’ के शुद्धिकरण आंदोलन के साथ होता है. इसकी वजह है. मेघों की शिक्षा का पहला प्रबंध ‘आर्य-समाज’ संस्था ने किया था जिसके साथ-साथ ‘आर्य-समाज’ ने उन्हें यह भी बताया-पढ़ाया कि मेघों का उद्धार ‘आर्य-समाज’ ने कैसे किया और उसके साथ कौन-सी सामाजिक और धार्मिक कड़ियां जुड़ती थीं. राजनीतिक कड़ियां तो थी ही नहीं और अगर थीं तो वे सवर्ण समाज से जुड़ी  थीं. आशय यह कि जो इतिहास मेघों को पढ़ाया गया वो उतना ही था जितना ‘आर्य-समाज’ ने अपने मिशन को गौरवान्वित करने के लिए लिखा और बताया. लेकिन दूसरी ओर ऐसे इतिहासकार भी हो चुके थे जिन्होंने मेघ (रेस) के ऐसे संदर्भ अपनी पुस्तकों में दिए थे जिनसे मेघों की उपस्थिति दो-अढाई हज़ार वर्ष पहले के इतिहास में नज़र आती थी. मेघों के बारे में आर्य-समाजियों का नेरेटिव अधिकतर ‘शुद्धीकरण’ की संकरी गली में आता-जाता रहा. उससे बाहर के मेघों की बात नहीं हुई. ‘सिंह सभा आंदोलन’ से जुड़ कर जो मेघ सिख बने ‘आर्य-समाज’ के नेरेटिव ने उनसे दूरी बनाए रखी.

‘आर्य-समाज’ द्वारा पढ़ाए गए इतिहास की परंपरा को बढ़ाते हुए मैंने प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा को देखा-सुना-पढ़ा है उनके अलावा कुछ अन्य बुजुर्ग भी इसी कथा के पक्षधर होंगे. इस बारे में मेरी रुचि रहेगी कि क्या उनमें से किसी ने कुछ लिखा भी है. सोत्रा जी ने यहां-वहां कुछ लिखा है. आजकल वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं.

मेघों के लोक-गायक रांझाराम के बारे में कहा जाता है कि वे ‘मेघों की कथा’ सुनाते थे और उस कथा को सिकंदर (Alexander The Great) से जोड़ते थे. कलाकार का अपना थीम होता है जिसे वो अपनी कथा में बताता है. रांझाराम क्या कथा कहते थे उसका कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. तो इस तान को यहीं तोड़ते हैं कि संभव है रांझाराम ने सिकंदर और पोरस (पुरु) की वे कथाएं जानी-सुनी हों जो हमें अन्य स्रोतों से अब मिली हैं. यहाँ जान लेना अच्छा होगा कि पोरस का पुरु के रूप में जो महाभारतीकरण और पौराणीकरण हुआ है वो एक अलग ही कथा है. किसी के लिए वो रोचक हो सकती है.

मेघों के बारे में एक कथा श्री आर.एल. गोत्रा जी की है जिसे उन्होंने दो शीर्षकों से लिखा है ‘Meghs of India’ और ‘Pre-historic Meghs’. इनमें वैदिक और ऐतिहासिक दोनों प्रकार के संदर्भ हैं. गोत्रा जी ने कई जगह स्पष्ट कर दिया है कि इतिहासिक संदर्भ अपनी पृष्ठभूमि के साथ अधिक उपयोगी होते हैं. पौराणिक संदर्भ बात को उलझा देते हैं ('पुराण' शब्द धोखेदार है. कुछ पुराण अंग्रेज़ों के शासन काल में लिखे गए. हो सकता है कुछ पुराण आज लिखे जा रहे हों. मतलब कि ज़रूरी नहीं कि पुराण बहुत पुराने हों). यदि अपने बारे में किसी ने खुद अपनी कही हो तो उसका अलग ही महत्व होता है. आपको और आपकी पृष्ठभूमि को आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. अपने बारे में अपना इमानदार लेखन आपका इतिवृत्त (इतिहास) होता है. आपके बारे में अन्य का लेखन उनकी आपके बारे में कम जानकारी के कारण पूर्वग्रह (prejudice) और पूर्वाग्रह (bias) से ग्रस्त और अधूरी समझ वाला हो सकता है. इस सब का परिणाम आपके बारे में एक ऐसी छवि का निर्माण हो सकता है जो आपका सत्य ना हो.

पिछले दिनों कर्नल तिलकराज जी ने बताया था कि भार्गव कैंप (जिसे मैं कभी-कभी अनधिकारिक रूप से ‘मेघनगर’ कह देता हूं) वहां रहने वाले लोगों के जीवन के बारे में किसी ने पुस्तक (संभवतः थीसिस) लिखी है. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने जो थोड़ा-सा बताया (मुझे उनके थोड़ा बताने से बहुत शिकायत है) उसका सार यह था कि इस पुस्तक में मेघों को बहुत ‘सहनशील’ बताया गया है. मैंने ख़ुद कहीं लिखा है कि ‘मेघ समाज कमोबेश एक संतुष्ट समाज है’. मेरे वैसा कहने के पीछे मेघ समाज के व्यापक जीवन के कई संदर्भ समेटने की एक कोशिश थी अन्यथा पूरा समाज संतुष्ट कैसे हो सकता है. लेकिन ‘सहनशील’ शब्द से मेरा माथा ठनका. इसे ठनकने की आदत है. कोई पूरा समुदाय ‘सहनशील’ कैसे हो सकता है? यह किसकी कथा है? और ऐसी क्यों है? मेघ समाज क्या समाज के रूप में कभी प्रतिक्रिया नहीं करता? क्या मेघों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि उनकी सहनशीलता (बरदाश्त) की ताकत जवाब दे गई हो? इन सवालों के जवाब उक्त पुस्तक को पढ़ने के बाद ही मिल सकते हैं. कर्नल तिलकराज द्वारा दिए संकेत से यह तो स्पष्ट है कि एक नई कथा का जन्म हुआ है.

