24 June 2019

Jat Dharma and Megh Dharma - जाटधर्म और मेघधर्म

जाट समुदाय में सक्रिय राजनीतिक संगठन ‘यूनियनिस्ट मिशन’ के अग्रणी श्री राकेश सांगवान से कई मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है. जाट समुदाय के लोग अपने आत्मविश्वासी स्वभाव के कारण पहचाने जाते हैं. जहाँ तक शिक्षा और जानकारी का सवाल है वे कुल मिला कर अभी तीसरी पीढ़ी तक आए हैं जो शिक्षित है. जाति व्यवस्था के आखिरी पायदानों पर खड़े अन्य समुदायों की तरह वे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में संघर्षरत हैं. हरयाणा जैसे राज्य में वे सत्ता का स्वाद चख कर उसे खो चुके हैं इसलिए उनमें अधिक बेचैनी है. उन्होंने जो खोया है वो बेशकीमती था. ख़ैर.
Rakesh Sangwan राकेश सांगवान
राकेश सांगवान जी ने पाखंड के खिलाफ काफी मुखर हो कर लिखा है जिसका विरोध उनके ही बीरदारी भाइयों ने उन्हें नास्तिक कह कर किया. संभवतः इसी वजह से राकेश जी ने मंशा जताई कि वे आने वाले साल में धन्ना भगत की जयंती पर सिख धर्म अपना लेंगे ताकि कोई उन्हें नास्तिक न कह सके. जाटों के लिए सिखी अनजानी चीज़ नहीं है. जाटों ने सिखी का जी-जान से निर्वाह किया है और वे ख़ुद भी सिखी की जान हैं. उनकी दलील है कि सिखी मीरी-पीरी और पाखंड रहित किरत पर आधारित है जिसे अध्यात्म कहा जाता है. उनकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में कई विचार कौंधने लगे जिसे कमेंट के तौर पर उन्हें भेजा है. उसी कमेंट को अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ :- “
आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई बातें याद हो आईं. खुशवंत सिंह ने कहीं कहा है कि सिखी का मतलब जाट ही है (उनके ओरिजिनल शब्द याद नहीं लेकिन अर्थ यही था.)
आपकी पोस्टों पर कई लोग आपको नास्तिक कहते रहे हैं. नास्तिक या तर्कशील होना कोई अवगुण या गाली नहीं है. जो लोग इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं वास्तव में वे धर्म की अवधारणा (कंसेप्ट) को लेकर भ्रम में है. आदमी धर्म की शरण में नहीं जाता बल्कि वो धर्म यानी किसी आचार-व्यवहार, गुण और विचार को ओढ़ता है. उस ओढ़ने को धर्म कह दिया जाता है. कोई बता रहा था कि ‘धर्म’ की अवधारणा ‘धम्म’ की अवधारणा से अलग है. फिर आपकी यह बात सही है कि धर्म-धर्म खेलना है तो धर्म पकड़ना ही पड़ेगा. एक घुंडी यह है कि यदि कोई कहता है कि वो किसी खास धर्म में जा रहा है तो प्रतिक्रिया बड़ी होती है. यदि वो कहता है कि मेरी गुरु नानक या गुरु गोविंद सिंह या खालसा पंथ में आस्था है तो प्रतिक्रिया की प्रकृति (narrative कह सकते हैं) बदल जाती है. आप की पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट करके जाटधर्म का उल्लेख किया है. एक सज्जन ने कहा है कि जाटधर्म, बौद्धधर्म और सिखधर्म में कोई अंतर नहीं है. सिखिज़्म के लिए ‘सिखी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो बहुत सटीक है. जीवन शैली के संदर्भ में मुझे सिखी और जाटिज़्म को एक समझने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब सरकारी फॉर्म में धर्म लिखने की बात आती है तो जाटधर्म या जाटिज़्म शब्द के सरकारी संदर्भ कहीं नहीं मिलते. जाहिर है कि जाटों के इतिहास में जाटधर्म ना तो परिभाषित है और ना स्थापित. उसे जैसे-तैसे परंपरागत हिंदू शब्द के अर्थ में फिट किया गया है. बुद्धिज्म के साथ भी यही हुआ लेकिन नवबौधों ने और सिखों ने अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने की प्रभावी कोशिशें की हैं जो जारी हैं. क्या दलित भी जाटधर्म में आते हैं? मेरा मानना है कि आते हैं क्योंकि इन सभी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बौधमत है. एक धर्म से दूसरे धर्म में ‘भागने’ का जहां तक सवाल है यह सवाल उन लोगों की सोच से पैदा होता है जिनके दिल में धर्म नाम की चीज का डर इतना बैठा दिया गया है कि ‘धर्म बदलने’ के नाम से ही उनकी धमनियों का चलता रक्त रुकने लगता है. बिना जाने कि धर्म डरने की नहीं बल्कि धारण करने की चीज है. यदि हम धर्म को प्रेत बना लेंगे तो वह पक्का पीछे पड़ेगा वरना धर्म का काम नहीं कि वो इंसान के पीछे पड़े बल्कि यह इंसान का काम है कि वो किसी इंसानी गुण का पीछा करे और उस धर्म को धारण कर ले. सिखी की विशेषता यह है कि वो स्थापित है - समाज में भी, धार्मिक क्षेत्र में भी और राजनीति में भी.” यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैंने इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया है. पहली बात यह कि कुछ मेघ सिखी में हैं. दूसरे, धर्म को लेकर मेघों की नई पीढ़ी में बेचैनी और उलझन है. तीसरे, पढ़ी-लिखी पीढ़ी परंपरागत धर्म पर कड़े सवाल ज़ोर से उठाने लगी है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर और अन्यथा भी ‘मेघ धर्म’ और ‘मेघ मानवता धर्म’ पर चर्चाएँ होती रही हैं. हो सकता है अन्य जातियों में भी अपने धर्म की पहचान करने की प्रवृत्ति हो. इन जानकारियों का मुझ पर असर हुआ है. इसलिए यह सब लिख डाला.

07 June 2019

Your Cultural Capital - आपकी सांस्कृतिक पूँजी


जून का पहला हफ्ता है. सुबह के पौने पाँच बजे हैं. पक्षियों की 'गुड मॉर्निंग' और 'हैलो-हाय' शुरू हो चुकी है और मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया हूँ. एक ग्रुप है जिसमें रात की 'गुड नाइट' से पहले मेघ-जन एक दूसरे को तल्ख़ी और ज़िम्मेदारी के साथ से पूछ रहे थे कि- "तुम बताओ, तुमने बिरादरी के लिए क्या किया." इस सवाल पर लंबी बातचीत आख़िर 'गुड नाइट' पर ही ख़त्म होनी थी, हो गई. रात को जो सवाल सो गया था उसका प्रभात भी होना था, हुआ. समाचार-पत्र जैसा सुप्रभात. दशकों पहले समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन आया करता था जिसमें खूबसूरत-सा एक राजनीतिक नारा होता था- "यह मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया, यह सोचो कि तुमने देश को क्या दिया है." नारे का महकता गुलाब सीधा दिल पर आ गिरता था और दिल से आवाज़ आती थी, "सच्ची यार, आदमी को सोचना तो येई चइये कि उसने देश को क्या दिया." बच्चों का और युवाओं का बहुत कुछ देने को दिल कर आता है लेकिन क्या दें इसकी समझ नहीं होती. बात एक वलवला बन कर दिल में रह जाती है. मोटा-मोटी हम जो कार्य करते हैं वो हम देश को देते हैं और हमें जो मिलता है वो देश से मिलता है. सिंपल. सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूँजी के क्षेत्र में यदि कोई बिरादरी गरीबी रेखा से कुछ ऊपर हो तो एक-दूसरे से कोई तीखे तेवर से नहीं पूछेगा कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया.' गरीबी रेखा से नीचे है तभी यह सवाल बनता है. तो...चलो जी वहाँ....वो...देख लेते हैं एक नेता ने कम्युनिटी सेंटर बनवा दिया, श्मशान घाट में बेंच बनवा दिए और शानदार वाशरूम भी, नेता ने एक सामाजिक संगठन खड़ा कर दिया, कबीर मंदिर बनवा दिए, सालाना शोभायात्राएँ निकाल दीं, वगैरा. लेकिन चुनाव में बिरादरी ने उसे जिताया नहीं, हराया भी नहीं बल्कि हरवा दिया. यह सांस्कृतिक और राजनीतिक पूँजी के अभाव की वजह से होता है. इसे वोटिंग वाले लोकतंत्र में किसी बिरादरी के वोटों के बिखराव यानि सियासी ग़रीबी के रूप में पहचाना जाता है. व्हाट्सएप ग्रुप में हो या वो सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गली-नुक्कड़ वाली चिल्लर बहस में हो, उसमें जब कोई पूछता है कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया' तो इसे झगड़ा नहीं बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए. यह एक-दूसरे को और ख़ुद को जानकारियाँ दे कर मज़बूत करने की कोशिश होती है. ढीले ढँग से इसे 'केंकड़ाना टाँग खिंचाई' कह देते हैं लेकिन यह शुरुआती संघर्ष है जो अलग-अलग तौर-तरीक़े से होता है और दिखता ज़रूर है. यहाँ तक कि चलते-चलते ताने कसने वाले एक तरह से आपको अपने भीतर से मिलती ताकत का स्रोत बनने लगते हैं. यदि आपने अपनी बिरादरी के लिए सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में कुछ भी संचय करने की दिशा में कार्य किया है तो पक्की बात है कि आपने देश के लिए कुछ किया है और देश को कुछ दिया है. चलिए 'पूँजी' के अर्थ जान लेते हैं. (आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसके बारे में दिल में एक डर-सा है. काश इसे सरल शब्दों में लिख सकता. परिभाषाओं के साथ अधिक छेड़-छाड़ नहीं हो सकती क्योंकि ये महीन धागे के अनुशासन में बुनी होती है.)

