"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


02 January 2021

Baba Faqir Chand - बाबा फ़कीर चंद

    मैंने पहले भी बाबा फ़कीर चंद पर कुछ ब्लॉग लिखे हैं. उन्हीं की निरंतरता में एक ब्लॉग यह भी है जिसे मैं महत्व देता हूँ. यह डेविड सी लेन की पुस्तक द अननोइंग सेज (The Unknowing Sage) पुस्तक का एक अंश है.   

    "खुशहाल ज़िंदगी जीओ और अपनी आमदनी से ज़्यादा खर्च न करो। अपनी हैसियत से ज़्यादा दान मत दो। मानवता मंदिर या किसी दूसरे गुरु और उनके सेंटर को दान देने के लिए अपने बच्चों की ज़रूरतों में कटौती मत करो। ऐसा करोगे तो यह बहुत बड़ा पाप होगा। खुशहाल ज़िंदगी के लिए एक और बात - बिना नागा नियमित रूप से साधन-अभ्यास किया करो। जैसे खाते हो, सोते हो ऐसे ही यह तुम्हारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा होना चाहिए। हर रोज़ एक या दूसरी चीज़ का दान किया करो। पता है हमारे बुज़ुर्ग क्या करते थे? वे भोजन करने से पहले गाय, कुत्ते और कौवों के लिए अलग निवाले रखते थे। गाय, कुत्ते और कौए के साथ अपना भोजन बांटे बिना नहीं खाना उनका धर्म था। क्या हम उनके रीति-रिवाज़ों का पालन करते हैं? यदि तुम एकमुश्त राशि दान नहीं कर सकते, तो जरूरतमंदों या बेसहारा लोगों के लिए हर रोज़ एक-दो पैसे बचाने की कोशिश करो। इससे तुममें बाँट कर खाने और दान देने की आदत पड़ जाएगी। अगर कोई शख़्स आज दान में एक लाख रुपये देता है, लेकिन फिर कई साल तक कुछ भी नहीं देता है, तो इससे उसे उतना लाभ नहीं होगा जितना उस आदमी को होगा जो एक या दूसरे तरीके से हर रोज़ दान देता है। इसलिए हर रोज़ दान देने, हर रोज़ ध्यान करने और हर रोज़ नए और constructive (तख़लीक़ी, रचनात्मक) ख़्याल करने का उसूल बनाओ। ये तुम्हारी ज़िंदगी को बदलने में मददगार होंगे। जो दान देता है, उसका दिलो दिमाग दानशील और उदार हो जाता है।

    यदि तुम्हारी माली हालत बहुत अच्छी नहीं हैं, तो तुम्हें पैसा दान करने की ज़रूरत नहीं है। महिलाएँ परिवार के लिए भोजन पकाने से पहले एक मुट्ठी आटा या चावल अलग रख दें। जब एक हफ़्ते का चावल या आटा इकट्ठा हो जाए तो उस आटे की रोटी बना कर या चावल पका कर चिड़ियों, कुत्तों और कौवें दें। मैं तहे दिल से ये सुनहरे उसूल तुम्हें बता रहा हूं। ये बहुत छोटी चीजें लगती हैं। लेकिन इन्हें छोटी मत समझो। ये ज़िंदगी को सुखी और खुशहाल बनाने के उसूल हैं। साल के सारे 365 दिन इस नेम का पालन करो, और अगर तुम्हारी गरीबी नहीं जाती, तो मेरी तस्वीर पर फूल मत चढ़ाना, जितना भी चाहे खराब सुलूक करना। हमारे ऋषि-मुनि बहुत बुद्धिमान थे। उन्हें हर चीज़ का मूल कारण पता था। लेकिन आज हम उनके बनाए हुए रीति-रिवाज़ों को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हैं। तुम पुरानी रसमों और सामाजिक रिवाज़ों के महत्व को समझने की कोशिश करो। तुम हर रोज़ भलाई का एक काम करो और एक साल बाद देखो कि तुम्हारे खाते में भलाई के कितने काम हैं।" 


3 comments:

  1. बहुत गहरी, जागरूक सोच .... हमारे बुज़ुर्ग जो भी कह गए हैं बहुत दूर का कह गए हैं ...
    कितना सच है ... पहले एक मुट्ठी रसोई के लिए निकाल कर समाज सेवा करने जाना ज्यादा उचित है ...
    आपको नव वर्ष की बहुत मंगल कामनाएं ...

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  2. एक-एक शब्द सत्य की प्रतीति समाहित किए हुए हैं । धन्यभागी हैं हम जैसे जिन्हें इन्हीं सत्यों से संस्कारित किया गया है । जिनका पालन अवश्य करते हैं । हार्दिक आभार ।

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  3. बहुत गहरे और गूढ़ संस्कारों को प्रत्यारोपित करने का संदेश देता बेहतरीन लेख..गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें..सादर जिज्ञासा सिंह..

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