‘सहनशील’ शब्द बहुत मुलायम, नाज़ुक और सौम्य अभिव्यक्ति है जिसमें किसी की शिक्षा, ग़रीबी, मूलभूत संसाधनों की कमी आदि से उठे क्रंदन को छिपाया जा सकता है. फिर भी लिखने वाले की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए. लेकिन जो लिखा गया है उसका व्यापक अध्ययन करके अपना नेरेटिव बताया जाना चाहिए.

कबीरपंथ के बैकड्रॉप में मेघों के बारे में डॉ. ध्यान सिंह का पीएचडी की डिग्री के लिए लिखा शोध-ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है. यह मेघों से संबंधित कई कथाओं को ख़ुद में समेटे हुए है. प्रत्यक्षतः यह सबसे पहले डॉ. सिंह का है लेकिन मुख्य रूप से डॉ. सेवा सिंह का है जो शोध के कार्य में ध्यान सिंह जी के गाईड थे. ज़रूरी नहीं कि इसमें जो जिस तरह से लिखा गया है वो डॉ. ध्यान सिंह का ही हो. इसमें सेवा सिंह जी का नेरेटिव शामिल है. ग़ौर से देखें तो शोधकर्ता और गाईड में यदि मतभेद हो तो अधिकतर मामलों में शोधकर्ता को गाईड के आगे नतमस्तक होना पड़ता है. ख़ैर. इस शोधग्रंथ में पौराणिक कथाओं, आर्य-समाज आंदोलन, सिंह सभा आंदोलन, कबीरपंथी आंदोलन आदि के नेरेटिव से काफ़ी कुछ शामिल किया गया है. शोधग्रंथ की पुस्तक-सूची अकसर बहुत लंबी होती है तो यह मान कर चलना चाहिए कि उसमें अनेक नेरेटिव शामिल किए गए हैं. लेकिन सबसे रुचिकर यह है कि मेघों पर किए गए शोध का शीर्षक ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ ही क्यों रखा गया. क्या मेघों की कथा का संबंध कबीरपंथ से है? है तो कितना है और कब से है? उसका एक स्पष्टीकरण तो इस तथ्य में मिल जाता है कि जब यह शोध हुआ (सन् 2008 में प्रस्तुत) तब कई स्थानों पर कुछ मेघों ने ख़ुद को जनगणना के आंकड़ों में ‘कबीरपंथी’ लिखवाया हुआ था. मेघ समाज के अपने कबीर के मंदिर थे और कबीर की पूजा का प्रचलन था. कहने का तात्पर्य यह कि ‘कबीरपंथ’ नाम का सामाजिक आंदोलन मेघ समाज में दस्तक दे चुका था. उसके रूप-स्वरूप पर अलग से बहस हो सकती है. साथ ही एक बात का नोटिस लिया जाना चाहिए कि मेघ समाज के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की कथा को छोड़ दें तो मेघों के जीवन और व्यवसाय में हुई उन्नति और नए व्यवसायों में उनकी कुशलता और प्रोफेशनल स्किल के बारे में दर्ज की गई पहली सकारात्मक टिप्पणियाँ भी डॉ. सिंह के शोधग्रंथ में आई हैं. मेघों की लोक-परंपराओं का पहला लेखा-जोखा इसी शोधग्रंथ में मिलता है. इसके अलावा याद रहना चाहिए कि लेखक का कोई भी कार्य अंतिम नहीं होता. आशा करनी चाहिए कि आगे चल कर डॉ. ध्यान सिंह वो नरेटिव लिखेंगे जो वो ख़ुद लिखना चाहेंगे.

जागते रहिए. अपना नेरेटिव अपनी कथा ख़ुद, मतलब 'ख़ुद' लिखिए. अपना कथ्य (थीम) ख़ुद तय कीजिए और दर्ज कीजिए. भोजपुरी में जीने का आशीर्वाद यों दिया जाता है- "जिअजागऽ". जिओ और जागते हुए जिओ.
अपने बारे में बोलिए और लिखिए.



28 June 2019

इतिहास का नया नजरिया - A new point of history

सदियों से वैदिक पौराणिक इतिहास को चुनौतियां नहीं मिली, एक तरफा इतिहास लिखा जाता रहा, लेकिन शिक्षा के प्रचार-प्रसार को धन्यवाद देना पड़ेगा कि कई परंपरागत अवधारणाओं और स्थापनाओं को चुनौती देने के लिए कई विद्वानों ने सप्रमाण अपनी बात कही है जिसकी एक समृद्ध परंपरा इन दिनों दिखने लगी है. इसका एक सशक्त उदाहरण फार्वर्ड प्रेस में छपा एक आलेख है जिसमें डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सिंह के शोध के बारे में कुमार बिंदु का एक आलेख है जो पढ़ने लायक है. उसका लिंक नीचे दिया गया है. 

