28 June 2019

इतिहास का नया नजरिया - A new point of history

सदियों से वैदिक पौराणिक इतिहास को चुनौतियां नहीं मिली, एक तरफा इतिहास लिखा जाता रहा, लेकिन शिक्षा के प्रचार-प्रसार को धन्यवाद देना पड़ेगा कि कई परंपरागत अवधारणाओं और स्थापनाओं को चुनौती देने के लिए कई विद्वानों ने सप्रमाण अपनी बात कही है जिसकी एक समृद्ध परंपरा इन दिनों दिखने लगी है. इसका एक सशक्त उदाहरण फार्वर्ड प्रेस में छपा एक आलेख है जिसमें डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सिंह के शोध के बारे में कुमार बिंदु का एक आलेख है जो पढ़ने लायक है. उसका लिंक नीचे दिया गया है. 

24 June 2019

Jat Dharma and Megh Dharma - जाटधर्म और मेघधर्म

जाट समुदाय में सक्रिय राजनीतिक संगठन ‘यूनियनिस्ट मिशन’ के अग्रणी श्री राकेश सांगवान से कई मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है. जाट समुदाय के लोग अपने आत्मविश्वासी स्वभाव के कारण पहचाने जाते हैं. जहाँ तक शिक्षा और जानकारी का सवाल है वे कुल मिला कर अभी तीसरी पीढ़ी तक आए हैं जो शिक्षित है. जाति व्यवस्था के आखिरी पायदानों पर खड़े अन्य समुदायों की तरह वे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में संघर्षरत हैं. हरयाणा जैसे राज्य में वे सत्ता का स्वाद चख कर उसे खो चुके हैं इसलिए उनमें अधिक बेचैनी है. उन्होंने जो खोया है वो बेशकीमती था. ख़ैर.
Rakesh Sangwan राकेश सांगवान
राकेश सांगवान जी ने पाखंड के खिलाफ काफी मुखर हो कर लिखा है जिसका विरोध उनके ही बीरदारी भाइयों ने उन्हें नास्तिक कह कर किया. संभवतः इसी वजह से राकेश जी ने मंशा जताई कि वे आने वाले साल में धन्ना भगत की जयंती पर सिख धर्म अपना लेंगे ताकि कोई उन्हें नास्तिक न कह सके. जाटों के लिए सिखी अनजानी चीज़ नहीं है. जाटों ने सिखी का जी-जान से निर्वाह किया है और वे ख़ुद भी सिखी की जान हैं. उनकी दलील है कि सिखी मीरी-पीरी और पाखंड रहित किरत पर आधारित है जिसे अध्यात्म कहा जाता है. उनकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में कई विचार कौंधने लगे जिसे कमेंट के तौर पर उन्हें भेजा है. उसी कमेंट को अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ :- “
आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई बातें याद हो आईं. खुशवंत सिंह ने कहीं कहा है कि सिखी का मतलब जाट ही है (उनके ओरिजिनल शब्द याद नहीं लेकिन अर्थ यही था.)
आपकी पोस्टों पर कई लोग आपको नास्तिक कहते रहे हैं. नास्तिक या तर्कशील होना कोई अवगुण या गाली नहीं है. जो लोग इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं वास्तव में वे धर्म की अवधारणा (कंसेप्ट) को लेकर भ्रम में है. आदमी धर्म की शरण में नहीं जाता बल्कि वो धर्म यानी किसी आचार-व्यवहार, गुण और विचार को ओढ़ता है. उस ओढ़ने को धर्म कह दिया जाता है. कोई बता रहा था कि ‘धर्म’ की अवधारणा ‘धम्म’ की अवधारणा से अलग है. फिर आपकी यह बात सही है कि धर्म-धर्म खेलना है तो धर्म पकड़ना ही पड़ेगा. एक घुंडी यह है कि यदि कोई कहता है कि वो किसी खास धर्म में जा रहा है तो प्रतिक्रिया बड़ी होती है. यदि वो कहता है कि मेरी गुरु नानक या गुरु गोविंद सिंह या खालसा पंथ में आस्था है तो प्रतिक्रिया की प्रकृति (narrative कह सकते हैं) बदल जाती है. आप की पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट करके जाटधर्म का उल्लेख किया है. एक सज्जन ने कहा है कि जाटधर्म, बौद्धधर्म और सिखधर्म में कोई अंतर नहीं है. सिखिज़्म के लिए ‘सिखी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो बहुत सटीक है. जीवन शैली के संदर्भ में मुझे सिखी और जाटिज़्म को एक समझने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब सरकारी फॉर्म में धर्म लिखने की बात आती है तो जाटधर्म या जाटिज़्म शब्द के सरकारी संदर्भ कहीं नहीं मिलते. जाहिर है कि जाटों के इतिहास में जाटधर्म ना तो परिभाषित है और ना स्थापित. उसे जैसे-तैसे परंपरागत हिंदू शब्द के अर्थ में फिट किया गया है. बुद्धिज्म के साथ भी यही हुआ लेकिन नवबौधों ने और सिखों ने अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने की प्रभावी कोशिशें की हैं जो जारी हैं. क्या दलित भी जाटधर्म में आते हैं? मेरा मानना है कि आते हैं क्योंकि इन सभी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बौधमत है. एक धर्म से दूसरे धर्म में ‘भागने’ का जहां तक सवाल है यह सवाल उन लोगों की सोच से पैदा होता है जिनके दिल में धर्म नाम की चीज का डर इतना बैठा दिया गया है कि ‘धर्म बदलने’ के नाम से ही उनकी धमनियों का चलता रक्त रुकने लगता है. बिना जाने कि धर्म डरने की नहीं बल्कि धारण करने की चीज है. यदि हम धर्म को प्रेत बना लेंगे तो वह पक्का पीछे पड़ेगा वरना धर्म का काम नहीं कि वो इंसान के पीछे पड़े बल्कि यह इंसान का काम है कि वो किसी इंसानी गुण का पीछा करे और उस धर्म को धारण कर ले. सिखी की विशेषता यह है कि वो स्थापित है - समाज में भी, धार्मिक क्षेत्र में भी और राजनीति में भी.” यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैंने इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया है. पहली बात यह कि कुछ मेघ सिखी में हैं. दूसरे, धर्म को लेकर मेघों की नई पीढ़ी में बेचैनी और उलझन है. तीसरे, पढ़ी-लिखी पीढ़ी परंपरागत धर्म पर कड़े सवाल ज़ोर से उठाने लगी है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर और अन्यथा भी ‘मेघ धर्म’ और ‘मेघ मानवता धर्म’ पर चर्चाएँ होती रही हैं. हो सकता है अन्य जातियों में भी अपने धर्म की पहचान करने की प्रवृत्ति हो. इन जानकारियों का मुझ पर असर हुआ है. इसलिए यह सब लिख डाला.