छात्र जीवन से ही परिभाषाओं के बोझिल शब्दों से डरता हूँ. लेकिन अब शब्दों की जमा पूँजी ने डर कम कर दिया है. लेकिन शब्दों की व्हेट लिफ़्टिंग आज भी करनी पड़ती है.😉

1. तो, सभ्याचारक पूँजी (cultural capital) की परिभाषा को समझते हुए चलना ज़रूरी है जिसे कुछ ऐसे समझाया गया है:- सभ्याचारक पूंजी में एक व्यक्ति की सामाजिक संपत्ति (तालीम, अक़्ल, बोल-वाणी और पोशाक का स्टाइल आदि) शामिल होते हैं जो एक स्तरीकृत (stratified) समाज में सामाजिक गतिशीलता (social mobility) को बढ़ावा देती है. (यानि आप उनकी मदद से समाज में अपना काम-काज आसानी से कर सकते हैं). (यह) सभ्याचारक पूँजी रिवाज़ों की एक अर्थव्यवस्था (विनिमय प्रणाली) के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में कार्य करती है, और इसमें बिना फ़र्क के सभी चीज़ें और प्रतीकात्मक सामान (symbolic goods) शामिल होते हैं, जिसे समाज विरल और प्राप्त करने लायक समझता है. विनिमय (एक्सचेंज) की एक प्रणाली के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में, सभ्याचारक पूंजी में एकत्रित सभ्याचारक ज्ञान शामिल होता है जो सामाजिक हैसियत (social status) और ताकत देता है. (यहाँ पूँजी को ज्ञान, गुण, अभिव्यक्ति, प्रभावोत्पादकता, प्रस्तुतीकरण आदि के रूप में भी देखें).

2. सियासी पूंजी राजनीतिक सिद्धांत में इस्तेमाल एक रूपक (metaphor) है जो रिश्तों, विश्वास, सद्भावना, और राजनेताओं या पार्टियों और अन्य हितधारकों (stakeholders), जैसे घटकों के बीच प्रभाव के ज़रिए बनी ताक़त और संसाधनों के संचय की अवधारणा के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक पूंजी को एक प्रकार की मुद्रा के रूप में समझा जा सकता है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को जुटाने, नीति सुधार, या अन्य राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है. हालाँकि, पूंजी का शाब्दिक रूप नहीं है, लेकिन सियासी पूंजी को अक्सर एक तरह के ऋण, या एक संसाधन (resource) के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे बैंक किया जा सकता है (संभाल कर रखा जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है), खर्च या गलत तरीके से खर्च किया जा सकता है, निवेशित (invest) किया जा सकता है, खोया जा सकता है और बचा कर भी रखा जा सकता है.

कुछ विचारक प्रतिष्ठित (reputational) पूँजी और प्रतिनिधि (representative) राजनीतिक पूंजी में अंतर करते हैं. प्रतिष्ठित पूंजी एक राजनेता की विश्वसनीयता और दृढ़ता को संदर्भित करती है. इस तरह की पूँजी को निरंतर नीति पोज़िशनिंग करके और वैचारिक नज़रिए को बनाए रख कर संचित किया जा सकता है.

10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. आदर्श राजनीतिक दलों से बँधे लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज में अन्य के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग समस्त समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. ऐसे लोग अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



01 May 2019

History and common man - आम आदमी और इतिहास

हालाँकि इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना कुल मिला व्यक्ति और उसकी जाति के लिए एक अच्छी बात हो सकती है लेकिन तटस्थ सत्य से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए. ह्वेन सांग तटस्थ सत्य कहता है ऐसा सभी इतिहासकार मानते आए हैं. ऐसे ही कन्निंघम ने धरती खोद कर भारत के प्राचीन इतिहास के कई पक्षों को सप्रमाण उजागर किया. उसकी तटस्थता पर कोई उँगली नहीं उठाई जा सकती. हाँ जो उंगलियाँ यूँ ही उठ जाती हैं उन्हें अपनी तटस्थता साबित करनी होगी.
आखिरकार पाठ्यक्रमों में पढ़ाना पड़ेगा कि बौधमत वो प्राचीनतम जीवन शैली (या धर्म) है जिसका प्रभाव पूरे विश्व में देखा गया है. जहाँ तक जातिवाद और जातियों का सवाल है इस बीच भारत में कई जातियाँ बनी-मिटीं और आज भी बन-मिट रही हैं. इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना उनका अधिकार है. एक तरफ़ा और चयनित इतिहास फ़िज़ूल है और उसमें लोगों की रुचि कम ही रहेगी. समष्टिपरक सत्य का कोई विकल्प इतिहास लेखन में भी नहीं है.


25 April 2019

From Hind to Hindu - हिंद से हिंदू तक

कहते है कि ह्यूनसांग ने ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया था और कि ‘हिंदू’ शब्द का पहला प्रयोग राधाकांतदेव बहादुर रचित 'शब्दकल्पद्रुम' नामक शब्दकोश में हुआ था जो संस्कृत का काफी पुराना शब्दकोश है हालाँकि इसका प्रकाशन 19वीं शताब्दी में हुआ था. संभव है संस्कृत के अस्तित्व में आने से पहले भारत में उपलब्ध शब्द 'हिंद' (जैसे- हिंदकुश) को संस्कृत में अनुवाद करके 'हिंदू' बना दिया गया हो या किसी उच्चारण प्रवृत्ति के चलते वो ‘हिंदू’ बन गया हो. हिंदकुश शब्द अशोक के समय से पहले का है. यह भाषाविज्ञानियों की स्थापना है.

अपनी स्थापना के साथ ही ‘हिंदू महासभा’ ने ‘हिंदू’ शब्द को विस्तारपूर्वक नए अर्थ के साथ शस्त्र और शास्त्र की तरह उठाया. 1915 से पहले भी लोग ‘हिंदू’ शब्द को जानते थे लेकिन एक क्षेत्र विशेष के लोगों के अर्थ में. कबीर ने भी लिखा - ".....हिंदुअन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई." ये दोनों शब्द क्षेत्र का संकेत देते हैं।

इसमें एक दूसरा फैक्टर भी है. द्रवड़ियन भाषाओं में आखिरी वर्ण के साथ अंत में उ की मात्रा का उच्चारण होता है जिसकी वजह से वे 'बुद्ध' को 'बुद्धु' उच्चारित करते हैं. तीसरे, जिसे निकृष्ट पुरुष की तरह संबोधित करना हो उसके नाम के पीछे ‘उ’ या ‘ऊ’ की मात्रा उच्चारित करने की बुरी ही सही लेकिन एक परंपरा है, उदाहरण के लिए रामू, परसु, मंगलु या मंगलू आदि. यह किसी व्यक्ति को क्षुद्र या पतित करार देने की युक्ति है.

‘हिंदू’ शब्द को काला, चोर, ठग आदि के अर्थ में भी जाना जाता रहा है. इस नज़रिए से देखें तो ‘हिंदू महासभा’ और उसके संगठनों ने ‘हिंदू’ शब्द को व्यापक अर्थ दे कर उसे ग्राह्य बनाने का प्रयास किया और उसे धर्म की सीमा तक खींच ले गए. इस तरह उन्होंने मनुवादी व्यवस्था की व्यापक सीमाओं को स्थापित करने का प्रबंधन किया और अब तक कर रहे हैं. लेकिन उनकी  व्यवस्था से आया जातिवाद उनके गले की फांस बनता जा रहा है. उनके ‘हिंदू’ शब्द को जातिवाद से अलग करना कठिन कार्य है.

‘हिंदू’ शब्द के बारे में यदि ऊपर बताई सरल बात पकड़ में न आए तो यह आलेख आप देख सकते हैं.