24 June 2019

Jat Dharma and Megh Dharma - जाटधर्म और मेघधर्म

जाट समुदाय में सक्रिय राजनीतिक संगठन ‘यूनियनिस्ट मिशन’ के अग्रणी श्री राकेश सांगवान से कई मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है. जाट समुदाय के लोग अपने आत्मविश्वासी स्वभाव के कारण पहचाने जाते हैं. जहाँ तक शिक्षा और जानकारी का सवाल है वे कुल मिला कर अभी तीसरी पीढ़ी तक आए हैं जो शिक्षित है. जाति व्यवस्था के आखिरी पायदानों पर खड़े अन्य समुदायों की तरह वे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में संघर्षरत हैं. हरयाणा जैसे राज्य में वे सत्ता का स्वाद चख कर उसे खो चुके हैं इसलिए उनमें अधिक बेचैनी है. उन्होंने जो खोया है वो बेशकीमती था. ख़ैर.
Rakesh Sangwan राकेश सांगवान
राकेश सांगवान जी ने पाखंड के खिलाफ काफी मुखर हो कर लिखा है जिसका विरोध उनके ही बीरदारी भाइयों ने उन्हें नास्तिक कह कर किया. संभवतः इसी वजह से राकेश जी ने मंशा जताई कि वे आने वाले साल में धन्ना भगत की जयंती पर सिख धर्म अपना लेंगे ताकि कोई उन्हें नास्तिक न कह सके. जाटों के लिए सिखी अनजानी चीज़ नहीं है. जाटों ने सिखी का जी-जान से निर्वाह किया है और वे ख़ुद भी सिखी की जान हैं. उनकी दलील है कि सिखी मीरी-पीरी और पाखंड रहित किरत पर आधारित है जिसे अध्यात्म कहा जाता है. उनकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में कई विचार कौंधने लगे जिसे कमेंट के तौर पर उन्हें भेजा है. उसी कमेंट को अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ :- “
आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई बातें याद हो आईं. खुशवंत सिंह ने कहीं कहा है कि सिखी का मतलब जाट ही है (उनके ओरिजिनल शब्द याद नहीं लेकिन अर्थ यही था.)
आपकी पोस्टों पर कई लोग आपको नास्तिक कहते रहे हैं. नास्तिक या तर्कशील होना कोई अवगुण या गाली नहीं है. जो लोग इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं वास्तव में वे धर्म की अवधारणा (कंसेप्ट) को लेकर भ्रम में है. आदमी धर्म की शरण में नहीं जाता बल्कि वो धर्म यानी किसी आचार-व्यवहार, गुण और विचार को ओढ़ता है. उस ओढ़ने को धर्म कह दिया जाता है. कोई बता रहा था कि ‘धर्म’ की अवधारणा ‘धम्म’ की अवधारणा से अलग है. फिर आपकी यह बात सही है कि धर्म-धर्म खेलना है तो धर्म पकड़ना ही पड़ेगा. एक घुंडी यह है कि यदि कोई कहता है कि वो किसी खास धर्म में जा रहा है तो प्रतिक्रिया बड़ी होती है. यदि वो कहता है कि मेरी गुरु नानक या गुरु गोविंद सिंह या खालसा पंथ में आस्था है तो प्रतिक्रिया की प्रकृति (narrative कह सकते हैं) बदल जाती है. आप की पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट करके जाटधर्म का उल्लेख किया है. एक सज्जन ने कहा है कि जाटधर्म, बौद्धधर्म और सिखधर्म में कोई अंतर नहीं है. सिखिज़्म के लिए ‘सिखी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो बहुत सटीक है. जीवन शैली के संदर्भ में मुझे सिखी और जाटिज़्म को एक समझने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब सरकारी फॉर्म में धर्म लिखने की बात आती है तो जाटधर्म या जाटिज़्म शब्द के सरकारी संदर्भ कहीं नहीं मिलते. जाहिर है कि जाटों के इतिहास में जाटधर्म ना तो परिभाषित है और ना स्थापित. उसे जैसे-तैसे परंपरागत हिंदू शब्द के अर्थ में फिट किया गया है. बुद्धिज्म के साथ भी यही हुआ लेकिन नवबौधों ने और सिखों ने अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने की प्रभावी कोशिशें की हैं जो जारी हैं. क्या दलित भी जाटधर्म में आते हैं? मेरा मानना है कि आते हैं क्योंकि इन सभी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बौधमत है. एक धर्म से दूसरे धर्म में ‘भागने’ का जहां तक सवाल है यह सवाल उन लोगों की सोच से पैदा होता है जिनके दिल में धर्म नाम की चीज का डर इतना बैठा दिया गया है कि ‘धर्म बदलने’ के नाम से ही उनकी धमनियों का चलता रक्त रुकने लगता है. बिना जाने कि धर्म डरने की नहीं बल्कि धारण करने की चीज है. यदि हम धर्म को प्रेत बना लेंगे तो वह पक्का पीछे पड़ेगा वरना धर्म का काम नहीं कि वो इंसान के पीछे पड़े बल्कि यह इंसान का काम है कि वो किसी इंसानी गुण का पीछा करे और उस धर्म को धारण कर ले. सिखी की विशेषता यह है कि वो स्थापित है - समाज में भी, धार्मिक क्षेत्र में भी और राजनीति में भी.” यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैंने इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया है. पहली बात यह कि कुछ मेघ सिखी में हैं. दूसरे, धर्म को लेकर मेघों की नई पीढ़ी में बेचैनी और उलझन है. तीसरे, पढ़ी-लिखी पीढ़ी परंपरागत धर्म पर कड़े सवाल ज़ोर से उठाने लगी है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर और अन्यथा भी ‘मेघ धर्म’ और ‘मेघ मानवता धर्म’ पर चर्चाएँ होती रही हैं. हो सकता है अन्य जातियों में भी अपने धर्म की पहचान करने की प्रवृत्ति हो. इन जानकारियों का मुझ पर असर हुआ है. इसलिए यह सब लिख डाला.