07 June 2019

Your Cultural Capital - आपकी सांस्कृतिक पूँजी


जून का पहला हफ्ता है. सुबह के पौने पाँच बजे हैं. पक्षियों की 'गुड मॉर्निंग' और 'हैलो-हाय' शुरू हो चुकी है और मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया हूँ. एक ग्रुप है जिसमें रात की 'गुड नाइट' से पहले मेघ-जन एक दूसरे को तल्ख़ी और ज़िम्मेदारी से पूछ रहे थे कि- "तुम बताओ, तुमने बिरादरी के लिए क्या किया." इस सवाल पर लंबी बातचीत आख़िर 'गुड नाइट' पर ही ख़त्म होनी थी, हो गई. रात को जो सवाल सो गया था उसका प्रभात भी होना था, हुआ. समाचार-पत्र जैसा सुप्रभात. दशकों पहले समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन आया करता था जिसमें खूबसूरत-सा एक राजनीतिक नारा होता था- "यह मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया, यह सोचो कि तुमने देश को क्या दिया है." नारे का महकता गुलाब सीधा दिल पर आ गिरता था और दिल से आवाज़ आती थी, "सच्ची यार, आदमी को सोचना तो येई चइये कि उसने देश को क्या दिया." बच्चों का और युवाओं का बहुत कुछ देने को दिल कर आता है लेकिन क्या दें इसकी समझ नहीं होती. बात एक वलवला बन कर दिल में रह जाती है. मोटा-मोटी हम जो कार्य करते हैं वो हम देश को देते हैं और हमें जो मिलता है वो देश से मिलता है. सिंपल. सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूँजी के क्षेत्र में यदि कोई बिरादरी गरीबी रेखा से कुछ ऊपर हो तो एक-दूसरे से कोई तीखे तेवर से नहीं पूछेगा कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया.' गरीबी रेखा से नीचे है तभी यह सवाल बनता है. तो...चलो जी वहाँ....वो...देख लेते हैं एक नेता ने कम्युनिटी सेंटर बनवा दिया, श्मशान घाट में बेंच बनवा दिए और शानदार वाशरूम भी, नेता ने एक सामाजिक संगठन खड़ा कर दिया, कबीर मंदिर बनवा दिए, सालाना शोभायात्राएँ निकाल दीं, वगैरा. लेकिन चुनाव में बिरादरी ने उसे जिताया नहीं, हराया भी नहीं बल्कि हरवा दिया. यह सांस्कृतिक और राजनीतिक पूँजी के अभाव की वजह से होता है. इसे वोटिंग वाले लोकतंत्र में किसी बिरादरी के वोटों के बिखराव यानि सियासी ग़रीबी के रूप में पहचाना जाता है. व्हाट्सएप ग्रुप में हो या वो सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गली-नुक्कड़ वाली चिल्लर बहस में हो, उसमें जब कोई पूछता है कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया' तो इसे झगड़ा नहीं बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए. यह एक-दूसरे को और ख़ुद को जानकारियाँ दे कर मज़बूत करने की कोशिश होती है. ढीले ढँग से इसे 'केंकड़ाना टाँग खिंचाई' कह देते हैं लेकिन यह शुरुआती संघर्ष है जो अलग-अलग तौर-तरीक़े से होता है और दिखता ज़रूर है. यहाँ तक कि चलते-चलते ताने मारने वाले एक तरह से आपको अपने भीतर से मिलती ताकत का स्रोत बनने लगते हैं. यदि आपने अपनी बिरादरी (बीरदारी) के लिए सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में कुछ भी संचय करने की दिशा में कार्य किया है तो पक्की बात है कि आपने देश के लिए कुछ किया है और देश को कुछ दिया है. चलिए 'पूँजी' के अर्थ जान लेते हैं. (आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसके बारे में दिल में एक डर-सा है. काश इसे सरल शब्दों में लिख सकता. परिभाषाओं के साथ अधिक छेड़-छाड़ नहीं हो सकती क्योंकि ये महीन धागे के अनुशासन में बुनी होती है.)