16 April 2019

Meghvahana and Megh - मेघवाहन और मेघ


राजतरंगिणी और मेघ लिखते समय और इतिहास का दर्शन समझते हुए कल्हण की राजतरंगिणी के बारे में कुछ समझा भी और कुछ सवाल भी मन में उठे थे. ख़ैर !

जो मेघजनमेघवाहनका नाम सुन करराजतरंगिणीमें अपने इतिहास की प्यास बुझाने आते रहे थे वे ख़ुद को रेगिस्तान में महसूस करते थे. वही अनुभव मेरा भी है. इस पुस्तक मेंमेघवाहनके बारे में जो लिखा गया है उसका सार यह है कि मेघवाहन का पिता उसी युधिष्ठिर का पड़पोता (great grandson) था जिसे गांधार के राजा गोपादित्य ने शरण दी थी. वो सन 25 ईस्वी में उठान पर था और उसने 34 वर्ष तक राज किया. (यह इस शर्त पर यहाँ लिख दिया है कि कोई मुझ से युधिष्ठिर की जन्म-मरण तिथि न पूछे) उसका विवाह असम की एक वैष्णव राजकुमारी अमृतप्रभा से हुआ था, जब कश्मीर का राजा संधिमति अनिच्छुक (unwilling king) साबित हुआ तो उसके कश्मीरी मंत्री (कश्मीरी ब्राह्मण) मेघवाहन को (संभवतः अफ़गानिस्तान से) कश्मीर ले आए थे. मेघवाहन ने पशुवध पर प्रतिबंध लगा दिया, उसने बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) की स्थापना की, उसकी रानियों ने बौद्ध विहार और मठ बनवाए, जिससे उसके बौध राजा होने का संकेत मिलता है. मेघवाहन श्रेष्ठ राजा था, उसने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया था.

मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि राजतरंगिणी के मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. वैसे भी मेघवाहन को पौराणिक कथाओं के साथ हैशटैग किया गया है जो सोद्देश्य किया गया है, ज़ाहिरा तौर पर यह इतिहास में बहुत कन्फ्यूज़न पैदा करता है. इस बारे में विकिपीडिया पर भरोसा करना अपनी ईमानदारी पर शक करने से भी बुरा है.

बेहतर है कि राजतरंगिणी के 'मेघवाहन' को समय की धारा में बह जाने दीजिए. वैसे आपकी कोशिशों को रोकने की मेरी मंशा नहीं है.


13 April 2019

The Philosophy of History - इतिहास का दर्शन

कहा जाता है कि पहले धर्म विकसित होता है और दर्शन यानी फ़लसफ़ा बाद में. यही बात इतिहास के दर्शन पर भी लागू होती है. पहले इतिहास अस्तित्व में आता है और बाद में उसकी विशेषताओं या दोषों के आधार पर उसका फ़लसफ़ा लिखा जाता है. साधारण शब्दों में कहें तो इतिहासकारों द्वारा लिखी गई सामग्री को समझने के लिए जो तरीक़े विकसित किए जाते हैं उनको ‘इतिहास का दर्शन’ कह दिया जाता है.

इतिहास का अर्थ है वे घटनाएं और कार्य जो इंसानी ज़ात के अतीत को (कालक्रमानुसार भी) बताते हैं. इसके दो भाग होते हैं -  पहला - ‘वास्तव में क्या हुआ’ उसका विश्लेषण, और दूसरा - जो हुआ उसका अध्ययन, विवरण और व्याख्या. इसकी बुनियाद पुरात्त्व संबंधी प्रमाण, पुस्तकीय दस्तावेज़, प्रत्यक्ष स्थिति और अनुमान पर खड़ी होती है.

आज के अर्थ में जिसे इतिहास कहते हैं वैसा इतिहास लिखने की परंपरा भारत में नहीं थी. पहली ऐतिहासिक संदर्भों वाली कल्हणकृत पुस्तक राजतरंगिणी को माना जाता है जिसे बाहरवीं शताब्दी की रचना कहा गया है. इसे भारत में इतिहास लेखन का पाषाणयुग कहा जा सकता है. इसकी अपनी सीमाएँ थीं. इसकी प्रामाणिकता के बारे में आप एक हद तक ही आश्वस्त हो सकते हैं. इसमें पौराणिक संदर्भ बड़ी मात्रा में हैं. कहने का तात्पर्य यह कि 2री से 4थी शताब्दी के बीच संस्कृत में जो साहित्य रचा गया उसे प्रत्यक्ष के साथ गड्डमड्ड करके एक अलग तरह का कथात्मक रूप देने की कोशिश की गई जिसे दुनिया में इतिहास लेखन की मिथ पद्धति के तौर पर ही जाना जाता है.
दूसरा समय वो था जब किसी समय किसी क्षेत्र में पैदा हुए विजेता को ही इतिहास लिखने या लिखवाने का राजकीय या धार्मिक अधिकार था. 'राजतरंगिणी' के बाद भी इस सिलसिले में मिथ (पौराणिक कथाओं) में इतिहास पिरोने की परंपरा जारी रही. यहाँ तक कि कई बार उन्हें आंशिक इतिहास कहना भी कठिन हो जाता है, हालाँकि उनमें ऐतिहासिक संकेत होते हैं या हो सकते हैं. उनमें विजेता वर्ग की कबीलाई कथाएं, परंपराएं और व्यवहार (संस्कृति, सभ्यता) शामिल रहता है. इतिहास लेखन की इस पद्धति में इंसान की प्राकृतिक गरिमा एक संयोग का विषय बन कर रह जाती है. उससे यह जानना कठिन हो जाता है कि तर्कसंगत क्या है और नैतिक रूप से स्वीकार्य क्या है.

18 वीं शताब्दी में 'इतिहास का दर्शन' एक जबरदस्त परिवर्तन से गुज़रा. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ ही ईश्वरीय और धर्म शास्त्रीय नज़रिए को बहुत बड़े स्तर पर चुनौती मिली. इसके साथ ही इतिहास में मिश्रित मिथ और उनकी लेखन शैली पर प्रश्नचिह्नों की बौछार हो गई और वे गलने लगे. अब इतिहास को लेकर एक नया नज़रिया और दर्शन विकसित हो रहा है :-  

“इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है और जो लिखा गया है बल्कि इतिहास वो भी है जिसे हमारे पुरखों ने सहा है और जो लिखा नहीं गया है.”

यानि जो इतिहास लिखा नहीं गया वो अस्तित्व में है. यह दर्शन एक नए इतिहास का निर्माण कर चुका है  जिसका दर्शन बाद में पुनः लिखा जाएगा.

27 March 2019

Some References from Ad-Dharmi Movement - आदधर्मी आंदोलन के कुछ संदर्भ

मार्क योरगन्समायर (Mark Juergensmeyer) एक अमेरिकी स्कालर हैं जो भारत में एक  अध्ययनात्मक दौरे पर आए थे और बाद में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - Religious Rebels in the Punjab - The Social Vision of Untouchables. हालांकि पंजाब में 'मेघ' एक छोटा समुदाय है लेकिन इस पुस्तक में उनका उल्लेख पर्याप्त रूप से किया गया है. इस पुस्तक को अजंता प्रकाशन, दिल्ली ने 1988 में छापा था. योरगन्समायर Theology (धर्मशास्त्र, ईश्वर मीमांसा) के विशेष जानकार हैं.

उक्त पुस्तक के पृष्ठ 27 पर इस बात का उल्लेख किया गया है कि शुद्धिकरण (जो एक विकसित और कार्यकुशल प्रक्रिया थी) के ज़रिए इस्लाम और ईसाइयत के दायरे में चले गए निम्न जातियों के लोगों को हिंदू स्वीकार्यता में लौटाना था. यह कार्य 1919 में किया गया था. वर्ष 1910 तक सियालकोट क्षेत्र के 36000 से अधिक लोग, जो अनुसूचित जातियों में तुलनात्मक नज़रिए से ऊंचा स्टेटस रखते थे, वे आर्यसमाजी हो गए थे. जाहिर है कि उस समय के युवा मेघ आर्यसमाज और उससे संबंधित संस्थाओं के संपर्क में आए और उनसे जुड़ गए. उन संस्थाओं में आर्यसमाज स्कूल और डीएवी कॉलेज शामिल थे. इस व्यवस्था ने शिक्षित अनुसूचित जातियों के युवाओं को एक नया रूप-रंग दिया. इसके पीछे यह भी मंशा रही कि वे आर्य समाज के  हक में खड़े रहेंगे. यह प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि जब शुद्धीकरण के नाम पर कुछ निम्न जाति के सिखों के केश सार्वजनिक रूप से काटे गए तो सिखों में ऐसे शुद्धीकरण के प्रति वितृष्णा जाग गई. 