07 June 2019

Your Cultural Capital - आपकी सांस्कृतिक पूँजी


जून का पहला हफ्ता है. सुबह के पौने पाँच बजे हैं. पक्षियों की 'गुड मॉर्निंग' और 'हैलो-हाय' शुरू हो चुकी है और मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया हूँ. एक ग्रुप है जिसमें रात की 'गुड नाइट' से पहले मेघ-जन एक दूसरे को तल्ख़ी और ज़िम्मेदारी से पूछ रहे थे कि- "तुम बताओ, तुमने बिरादरी के लिए क्या किया." इस सवाल पर लंबी बातचीत आख़िर 'गुड नाइट' पर ही ख़त्म होनी थी, हो गई. रात को जो सवाल सो गया था उसका प्रभात भी होना था, हुआ. समाचार-पत्र जैसा सुप्रभात. दशकों पहले समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन आया करता था जिसमें खूबसूरत-सा एक राजनीतिक नारा होता था- "यह मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया, यह सोचो कि तुमने देश को क्या दिया है." नारे का महकता गुलाब सीधा दिल पर आ गिरता था और दिल से आवाज़ आती थी, "सच्ची यार, आदमी को सोचना तो येई चइये कि उसने देश को क्या दिया." बच्चों का और युवाओं का बहुत कुछ देने को दिल कर आता है लेकिन क्या दें इसकी समझ नहीं होती. बात एक वलवला बन कर दिल में रह जाती है. मोटा-मोटी हम जो कार्य करते हैं वो हम देश को देते हैं और हमें जो मिलता है वो देश से मिलता है. सिंपल. सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूँजी के क्षेत्र में यदि कोई बिरादरी गरीबी रेखा से कुछ ऊपर हो तो एक-दूसरे से कोई तीखे तेवर से नहीं पूछेगा कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया.' गरीबी रेखा से नीचे है तभी यह सवाल बनता है. तो...चलो जी वहाँ....वो...देख लेते हैं एक नेता ने कम्युनिटी सेंटर बनवा दिया, श्मशान घाट में बेंच बनवा दिए और शानदार वाशरूम भी, नेता ने एक सामाजिक संगठन खड़ा कर दिया, कबीर मंदिर बनवा दिए, सालाना शोभायात्राएँ निकाल दीं, वगैरा. लेकिन चुनाव में बिरादरी ने उसे जिताया नहीं, हराया भी नहीं बल्कि हरवा दिया. यह सांस्कृतिक और राजनीतिक पूँजी के अभाव की वजह से होता है. इसे वोटिंग वाले लोकतंत्र में किसी बिरादरी के वोटों के बिखराव यानि सियासी ग़रीबी के रूप में पहचाना जाता है. व्हाट्सएप ग्रुप में हो या वो सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गली-नुक्कड़ वाली चिल्लर बहस में हो, उसमें जब कोई पूछता है कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया' तो इसे झगड़ा नहीं बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए. यह एक-दूसरे को और ख़ुद को जानकारियाँ दे कर मज़बूत करने की कोशिश होती है. ढीले ढँग से इसे 'केंकड़ाना टाँग खिंचाई' कह देते हैं लेकिन यह शुरुआती संघर्ष है जो अलग-अलग तौर-तरीक़े से होता है और दिखता ज़रूर है. यहाँ तक कि चलते-चलते ताने मारने वाले एक तरह से आपको अपने भीतर से मिलती ताकत का स्रोत बनने लगते हैं. यदि आपने अपनी बिरादरी (बीरदारी) के लिए सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में कुछ भी संचय करने की दिशा में कार्य किया है तो पक्की बात है कि आपने देश के लिए कुछ किया है और देश को कुछ दिया है. चलिए 'पूँजी' के अर्थ जान लेते हैं. (आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसके बारे में दिल में एक डर-सा है. काश इसे सरल शब्दों में लिख सकता. परिभाषाओं के साथ अधिक छेड़-छाड़ नहीं हो सकती क्योंकि ये महीन धागे के अनुशासन में बुनी होती है.)

छात्र जीवन से ही परिभाषाओं के बोझिल शब्दों से डरता हूँ. लेकिन अब शब्दों की जमा पूँजी ने डर कम कर दिया है. लेकिन शब्दों की व्हेट लिफ़्टिंग आज भी करनी पड़ती है.😉

1. तो, सभ्याचारक पूँजी (cultural capital) की परिभाषा को समझते हुए चलना ज़रूरी है जिसे कुछ ऐसे समझाया गया है:- सभ्याचारक पूंजी में एक व्यक्ति की सामाजिक संपत्ति (तालीम, अक़्ल, बोल-वाणी और पोशाक का स्टाइल आदि) शामिल होते हैं जो एक स्तरीकृत (stratified) समाज में सामाजिक गतिशीलता (social mobility) को बढ़ावा देती है. (यानि आप उनकी मदद से समाज में अपना काम-काज आसानी से कर सकते हैं). (यह) सभ्याचारक पूँजी रिवाज़ों की एक अर्थव्यवस्था (विनिमय प्रणाली) के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में कार्य करती है, और इसमें बिना फ़र्क के सभी चीज़ें और प्रतीकात्मक सामान (symbolic goods) शामिल होते हैं, जिसे समाज विरल और प्राप्त करने लायक समझता है. विनिमय (एक्सचेंज) की एक प्रणाली के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में, सभ्याचारक पूंजी में एकत्रित सभ्याचारक ज्ञान शामिल होता है जो सामाजिक हैसियत (social status) और ताकत देता है. (यहाँ पूँजी को ज्ञान, गुण, अभिव्यक्ति, प्रभावोत्पादकता, प्रस्तुतीकरण आदि के रूप में भी देखें).☺

2. सियासी पूंजी राजनीतिक सिद्धांत में इस्तेमाल एक रूपक (metaphor) यानी रूपक है जो रिश्तों, विश्वास, सद्भावना, और राजनेताओं या पार्टियों और अन्य हितधारकों (stakeholders), जैसे घटकों के बीच प्रभाव के ज़रिए बनी ताक़त और संसाधनों के संचय की अवधारणा के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक पूंजी को एक प्रकार की मुद्रा के रूप में समझा जा सकता है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को जुटाने, नीति सुधार, या अन्य राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है. हालाँकि, पूंजी का शाब्दिक रूप नहीं है, लेकिन सियासी पूंजी को अक्सर एक तरह के ऋण, या एक संसाधन (resource) के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे बैंक किया जा सकता है (संभाल कर रखा जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है), खर्च या गलत तरीके से खर्च किया जा सकता है, निवेशित (invest) किया जा सकता है, खोया जा सकता है और बचा कर भी रखा जा सकता है.

