18 November 2019

Caste name passing through history - इतिहास से गुज़रता जाति नाम


इंसानी स्वभाव है कि वो जब चीज़ों का अध्ययन करता है तो सहूलियत के लिए उसे हिस्सों में बांट लेता है. जातियों के विभाजन के मुख्य आधार कई हैं जैसे नाम, रूप, रंग, व्यसाय और उससे जुड़ी वस्तुएँ, ध्वनियाँ, भौगोलिक स्थिति, आसपास उपलब्ध चीज़ें, जीव, पेड़, नदी, पहाड़, सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन, या नाम देने वाले का मनोभाव. अपने कबीले और अन्य मानव समूहों की पहचान के लिए अमूमन इन्हीं आधारों पर उनके अलग-अलग नाम रख लिए जाते हैं.

आर.एल. गोत्रा जी ने मेघों के विभिन्न नामों या उनके अन्य प्रचलित नामों की सूची अपने आलेख Meghs of India में दी थी जिसमें ये नाम शामिल किए गए थे:- मद्र, मेघ, मेद, मेदे, भगत, जुलाहा, कबीरपंथी, कसबी, मेध, मेधो, मेगल, मेगला, मींह्ग, मेन, मेंग, मेंह्गवाल, मेथा, मेघोवाल, पंगवाल, पाओली, भाकरी आदि. ये नाम मेघों के साथ किसी न किसी रूप में जुड़े हैं. इतने अलग नामों की पृष्ठभूमि में भौगोलिक, धार्मिक, भाषा-बोली आदि कारण स्पष्ट देखे जा सकते हैं.

डॉ. नवल वियोगी, ताराराम जी और आर.एल गोत्रा जी के दिए संदर्भों के साथ पिछले आलेख मेघ और नाग वंश में चर्चा की गई थी कि प्राचीन काल से ही नाग वंश के अतर्गत आने वाली जातियों और उनके नाम-उपनाम आदि में भेद होता रहा है. एक सूत्र मेघऔरअहि (नाग) मेघशब्द में है. दूसरा सूत्र है महार, मदर (मद्र अथवा मेघों का अन्य नाम), महरा, सलोतरी (साल्व गोत्री जिनका संबंध मद्रों से था) और तक्षक या टाक जनजातियों से जन्मी महार, मराठा, कुर्मी आदि जातियों के साथ-साथ मेघ (कोली). तीसरा सूत्र है महाभारत में उल्लिखित कुनिंद या कुणिंद.

एक अन्य सूत्र गौतम बुद्ध के वंशवृक्ष के हवाले से मिलता है जिसका उल्लेख डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने किया है. वे बताते हैं कि गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य वंश में हुआ. शाक्य यानि सागबेरिया या सागबरिया. बुद्ध का ससुराल कोलिय वंश में था यानि कोल, कोली, कील, कोरी, कुरी,कीर, कोइरी, किरार, कुर्मी. बुद्ध की पत्नी गोपा यानि गोप, गोआर, ग्वाल, गड़ेरी.

अब इतने सूत्र मिलने के बाद नागवंश को देखें तो सारा भारत नागमय दिखता है. एक और बात कि इतिहास में पीछे जाएँ तो जातियों की संख्या कम होती जाती है. यानि समय-समय पर जातियों में से जातियाँ पैदा हुईं और उनकी गिनती बढ़ी. अंततः हर जाति अपनी अलग पहचान के साथ ख़ुद को देखने की आदी हो गई और ख़ुद से अलग हुई जाति (अपने टुकड़े) को दूर होते देखती रही, यहाँ तक कि कालांतर में उनकी परस्पर पहचान धुँधली हो गई, बहुत धुँधली.

जातियों और गोत्रों के पुराने नामों का अध्ययन करें तो तार आपस में जुड़ते नज़र आते हैं. इस पोस्ट का प्रयोजन यह कहना है कि भारत में नागवंश कण-कण में व्याप्त है. वो लगभग सारे भारत में बसी शिव (द्रविड़ संस्कृति के सिवन, Sivan) की उस छवि जैसा है जो पौराणिक हो चुकी है और जिसके गले में नाग स्वयं आभूषण रूप में सुशोभित हैं.

13 November 2019

Megh and Naag Vansh - मेघ और नागवंश

मेघों को मेघऋषि से जोड़ने वाली बात मेघ समाजों की लोकस्मृति में रही है.  श्री आर.एल. गोत्रा ने अपने आलेख Meghs of India में ऋग्वैदिक कथाओं का अध्ययन करके वृत्र या प्रथम मेघ को एक ही पात्र पाया है. लेकिन वैदिक कथा के आधार पर उस पात्र के जीवन-काल का निर्णय नहीं किया जा सकता. इसलिए ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से वो पात्र सवालों से सर्वथा मुक्त नहीं है. कथा में वृत्र, मेघऋषि या प्रथम मेघ को अहिमेघ (नागमेघ) भी कहा गया है. संभव है ऐसा शत्रुता भाव के कारण कहा गया हो या उसके वंश (नाग वंश) के संदर्भ में उसे अहि (नाग) कहा गया हो.

Dr. Naval Viyogi, D.Litt.
आजकल डॉ. नवल वियोगीD. Litt in History and Culture from the Round Table University, Erazona, U.S.A. की पुस्तक “प्राचीन भारत के शासक नाग, उनकी उत्पत्ति और इतिहास” पढ़ रहा हूँ. वे Director, Indian National Historical Reserch Council (National Award Winner in Research Work, 1986) रह चुके हैं. उक्त पुस्तक के पृष्ठ 141 पर कुछ कड़ियों को डॉ. नवल ने जोड़ा है जो मेरे जैसे पाठक के लिए चौंकाने वाला रहा. उन्होंने बताया है कि नागवंशियों से अनेक जातियाँ निकली हैं जिन्हें आदिवासी होने के कारण चौथे वर्ण में रखा गया. इन जातियों में डॉ. नवल ने अन्य जातियों के साथ-साथ मेघ जाति को भी रखा है. टाक क्षत्रिय शासकों के गोत्रों का उल्लेख करते हुए वे उनके मालव और मद्र गोत्रों का उल्लेख करते हैं. उनका मानना है कि टाक वंश में इन गोत्रों का नाम होना इस बात का प्रमाण है कि ये शाखाएँ ऐतिहासिक सत्य हैं. इनका प्रसार आसाम की नाग जातियों तक है. इसके अलावा इनके गोत्रों की सूची में महार, मदर (मद्र अथवा मेघों का अन्य नाम), महरा, सलोतरी (साल्व गोत्री जिनका संबंध मद्रों से था) वगैरा को उन्होंने उस सूची में रखा है.

अब मद्र, मेघ, मेद, मेदे, ये कैसे जुड़े हैं उसकी व्याख्या इस आलेख में मिल जाती है जो ताराराम जी ने लिखा है. ताराराम जी 'मेघवंश - इतिहास और संस्कृति' पुस्तक के लेखक हैं. इस जानकारी के आधार पर इतना तो कहा जा सकता है कि मेघ वंश और नाग वंश संभवतः एक ही वंश के दो नाम रहे होंगे जैसा कि मेघ और अहिमेघ नामों से प्रकट होता है, या फिर वे दोनों वंश अतीत में निकट संबंधी रहे हैं. डॉ. नवल ने अपनी उक्त पुस्तक में जो जानकारी दी है वो पठनीय है. सुझाव यह है कि रुचि रखने वाले इसे खरीद कर अवश्य पढ़ें.

डॉ. नवल वियोगी नागवंश का इतिहास खोजते हुए महाभारत की कथाओं की उपेक्षा नहीं करते चाहे उनमें पेश की गई तस्वीर धुँधली ही क्यों न हो. उनका मत है कि नाग वंशी अनार्य लोग थे जिनकी उत्पत्ति कश्यप ऋषि से हुई होगी. ये नाग लोग मूल रूप में नाग पूजक थे और नाग कहलाए. नाग पूजा कहाँ से चल कर कहाँ तक पहुँची उसका उल्लेख 
पर्याप्त संदर्भों के साथ इसमें कर दिया गया है. नाग वंशी भारत में कहाँ-कहाँ बसे हैं उसका वर्णन भी इस पुस्तक में है.