छात्र जीवन से ही परिभाषाओं के बोझिल शब्दों से डरता हूँ. लेकिन अब शब्दों की जमा पूँजी ने डर कम कर दिया है. लेकिन शब्दों की व्हेट लिफ़्टिंग आज भी करनी पड़ती है.😉

1. तो, सभ्याचारक पूँजी (cultural capital) की परिभाषा को समझते हुए चलना ज़रूरी है जिसे कुछ ऐसे समझाया गया है:- सभ्याचारक पूंजी में एक व्यक्ति की सामाजिक संपत्ति (तालीम, अक़्ल, बोल-वाणी और पोशाक का स्टाइल आदि) शामिल होते हैं जो एक स्तरीकृत (stratified) समाज में सामाजिक गतिशीलता (social mobility) को बढ़ावा देती है. (यानि आप उनकी मदद से समाज में अपना काम-काज आसानी से कर सकते हैं). (यह) सभ्याचारक पूँजी रिवाज़ों की एक अर्थव्यवस्था (विनिमय प्रणाली) के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में कार्य करती है, और इसमें बिना फ़र्क के सभी चीज़ें और प्रतीकात्मक सामान (symbolic goods) शामिल होते हैं, जिसे समाज विरल और प्राप्त करने लायक समझता है. विनिमय (एक्सचेंज) की एक प्रणाली के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में, सभ्याचारक पूंजी में एकत्रित सभ्याचारक ज्ञान शामिल होता है जो सामाजिक हैसियत (social status) और ताकत देता है. (यहाँ पूँजी को ज्ञान, गुण, अभिव्यक्ति, प्रभावोत्पादकता, प्रस्तुतीकरण आदि के रूप में भी देखें).☺

2. सियासी पूंजी राजनीतिक सिद्धांत में इस्तेमाल एक रूपक (metaphor) यानी रूपक है जो रिश्तों, विश्वास, सद्भावना, और राजनेताओं या पार्टियों और अन्य हितधारकों (stakeholders), जैसे घटकों के बीच प्रभाव के ज़रिए बनी ताक़त और संसाधनों के संचय की अवधारणा के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक पूंजी को एक प्रकार की मुद्रा के रूप में समझा जा सकता है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को जुटाने, नीति सुधार, या अन्य राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है. हालाँकि, पूंजी का शाब्दिक रूप नहीं है, लेकिन सियासी पूंजी को अक्सर एक तरह के ऋण, या एक संसाधन (resource) के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे बैंक किया जा सकता है (संभाल कर रखा जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है), खर्च या गलत तरीके से खर्च किया जा सकता है, निवेशित (invest) किया जा सकता है, खोया जा सकता है और बचा कर भी रखा जा सकता है.

कुछ विचारक प्रतिष्ठित (reputational) पूँजी और प्रतिनिधि (representative) राजनीतिक पूंजी में अंतर करते हैं. प्रतिष्ठित पूंजी एक राजनेता की विश्वसनीयता और दृढ़ता को संदर्भित करती है. इस तरह की पूँजी को निरंतर नीति पोज़िशनिंग करके और वैचारिक नज़रिए को बनाए रख कर संचित किया जा सकता है.