कुछ विचारक प्रतिष्ठित (reputational) पूँजी और प्रतिनिधि (representative) राजनीतिक पूंजी में अंतर करते हैं. प्रतिष्ठित पूंजी एक राजनेता की विश्वसनीयता और दृढ़ता को संदर्भित करती है. इस तरह की पूँजी को निरंतर नीति पोज़िशनिंग करके और वैचारिक नज़रिए को बनाए रख कर संचित किया जा सकता है.

10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. राजनीतिक दलों के बंधुआ लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है वहाँ धर्म-शर्म किसी कोने में रखे रहते हैं और राजनीति में यह सही होता होगा. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज के दूसरे सदस्यों के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग सारे समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. वे अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



01 May 2019

History and common man - आम आदमी और इतिहास

हालाँकि इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना कुल मिला व्यक्ति और उसकी जाति के लिए एक अच्छी बात हो सकती है लेकिन तटस्थ सत्य से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए. ह्वेन सांग तटस्थ सत्य कहता है ऐसा सभी इतिहासकार मानते आए हैं. ऐसे ही कन्निंघम ने धरती खोद कर भारत के प्राचीन इतिहास के कई पक्षों को सप्रमाण उजागर किया. उसकी तटस्थता पर कोई उँगली नहीं उठाई जा सकती. हाँ जो उंगलियाँ यूँ ही उठ जाती हैं उन्हें अपनी तटस्थता साबित करनी होगी.
आखिरकार पाठ्यक्रमों में पढ़ाना पड़ेगा कि बौधमत वो प्राचीनतम जीवन शैली (या धर्म) है जिसका प्रभाव पूरे विश्व में देखा गया है. जहाँ तक जातिवाद और जातियों का सवाल है इस बीच भारत में कई जातियाँ बनी-मिटीं और आज भी बन-मिट रही हैं. इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना उनका अधिकार है. एक तरफ़ा और चयनित इतिहास फ़िज़ूल है और उसमें लोगों की रुचि कम ही रहेगी. समष्टिपरक सत्य का कोई विकल्प इतिहास लेखन में भी नहीं है.


25 April 2019

From Hind to Hindu - हिंद से हिंदू तक

कहते है कि ह्यूनसांग ने ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया था और कि ‘हिंदू’ शब्द का पहला प्रयोग राधाकांतदेव बहादुर रचित 'शब्दकल्पद्रुम' नामक शब्दकोश में हुआ था जो संस्कृत का काफी पुराना शब्दकोश है हालाँकि इसका प्रकाशन 19वीं शताब्दी में हुआ था. संभव है संस्कृत के अस्तित्व में आने से पहले भारत में उपलब्ध शब्द 'हिंद' (जैसे- हिंदकुश) को संस्कृत में अनुवाद करके 'हिंदू' बना दिया गया हो या किसी उच्चारण प्रवृत्ति के चलते वो ‘हिंदू’ बन गया हो. हिंदकुश शब्द अशोक के समय से पहले का है. यह भाषाविज्ञानियों की स्थापना है.

अपनी स्थापना के साथ ही ‘हिंदू महासभा’ ने ‘हिंदू’ शब्द को विस्तारपूर्वक नए अर्थ के साथ शस्त्र और शास्त्र की तरह उठाया. 1915 से पहले भी लोग ‘हिंदू’ शब्द को जानते थे लेकिन एक क्षेत्र विशेष के लोगों के अर्थ में. कबीर ने भी लिखा - ".....हिंदुअन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई." ये दोनों शब्द क्षेत्र का संकेत देते हैं।

इसमें एक दूसरा फैक्टर भी है. द्रवड़ियन भाषाओं में आखिरी वर्ण के साथ अंत में उ की मात्रा का उच्चारण होता है जिसकी वजह से वे 'बुद्ध' को 'बुद्धु' उच्चारित करते हैं. तीसरे, जिसे निकृष्ट पुरुष की तरह संबोधित करना हो उसके नाम के पीछे ‘उ’ या ‘ऊ’ की मात्रा उच्चारित करने की बुरी ही सही लेकिन एक परंपरा है, उदाहरण के लिए रामू, परसु, मंगलु या मंगलू आदि. यह किसी व्यक्ति को क्षुद्र या पतित करार देने की युक्ति है.

‘हिंदू’ शब्द को काला, चोर, ठग आदि के अर्थ में भी जाना जाता रहा है. इस नज़रिए से देखें तो ‘हिंदू महासभा’ और उसके संगठनों ने ‘हिंदू’ शब्द को व्यापक अर्थ दे कर उसे ग्राह्य बनाने का प्रयास किया और उसे धर्म की सीमा तक खींच ले गए. इस तरह उन्होंने मनुवादी व्यवस्था की व्यापक सीमाओं को स्थापित करने का प्रबंधन किया और अब तक कर रहे हैं. लेकिन उनकी  व्यवस्था से आया जातिवाद उनके गले की फांस बनता जा रहा है. उनके ‘हिंदू’ शब्द को जातिवाद से अलग करना कठिन कार्य है.

‘हिंदू’ शब्द के बारे में यदि ऊपर बताई सरल बात पकड़ में न आए तो यह आलेख आप देख सकते हैं.

हिंदू शब्द एक मकड़जाल है

16 April 2019

Meghvahana and Megh - मेघवाहन और मेघ


राजतरंगिणी और मेघ लिखते समय और इतिहास का दर्शन समझते हुए कल्हण की राजतरंगिणी के बारे में कुछ समझा भी और कुछ सवाल भी मन में उठे थे. ख़ैर !