पुस्तक की भूमिका में डॉ. नवल लिखते हैं कि तक्षक या टाक जनजातियों से अनेक जातियों का जन्म हुआ है जिनमें कई अन्य जातियों के अतिरिक्त महार, मराठा, कुर्मी आदि जातियों के साथ-साथ मेघ (कोली) भी हैॆं. बुद्ध के जीवन काल (567 से 487 ई.पू) में मद्र लोग बुनकर थे. इसी काल के दौरान टका (तक्षक यानि नागवंशी) लोगों का टका, मेघ या मद्र नाम से विभाजन हो चुका था. कन्निंघम के हवाले से बताया गया है कि जम्मू में दक्षिण के पहाड़ी इलाके में बसी ये जातियाँ पूर्व काल में शासक जातियाँ रही होंगी. उनका ऐसा कथन इस तथ्य को समाहित करते हुए है कि ये जातियाँ श्रम संस्कृति की वाहक थीं.

यौधेयों के साथ संबंध को लेकर डॉ. नवल ने यह जानकारी दी है कि कुषानों को भारत की सीमाओं से जब बाहर निकाला गया तब यौधेयों को कुनिंदाओं ने बहुमूल्य सहयोग दिया. इन कुनिंदाओं का सतलुज और ब्यास के बीच के ऊपरी क्षेत्र पर अधिकार था. बनावट और सजावट के नज़रिए से उनके सिक्के उसी काल के यौधेयों के सिक्कों जैसे ही थे जो दर्शाता है कि यौधेयों के साथ उनके रिश्ते गहरे थे. ये कुनिंदा बुनकर थे जिनके बारे में कहा गया है कि उनका जन्म मद्रों से हुआ था और वे उसी क्षेत्र के थे जिस पर मद्रों का शासन रह चुका था.

अपनी इस पुस्तक में डॉ. नवल यह मान कर चले हैं कि भाषा की दृष्टि से संस्कृत पहले आई थी और पाली बाद में. यानि संस्कृत के शब्द बिगड़ कर पाली बनी. भाषाविज्ञान की जो बातें डॉ. नवल के समय में पढ़ाई जा रही थीं उसके अनुसार उनका वैसा सोचना-मानना ठीक कहा जाएगा. लेकिन इस बीच जो नया शोध हुआ उसके अनुसार प्राकृत और पाली के कई शब्दों को संस्कृत के अनुकूल बना (adapt) कर उनका स्वरूप बदला गया और नतीजतन उनके मतलब बदल गए. उन्होंने जिस कालखंड के मेघों के संदर्भ में चाणक्य का उल्लेख किया है वो भी अब सवालों के घेरे में है. आधुनिक इतिहासकारों ने चाणक्य नामक पात्र की ऐतिहासिकता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं. काश ये जानकारियाँ डॉ. नवल के जीवन काल उन्हें उपलब्ध हो गई होतीं. ख़ैर!     

पुस्तक पढ़ते समय इस बात को ध्यान में रख कर पढ़ना चाहिए कि इसमें मेघों या मद्रों का उल्लेख विभिन्न नाग वंशी जातियों की उत्पत्ति और इतिहास के संदर्भ में हुआ है. इसमें अपना इतिहास ढूँढने के लिए अपने अध्ययन के औज़ारों को पास रखना होगा.

(15-11-2019 नोटयद्यपि नवल जी की उक्त पुस्तक में 'कुनिंदा', 'कुनिंदाओं' जैसे शब्द का प्रयोग हुआ है तथापि मुझे इस शब्द की वर्तनी (स्पैलिंग) को लेकर कुछ संशय था. महाभारत में कुछ ऐसा ही शब्द कभी पढ़ा था. ढूँढने पर पता चला कि वो शब्द 'कुनिंदा' न हो कर 'कुनिंद' है जिसे महाभारत में 'कुणिंद' लिखा गया है. इसका कारण अंग्रेज़ी में इसकी वर्तनी Kuninda हो सकती है.)

मेघ सभ्यता

नाग और ड्रैगन







प्राचीन भारत के शासक नाग, उनकी उत्पत्ति और इतिहास

लेखक - डॉ. नवल वियोगी
प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 
नई दिल्ली-110063
मूल्य : Rs.300/-

मोबाइल - 9818390161, 9810249452




03 November 2019

My Religious Journey - मेरी धार्मिक यात्रा




बालपन का मन-मस्तिष्क कैमरे की डिस्क जैसा होता है जिस पर ज़िंदगी के अक्स छपते जाते हैं.

अमृतसर का नवांकोट, सामने मैदान और किला और आगे शीतला मंदिर. माता-पिता कभी शीतला मंदिर और कभी स्वर्ण मंदिर ले जाते थे. ये स्थान मेरे लिए घूमने की जगह थे जहाँ रौनक रहती थी. मेरी कुंडली शीतला मंदिर के किसी ज्योतिषी ने 34 रुपए में बनाई थी. बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखी थीं. एक बार माँ के साथ स्वर्ण मंदिर से लौटते हुए देखा बाज़ार में दो जुलूस आमने-सामने आ गए. एक जुलूस (सिखों का) नारा लगा रहा था- ‘पंजाबी सूबा’ और दूसरा (हिंदुओं का) नारे का जवाब दे रहा था- ‘महापंजाब’. दोनों तरफ़ के आगू उछल-उछल कर नारे लगा रहे थे. मां ने मुझे बाजू में भर कर सड़क के किनारे खींच लिया और एक मकान के थड़े पर हम खड़े हो गए. लोगों ने दरवाज़े बंद कर लिए हुए थे. हमारे पीछे भी दरवाज़ा था जो बंद था. कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला और सीढ़ियों से उतरी एक अमृतधारी सिख महिला ने कहा- बहन जी अंदर आ जाओ. ये लोग पता नहीं क्या करेंगे. ऊपर की मंज़िल पर उसने हमें अपने ड्राइंग रूम में बिठाया था. जब शोर थमा तो हम बाहर निकल कर घर आए. अगले दिन पिता जी अखबार पढ़ कर बता रहे थे- ‘जुलूस के दौरान सोडावाटर की बोतलें भी फेंकी गईं जिससे कई लोग घायल हो गए’. यह धार्मिक-राजनीतिक घृणा से मेरी पहली मुलाकात थी. उस अमृतधारी सिख महिला की छवि और उसकी सहज प्रेममयी आवाज़ याद है. धार्मिक-राजनीतिक घृणा के शोर में धर्म उस महिला के रूप में वहाँ मौजूद था.

रामपुरा फूल में मेरा दाख़िला सरकारी स्कूल में हुआ. वहाँ सुबह असैंबली में प्रार्थना कराई जाती थी- ‘दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना, दया करना हमारी आत्मा को शुद्धता देना’. बहुत सुरीला गीत था लेकिन न मुझे आत्मा का पता था न परमात्मा का न प्रभु का. ख़ैर! रोहतक के माडल टाऊन में जहाँ हम रहते थे उसके पीछे ही राम मंदिर था. वहाँ मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ जाता, प्रसाद लेता और जब भी कोई कथावाचन होता तो सुनने चला जाता था. एक साल यह चलता रहा. समझ में कुछ आता था ऐसा तो मैं नहीं कह सकता लेकिन निश्चल हो कर कहानी सुनने का कुछ अनुशासन आ गया. निश्चल हो कर (कुछ न करते हुए) थोड़ी देर बैठना बेहतर जीवन के लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षण का एक अंग है.

लड़कपन से किशोरावस्था में प्रवेश करने का समय टोहाना में आया. यह वो समय था जब चीन ने आक्रमण किया था. ऑल इंडिया रेडियो और नवभारत टाइम्स (सुबह होते ही जिसकी मैं प्रतीक्षा करता था) के द्वारा हम बच्चे देशप्रेम को जान रहे थे. पिता जी ने बताया था कि देश की रक्षा पहला धर्म होता है. देशप्रेम सबसे बड़ा धर्म होता है.