पृष्ठ 214 पर उल्लेख है कि महाशों को भी वे आर्य समाज में लाने में सफल हुए. उन महाशों में से कईयों ने दावा किया कि वे इससे पहले मेघ ही थे जो अछूत जातियों में चमारों और अन्य के मुकाबले कुछ ऊंचा स्टेटस रखते थे.

इस पुस्तक के पृष्ठ 225 पर 1947 के भारत विभाजन के बारे में मार्क ने बहुत ही बढ़िया और सटीक टिप्पणी दी है जिसमें वे लिखते हैं - “चमार समुदाय के अतिरिक्त स्टेटस में तनिक ऊंची कुछ अन्य जातियों को भी अपने घर-बार छोड़कर खींची गई सीमारेखा के पूर्व में आना ज़रूरी लगा. जो कोई पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके में रहते थे उनकी पहचान हिंदुइज्म या सिखइज़्म के साथ इस तरह जुड़ी थी कि उन्हें भी पूर्व में आना पड़ा और इसके उलट जुलाहों और मोचियों को भारतीय पंजाब से उल्टी दिशा (पाकिस्तान) में जाना पड़ा.  उदाहरण के लिए अल्लाहपिंड गांव जोकि विभाजन रेखा के ज़रा पूर्व में था वहां कोई मुस्लिम नहीं रहता है. हालांकि सच्चाई यह है कि उनके पास ज़मीन थी और गांव का नाम ही 'अल्लाहपिंड' यानी 'अल्लाह का गांव' था. उनकी जगह पश्चिमी पंजाब के जाट सिख और निम्न जातियों के मेघ आ गए जो हिंदुओं में ‘कन्वर्ट’ बन गए थे.” 

(इस पैराग्राफ में हिंदू होने, हिंदू ना होने या हिंदू शब्द की अबूझ व्याख्या के साथ-साथ उसके संदर्भगत अर्थ से निकली बेघर होने की मर्मांतक पीड़ा छुपी हुई है. शुद्धिकृत लोगों के लिए ‘कन्वर्ट’ शब्द का प्रयोग एक अलग तरह का दर्द देता है.)

पृष्ठ 266 पर ‘दलित संघर्ष समिति’ की पृष्ठभूमि के साथ मार्क ने समिति के अधिकारियों और प्रायोजकों की लंबी सूची में जालंधर की उन तीन जातियों (मेघ, चमार, चुहड़ा) का मुख्य रूप से उल्लेख किया है जो इस समिति में थे. इसी संदर्भ में उन्होंने कुछ व्यक्तियों के नाम भी प्रधानता के साथ लिखे हैं जिनमें श्री सतपाल महे जिनका आदधर्म के साथ पारिवारिक संबंध रहा. उनके संबंधियों में श्री सुंदर दास रहे. उनके एक कज़िन मनोहर लाल महे का भी नाम विशेष रूप से लिया गया है जो बूटा मंडी के रहने वाले थे. (मेघ समुदाय के कौन-कौन से प्रतिष्ठित व्यक्ति इस समिति में रहे उनके नामों की जानकारी की दरकार है. क्या यह समिति आज भी सक्रिय है. उनके सक्रिय समुदायों में कौन-कौन से समुदाय हैं?)

पृष्ठ 225 पर उठाए गए महीन सवाल का जवाब पृष्ठ 298 पर खुलकर सामने आ गया है. वहां लिखा गया है कि आर्यसमाज ने कई संगठन स्थापित किए जो उपदेशात्मक कार्य करते थे और उन्होंने कई समितियां बनाईं और रीकन्वर्शन (शुद्धि) का सारा आंदोलन शुरू किया. उन्होंने अछूतों का अभिलोपन (obliterate) करने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने यह कहकर कि छुआछूत समाप्त हो चुकी है और कोई भेदभाव नहीं है, हजारों अछूतों को लुभा कर शुद्धीकरण के जाल में फंसा लिया. बेचारा अछूत फिर से हिंदू आर्यों के द्वारा फांस लिया गया जैसे कोई हाथी के दांतों में उलझ जाता है. वास्तविकता यही थी कि हिंदू आर्य अभी भी मनु के अनुयाई थे जिसमें बहुत भेदभाव था. अछूत जान गए थे कि हिंदू आर्यों ने उन्हें अपने जाल में फंसा लिया है इसलिए वो अब अपने संगठन बनाना चाहते थे. उन्होंने खुद अपने कल्याण के लिए रुचि लेना शुरू किया. वे ऊंची जाति के हिंदुओं का विश्वास नहीं करते थे. संगठन खड़े किए गए, समितियां बनाई गई और उन्होंने अपने गुरुओं का चुनाव भी कर लिया.

सन 1925 के शुरू में एक समिति बनाई गई थी जिसका नाम रखा गया था ‘आदधर्म’. ऋषि वाल्मीकि, रविदास, कबीर और नामदेव के नामों के तहत इसकी स्थापना की गई. पहली बैठक मंगू राम मुग्गोवालिया की अध्यक्षता में 11 से 12 जून 1926 को गांव मुग्गोवाल, थाना माहलपुर, तहसील गढ़शंकर, जिला होशियारपुर में की गई. इसमें सभी अछूत जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया चुहड़ा, चमार, रविदासी, सांसी, जुलाहा, मेघ, कबीरपंथी, महाशा और कई अन्य जातियों के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया. अछूतों के अलावा इसमें अन्य सम्मानित लोगों ने भी हिस्सा लिया उनमें ईसाई, सिख, मुस्लिम, आर्यसमाजी और सनातनी भी थे. इस समिति का विरोध भी हुआ. लेकिन समिति को चलाए  रखने के पक्ष में ज़रदस्त समर्थन मिला और वो सशक्त होती चली गई. इसका मुख्यालय जालंधर में बनाया गया और इसका पूरा नाम रखा गया ‘आदधर्म मंडल ऑफ पंजाब, जालंधर सिटी’. (इस आदधर्म आंदोलन के साथ एडवोकेट हंसराज भगत जुड़े थे इसका उल्लेख हमें मिल जाता है. उनके अतिरिक्त और भी मेघ यदि इससे जुड़े थे तो उसकी जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.)

‘दलित संघर्ष समिति’ के संदर्भ में कुछ बातें कहने लायक हैं. उक्त समिति का मुख्यालय जालंधर में ही रहा है जहां मेघों की बहुत बड़ी न सही लेकिन काफी संख्या है. अब यह बात देखने लायक है कि इस बीच मेघों और अन्य स्थानीय अनुसूचित जातियों जैसे रविदासी, रामदासी समाज में परस्पर संबंध बढ़े हैं यानि उनमें शादियाँ होती हैं. लेकिन मेघ समुदाय के कुछ लोग जब अपनी श्रेष्ठता की हाँकते हैं तो उसे अन्य समुदायों के साथ राजनीतिक संबंध न जोड़ने तक खींच कर ले जाते हैं.  यह घातक है क्योंकि पंजाब में मेघों की अपनी जनसंख्या बहुत कम है. वे अन्य समुदायों के साथ मिलकर ही अपनी राजनीतिक शक्ति का गठन कर सकते हैं. जालंधर में देखा गया है कि मेघ समुदाय के कुछ लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और वे रविदासी या रामदासी समुदाय के नेताओं के साथ सहयोग करते हैं. मेरा मानना है कि यह सही रास्ता है और आगे चलकर इसी से सकारात्मक नतीजे निकलेंगे. जरूरी नहीं कि राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ही रहे. पार्टी बदल भी जाए तब भी ऐसे साथ को और गठबंधन को निभाना हितकारी है.

अंत में एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं कि मुझे 'रिलिजियस रिबेल्स Religious Rebels'  या 'धार्मिक विद्रोही' शब्द सही नहीं लगता. एक समय था जब राजाओं, महाराजाओं या सामंतों की व्यवस्था के प्रति विरोध करने वाले को विद्रोही या द्रोही कह दिया जाता था. अब वो समय नहीं है. अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां बहुमत ही व्यवस्था का नियामक होता है. व्यवहारिक रूप से भले ही आज अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी उस व्यवस्था का नियमन (रेग्युलेशन) ना कर पाते हों लेकिन बँटे होने के बावजूद उनकी सभ्यातामूलक जीवन शैली एक है और अनेक अवसरों पर वे आपस में जुड़ा महसूस करते हैं. उक्त जीवन शैली वाले लोग जब बहुसंख्यक हैं और धर्म के प्रति उनकी अवधारणाएँ लगभग एक समान हैं तो उन्हें किसी अन्य धर्म के प्रति 'विद्रोही' कैसे कहा जा सकता है.