जो मेघजनमेघवाहनका नाम सुन करराजतरंगिणीमें अपने इतिहास की प्यास बुझाने आते रहे थे वे ख़ुद को रेगिस्तान में महसूस करते थे. वही अनुभव मेरा भी है. इस पुस्तक मेंमेघवाहनके बारे में जो लिखा गया है उसका सार यह है कि मेघवाहन का पिता उसी युधिष्ठिर का पड़पोता (great grandson) था जिसे गांधार के राजा गोपादित्य ने शरण दी थी. वो सन 25 ईस्वी में उठान पर था और उसने 34 वर्ष तक राज किया. (यह इस शर्त पर यहाँ लिख दिया है कि कोई मुझ से युधिष्ठिर की जन्म-मरण तिथि न पूछे) उसका विवाह असम की एक वैष्णव राजकुमारी अमृतप्रभा से हुआ था, जब कश्मीर का राजा संधिमति अनिच्छुक (unwilling king) साबित हुआ तो उसके कश्मीरी मंत्री (कश्मीरी ब्राह्मण) मेघवाहन को (संभवतः अफ़गानिस्तान से) कश्मीर ले आए थे. मेघवाहन ने पशुवध पर प्रतिबंध लगा दिया, उसने बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) की स्थापना की, उसकी रानियों ने बौद्ध विहार और मठ बनवाए, जिससे उसके बौध राजा होने का संकेत मिलता है. मेघवाहन श्रेष्ठ राजा था, उसने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया था.

मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि राजतरंगिणी के मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. वैसे भी मेघवाहन को पौराणिक कथाओं के साथ हैशटैग किया गया है जो सोद्देश्य किया गया है, ज़ाहिरा तौर पर यह इतिहास में बहुत कन्फ्यूज़न पैदा करता है. इस बारे में विकिपीडिया पर भरोसा करना अपनी ईमानदारी पर शक करने से भी बुरा है.

बेहतर है कि राजतरंगिणी के 'मेघवाहन' को समय की धारा में बह जाने दीजिए. वैसे आपकी कोशिशों को रोकने की मेरी मंशा नहीं है.


13 April 2019

The Philosophy of History - इतिहास का दर्शन

कहा जाता है कि पहले धर्म विकसित होता है और दर्शन यानी फ़लसफ़ा बाद में. यही बात इतिहास के दर्शन पर भी लागू होती है. पहले इतिहास अस्तित्व में आता है और बाद में उसकी विशेषताओं या दोषों के आधार पर उसका फ़लसफ़ा लिखा जाता है. साधारण शब्दों में कहें तो इतिहासकारों द्वारा लिखी गई सामग्री को समझने के लिए जो तरीक़े विकसित किए जाते हैं उनको ‘इतिहास का दर्शन’ कह दिया जाता है.

इतिहास का अर्थ है वे घटनाएं और कार्य जो इंसानी ज़ात के अतीत को (कालक्रमानुसार भी) बताते हैं. इसके दो भाग होते हैं -  पहला - ‘वास्तव में क्या हुआ’ उसका विश्लेषण, और दूसरा - जो हुआ उसका अध्ययन, विवरण और व्याख्या. इसकी बुनियाद पुरात्त्व संबंधी प्रमाण, पुस्तकीय दस्तावेज़, प्रत्यक्ष स्थिति और अनुमान पर खड़ी होती है.

आज के अर्थ में जिसे इतिहास कहते हैं वैसा इतिहास लिखने की परंपरा भारत में नहीं थी. पहली ऐतिहासिक संदर्भों वाली कल्हणकृत पुस्तक राजतरंगिणी को माना जाता है जिसे बाहरवीं शताब्दी की रचना कहा गया है. इसे भारत में इतिहास लेखन का पाषाणयुग कहा जा सकता है. इसकी अपनी सीमाएँ थीं. इसकी प्रामाणिकता के बारे में आप एक हद तक ही आश्वस्त हो सकते हैं. इसमें पौराणिक संदर्भ बड़ी मात्रा में हैं. कहने का तात्पर्य यह कि 2री से 4थी शताब्दी के बीच संस्कृत में जो साहित्य रचा गया उसे प्रत्यक्ष के साथ गड्डमड्ड करके एक अलग तरह का कथात्मक रूप देने की कोशिश की गई जिसे दुनिया में इतिहास लेखन की मिथ पद्धति के तौर पर ही जाना जाता है.
दूसरा समय वो था जब किसी समय किसी क्षेत्र में पैदा हुए विजेता को ही इतिहास लिखने या लिखवाने का राजकीय या धार्मिक अधिकार था. 'राजतरंगिणी' के बाद भी इस सिलसिले में मिथ (पौराणिक कथाओं) में इतिहास पिरोने की परंपरा जारी रही. यहाँ तक कि कई बार उन्हें आंशिक इतिहास कहना भी कठिन हो जाता है, हालाँकि उनमें ऐतिहासिक संकेत होते हैं या हो सकते हैं. उनमें विजेता वर्ग की कबीलाई कथाएं, परंपराएं और व्यवहार (संस्कृति, सभ्यता) शामिल रहता है. इतिहास लेखन की इस पद्धति में इंसान की प्राकृतिक गरिमा एक संयोग का विषय बन कर रह जाती है. उससे यह जानना कठिन हो जाता है कि तर्कसंगत क्या है और नैतिक रूप से स्वीकार्य क्या है.

18 वीं शताब्दी में 'इतिहास का दर्शन' एक जबरदस्त परिवर्तन से गुज़रा. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ ही ईश्वरीय और धर्म शास्त्रीय नज़रिए को बहुत बड़े स्तर पर चुनौती मिली. इसके साथ ही इतिहास में मिश्रित मिथ और उनकी लेखन शैली पर प्रश्नचिह्नों की बौछार हो गई और वे गलने लगे. अब इतिहास को लेकर एक नया नज़रिया और दर्शन विकसित हो रहा है :-  

“इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है और जो लिखा गया है बल्कि इतिहास वो भी है जिसे हमारे पुरखों ने सहा है और जो लिखा नहीं गया है.”

यानि जो इतिहास लिखा नहीं गया वो अस्तित्व में है. यह दर्शन एक नए इतिहास का निर्माण कर चुका है  जिसका दर्शन बाद में पुनः लिखा जाएगा.