बचपन का यह बहुत नाज़ुक समय रहता है. अक़्ल की नसें फूटती हैं. स्मरणशक्ति ज़बरदस्त होती है. बच्चा प्राकृतिक रूप से जिज्ञासु होता है. उसके आने वाले जीवन की दिशा इसी आयु में स्पष्ट होने लगती है.

टोहाना का वह सरकारी स्कूल इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण था कि वहाँ के हेड मास्टर श्री नागपाल स्कूल में कई प्रकार के धार्मिक कार्यक्रम कराते रहते थे. टोहाना में जैनियों की अच्छी संख्या थी. जैन साध्वियाँ वहाँ आती थीं. उनकी मीठी वाणी और शुद्ध हिंदी बहुत आकर्षित करती थी - ‘मैं विद्यार्थिनी होने के नाते यहाँ आई हूँ’. योग सिखाने वाले आते थे. कई तरह के साधु आते थे. उनमें से कइयों के मुकाबले मैं योगासन अधिक सहज तरीके से कर लेता था. एक बार काली और लंबी दाढ़ी वाला एक भगवा वेषधारी साधु आया जिसकी हमारे अंग्रेज़ी के तेज़ तर्रार मास्टर श्री चेतराम जी से अंग्रेज़ी में बहस (झड़प कहना भी ठीक होगा) हो गई. चेतराम जी बहुत फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलते थे इसलिए हम हिंदी स्कूल के बच्चे उनकी अंग्रेज़ी समझ नहीं पाए. लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह समझ आ रहा था कि वे उस साधु पर बहुत आक्रामक थे और साधु के पास कोई जवाब न होने से उसके चेहरे का रंग फीका पड़ता जा रहा था. हमें लगा कि साधु में दम नहीं है. उसी दिन शाम को एक मंदिर में हरमिलापी जी महाराज का सत्संग था जहाँ मैं उत्सुकतावश अकेले ही चला गया. मैं काफी आगे जा कर बैठा. हरमिलापी जी के सत्संग के दौरान अचानक कुछ हलचल हुई, लोगों के मुँह से वाओ जैसी आवाज़ निकली और हरमिलापी जी ने प्रसन्न हो कर किसी के लिए आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया. जिधर उनका हाथ उठा था मैंने उधर पीछे मुड़ कर देखा तो महिलाओं और पुरुषों के बीच बने रास्ते में एक साधु हाथ जोड़ कर खड़ा था. वो वही साधु था जो दिन में मास्टर चेतराम जी के वचनों से हत्प्रभ हो चुका था. मेरा मन पशोपेश में पड़ गया. जो साधु हमारे टीचर का सामना नहीं कर सका था वो यहाँ सम्मानित हो रहा था. यहाँ शिक्षा के महत्व को मैं रेखांकित कर रहा हूँ. कहने का सार यह कि हरमिलापी जी महाराज और उस साधु की उपस्थिति को भव्य बनाता वातावरण वहाँ था और मेरे मन में मास्टर चेतराम जी भी उपस्थित थे.

टोहाना के उस स्कूल में पढ़ते समय एक वायलिन जैसा वाद्य यंत्र बजाने वाला कलाकार दो बार आया था. वो राष्ट्रगान को ठीक 52 सेकेंड में बजाता था. आखिर में उसका एक प्रिय भजन होता था जिसके बोल थे- ‘जब तेरी डोली निकाली जाएगी, बिन मुहूरत के उठा ली जाएगी’. उसके गाने का स्टाइल मन में वैराग्य भरता था. इन्हीं दिनों पिता जी अपने समय के महान योगी स्वामी व्यास देव उर्फ़ स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती 1008 जिन्हें बाद में भावसमाधि के अभ्यास के कारण परमहंस भी कहा गया था, उनकी तीन बृह्दाकार पुस्तकें लाए- ‘बहिरंग-योग’, ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’. ‘बहिरंग-योग’ में यम, नियम, आसनप्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को जिस भाषा में उन्होंने समझाया था वह कठिन नहीं थी. ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’ समझने की कोशिश की लेकिन उनकी भाषा और उसका अर्थ मेरी पहुँच से बाहर था. लेकिन ‘बहिरंग-योग’ के प्रभावाधीन मैं योग और आंतरिक अभ्यास की ओर प्रवृत्त हुआ. तब मैं सातवीं कक्षा में था. किशोरावस्था आ चुकी थी. इस आयु में सेक्स सहित मन के विभिन्न निकायों (विचारों कह लीजिए) का विकास हो रहा होता है. समाधि में साधन के समय जिस प्रकार के हमारे विचार-वृत्तियाँ होती हैं उन्हें बल मिल जाता है. इससे मुझे आगे चल कर कुछ हानि उठानी पड़ी और फ़ायदा भी हुआ. कालेज के दिनों में एक अवसर पर चंडीगढ़ में स्वामी योगेश्वरानंद जी के शिविर में उनसे मिलने का अवसर मिला. इस शिविर का आयोजन उस समय चंडीगढ़ के एसपी रहे श्री भनोट ने किया था. योगेश्वरानंद जी ने प्राणायाम और आंतरिक साधनों के बारे में कुछ अनुदेश दिए. अगले दिन लाला लाजपतराय भवन, सैक्टर 15 में उनका व्याख्यान सुना. योगियों की दृढ़ इच्छा शक्ति के उन्होंने उदाहरण दिए. बाकी अब याद नहीं. उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था. अच्छा स्वास्थ्य धर्म का महत्वपूर्ण अंग है.

फिर से टोहाना लौटता हूँ जहाँ से एक अन्य रास्ता निकला जब पिता जी स्वामी योगेश्वरानंद जी की पुस्तकें तो लाए ही थे साथ ही उन दिनों किन्हीं साधुओं के बताने पर वे उच्च आध्यात्मिक शिक्षा के लिए होशियारपुर के बाबा फकीर चंद के संपर्क में आए या कहना चाहिए कि चले गए और उनके हो रहे. फकीर चंद जी की फोटो हमारे घर में विराजमान हो गई. 1966 में पिता जी ने मुझे चंडीगढ़ में मेरे बड़े भाई के पास छोड़ा जहाँ मेरा दाखिला डीएवी कालेज में हुआ. वहाँ धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत सत्यार्थप्रकाश नामक पुस्तक पढ़ाई जाती थी. सत्यार्थप्रकाश में आर्यसमाज के नियम दिए गए थे. अन्य कई संस्थाएँ जो किसी धर्म का प्रचार करती हैं उनके साहित्य में संस्था या धर्म के नियम लिखे रहते हैं. नियम से तात्पर्य एक विशेष अनुशासन से होता है जो उस संस्था के संपर्क में आने वाले के लिए प्रस्तावित होता है. वो चाहे तो संस्था के साथ निबाहने के लिए उन्हें माने. मेरे सामने कई अन्य संस्थाओं के नियम आए. उनमें से कई नियम ऐसे भी होते हैं जो आपको कुछ सिखाने की बजाय आपके व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं. कुछ नियम आपको मानसिक गुलाम, यहाँ तक कि जोकर बना देने की क्षमता रखते हैं. कहते हैं कि धर्म में पैदा होना अच्छी बात है लेकिन धर्म में ही मर जाना बुरी बात. इसका अर्थ साधारणतः यह है कि वो धर्म अच्छा जो बंदे को ज़िंदगी जीने और तरक्की का रास्ता दिखाने के बाद बंदे को उसकी आज़ादी वापस कर दे ताकि वो परिवर्तनशील दुनिया के साथ चलता रह सके.