कुछ हिंदी साहित्यकारों ने कबीर को विद्रोही व्यक्तित्व कहा था. उनकी ही विचारधारा के लोग कबीर को छिपा हुआ बौध भी कह गए क्योंकि कबीर का संबंध सिद्ध और नाथपंथी साधुओं से रहा जो बौधमत की परंपरा से ही निकली धाराएँ थीं. कबीर को ध्यान से पढ़ें तो वे तर्कवादी (Rationalist) ठहरते हैं. तर्क करने वाले को ढीली भाषा में नास्तिक कह दिया जाता है. अब 'तर्क' करने का अर्थ 'विद्रोह' भी किया जाए तो उसे स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आदधर्म कोई विद्रोह नहीं है बल्कि यह बहुजनों का अपने मूल के प्रति अपनी व्यापक आस्था को बेहतर तरीके से संगठित करने का प्रयास था. विद्रोही तो वो समूह थे जो आदधर्म आंदोलन का विरोध कर रहे थे. 

19 March 2019

Our Hero Sh. Lekhraj Bhagat, IPS - हमारे हीरो श्री लेखराज भगत, आईपीएस

श्री लेखराज भगत, आईपीएस

(यह आलेख श्री लेखराज भगत, आईपीएस की सुपुत्री श्रीमती स्वर्णकांता के उद्गार हैं)
(1)
मेरे पिता श्री लेखराज भगत जी का जन्म सन 1930 में सियालकोट में हुआ था. एक बहुत ही साधारण परिवार में उन्होंने जन्म लिया. उनसे छोटी दो बहनें थीं. वे अपने परिवार में सबसे बड़े थे. उनके पिताजी (मेरे दादा जी) बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे. उन्होंने 5 या 6 क्लास ही पास की थी. दादाजी के दो बेटे और दो बेटियां थीं. दादी जी भी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी थीं. बड़े होने पर मेरे पिताजी का दाख़िला गवर्नमेंट स्कूल में हुआ. जब वे नवीं क्लास में गए तब उनके गांव के आसपास कोई स्कूल नहीं था. इसलिए वे अपने ननिहाल में गए. उनके ननिहाल के पास एक आर्य मॉडल स्कूल था.  उनका वहां एडमिशन हो गया. उनकी पुढ़ाई का ज़्यादातर खर्चा उनके मामाजी दिया करते थे. मेरे पिताजी एक-दो महीने के बाद ही घर जा पाते थे. अपने ननिहाल के प्रति मेरे पिताजी के मन में बहुत प्रेम और लगाव था. परिवार में नाना-नानी और दो मामा थे.

जब पिता जी ने दसवीं क्लास का इम्तिहान दिया तभी 1947 में भारत का विभाजन हो गया. विभाजन की वजह से पिता जी इधर भारत में गए. सबसे पहले वे जालंधर लगाए गए कैंप में रहे. पिताजी का एक छोटा भाई भी था उनके साथ. उन हालात में पिता जी का जो छोटा भाई चल बसा जिसकी वजह से मेरी दादा-दादी बहुत सदमें में आ गए. उन्हें लगा कि ऐसे हालात में हमारा कोई बच्चा नहीं बचेगा. फैसला हुआ कि जम्मू में मेरे पिताजी के ननिहाल हैं. वहाँ भेजने से बच्चों का लालन-पालन ठीक से हो जाएगा.

उस समय पिता जी के दादाजी भी जिंदा थे जो खड्डियों (हथकरघा) पर कपड़ा बुनने का काम किया करते थे. इस समय मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा, शायद उनके गांव का नाम पत्तन था, वहां चले गए. जम्मू में जहाँ पिताजी का ननिहाल था वहां एक तवी नाम की नदी है. वहीं उसके किनारे पर एक गांव है उनका, वे वहां बस गए. मेरे दादाजी के पिता (मेरे परदादा जी) को जम्मू में आर. एस. पुरा तहसील के एक गांव ‘ढींढें कलां’, वहां उनको थोड़ी-सी ज़मीन मिल गई और उन्होंने वहाँ रहना शुरू कर दिया. कुछ सालों के बाद मेरे परदादा जी का देहांत हो गया.

पिताजी को दसवीं का सर्टिफिकेट नहीं मिला था क्योंकि दसवीं क्लास की परीक्षा उन्होंने पाकिस्तान में दी थी और देश का बँटवारा हो गया था. बहुत कोशिशों के बाद उनको सर्टिफिकेट मिला. उसके बाद उन्होंने ग्यारहवीं-बारहवीं, जिसे उन दिनों एफ.ए. कहते थे, वो पास की. वो पास करने के बाद उन्हें अगली ज़रूरत नौकरी की थी. जम्मू में नौकरी मिलने नौकरी मिलना कठिन था क्योंकि वहां अफ़रा-तफ़री का माहौल था.

1950 में पिताजी की शादी हो गई. शादी के बाद परिवार पालना था इसलिए नौकरी पाने की जल्दी थी. तभी 1952 में ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में अस्सटेंट की नौकरी मिल गई. वहां उन्होंने जॉइन कर लिया. वहां पर उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. उस समय क्लर्क की नौकरी भी बड़ी चीज़ मानी जाती थी. उनके सीनियर उन्हें बहुत पसंद करते थे. पिता जी की रिहाइश शकूरबस्ती में थी. ऑफिस से घर दूर था. शुरू में वे साइकिल पर ऑफिस जाते थे. रात 11,11.30 उन्हें छुट्टी होती थी तो वापसी पर उन्हें कई बार महसूस हुआ कि कोई उनका पीछा करता है. पिताजी ने अपने बॉस को कहा कि कल से मैं नहीं आऊंगा. उसने पूछा कि 'क्या हो गया?' उन्होंने बताया कि 'कोई मुझे रात को रास्ते में डराता है, अब मैं नहीं आऊंगा.' उनकी बात समझते हुए बॉस ने उनके लिए एक सरकारी अंबेसडर कार का प्रबंध कर दिया और कहा कि 'आज से तुम कभी साइकिल पर नहीं आओगे. गाड़ी जाएगी और वहां से लेकर आएगी.' इस तरह पिता जी बताया करते थे कि जब मैं क्लर्क था तब मुझे गाड़ी लेने आया करती थी.

1962 में उनकी आंखों में कुछ तकलीफ़ हुई. मुंबई जा कर उन्होंने इलाज कराया. वहीं उन्होंने अपने एक दोस्त को देखा कि वह बहुत-सी किताबें लेकर बैठा रहता था और पढ़ रहता था. पिताजी ने पूछा कि ये किन विषयों की किताबें हैं. जिन्हें आप इतना पढ़ते हो. तो उसने बताया कि एक इम्तेहान होता है - आईएएस का, और वो देश में सरकारी नौकरी का सब से ऊँचा मुक़ाम होता है. पिताजी की जिज्ञासा बढ़ी और उन्होंने उससे बहुत सी जानकारी ली कि क्या करना है, क्या पढ़ना है. जानकारी लेकर जब वे वापिस दिल्ली पहुंचे तब तक उनके मन में इस बारे में इतना गहरा रुझान पैदा हो गया था. उन्होंने फटाफट ढेर सारी पुस्तकें खरीदीं. (इस बीच उन्होंने बी.ए. कर ली थी और इंग्लिश मास्टर्स का फर्स्ट ईयर भी जॉइन किया था. उनकी वे पुस्तकें मेरी एम.ए. इंगलिश में बहुत काम आई. मैंने वो पुस्तकें बहुत सहेज कर रखी हुई थीं.)

मेरी मां उनके साथ ही दिल्ली में रहती थी. जब परीक्षा की तैयारी का समय आया तो मां को उन्होंने यह कह कर गाँव भेज दिया कि मेरे सामने एक लक्ष्य है और मुझे उसके लिए बहुत फोकस चाहिए. परिवार मेरे साथ रहेगा तो शायद मैं उतना फोकस न कर पाऊं जितना ज़रूरी है.