27 March 2019

Some References from Ad-Dharmi Movement - आदधर्मी आंदोलन के कुछ संदर्भ

मार्क योरगन्समायर (Mark Juergensmeyer) एक अमेरिकी स्कालर हैं जो भारत में एक  अध्ययनात्मक दौरे पर आए थे और बाद में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - Religious Rebels in the Punjab - The Social Vision of Untouchables. हालांकि पंजाब में 'मेघ' एक छोटा समुदाय है लेकिन इस पुस्तक में उनका उल्लेख पर्याप्त रूप से किया गया है. इस पुस्तक को अजंता प्रकाशन, दिल्ली ने 1988 में छापा था. योरगन्समायर Theology (धर्मशास्त्र, ईश्वर मीमांसा) के विशेष जानकार हैं.

उक्त पुस्तक के पृष्ठ 27 पर इस बात का उल्लेख किया गया है कि शुद्धिकरण (जो एक विकसित और कार्यकुशल प्रक्रिया थी) के ज़रिए इस्लाम और ईसाइयत के दायरे में चले गए निम्न जातियों के लोगों को हिंदू स्वीकार्यता में लौटाना था. यह कार्य 1919 में किया गया था. वर्ष 1910 तक सियालकोट क्षेत्र के 36000 से अधिक लोग, जो अनुसूचित जातियों में तुलनात्मक नज़रिए से ऊंचा स्टेटस रखते थे, वे आर्यसमाजी हो गए थे. जाहिर है कि उस समय के युवा मेघ आर्यसमाज और उससे संबंधित संस्थाओं के संपर्क में आए और उनसे जुड़ गए. उन संस्थाओं में आर्यसमाज स्कूल और डीएवी कॉलेज शामिल थे. इस व्यवस्था ने शिक्षित अनुसूचित जातियों के युवाओं को एक नया रूप-रंग दिया. इसके पीछे यह भी मंशा रही कि वे आर्य समाज के  हक में खड़े रहेंगे. यह प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि जब शुद्धीकरण के नाम पर कुछ निम्न जाति के सिखों के केश सार्वजनिक रूप से काटे गए तो सिखों में ऐसे शुद्धीकरण के प्रति वितृष्णा जाग गई. 

पृष्ठ 214 पर उल्लेख है कि महाशों को भी वे आर्य समाज में लाने में सफल हुए. उन महाशों में से कईयों ने दावा किया कि वे इससे पहले मेघ ही थे जो अछूत जातियों में चमारों और अन्य के मुकाबले कुछ ऊंचा स्टेटस रखते थे.

इस पुस्तक के पृष्ठ 225 पर 1947 के भारत विभाजन के बारे में मार्क ने बहुत ही बढ़िया और सटीक टिप्पणी दी है जिसमें वे लिखते हैं - “चमार समुदाय के अतिरिक्त स्टेटस में तनिक ऊंची कुछ अन्य जातियों को भी अपने घर-बार छोड़कर खींची गई सीमारेखा के पूर्व में आना ज़रूरी लगा. जो कोई पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके में रहते थे उनकी पहचान हिंदुइज्म या सिखइज़्म के साथ इस तरह जुड़ी थी कि उन्हें भी पूर्व में आना पड़ा और इसके उलट जुलाहों और मोचियों को भारतीय पंजाब से उल्टी दिशा (पाकिस्तान) में जाना पड़ा.  उदाहरण के लिए अल्लाहपिंड गांव जोकि विभाजन रेखा के ज़रा पूर्व में था वहां कोई मुस्लिम नहीं रहता है. हालांकि सच्चाई यह है कि उनके पास ज़मीन थी और गांव का नाम ही 'अल्लाहपिंड' यानी 'अल्लाह का गांव' था. उनकी जगह पश्चिमी पंजाब के जाट सिख और निम्न जातियों के मेघ आ गए जो हिंदुओं में ‘कन्वर्ट’ बन गए थे.” 

(इस पैराग्राफ में हिंदू होने, हिंदू ना होने या हिंदू शब्द की अबूझ व्याख्या के साथ-साथ उसके संदर्भगत अर्थ से निकली बेघर होने की मर्मांतक पीड़ा छुपी हुई है. शुद्धिकृत लोगों के लिए ‘कन्वर्ट’ शब्द का प्रयोग एक अलग तरह का दर्द देता है.)

पृष्ठ 266 पर ‘दलित संघर्ष समिति’ की पृष्ठभूमि के साथ मार्क ने समिति के अधिकारियों और प्रायोजकों की लंबी सूची में जालंधर की उन तीन जातियों (मेघ, चमार, चुहड़ा) का मुख्य रूप से उल्लेख किया है जो इस समिति में थे. इसी संदर्भ में उन्होंने कुछ व्यक्तियों के नाम भी प्रधानता के साथ लिखे हैं जिनमें श्री सतपाल महे जिनका आदधर्म के साथ पारिवारिक संबंध रहा. उनके संबंधियों में श्री सुंदर दास रहे. उनके एक कज़िन मनोहर लाल महे का भी नाम विशेष रूप से लिया गया है जो बूटा मंडी के रहने वाले थे. (मेघ समुदाय के कौन-कौन से प्रतिष्ठित व्यक्ति इस समिति में रहे उनके नामों की जानकारी की दरकार है. क्या यह समिति आज भी सक्रिय है. उनके सक्रिय समुदायों में कौन-कौन से समुदाय हैं?)