भाई साहब ने डेरा ब्यास के बाबा चरण सिंह जी से नामदान लिया हुआ था और उनके कायल थे. मैंने बाबा जी के दो-एक सत्संग सुने हुए हैं. भाई साहब समाधि भी लगाते थे. भिवानी से रिटायर होने के बाद पिता जी चंडीगढ़ में अपने घर न आ कर सीधे होशियारपुर में बाबा फकीर के आश्रम में चले गए जहाँ उन्होंने अपना एक कमरा और रसोई बनवा ली थी. बड़े भाई साहब ही मुझे पहले पहल होशियारपुर के उस आश्रम में ले गए थे और मैंने फकीर चंद जी को देखा और उनके कुछ सत्संग सुने जो आसान और बोलचाल की भाषा में थे. फकीर चंद जी उत्साह देने वाली बातें करते थे. रियारमेंट के बाद पिता जी का सादगी भरा जीवन वहाँ आश्रम में देखा. उसके बाद तो हर साल मैं गर्मियों की छुट्टियों में दो-दो महीने के लिए उस आश्रम (मानवता-मंदिर) में जाता रहा और फकीर चंद जी के काफी सत्संग बहुत चाव और लगन से सुने. फकीर चंद जी ने अपने सत्संगियों को हिदायत दी थी कि उनकी अनुपस्थिति में वे भगत मुंशी राम के साथ बैठ कर साधन-अभ्यास किया करें. ज़ाहिर है कि पिता जी आंतरिक अभ्यास के बहुत अनुभवी थे. फकीर चंद जी ने मुझे सुमिरन और ध्यान करने के निर्देश दिए. बाद में आगे चल कर पिता जी ने बहुत ऊँची समाधि की ओर जाने के लिए कहा.

चंडीगढ़ में कालेज के दिनों में अपने जीजा जी (श्री सत्यव्रत शास्त्री) के संपर्क में भी कई साल रहा जो आर्यसमाजी थे और पुरोहिताई का कार्य भी करते थे. सैक्टर-22 की आर्यसमाज में स्वामी अग्निवेश के आठ-दस दिनों के एक शिविर में मैंने हिस्सा लिया. तब स्वामी अग्निवेश आर्यसमाज के लिए बहुत काम कर रहे थे. आज मैं स्वामी अग्निवेश को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ. वे कई नामी-गिरामी भगवाधारी लोगों के मुकाबले बेहतर कार्य कर रहे हैं. बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति के क्षेत्र में उनका कार्य उन्हें कई भगवा धारियों से अलग और ऊँची जगह देता है. समाज-सेवा धर्म का अभिन्न अंग है.

चंडीगढ़ में रहते हुए कुछ साल मैं आर्यसमाज और बाबा फकीर चंद के बीच झूलता रहा. चूँकि पिता जी का झुकाव फकीर चंद की ओर था इसलिए मैं भी वैचारिक रूप से उधर झुकता चला गया. यहाँ फकीर चंद जी के बारे में वो विशेष बात बता देना चाहता हूँ जो उनकी अपनी ज़बान से सुन रखी है. फकीर चंद जी जाति के ब्राह्मण थे. एक दृष्य के द्वारा उनकी भेंट अपने गुरु से हुई जो जाति के कायस्थ थे और राधास्वामी संत्संग आगरा के सत्संगी रह चुके थे. फकीर चंद जी के होशियारपुर सेंटर (मानवतामंदिर) को ब्राह्मणों का केंद्र माना जाता था. यहाँ अभिवादन के तौर पर ‘राधास्वामी’ कहने की परंपरा थी. फकीर चंद जी के सत्संग इस मायने में महत्वपूर्ण थे कि उनके व्याख्यानों में एक बात बार-बार बहुत साफ़ कही जाती थी कि “जब मुझे मालूम हुआ कि मेरा रूप लोगों में प्रकट हो जाता है और वो मैं नहीं होता, इस बात ने मेरे जीवन का तख़्ता बदल दिया”. मैं अक्सर सोचा करता था कि मुहावरा तो तख़्ता पलट दिया होता है तो फकीर चंद जी तख़्ता बदल दिया क्यों कहते हैं. बाद में समझ आया कि तख़्ते से उनका तात्पर्य ‘बैनर’ से था. हज़ारों बार मेरे कानों ने वो बात सुनी और वो चित्त में बैठती चली गई. इसका अंतिम परिणाम यह निकला कि जब भी कहीं पढ़ता-सुनता कि किसी के यहाँ कोई रूप, मूर्ति या चीज़ प्रकट हुई है तो मैं समझ जाता था कि या तो कहीं मन का खेल (प्रोजेक्शन) हुआ है या फिर किसी इंसान ने ही कोई नया जाल बिछाया है.

मुंबई में नौकरी के दौरान मेरे एक मित्र अब्दुल हमीद ख़ान मुझे ब्रह्मकुमारियों के केंद्र में ले गए जहाँ मैंने कुछ दिन का एक पाठ्यक्रम (कोर्स)-सा किया. वहाँ मन (विचारों) के प्रबंधन के तौर-तरीके सिखाए गए. जिन्हें मैं उपयोगी मानता हूँ. विचार-प्रबंधन के वो तरीके दरअसल मैं कुछ मैनेजमेंट प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान जान चुका था. एक मैनेजमेंट गुरु ने कहा था कि आपकी जो भी इच्छा हो या जो भी आप करना या बनना चाहते हों उसका एक 3डी चित्र अपने मन में बना कर रखें. इसे फकीर चंद जी ऐसे समझाते थे, "जो भी तुम को माँगना हो उसकी फोटो बना कर अपनी खोपड़ी में रखो". बात एक ही थी. बहरहाल मैंने बीके (ब्रह्मकुमार) का कोर्स तो अटैंड कर ही लिया था.

ऊपर की बातों से ज़ाहिर है कि मेरे धार्मिक मन को अधिकतर बाबा फकीर पर ठहरने का मौका मिला. यह चांस की बात रही. वरना मन पर धार्मिक संस्कार तो कई प्रकार के थे. मेरा उद्देश्य यहाँ अपनी धार्मिक यात्रा को समझना है. फकीर को मैं आज भी याद करता हूँ. वे इतने खुले थे कि उनकी खूबियों और कमियों को भी गिना जा सकता है. डेविड सी. लेन के डिस्कशन ग्रुप में बहुत विस्तार से उनका उल्लेख आ चुका है. सिर्फ इतना जानना काफी है कि फकीर का बार-बार यह कहना कि ‘मैं किसी के अंतर नहीं जाता’ मेरे दिमाग़ में घर कर गया और उसने मेरे धार्मिक जीवन को रोशन और समतल कर दिया. कोई और मेरे मन के मैदान में चोरी से घुस नहीं सका. नो चांस.

फकीर चंद जी के निधन के बाद मुंशीराम जी चंडीगढ़ में अपने घर आ गए. उनके दैनिक कार्यक्रम नियमित रूप से चलते थे. लगभग आठ साल उनकी सेवा करने का अवसर मुझे मिला फिर नौकरी के सिलसिले में मुझे चंडीगढ़ से बाहर जाना पड़ा. इस दौरान उनसे बहुत कुछ जानने-सीखने को मिला. एक विशेष उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. श्री मुंशीराम जी आंतरिक अभ्यास और समाधियों के बहुत अनुभवी थे. कई लोग उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे. एक बार मैंने उनसे पूछ लिया कि सबसे बढ़िया समाधि कैसी होती है तो उन्होंने कहा कि जब हम ऑफिस में काम करते हुए किसी समस्या को सुलझाने में लगे होते हैं और मन उसमें पूरी तरह लगा होता है तो जिस हालत में उस समस्या का समाधान मिल जाता है वही सबसे बढ़िया समाधि होती है. यह बात मैंने गाँठ बाँध ली और कभी ऊँची समाधियों के चक्कर में नहीं पड़ा. मन लगा कर कोई कार्य करने से बेहतर और कौन-सी समाधि हो सकती है.
    