(2)
उन्होंने 1963 की आईएएस/आईपीएस की परीक्षा दी और क्वालीफाई करने के बाद सिलेक्शन हो गया. 1964 में उन्होंने प्रोबेशनर के तौर पर जॉइन कर लिया. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उन्होंने 1965 में एडीशनल एस.पी. करनाल के तौर जॉइन किया. तब उनका वेतन ₹450 था. समय ऐसा था कि उस तनख़्वाह में बरकत बहुत थी. जो रिहाइशी कोठी मिली थी वो बहुत बड़ी और आलीशान थी. किराया 75 रुपए था. उसमें एक सर्वेंट क्वार्टर भी था. तभी हम ने पहली बार देखा कि घर में एक सोफा सेट होता है, बेडरूम होते हैं, वॉशरूम होता है. इन सारी चीजों का हमें पहली बार पता चला, उस समय मैं तीसरी क्लास में पढ़ती थी. घर में सर्वेंट वगैरा सब थे. पिताजी को लेने जीप आती थी. एक्सरसाइज़ के लिए उन्होंने साइकिल रखी हुई थी. कोठी के सामने ही एक गवर्नमेंट स्कूल था जहाँ हमारा एडमिशन होना था. मुझे और मेरी बड़ी बहन आदर्श कांता को डैडी एडमिशन के लिए जब लेकर गए तब डैडी ने यूनिफॉर्म पहनी हुई थी. जैसे ही हम लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ बैठे बच्चे खड़े होकर सैल्यूट करने लगे. हम हैरान थे कि वे ऐसा क्यों कर रहे थे. हमें पता ही नहीं था कि यूनिफॉर्म वाले व्यक्ति की समाज में कितनी इज़्ज़त होती है. बच्चों के उस व्यवहार से हमें पता चला कि हमारे पिता जी का एक रुतबा है. जैसे ही हम प्रिंसिपल के ऑफिस में पहुंचे तो वे बहुत सम्मान के साथ उठ खड़े हुए. उन्होंने पिता जी से हाथ मिलाया और उनकी आपस में बहुत सी बात-चीत हुई. घर के सामने ही स्कूल था. एक ऑर्डरली हमें वहाँ छोड़ने जाता था. वही लेकर भी आता था.

उसके बाद हमारे पिता जी की ट्रांसफ़र पहले तो कुल्लू-मनाली हुई थी लेकिन अभी रास्ते में थे कि खबर मिली कि पंजाब का विभाजन करके पंजाब-हरयाणा बना दिया गया था. इसी सिलसिले में पिता जी को शिफ्ट करके 44वीं बटालियन, बीएसएफ जम्मू में तैनात कर दिया गया था.

जम्मू में पोस्टिंग का वो जो दौर हमारे जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण  समय था. पिता जी का स्टेटस और इतने रिश्तेदार हमारे घर आते थे कि कई बार हम घर के पर्दे उतारकर बिस्तर बनाते थे ताकि जो कोई आए वो एडजस्ट हो जाए. हमारा घर गांधीनगर में था और पिताजी की पोस्टिंग राजौरी में थी. वे महीना 15 दिन के बाद घर आते थे. हमारी पढ़ाई की वजह से उन्होंने हमें जम्मू के गांधीनगर में रखा था ताकि हमारी पढ़ाई निरंतर हो और उसमें कोई व्यवधान न पड़े. घर में नौकर-चाकर, खाना बनाने वाला और एक ऑर्डरली होता था, उन सब के ऊपर एक हवलदार होता था जो हर रोज़ सुबह-शाम आकर जानकारी लेता था कि घर में कुछ सामान तो नहीं लाना है. हमारे ननिहाल वाले भी अकसर आते रहते थे. कई बार तो घर पर जैसे मेला लगा रहता था. मुझे याद है कि कई बार तो 70-70 कप चाय बनती थी. 

पहले हम चार बहनें थीं. उसके बाद जब पिता जी कमांडेंट थे तब मेरे भाई का सन 1968 में जन्म हुआ. बहुत से रिश्तेदार आए. बहुत बड़ा फंक्शन किया गया. तब हमने देखा कि इतना बड़ा टेंट लगा था जैसे सारी दुनिया उसमें आ सकती थी. हम बड़े हो रहे थे और समझदार भी. हमारा लड़कपन यह सब देख कर प्रफुल्लित हो उठा था. वहाँ रहते हुए ईश्वर ने हमें मौका दिया था कि हर किसी को बस देना ही देना था. 1969 में पिता जी ने जालंधर में कमांडेंट के तौर पर जॉइन किया. तब भी हम बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे. पापा ने सोचा कि फिलहाल सारा परिवार साथ नहीं ले जाना चाहिए. इसलिए बड़े तीन भाई-बहन वहीं रहे और छोटे मम्मी-डैडी के साथ. शुरू में कुछ अजीब लगा. वहां बड़े-बड़े टेंटों में रहना था. यह भी एक नई बात थी. लेकिन सर्विसिज़ में वो टेंट भी जैसे स्वर्ग होता है. बहुत ही बड़े और सुंदर टेंट थे. उस दौर को भी हमने बहुत एंजॉय किया और फिर 1971 में पिता जी ने डी.आई.जी. ट्रैफिक के तौर पर चंडीगढ़ में जॉइन किया. जब हम चंडीगढ़ आए तब एक नई दुनिया में आ गए. वो दुनिया ऐसी थी कि पिताजी के नए सर्कल के कारण बहुत से नए लोगों के साथ दोस्ती हुई, पहचान हुई. और फिर अपने लोगों से मिल कर बहुत ही अच्छा लगता था. फिर हमने 11 सेक्टर में घर लिया. जैसे ही हमने घर लिया वैसे ही चंडीगढ़ में हमारी भगत बिरादरी के लोगों से मिलना-जुलना बहुत बढ़ गया. जब हम आए तो उस समय हमारे एक अंकल हुआ करते थे सीएसआईओ में - श्री एम.आर. भगत. अब वो नहीं रहे. बाद में उनका देहरादून ट्रांसफर हो गया था और वे शिफ्ट कर गए. आज वो पति-पत्नी दोनों नहीं हैं. सब से ज़्यादा हम उन्हीं के यहाँ जाया करते थे. श्री एम. आर. भगत जी की पत्नी ने भी हमारा ख़ूब स्वागत किया. इस तरह करते-करते हमारी खूब सारी जानकारी सब के साथ हो गई. वही हमें पहले पहल श्री ज्ञानचंद, आईएएस के घर लेकर गए थे. श्री इंद्रजीत मेघ और श्री केसर नाथ अंकल और भगत बिरादरी के बहुत से लोगों से मेलजोल हुआ. इसी दौरान हमारा परिचय श्री मिल्खीराम भगत, पीसीएस से भी हुआ. मेरी बड़ी बहन आदर्श कांता ने 1974 में पंजाब पंजाबी यूनिवर्सिटी में एम.ए. हिंदी जॉइन की थी. उसने जीसीजी से ग्रेजुएशन किया था. मैंने 1973 में प्रेप जॉइन किया था.

फिर 1973 में ज्ञानी जैल सिंह डैडी को एसएसपी के तौर पर ले गए अपने जिले फरीदकोट में ले गए. हम अक्तूबर 1972 में चंडीगढ़ से गए थे और उसके बाद हम 1974 में वापस आ गए. मुझे याद है कि अंग्रेजों के टाइम जिस जेल में ज्ञानी ज़ैल सिंह को रखा गया था वह जगह ज्ञानी ज़ैल सिंह जी ने डैडी को दिखाई थी और वहां कई फोटोग्राफ़ खींचे गए थे, इसलिए मुझे वह याद है. 1974 में हम फिर से चंडीगढ़ आ गए उसके बाद हम लोग ज्यादातर यहीं रहे. 1976 में डैडी ने कपूरथला में एसएसपी के तौर पर जॉइन किया. फ़रीदकोट और कपूरथला में जो घर उन्हें मिले वो कभी वहां के महाराजाओं के घर थे जो बहुत आलीशान थे. उनकी सीढ़ियां इतनी मजबूत थीं कि हाथी उन पर चढ़ जाए...बहुत ही आलीशान….
जितने भी स्टेशनों पर डैडी रहे वहाँ, मुझे 1966 का याद है, जब वह बीएसएफ में थे, तब उन्होंने सैंकड़ो लोगों को नौकरियाँ पाने में मदद की और इस तरीके से हज़ारों लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने में अपना सहयोग दिया. जो लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, वो हर कोई बीएसएफ में. आज उनके पोते-पोतियां हैं जो हमें कभी-कभार मिलते रहते हैं. जहां पर भी हमारे और डैडी के नानके-दादके जाते हैं वो हमें मिलते हैं वे पुरानी बातों को याद करते हैं और डैडी का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने उन्हें एक नया रास्ता दिखाया था. ऐसी बातें सुन कर मुझे बहुत खुशी होती है कि अपना पोज़िशन से डैडी ने उनके लिए जो बन पड़ा वो कर किया. फरीदकोट में भी बहुत से लोग, वो चाहे कहीं से भी आए हों, किसी भी जाति से आए हों, उनको नौकरी पाने में डैडी की मदद मिल जाती थी. मैं चंडीगढ़ में कॉलेज के हॉस्टल में थी. 1977 में मेरे होस्टल में एक बाबा जी थे जो कालेज में गार्ड थे. उनका एक पोता था. बाबा जी का काम था कि वो रोज़ सुबह मुझे न्यूज़ पेपर पकड़ाने आते थे. एक दिन उन्होंने मुझे कहा कि 'आप इतने काम कराते हो आप एक काम मेरा भी करा दो. मेरा एक पोता है उसे नौकरी लगवा दो.' मैंने कहा 'ठीक है. जब मैं घर जाऊंगी तो उसे आप मेरे साथ भेज दो.' मैं जब भी कभी चंडीगढ़ से घर जाती थी तो मेरे साथ कोई ना कोई रहता था. लड़का मेरे साथ गया और वहाँ जा कर मैंने उसे पिताजी से परिचित कराया. वो हमारे घर पर ही रुका. मैंने पिता जी से कहा कि यह दसवीं पास है. इसे कहीं एडजस्ट करा दो. उन्होंने कहा कि कल यह मेरे ऑफिस में आ जाए, मैं देखता हूँ. उसके बाद मैं चंडीगढ़ आ गई. और अगली बार जब बाबा जी मिले तो उन्होंने बताया कि उनका लड़का चंडीगढ़ आया है वो पुलिस में भर्ती हो चुका है. लगा जैसे किसी ने चुटकी बजाई हो. मुझे याद है 1976 में जब हम फिल्लौर में थे, तब हमारी बिरादरी के और ददिहाल और ननिहाल के कई लोग, अन्य जान-पहचान के लोग किसी न किसी काम से आते रहते थे. वहाँ भी डैडी ने लोगों की मदद की. आज डैडी के बहुत से जान-पहचान के लोग राजस्थान में बसे हैं. उन दिनों शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने नौकरी के लिए मदद माँगी हो और उसकी मदद न हुई हो. कइयों को तो हम जानते तक नहीं थे लेकिन उनको सहायता मिली. इस तरह से हज़ारों लोगों के जीवन को पिता जी ने छुआ और उनकी ज़िंदगी बदल गई.
लेखिका - श्रीमती स्वर्णकांता
विशेष उल्लेख
मेघ समुदाय के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता श्री इंद्रजीत मेघ ने अपनी यादें साझा करते हुए बताया है कि श्री लेखराज जी ने न केवल रोज़गार के मामले में बल्कि गंभीर अदालती मामले सुलटाने में भी मेघ समुदाय के लोगों की मदद की. वे बताते हैं कि जब भी वे कोई काम लेकर उनके यहाँ गए कभी खाली हाथ नहीं लौटे. काम कराने के लिए लेखराज जी साथ हो लेते थे. इस नज़रिए से श्री लेखराज जी एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी देखे जाते हैं. श्री इंद्रजीत ने इस बात का विशेष उल्लेख किया है कि लेखराज जी ने कुछ लोगों को चल-अचल संपत्ति आदि के रूप में पूँजी दे कर उनके कामकाज में मदद की.