पृष्ठ 225 पर उठाए गए महीन सवाल का जवाब पृष्ठ 298 पर खुलकर सामने आ गया है. वहां लिखा गया है कि आर्यसमाज ने कई संगठन स्थापित किए जो उपदेशात्मक कार्य करते थे और उन्होंने कई समितियां बनाईं और रीकन्वर्शन (शुद्धि) का सारा आंदोलन शुरू किया. उन्होंने अछूतों का अभिलोपन (obliterate) करने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने यह कहकर कि छुआछूत समाप्त हो चुकी है और कोई भेदभाव नहीं है, हजारों अछूतों को लुभा कर शुद्धीकरण के जाल में फंसा लिया. बेचारा अछूत फिर से हिंदू आर्यों के द्वारा फांस लिया गया जैसे कोई हाथी के दांतों में उलझ जाता है. वास्तविकता यही थी कि हिंदू आर्य अभी भी मनु के अनुयाई थे जिसमें बहुत भेदभाव था. अछूत जान गए थे कि हिंदू आर्यों ने उन्हें अपने जाल में फंसा लिया है इसलिए वो अब अपने संगठन बनाना चाहते थे. उन्होंने खुद अपने कल्याण के लिए रुचि लेना शुरू किया. वे ऊंची जाति के हिंदुओं का विश्वास नहीं करते थे. संगठन खड़े किए गए, समितियां बनाई गई और उन्होंने अपने गुरुओं का चुनाव भी कर लिया.

सन 1925 के शुरू में एक समिति बनाई गई थी जिसका नाम रखा गया था ‘आदधर्म’. ऋषि वाल्मीकि, रविदास, कबीर और नामदेव के नामों के तहत इसकी स्थापना की गई. पहली बैठक मंगू राम मुग्गोवालिया की अध्यक्षता में 11 से 12 जून 1926 को गांव मुग्गोवाल, थाना माहलपुर, तहसील गढ़शंकर, जिला होशियारपुर में की गई. इसमें सभी अछूत जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया चुहड़ा, चमार, रविदासी, सांसी, जुलाहा, मेघ, कबीरपंथी, महाशा और कई अन्य जातियों के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया. अछूतों के अलावा इसमें अन्य सम्मानित लोगों ने भी हिस्सा लिया उनमें ईसाई, सिख, मुस्लिम, आर्यसमाजी और सनातनी भी थे. इस समिति का विरोध भी हुआ. लेकिन समिति को चलाए  रखने के पक्ष में ज़रदस्त समर्थन मिला और वो सशक्त होती चली गई. इसका मुख्यालय जालंधर में बनाया गया और इसका पूरा नाम रखा गया ‘आदधर्म मंडल ऑफ पंजाब, जालंधर सिटी’. (इस आदधर्म आंदोलन के साथ एडवोकेट हंसराज भगत जुड़े थे इसका उल्लेख हमें मिल जाता है. उनके अतिरिक्त और भी मेघ यदि इससे जुड़े थे तो उसकी जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.)

‘दलित संघर्ष समिति’ के संदर्भ में कुछ बातें कहने लायक हैं. उक्त समिति का मुख्यालय जालंधर में ही रहा है जहां मेघों की बहुत बड़ी न सही लेकिन काफी संख्या है. अब यह बात देखने लायक है कि इस बीच मेघों और अन्य स्थानीय अनुसूचित जातियों जैसे रविदासी, रामदासी समाज में परस्पर संबंध बढ़े हैं यानि उनमें शादियाँ होती हैं. लेकिन मेघ समुदाय के कुछ लोग जब अपनी श्रेष्ठता की हाँकते हैं तो उसे अन्य समुदायों के साथ राजनीतिक संबंध न जोड़ने तक खींच कर ले जाते हैं.  यह घातक है क्योंकि पंजाब में मेघों की अपनी जनसंख्या बहुत कम है. वे अन्य समुदायों के साथ मिलकर ही अपनी राजनीतिक शक्ति का गठन कर सकते हैं. जालंधर में देखा गया है कि मेघ समुदाय के कुछ लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और वे रविदासी या रामदासी समुदाय के नेताओं के साथ सहयोग करते हैं. मेरा मानना है कि यह सही रास्ता है और आगे चलकर इसी से सकारात्मक नतीजे निकलेंगे. जरूरी नहीं कि राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ही रहे. पार्टी बदल भी जाए तब भी ऐसे साथ को और गठबंधन को निभाना हितकारी है.

अंत में एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं कि मुझे 'रिलिजियस रिबेल्स Religious Rebels'  या 'धार्मिक विद्रोही' शब्द सही नहीं लगता. एक समय था जब राजाओं, महाराजाओं या सामंतों की व्यवस्था के प्रति विरोध करने वाले को विद्रोही या द्रोही कह दिया जाता था. अब वो समय नहीं है. अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां बहुमत ही व्यवस्था का नियामक होता है. व्यवहारिक रूप से भले ही आज अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी उस व्यवस्था का नियमन (रेग्युलेशन) ना कर पाते हों लेकिन बँटे होने के बावजूद उनकी सभ्यातामूलक जीवन शैली एक है और अनेक अवसरों पर वे आपस में जुड़ा महसूस करते हैं. उक्त जीवन शैली वाले लोग जब बहुसंख्यक हैं और धर्म के प्रति उनकी अवधारणाएँ लगभग एक समान हैं तो उन्हें किसी अन्य धर्म के प्रति 'विद्रोही' कैसे कहा जा सकता है.

कुछ हिंदी साहित्यकारों ने कबीर को विद्रोही व्यक्तित्व कहा था. उनकी ही विचारधारा के लोग कबीर को छिपा हुआ बौध भी कह गए क्योंकि कबीर का संबंध सिद्ध और नाथपंथी साधुओं से रहा जो बौधमत की परंपरा से ही निकली धाराएँ थीं. कबीर को ध्यान से पढ़ें तो वे तर्कवादी (Rationalist) ठहरते हैं. तर्क करने वाले को ढीली भाषा में नास्तिक कह दिया जाता है. अब 'तर्क' करने का अर्थ 'विद्रोह' भी किया जाए तो उसे स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आदधर्म कोई विद्रोह नहीं है बल्कि यह बहुजनों का अपने मूल के प्रति अपनी व्यापक आस्था को बेहतर तरीके से संगठित करने का प्रयास था. विद्रोही तो वो समूह थे जो आदधर्म आंदोलन का विरोध कर रहे थे.