अब 69 साल का होने वाला हूँ. धर्म की बातें सुन-सुन कर पक चुका हूँ. लेकिन चौकन्ना रहता हूँ. पिछले दिनों मैं एक मित्र से मिलने जालंधर गया तो वहाँ डॉ. आंबेडकर भवन में लगी बुद्ध की मूर्ति के सामने उनके साथ ग्रुप फोटो खिंचवाई और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया. एक रिश्तेदार ने वो फोटो देखी और पूछा कि बौध हो गए हो क्या? उसकी आवाज़ में एक व्यंग था जिसे मैं जड़ तक समझता हूँ. उसी प्रसंग में कई बातें याद हो आईं. हमारे पूर्वजों को मंदिरों में घुसने की मनाही थी. पुरोहित वर्ग हमारी जातियों से दूर ही रहता था. सोचता हूँ तब हमारे पूर्वजों को धार्मिक शिक्षा कहाँ से मिलती थी? उनका सादगी और प्रेम भरा निश्छल व्यवहार किससे प्रेरित था? यम और नियमों की गढ़त से निखरा उनका सामाजिक व्यवहार किसका ऋणी था? मेरे माता-पिता, संबंधी-मित्र मुझे कई धार्मिक स्थानों पर ले कर गए लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने वहाँ से कुछ महत्व का सीखा. अधिकतर धार्मिक स्थान एक प्रोपेगंडा के सहारे चलते हैं. उनके साथ कुछ चमत्कारों की कहानियाँ जोड़ दी गई होती हैं. कुल मिला कर एक प्रकार का व्यवसाय उन स्थानों पर चलता है. अपने जीवन के लिए महत्व का जो सीखा वो या तो माँ ने बचपन में अपने प्यार-दुलार से सिखाया या आगे चल कर स्वामी योगेश्वरानंद के साहित्य और कुछ बाबा फकीर की संगत से सीखा. फकीर ने तो हिदायत कर दी थी कि तुम जवान हो, खूब पढ़ो और बढ़ो. उस समय की मेरी आयु और ज़रूरतों को भगती की आवश्यकता नहीं थी. मैंने जीवन में बहुत पढ़ा, बहुत सीखा. उससे लाभ मिला.

आगे के जीवन में और अधिक अध्ययन करने के बाद यह जाना कि जीवन की गढ़त करने वाले यम-नियम तो धम्मपद में उल्लिखित हैं और उनका व्यवहारिक ज्ञान बचपन में मेरी साक्षर-भर माँ मुझे पहले ही दे चुकी थी. माँ धम्मपद के बारे में कुछ भी जानती थी ऐसा मुझे नहीं लगता. ‘बहिरंग-योग’ (अष्टांगयोग) से माँ के दिए ज्ञान की पुष्टि मात्र हुई थी. माँ को वो सब किसने सिखाया? यह सहज सवाल है. मुझे नहीं लगता कि माँ का अपना कोई सर्कल अपने समाज से बाहर किसी अन्य धार्मिक समूह में था. मोहल्लों की कीर्तन मंडलियों की मैं बात नहीं करता जो मोहल्ला पोलिटिक्स का निर्माण करती हैं. मेरा मानना है कि माँ को वो सब उस सामाजिक-धार्मिक परंपरा से प्राप्त हुआ था जिसकी जड़ें देश की उस सभ्यता में हैं जिसे आजकल बौध-सभ्यता कहा जाता है. इंसानों और पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और सेवा का पाठ माँ ने पढ़ाया. उधर फकीर चंद जी की संगत से मैंने जाना कि मन में किसी का रूप प्रकट होना धार्मिक लूट का मुख्य आधार है. जब इतना हो गया तो फिर मूर्ति पूजा या उससे संबंधित अन्य प्रकार के धार्मिक क्रियाकलापों से मेरा संबंध टूटना तय ही था. धार्मिक लूट से बचा रहा. यह बड़ी बात रही. यानि प्रत्यक्ष में मेरा नास्तिक-जैसा हो जाना कुदरती था. मेरी बनावट कुछ ऐसी ही हो चुकी थी. फकीर चंद जी के गुरु शिवब्रतलाल जी उन्हें कहते थे कि पिछले जन्म में मैं बुद्ध था और तुम भिक्षु आनंद थे. उनकी इस बात को मैं धम्म प्रवाह की कथा के रूप में सुनता हूँ. डेविड सी. लेन ने फकीर चंद जी की रेखांकित शिक्षाओं में एक तिब्बतन भिक्षु को देख लिया था.

इस यात्रा का परिणाम यह रहा कि किसी तरह की धार्मिक भटकन बाकी नहीं रही. धार्मिक यात्रा मुझे फिर से माँ तक ले आती है जिसने बचपन में मुझे बाहर से थपेड़ कर भीतर से मज़बूत किया. वो कभी किसी आडंबर में नहीं पड़ी. इस प्रक्रिया में मैं अकेला नहीं था और माँ भी अकेली नहीं थी. उसके साथ उसके जैसी लाखों अनपढ़ या साक्षर-भर मेघ माताएँ और मेघ बच्चे थे और करोड़ों हो चुके हैं जिन्होंने अपनी सभ्यता को बिना किसी कर्म-कांड के प्रेमपूर्वक संजोए रखा है. मुझे कुछ अलग बनने की ज़रूरत महसूस नहीं होती. मैं एक तरह का धर्मरहित धार्मिक बंदा बन चुका हूँ जो पुनर्जन्म के विचार तक से मुक्त है.

आज इतना भर जानता हूँ कि माँ का बनाया हुआ रास्ता स्वयं मुझे उठाए फिरता है.

30 October 2019

The King Priest of Mohanjodaro - मोहनजोदड़ो का राजपुरोहित


इसी साल 24 मार्च 2019 को और पिछले साल 17 नवंबर 2018 को आदरणीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने एक ही विषय पर दो पोस्टें डाली थीं. विषय था मोहनजोदड़ो के तथाकथित राजपुरोहित (King priest) की वह विश्व प्रसिद्ध मूर्ति जो कराची के म्यूज़ियम में रखी है वह किसकी मूर्ति हो सकती है या है. मोहनजोदड़ो में इस मूर्ति के अतिरिक्त मिली अन्य मूर्तियों का आपस में मिलान और बुद्ध की मूर्ति से मिलान करने के बाद उनका मानना है कि यह मूर्ति बुद्ध की मूर्ति के स्टाइल की है. इस बारे में अंतिम निष्कर्ष क्या होगा पता नहीं लेकिन मूर्ति के माथे पर बना कुकुध और बैठने की मुद्रा भी बुद्ध की ओर संकेत करती है.

इस संदर्भ में मुझे एक मेघ ऋषि मंदिर में स्थापित फोटो का ध्यान हो आया जो मोहनजोदड़ो की उक्त मूर्ति का रूपांतरण (adaptation) प्रतीत होता था. उसकी अन्य छवियाँ भी तैयार की गई थीं. ऐसा भी होता है कि हम कभी किसी छवि को प्रतीक बना कर एक अर्थ विशेष में उसका प्रयोग करते हैं लेकिन बाद में होने वाला शोध उसे अलग अर्थ दे सकता है हालाँकि आस्था का तत्त्व उसमें स्थाई रह सकता है. इस निगाह से देखें तो प्रतीकात्मकता (symbolism) में अर्थ विस्तार की संभावनाएँ बरकरार रहती हैं. ऋषियों-मुनियों की प्रतीकात्मक छवियों (images) में भी परिवर्तन होता रहता है. कहीं कुछ जोड़-दिया जाता है और कहीं कुछ घटा दिया जाता है ताकि वो समय के अनुसार नया अर्थ दे सके.

फेसबुक पर कभी एक सज्जन ने पूछा था कि तुलसी दास के चित्र में कलम, दवात और पुस्तक भी रखी रहती है तो कबीर के चित्र में बीजक नामक ग्रंथ और कलम-दवात क्यों नहीं रखी जा सकती? रखी जा सकती है. कौन रोकता है? कबीर का चित्र उनके ज्ञान के अनुरूप होना ही चाहिए. 







18 October 2019

A memorable day - एक यादगार दिन

14 अक्तूबर, 2019 का दिन मेरे लिए खास था. इस दिन जालंधर में अंबेडकर भवन में धम्म प्रवर्तन दिवस का आयोजन किया गया जिसमें इतिहासकार ताराराम जी को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था. मैंने उत्सुक श्रोता और दर्शक के तौर पर इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया और कुछ फोटोग्राफ़ लिए. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री लाहौरी राम बाली थे जिनसे मेरा पुराना परिचय रहा है हालांकि इस बीच कई वर्ष तक उनसे कोई भेंट या बातचीत नहीं हुई. लेकिन देखा कि 90 से अधिक वर्ष की उम्र में उनकी वाणी वैसी ही ओजमयी है.

