10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.

मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही पाँच हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (किसी ने हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया है). यानी चार या पाँच नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल काफ़ी सही है. राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है….और धर्मों के बाज़ारों में एकता नहीं बेची जाती, यह दुनियावी सच्चाई है. आदर्श राजनीतिक दलों से बँधे लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है.

एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इसमें आप आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज में अन्य के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग समस्त समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. ऐसे लोग अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



5 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/05/2019 की बुलेटिन, " प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की १६२ वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह क्या बात कही है ,सुंदर आलेख मेघों की एकता

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  3. एकता देश, समाज और कई और मुद्दों से भी होती है ... शायद तभी ये देश और संस्कृति भी है ...
    हर कोई मिल के रहे, समभाव रहे तो कितना अच्छा रहे ...

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    1. देश या राष्ट्र उसे माना गया है जहाँ के लोग एक दूसरे की चिंता करते हैं. देश की एकता को इस नज़रिए से देखने की सख़्त ज़रूरत है.

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