भगत विकास सभा के संचालक प्रोफेसर के. एल. सोत्रा बताते हैं कि वे चंडीगढ़ प्रवास के दौरान अक्सर श्री लेखराज भगत जी से मिलते रहे. लेखराज जी का व्यक्तित्व शानदार था. शारीरिक सौष्ठव सैनिकों जैसा था. वे सादा विचारों के व्यक्ति थे. सबसे बहुत अपनत्व के भाव से मिलते थे और सभी की सहायता के लिए तत्पर रहते थे.






मेघ समाज पर शोध करने वाले डॉ. ध्यान सिंह ने बताया है कि श्री लेखराज जी में एक बहुत ही विनम्र पुलिसवाला भी था जो सामाजिक तौर पर मिलनसार था और सभी परिस्थितियों में ढल जाने वाला उनका तरल और सरल स्वभाव था. कई सामाजिक कार्यक्रमों में वे दरी पर या जमीन पर बैठकर सहभागिता करते थे जो उनके गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की शानदार छवि को और भी बढ़ा कर देता था.











18 March 2019

Tulsiram, Hon. Subedar Major - तुलसीराम, ऑनरेरी सूबेदार मेजर

किसी दिन सूरज बहुत खुशी लेकर आता है. कल का दिन ऐसा ही था.

संपादक ‘मेघ-चेतना’ के नाम पर एक पत्र अख़्नूर (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ जिसमें एक ऑनरेरी सूबेदार मेजर तुलसीराम को सेना का ‘वीरचक्र’ मिले होने की सूचना मिली.

हालांकि मैंने हाल ही में ‘मेघ-चेतना’ के संपादकीय कार्य से छुट्टी ले ली है तथापि पिछले अंकों में छपे मेरे पते पर एक लिफ़ाफ़ा डाक से मिला जिसे मैंने खोल लिया (इसके लिए ‘ऑल इंडिया सभा, चंडीगढ़’ से क्षमा). लिफ़ाफ़े में एक पत्र मिला जिसके साथ कई क़ाग़ज़ नत्थी थे. 17-03-2019 को मिले अग्रेषण-पत्र (forwarding letter) पर अख़्नूर के एक सज्जन डॉ. के.सी. भगत के हस्ताक्षर थे और उसके साथ संलग्न पत्र पर डॉ. के.सी. भगत, प्रेज़िडेंट, जागृति समाज (रजि.) और ऑनरेरी कैप्टेन बी.आर भगत, जनरल सेक्रेटरी, एक्स-सर्विसमैन एसोसिएशन, अख़्नूर के हस्ताक्षर थे. पत्र 10 मार्च, 2019 को लिखा गया था. तीसरे पृष्ठ पर एक रौबदार सैनिक की फोटो छपी थी जिसके नीचे जानकारी दी गई थी वे ‘वीरचक्र’ प्राप्त तुलसीराम जी हैं. 1962 के भारत-चीन युद्ध में वे लद्दाख में रेमू नामक एक छोटी चौकी के कमांडर थे और उनके साथ चार अन्य सैनिक थे. जब चीनी फौज ने हमला किया तब इन कुल पाँच सैनिकों ने उनके हमले का सामना किया. लड़ाई में लगभग 200 चीनी सैनिक हताहत हुए. तुलसीराम के पास लाइट मशीन गन (LMG) थी जिसे तुलसीराम खुद चला रहे थे. चौकी गिरने के बाद वे अपनी एलएमजी साथ लेकर लौटे थे.

भारत-चीन युद्ध के दौरान युद्ध-भूमि में शौर्य और वीरता का प्रदर्शन करने वाले इस धरतीपुत्र को तब भारत के राष्ट्रपति ने ‘वीरचक्र’ प्रदान किया था. गाँव सरमला, तहसील खौड़, ज़िला जम्मू के इस धरती-पुत्र का नाम दिल्ली के उस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर भी उत्कीर्ण है जिसका लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी, 2019 को किया है. हम ऑनरेरी सूबेदार मेजर तुलसीराम जी को सलाम करते हैं. शत्रु के समक्ष प्रदर्शित उनका साहस ऊंचे दर्जे का था. भारत के राष्ट्रपति ने 20-12-1971 को तुलसीराम जी को 26-07-1968 से ऑनरेरी सूबेदार मेजर बनाया. 

श्री तुलसी राम जी का जीवन कब से कब तक आ रहा यह जानकारी मिलनी बहुत जरूरी है. उन्होंने जम्मू कश्मीर के एक सुदूर चुनाव क्षेत्र की अख़्नूर तहसील के एक सीमांतक (मीर्जिनल) परिवार में जन्म लिया था और और अपने शौर्य के कारण उन्होंने इस जम्मू कश्मीर के इस पिछड़े क्षेत्र का मान बढ़ाया. उनके इस शौर्य ने इस क्षेत्र के कई युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित किया और राष्ट्रीय सेवाओं में जाकर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने समाज सेवा में अपना जीवन लगाया.

अक्सर देखा गया है कि सेवानिवृत्त सैनिक समाज-सेवा में भी प्रवृत्त हो जाते हैं. वे एक निश्चित अनुशासन में प्रशिक्षित होते हैं. देश के विभिन्न भागों, वहाँ के समाज और वहाँ के बोल-पानी को वे समझते हैं. इस नज़रिए से वे अपने अनुभव के आधार पर समुदाय को बहुत कुछ देने की हालत में होते हैं.  अपने अनुभव के साथ वहां वे अपनी सेवा की गहरी निशानियां छोड़ते चलते हैं. इस लिए उनके उस जीवन के बारे में जितनी अधिक जानकारी मिल सके उतनी एकत्रित की जानी चाहिए. इस बारे में मैंने ऑनरेरी कैप्टन बी.आर. भगत जी से विशेष अनुरोध किया है. ‘वीरचक्र’ देते समय जो साइटेशन पढ़ी जाती है उसमें तुलसीराम जी के नाम के साथ ‘मेघ’ या ‘भगत’ सरनेम नहीं था. इसकी जानकारी प्राप्त करने में श्री एन.सी. भगत और श्री अनिल भारती (कुमार ए. भारती) जी ने मदद की और श्री बी.आर भगत जी ने स्पष्ट किया कि श्री तुलसीराम जी मेघ भगत हैं.

जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तब पंजाब से एक आर्मी आफ़िसर हमारे घर आए थे जिन्होंने बताया था कि उन्होंने सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश किया था (जिसे आजकल 'घर में घुस कर मारना' कहते हैं). काफी आगे जाने के बाद एक बारूदी सुरंग फटने से वे बुरी तरह घायल हुए थे. सूबेदार हरबंस लाल ने दूसरे विश्वयुद्ध में बरमा की लड़ाई में हिस्सा लिया था. बाद में वे राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे (उनके बेटे डॉ. अशोक भगत सेना में मेजर रहे हैं). 

मेघों में बहुत से युवा सेना में गए हैं और उन्होंने बेहतरीन सेवाएं दी हैं. यदि उनके बारे में जानकारियाँ इकट्ठी हो सकें तो बहुत अच्छा होगा. बेहतर यही होगा  कि वे अपने बारे में लिखें, अपने अनुभव और जीवन-संघर्ष के बारे में बताएं ताकि उनके जीवन से अन्य युवा और आने वाली पीढ़ी प्रेरणा ले सकें.





ये ब्लॉग (लिंक) भी देखिए.



Bhagat GopiI Chand

07 March 2019

Thanks to bookbinding - जिल्दसाज़ी का शुक्रिया

अप्रैल 2016 में ऑल इंडिया मेघ सभा का अध्यक्ष पद संभालने की स्थिति आ बनी थी. इस संस्था द्वारा प्रकाशित की जा रही पत्रिका ‘मेघ-चेतना’ के मुख्य संपादक का दायित्व साथ ही आया.

पत्रिका-प्रकाशन और दो-चार शब्द लिख लेने का कुछ अभ्यास पहले से था ही, वो काम आया. दिसंबर 2018 तक के त्रैमासिक अंक निरंतर निकले. कुछ देरी से निकले. इसमें सबसे बड़ी समस्या थी लेखकों और आलेखों की कमी.

अनुभव बताता है कि लिखता वही है जिसे पढ़ने की आदत हो और लिखता वही है जिसे लिखने का ‘चस्का’ हो और लिखने में उसका अपना ‘स्वार्थ’ हो. स्वार्थ, जिसमें लालच भी कुछ मात्रा में शामिल होता है, की महिमा महान ग्रंथों में गाई गई है क्योंकि उनके लिखने वाले जानते थे कि लालच, लोभ और स्वार्थ के बिना हम अपना परिवार तक नहीं चला सकते. दरअसल उन महान ग्रंथों की रचना की पृष्ठभूमि में स्वार्थ ही था. उनका प्रयोजन अपने खुद के, अपने समाज (संबंधियों), अपनी विचारधारा, अपने धर्म आदि का हित साधना था. इसे ‘स्वांतःसुखाय’ (अपने सुख के लिए) लिखना कहा गया है.

मुझे अपने जाति भाइयों-बहनों से बड़ी शिकायत रही है कि वे लिखते नहीं हैं लेकिन वो शिकायत छोटी होती जा रही है. अब लिखने वालों की संख्या बढ़ी है, विशेषकर सोशल मीडिया पर. रचनात्मक साहित्य लिखने के अलावा वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आए हैं. पारंपरिक व्यवसाय समाप्त हो जाने के बाद वे विभिन्न व्यवसायों में गए हैं और ख़ूब नाम कमाया है. लेकिन लेखन के व्यवसाय में आए लोगों की गिनती थोड़ी है. उधर अध्यापन के क्षेत्र में गए लोगों की संख्या काफी है. तथापि अभी वे दूसरों का लिखा हुआ पढ़ाते हैं. उनके दिल में यह चाहत पैदा होना बाकी है कि वे खुद कुछ ऐसा लिखें जिसे दूसरे पढ़ाएं. ख़ैर, वह समय आ रहा है. 

बात अपने स्वार्थ की चल रही थी. ‘मेघ-चेतना’ का संपादन करते हुए कुल 7 अंक निकाले थे. उनकी कुछ प्रतियां रखी हुई थीं. विचार आया कि इनको सुरक्षित रखने के लिए इन्हें जिल्दबंद क्यों ना करवा लिया जाए सो करवा लिया. मन और वाणी के बाद इतिहास को जिल्द ही संभालती है. अब लगभग डेढ़ साल तक किए गए कार्य का एक समेकित (कंसोलिडेटेड) रिकॉर्ड मेरे सामने है. जिल्दसाज़ (बुकबाइंडर) ने दो प्रतियां देते हुए कहा, “आपके दोनों प्रोजेक्ट हो गए हैं.” बहुत उत्पादक शब्द है ‘प्रोजेक्ट’. ज़रूर अंकुरित होता है. अंकुर है तो फल-फूल भी आएँगे.

जिल्दसाज़ी का शुक्रिया जो इतिहास, जज़्बात के अलावा वक़्त को भी पोशाक पहना देती है.

25 February 2019

Meghwal Pargana in Jalandhar - जालंधर में मेघवाल परगना


ताराराम जी ने 'प्रोसीडिंग्ज़ ऑफ़ द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस' पुस्तक के पृष्ठ सं 1180 की फोटो भेजी है जिसके नीचे के पैरा में जालंधर ज़िले के अंतर्गत एक 'मेघवाल' परगना (अनेक गांव वाला क्षेत्र) का उल्लेख है. पंजाब/सिख इतिहास का कोई जानकार बता सकता है कि आज यह क्षेत्र किस नाम से जाना जाता है? 


13 February 2019

An incomplete page - एक अधूरा पन्ना

आधुनिक इतिहासकारों में इस बात पर सहमति दिखाई देती है कि पुराणों में कोसल सम्राटों के रूप में जिन मेघों (मघों) का उल्लेख किया गया है वही कोशांबी में मिले शिलालेखों, सिक्कों और मुहरों पर उत्कीर्ण मघ हैं. मघ शब्द को वे राजवंश की पदवी के रूप में देखते हैं जो उन राजाओं के नाम के साथ जोड़ी जाती थी. ज़ाहिर है कभी इस वंश का बोलबाला रहा था जिसे पौराणिकों ने अपनी रचनाओं से लगभग गुम कर दिया. पौराणिक उस काल में अपना साहित्य रच रहे थे और उधर बाकियों की शिक्षा पर पाबंदी लगी हुई थी. लेकिन पौराणिक इतिहास और धरती के नीचे दबे इतिहास की टकराहट में पुरातत्ववेत्ताओं की बात पहले भी भारी थी और आज भी सशक्त है. इतिहासकारों के अनुसार मघ या मेघ राजाओं का शासनकाल पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी पड़ता है और उनका शासन बंधोगढ़ से फतेहपुर तक था. उनके इस शासनकाल को ही पहले कभी अंधकारकाल या डार्क एजिज़ के नाम से संक्षेप में समेट दिया जाता था. लेकिन वो अंधकार काल अब प्रकाश में आ चुका है. लेकिन तीसरी शताब्दी के बाद का उनका समय अंधकारमय है. क्या वो मघ या मेघ केवल बंधोगढ़ से फतेहपुर तक सीमित थे? ऐसा लगता नहीं.
कर्नल अलेग्ज़ांडरकन्निंघम ने बताया है कि मेघ सिकंदर के समय में सतलुज के क्षेत्र में बसे हुए थे. कन्निंघम ने उन्हें मघ और मख के तौर पर भी उल्लेखित (mention) किया है. इतना तो स्पष्ट है कि सिकंदर से पहले भी मेघों की स्थिति इस क्षेत्र में रही होगी तो वो क्षेत्र कितना विस्तृत था इसका आकलन उन नामों से भी किया जाना चाहिए जिन्हें मेघों के विभिन्न कबीलों और उनके विविध नामों से पहचाना गया है. ऐसे कई नाम श्री आर.एल. गोत्रा ने अपने आलेख Meghs of India में ‘Megh were Hadappan’ उप-शीर्षक के अंतर्गत बताए हैं जैसे- भगत, जुलाहा, जुलाह, कबीरपंथी, मेद, मेध, मेधो, मेग, मेगल, मेगला, मेघ, मींह्ग, मेंग, मेन, मेंघवाल, मेघोवाल आदि. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि मेघ हड़प्पन (सिंधुघाटी) सभ्यता वाले क्षेत्र के निवासी थे. इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को बौध सभ्यता वाला क्षेत्र बताया है.
इतिहास की पुस्तकों में इस बात का ज़िक्र मिल जाता है कि बुद्ध ने छठी शताब्दी ई.पू. में स्यालकोट में निवास किया था और यहाँ के लोगों ने बौधमत अपनाया था. आगे चल कर इस क्षेत्र में पुष्यमित्र शुंग ने बौधों की हत्याएँ कराईं और इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाया. उसके बाद मिनांडर ने पुष्यमित्र को हरा कर इस क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया और पूर्व में पाटलिपुत्र तक बढ़ गया.