ताराराम जी इस अवसर पर बौधमत पर और धम्मचक्र परिवर्तन पर बोले. उन्होंने बाली जी और अपने द्वारा राजस्थान में किए कार्य का ब्यौरा दिया. अपने पिता श्री धर्माराम जी के जीवन संघर्ष पर उन्होंने प्रकाश डाला और उपस्थितों को बौधमत की सुंदरता बताते हुए इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी. कार्यक्रम के बाद वहाँ लगी पुस्तक प्रदर्शनी से हमें नवल वियोगी की पुस्तक ‘प्राचीन भारत के शासक नागउनकी उत्पत्ति और इतिहास’ मिली जिस पर हम दोनों की नज़र गड़ी थी. पुस्तक खरीद कर हम एक अन्य कार्यक्रम की ओर निकल पड़े जहाँ शाम को ताराराम जी ने कबीर पर व्याख्यान दिया. फिर हमने चंडीगढ़ की ओर प्रस्थान किया.

अगले दिन हम दोनों ने ऑस्ट्रेलिया में बैठे श्री आर. एल. गोत्रा जी से फोन पर लंबी बातचीत की. श्री रतन लाल गोत्रा बहुत उत्साहित थे. उन्होंने बताया कि मेघों के इतिहास की जानकारी ईरानइराक और उसके आसपास के क्षेत्रों से मिलने की संभावनाएं अधिक हैं. विषय ऐसा था कि बातचीत काफी लंबी चली. उसके बाद मैंने ताराराम जी से पूछा कि क्या उनके पास नवल वियोगी जी का मोबाइल नंबर हैअदम्य इतिहासकार श्री नवल वियोगी जी दो-तीन वर्ष पहले पूरे हो चुके हैं. इस बीच ताराराम जी का मोबाइल भी बदल चुका है. इसलिए वियोगी जी का मोबाइल नंबर मिल जाना अपने ही झोले से निकले सरप्राइज़ गिफ्ट से कम नहीं था. कुछ ही देर में हम वियोगी जी के परिवार के संपर्क में थे. यह सब जैसे 15 अक्तूबर 2019 को ताराराम जी की इस एक दिवसीय यात्रा के दौरान ही होना था. उनके परिवार से बातचीत के बाद हमारी जानकारी में आया कि वियोगी जी की कुछ पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन हैं और उनमें मेघों के संबंध में जानकारी देने वाली वो पुस्तक भी शामिल है जिसका उल्लेख श्री गिरधारी लाल भगत जी ने कभी मुझ से किया था. इसके बारे में डॉ. ध्यान सिंह को सूचित कर दिया है जिनका डॉ. नवल वियोगी के यहाँ काफी आना-जाना रहा है.

ज़ाहिर है नई जानकारियाँ मिलने को हैं और हम सभी उत्सुक हैं और आतुर भी. 
  






22 September 2019

Santram BA, Commitment against casteism - संतराम बीए, जातिवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता


हम भारतीय जब किसी मशहूर आदमी का नाम सुनते हैं तो आदतन उसकी जाति ढूंढते हैं. संतराम बीए जैसे व्यक्तित्व के बारे में मैंने भी यही किया था. एक पुस्तक के एक पन्ने की फोटो हाथ लगी थी और उसमें संतराम जी के नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द लगा था जिसे केंद्र में रख कर मैंने उस पर ब्लॉग लिखा. होना यह चाहिए कि जब महत्वपूर्ण और असाधारण कार्य करने वाले किसी महापुरुष की बात हम करें तो उसकी बात उसके संपूर्ण कार्य के संदर्भ में करें. जिसने अपना जीवन-संघर्ष और कार्य विस्तार से दर्ज कर दिया है उसके कार्य को शुरू से आखिर तक देखना चाहिए. संभव है कि उसने जिस माने हुए सत्य के साथ कोई काम शुरू किया हो अंत में वो उसी सत्य के खिलाफ़ खड़ा दिखे. उस सत्य का इस्तेमाल और ज़िंदगी का तजुर्बा उसे ऐसा बना सकता है. उसके जीवन में उसकी जाति के अलावा भी ऐसा बहुत कुछ होता है जिसे ध्यान से पढ़ा और देखा जाना चाहिए. उनका साहित्य उनके पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सीढ़ी का काम करता है. 
संतराम बीए की यह फोटो चारु गुप्ता जी के आलेख में मिली जिसे संतराम जी की दुहिता
मधु चढा जी के सौजन्य से प्रकाशित किया गया है. आप दोनों का आभार.
संतराम जी पर लिखे पिछले ब्लॉग में मैंने भारत सरकार की वेबसाइट का लिंक लगाया था जिस पर उनकी आत्मकथा उपलब्ध थी. एक दिन देखा कि वो लिंक गायब था. इससे थोड़ी तकलीफ हुई. फिर से लिंक की तलाश शुरू की तो एक शोधकर्ता चारु गुप्ता के एक आलेख की पीडीएफ मिली. “Speaking Self, Writing Caste - Recovering the life of Santram B.A.” इससे  अच्छी जानकारी मिली. इसमें कई देशी-विदेशी लेखकों द्वारा बहुजन लेखकों की आत्मकथाओं की विशेषताओं का विश्लेषण दिया गया है जो पढ़ने योग्य है. इसके लिए चारु गुप्ता का आभार. अंग्रेज़ी में लिखे अपने आलेख के शुरू में ही चारु गुप्ता ने इस बात का उल्लेख किया है कि 'जाति के कारण संतराम जी के साहित्य को हिंदी साहित्य के हाशिए पर रख दिया गया.'

संतराम जी ने सौ के लगभग पुस्तकें-पुस्तिकाएँ लिखीं. संतराम जी शिक्षित और अध्ययनशील व्यक्ति थे. विज्ञान की जानकारी ने उन्हें तर्कशील बनाया. लेकिन उस समय का हमारा समाज वैज्ञानिक तर्क के साथ खड़ा नहीं था. शायद आज हो.

हमें जानना चाहिए कि संतराम ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पुस्तक ‘जात पात उन्मूलन’ (एनीहिलेशन ऑफ कास्ट) का हिंदी अनुवाद करके उसे प्रकाशित कराया था. उनकी आत्मकथा से मालूम पड़ता है कि वे हिंदू दायरे में रह कर जातिप्रथा में सुधार की बात करते थे. उनका चिंतन गांधी और अंबेडकर दोनों से प्रभावित था. उनका रास्ता आर्य समाज और आदधर्म आंदोलन के बीच से गुजर रहा था. उनकी आत्मकथा ‘मेरे जीवन के कुछ अनुभव’ जाति प्रथा को चुनौती देती पुस्तक है. वे उसमें लिखते हैं कि यदि आप जाति प्रथा के खिलाफ कोई संघर्ष करते हैं तो आप ही की जाति के लोग आपके खिलाफ खड़े हो जाते हैं, यहां तक कि आपके परिवार के लोग भी. संतराम अपने समय के ऐसे लेखक थे जिनके आलेख उस समय की कई जानी-मानी पत्रिकाओं में छपे. उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘क्रांति’ और हिंदी पत्रिका ‘युगांतर’ का संपादन किया. इनके ज़रिए वे जातपात तोड़क मंडल (JPTM) का संदेश देते रहे. स्वतंत्रता के बाद वे होशियारपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘विश्वज्योति’ से जुड़े रहे.

अपनी साधारणता को साथ रखते हुए किसी असाधारण समस्या पर अपनी बात रखना ऐसी कथा है जो बहुजन साहित्य की खास पहचान है. इसे इस संदर्भ में भी देख लेना चाहिए कि संतराम जी ने अपने जीवनकाल में मानवाधिकारों की स्थापना अंग्रेज़ी शासन के दौरान होते देखी थी जिसने बाद में भारतीय संविधान में जगह पाई.

संतराम जी के जीवन बारे में प्रसिद्ध बहुजन लेखक कंवल भारती का यह हिंदी में लिखा आलेख आप ज़रूर पढ़ लीजिए जो फार्वर्ड प्रेस में छपा था. इसमें उनके जीवन-संघर्ष से जुड़ी बहुत मार्मिक बातें वर्णित हैं. इस आलेख से पता चलता है की संतराम जी और राहुल सांकृत्यायन मित्र थे. उनकी मित्रता आर्यसमाज के दायरे से बाहर व्यक्तिगत जीवन तक थी. राहुल सांकृत्यायन ने ही संतराम जी की बिटिया का नाम गार्गी रखा था.

आज संतराम जी का जीवन संघर्ष हमारे लिए एक उदाहरण के रूप में मौजूद है जिसे जानने के बाद हम अपने बारे में बेहतर तरीके से सोचने लगते हैं. चारु गुप्ता का आलेख एक शोध-आलेख (Research Paper) है. उसका अपना महत्व है. लेकिन जो अन्य जानकारियां हमें यहां-वहां से मिलती हैं या पुस्तकों में दर्ज हुई हैं वह हमें तत्कालीन व्यवस्था की बड़ी तस्वीर देती हैं. उसका ऐतिहासिक महत्व है. तब से लेकर आजतक उन परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन ज़रूर आया होगा. उसके पीछे कई लोगों और आंदोलनों की भूमिका रही होगी. उसे भी देखा जाना चाहिए.

प्रजापति समाज ने संतराम जी को उनकी जीवनी में उल्लिखित ‘कुम्हार’ शब्द के आधार पर अपनाया है और उन्हें सम्मान दिया है. मुझे उनके जाति नाम में ‘मेघ’ शब्द का उल्लेख आकर्षित कर गया यह अपनी जगह है. मिल रही जानकारी के अनुसार संत राम जी का कुछ साहित्य संभवतः अभी तक अप्रकाशित है. उसमें दर्ज उनके जीवन अनुभव भी प्रकाश में आने चाहिएँ ताकि हम अपनी आज की जीवन-परिस्थितियों के आलोक में कुछ और भी सीखें और आज की जरूरतों के हिसाब से उन्हें बदलें या ख़ुद को ट्यून करें.

आदरणीय संतराम बीए जी के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद मैं सोच में पड़ा हूं कि क्या फर्क पड़ता है यदि संतराम जी मेघ हैं या प्रजापति समाज से हैं. सच्चाई यह है कि हम जिस वृहद् समाज में रह रहे हैं वहां जाति एक हक़ीक़त है और हर व्यक्ति अपनी जाति को लेकर अकेला खड़ा है. जातिवाद की यही खासियत है कि वो एक जाति के भीतर खड़े एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अलग कर देता है चाहे वो व्यक्ति जातिवाद के खिलाफ़ आंदोलन ही क्यों न कर रहा हो, वो अकेला हो जाता है. इसका असर समाज के उस हिस्से पर भी पड़ रहा है जो जातपात के कारण अभी तक फ़ायदे में रहा.

14 September 2019

King Meghvahana - राजा मेघवाहन

आगे बढ़ने से पहले कृपया नोट कर लें कि मैं इतिहासकार नहीं हूं. मैं अपनी जाति का इतिहास ढूंढता रहा हूं. इस सिलसिले में जो मिला, अच्छा-बुरा, सही-गलत वो सब यहां इकट्ठा हुआ. इसलिए यदि मैं किसी इतिहास संबंधी अवधारणा को गलत मान बैठा हूं या उसे गलत साबित करने की कोशिश की है तो उसका कारण मेरे पढ़े हुए इतिहास के उलट किसी इतिहास का मौजूद होना है.  अब आगे चलें.

जम्मू-कश्मीर के निवासी मेघ और अन्य बहुत से मेघ अपने इतिहास को ‘राजतरंगिणी’ के राजा मेघवाहन में देखते हैं. पता नहीं उनमें से कितने लोगों ने राजतरंगिणी का मूल पाठ (संस्कृत में) पढ़ा. संस्कृत में लिखी राजतरंगिणी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन अंग्रेज़ी और हिंदी में अनूदित अंश (तृतीय तरंग के) पढ़े जो मेघवाहन से संबंधित हैं और मैं मानता हूं कि उसमें राजा मेघवाहन का जितना उल्लेख किया गया है वह राजा और उसकी शासन प्रणाली के वर्णन के  लिहाज़ से अपर्याप्त है. राजतरंगिणी के लेखक पं.कल्हण आज के अर्थ में इतिहासकार नहीं थे. लेकिन बहुत से ऐतिहासिक संदर्भों को उन्होंने अपने नज़रिए से रिकार्ड किया. 12वीं शताब्दी में इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं थी उस काल में कल्हण का कार्य महत्वपूर्ण रहा होगा. आज के इतिहास लेखन से जैसी अपेक्षा हो सकती है वैसी कल्हण से नहीं होनी चाहिए. राजतरंगिणी की लेखन शैली पौराणिक कथा शैली से प्रभावित है.

श्री जोगेश चंदर दत्त ने ‘राजतरंगिणी’ का जो अंग्रेज़ी अनुवाद किया है उसी की पीडीएफ फाइल मेरी नज़र में पहले आई. उसमें बहुत स्पष्ट लिखा था कि राजा मेघवाहन जिस कालखंड में थे उसमें बौधमत का बहुत प्रभाव था. राजा के अलावा उसकी रानियों ने भी बौद्ध मठों का निर्माण करवाया था. उस नेरेशन से तब के जम्मू-कश्मीर में बौद्धमत की व्यापकता का उल्लेख मिलता है. जीवों के प्रति करुणा का भाव फैलाने में मेघवाहन की भूमिका को राजतरंगिणी में सराहा गया है. 

हफ्ता-भर पहले ‘मेघ-चेतना’ के लगभग दस साल तक संपादक रहे श्री एन.सी. भगत ने ‘मेघ-चेतना’ के किसी पुराने अंक में से 4 पृष्ठों की फोटो कॉपी मुझे दी. उसमें प्रकाशित एक आलेख मेघवाहन के बारे में था. उस आलेख के शुरू में ही छपा था “मूल पाठों का सारांश, पंडित कल्हण लिखित कश्मीर के राजाओं का इतिहास, राजतरंगिणी की तृतीय तरंग के आरंभ में ही साक्षात जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन का प्रसंग शुरू होता है.यह रुचिकर था. इसे “आचार्य जैन मुनि श्री विमल मुनि जी महाराज श्री दर्शन मुनि जी महाराज” के सौजन्य से छापा गया था. उक्त आलेख दोनों मुनिजनों ने मिल कर लिखा या पहले वाले मुनि जी महाराज ने लिखा यह स्पष्ट नहीं है. श्री दर्शन मुनि जी महाराज का नाम (संभवतः दर्शन भगत था) लेकिन यह मानने का मेरे पास पर्याप्त कारण है कि जैन दायरे में उनका नाम सुदर्शन मुनि रहा होगा जिनसे मैं कालेज के दिनों में जैन धर्मशाला, सैक्टर-18, चंडीगढ़ में श्री सत्यव्रत शास्त्री जी के साथ मिलने गया था. उक्त आलेख के स्कैन इस ब्लॉग के अंत में दिए गए हैं. श्री सुदर्शन मुनि ऊधमपुर, जम्मू के रहने वाले थे.

मेघ-चेतना’ पत्रिका में छपा उक्त आलेख किसी पौराणिक कथा से कम नहीं. आलेख के शीर्षक में लिखा है - “साक्षात् जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन”. आगे पहले पैराग्राफ में ही लिखा गया है कि “प्राणी मात्र पर दया करने वाले बोधिसत्वों की महिमा को भी उस उत्तम विचार संपन्न राजा ने अपने गंभीर तथा उदात्त चरित्र से परास्त कर दिया.” ऐसा कह कर मेघवाहन को जैनमत का गौरव कहा गया है ऐसा प्रतीत होता है. जोगेश चंदर दत्त के 'राजतरंगिणी' के अंग्रेजी अनुवाद में लिखा है कि महामेघवाहन बौधमत के अनुयाई थे और उनकी रानियों ने बौद्ध विहार बनवाए थे. यानि दोनों संदर्भों के नेरेशन में तनिक भिन्नता है. 

मेघवाहन को प्रभु जिनेंद्र तुल्य मानना एक सद्भावनापूर्ण सोच है पर ज़रा संभल कर. ओडिशा (जिसे पहले उड़ीसा, Odissa कहा जाता था) में एक महामेघवाहन राजवंश रहा है जिसकी परंपरा में खारवेल जैसे सम्राट जैनमत के अनुयायी थे. अभी तक मेरी नज़र में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो कश्मीर के मेघवाहन और ओडिशा के महामेघवाहन बीच कोई तर्कपूर्ण संबंध बिठाता हो. अलबत्ता एक आलेख (यथा 13-09-2019 को देखा गया) ऐसा है जो दोनों को एक साथ रखता है. वहां मेघवाहन और महामेघवाहन को लेकर स्पष्टता की ज़रूरत है.  

अब सवाल रह जाता है कि क्या राजा मेघवाहन ‘मेघ’ नस्ल के थे. राजतरंगिणी में इस बारे में स्पष्ट तो कुछ लिखा नहीं है लेकिन यह ज़रूर लिखा है, “We are ashamed to relate the history of this good king to vulgar men, but those who write according to the Rishis do not care for the taste of their hearers.” इसे अब कोई दिल पर ले ले या नकार दे यह आज उसकी मर्ज़ी पर है.

धार्मिक, इतिहासिक, सामाजिक विषयों पर लिखे ग्रंथों को जब पढ़ना हो तो उनके लेखकों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को जानना-समझना बहुत ज़रूरी है. उसके बिना आप उनकी रचनाओं के गूढ़ कथ्य को सही सदर्भों में नहीं जान सकते. कल्हण कश्मीरी ब्राह्मण/पंडित थे और रामायण तथा महाभारत के जानकार थे. विकिपीडिया पर कल्हण के बारे में काफी कुछ कहा गया साथ ही यह जानना ज़रूरी है कि इतिहास के बारे में विकिपीडिया बहुत विश्वसनीय स्रोत नहीं है, तथापि कल्हण को इस लिंक से थोड़ा जान लीजिए (यह लिंक 13-09-2019 को देखा गया है).

कल्हण अपनी ‘राजतरंगिणी’ में संकलित ऐतिहासिक संदर्भों को पौराणिक शैली से मुक्त नहीं रख पाए. इसका एक उदारण मेघवाहन के संदर्भ में उनकी निम्नलिखित टिप्पणी से मिल जाता है, “From that time none violated the king's order against the destruction of animals, neither in water, nor in the skies, nor in forests did animals kill one another.” “...nor in forests did animals kill one another” जैसी बात कहना एक बहुत ही काल्पनिक स्थिति की बात है जिसमें अतिश्योक्ति है और अतिरंजना भी वरना प्रकृति में एक जीव भोजन है दूसरे जीव का.

जहाँ तक करुणा (tenderness) और अहिंसा (non-violence) की बात है करुणा बौधमार्ग की महत्वपूर्ण जीवन शैली है और अहिंसा जैनमार्ग की. बौधमत राज्य की रक्षा और आत्मरक्षा के लिए हिंसा के प्रयोग की अनुमति देता है.

अंत में मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि 'राजतरंगिणी' के राजा मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. यदि किसी को नज़र आ जाए तो उसे लिखना चाहिए.

ये लिंक भी देखे जा सकते हैं


Rajtarangini (PDF) (Page 36-37)

नरेंदर सहगल की पुस्तक व्यथित जम्मू-कश्मीर के पृष्ठ 25 पर प्रतिभाशाली मेघवाहन का उल्लेख हुआ है.






09 September 2019

Aryan Invasion? - आर्यों का आक्रमण?

डीएनए रिपोर्टों ने अभी तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में कई जगह निशान लगा कर बताया है कि हुज़ूर यहाँ-यहाँ कुछ गड़बड़ है. 2018 में राखीगढ़ी में 4500 साल पुराने (हड़प्पा सभ्यता के समय के) नरकंकाल मिले. डीएनए रिपोर्ट आने से पहले ही तब मीडिया मालिक (पत्रकारों के अवतार में) अपने-अपने सिद्धांतों के साथ टूट पड़े. “ये हमीं है, यह हमारा है, वो सभ्यता हमारी थी, हमने उसे नष्ट नहीं किया था, हम सिंधुघाटी के ही हैं, हमीं ने उसे विकसित किया था, आर्य आक्रमण का सिद्धांत गलत है, अंग्रेज़ों ने हमारे इतिहास को गलत लिखा”. (यानि अंग्रेज़ों के जाने के 70 साल बाद आज तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में यदि कुछ गलती है तो उसके ज़िम्मेदार अंग्रेज़ हैं, वग़ैरा).

अब सितंबर 2019 में उन कंकालों की डीएनए और अवशेषों  के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं तो मीडिया फिर उस पर झपट पड़ा कि इसमें यह मेरा है, तुम्हारा क्या है, हम तो पहले से ही कह रहे थे, तुम्हारा तो सिद्धांत ही गलत था, कोई आक्रमण नहीं हुआ बल्कि बाहरी लोग थोड़े-थोड़े करके आए थे, कुछ उधर से इधर आए और कुछ इधर से उधर गए (ऐसी कई बातें और उनसे जुड़े सवाल अपेक्षित थे इसलिए डीएनए रिपोर्ट अपनी सीमाएँ बता गई है और कई स्पष्टीकरण दे गई है) लेकिन सवाल मुख्यतः उस इतिहास पर उठाया जा रहा है जो बच्चों को बताता रहा है कि भारत के लोग असभ्य थे और उन्हें सभ्य बनाने के लिए आर्य लोग बाहर से यहाँ आए थे. डीएनए रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दक्षिण एशिया की किसानी यहाँ के स्थानीय लोगों ने ही शुरू की थी. उसका कोई संबंध ईरान या पश्चिम से नहीं है. यानि भारत प्रायद्वीप की सभ्यता यहाँ के स्थानीय बाशिंदों ने ही विकसित की थी.
फिर वो आर्यवर्त क्या चीज़ है? ऊपर उठा हाथ पूछ रहा है कि आर्य का तात्पर्य रेस (नस्ल) से है या श्रेष्ठ से है, यदि श्रेष्ठ से है तो श्रेष्ठता का सिद्धांत कहाँ से आया, किसने पढ़ाया? आज के भारत में जातीय श्रेष्ठता का औचित्य क्या है? उससे अधिक प्रखर सवाल यह हो सकता है कि जातीय श्रेष्ठता पर आधारित व्यवस्था क्यों है.

इसी संदर्भ में कुछ विद्वान यह बात दोहरा रहे हैं कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि आर्य बाहर से नहीं आए बल्कि वो यहीं के हैं. इस उद्धरण को भी मीडिया मालिक भुनाते फिर रहे हैं. प्रकारांतर से वे उस धारणा को झुठलाना चाहते हैं जो बहुत प्रचारित हो चुकी है कि ‘ब्राह्मण विदेशी’ है. इसी संदर्भ को दूसरे विद्वान कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने से पहले ही भारत के कुछ लोगों ने ख़ुद को बाकियों से श्रेष्ठ कहना शुरू किया था. "आर्य बाहर से नहीं आए" वाली बात को वे डॉ. आंबेडकर की राष्ट्रनिर्माण संबंधी अवधारणा से जोड़ कर देखते हैं और मानते हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग भारत के ही हैं. सभी को मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण करना है और उसमें जातीय श्रेष्ठता वाली सोच को बाधा बन कर नहीं आना चाहिए.

फिलहाल संदर्भित रिपोर्ट यह स्थापित कर रही है कि पहले जो पढ़ाया जाता था कि प्राचीन विकसित सभ्यता का विकास बाहर से आए लोगों ने किया वो ग़लत है. वास्तव में वो विकास मूलनिवासियों ने किया था.

अब मेघों के लिए दो शब्द. 'मूलनिवासी' नाम के तहत जो मेघ पहले असहज महसूस कर रहे थे वे अब सहज हो कर बैठ सकते हैं.