हमारे सामाजिक संगठनों की कथा

आजकल सामाजिक संगठनों का स्वरूप बदलने के मोड़ पर आ चुका है. पहले सामाजिक संगठन, संस्थाएं, सभाएं या उद्धार सभाएं बना करती थीं लेकिन अब आगे बढ़कर उन्होंने एनजीओ बनाने का कार्य शुरू किया है. यहां हम पहले सामाजिक संगठनों की ही बात करेंगे जिनकी भूमिका का समाज के विकास और उसके ताने-बाने पर कुछ-न-कुछ असर होता है.

सामाजिक संगठन का अर्थ होता है - लोगों के किसी समूह का सामूहिक रूप से कुछ आवश्यक क्षेत्रों में अपने समाज के उत्थान के लिए कार्य करना. संगठन इसलिए ताकि कार्य अधिक हो और समाज सेवा जिस रूप में भी हो वह अधिक हो और उस पर अच्छे से विचार किया गया हो जिससे वे समाज की उम्मीदों को पूरा कर सकें.
हमें सबसे पहले आर्यसमाज द्वारा बनाई गई ‘मेघ उद्धार सभा’ का ध्यान आता है लेकिन वो यहाँ का मुख्य संदर्भ नहीं. वह मेघ समाज का अपनी कोख से जन्मा संगठन नहीं था बल्कि कुछ आर्यसमाजियों (विशेषकर लाला गंगाराम) ने मिल कर उसे बनाने में मुख्य भूमिका निभाई थी. मेघ उद्धार सभा बनाने के बाद आर्यसमाज ने अपनी कुछ शिक्षण संस्थाएं खोलीं जिनका मेघ समुदाय को बहुत लाभ हुआ. वे संस्थाएं आर्य प्रतिनिधि सभा के संरक्षण में और तत्वाधान में चलाई गई थीं. उसमें मेघ समाज की कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं थी और न ही आर्य प्रतिनिधि सभा में मेघों का कोई महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व था. यदि हम अपने समाज में कार्य कर चुकी आर्यसमाज को भी सामाजिक संगठन के तौर पर देखने की कोशिश करें तो उसके प्रबंधन ढाँचे में समय-समय पर हुए परिवर्तनों के पैटर्न को समझने की ज़रूरत होगी और देखना पड़ेगा कि आर्यसमाज का मेघों से संबंधित एजेंडा क्या है, कहाँ तक पहुँचा है और कोई एजेंडा है भी या नहीं. वो अलग विषय है और उसे अलग से डील किया जाना चाहिए.
बीसवीं सदी के साठ और सत्तर के दशक का एक समय था जब मेघों के संगठन बनाने और चलाने में युवाओं की बराबर की भूमिका थी. उसके बाद परिस्थितियाँ बदलीं. नौकरियों के कारण लोग दूर-दूर जा कर अन्य शहरों में बसे. वहाँ उन्हें ‘अपनों’ की ज़रूरत महसूस हुई और उन्होंने शहरों में अपने समुदाय के संगठन बनाए. उन संगठनों की बैठकें निरंतर होती थीं. मेल-मिलाप होता था. लोगों में उत्साह था. कमोबेश उस ज़माने के वही जाने-पहचाने चेहरे हैं जो आज भी अपनी बढ़ी हुई उम्र के साथ अपने सामाजिक संगठनों को चलाते चले आ रहे हैं. शिक्षा, रोज़गार और करियर का सीन इस क़द्र बदल चुका है कि युवा लोग अब संगठनों की बैठकों में कम नज़र आते हैं. युवाओं का करियर के लिए संघर्ष पहले से बहुत कठिन और गंभीर दौर में है. समय की किल्लत उनकी दूसरी समस्या है. वे सामाजिक संगठनों के प्रति उदासीन हैं. यही वजह है कि आज हमारे सामाजिक संगठनों के अधिकतर कार्यकर्ता आमतौर पर सीनियर या बहुत सीनियर सिटिज़न हैं. उनकी थकी हुई उम्र का असर संगठनों पर आ रहा है. दूसरी ओर कई युवाओं का विचार है कि किसी सामाजिक संगठन से जुड़ने का अर्थ अपनी जाति की पहचान को दूसरे समाजों तक पहुँचाना है जो ग़ैर-ज़रूरी है. उनके अपने स्कूल-कालेज, ऑफ़िस आदि के दायरे हैं. अपनी जाति-पहचान का एक नया दायरा बनाना या गेट-वे (Gate Way) खड़ा करना उन्हें ठीक नहीं लगता. उनकी यह सोच संगठनों में उनकी ग़ैर-हाज़िरी की शक़्ल में असरअंदाज़ हुई है.

तो क्या हमारे संगठन समाज की उम्मीदों को पूरा कर सके हैं? संगठन बनाने और चलाने वालों को इसका जवाब ख़ुद से पूछना ही होगा. आने वाले समय की सकारात्मक दहलीज पर पाँव रखने से पहले हम ख़ुद को उस आईने में देखते चलते हैं जो सामाजिक संगठन चला चुके समाज के शिक्षित वर्ग और पिछली पीढ़ी ने हमें दिखाया है. यह कहीं-कहीं नेगेटिव ज़रूर है लेकिन पोज़िटिविटी की सीमा इसके आगे शुरू होती है. आगे जो कुछ लिखा गया है वह उन्हीं के अनुभवों के आधार पर है. लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि जो उन्होंने महसूस किया है वो केवल मेघ समाज के संगठनों की ही ‘दर्द भरी कहानी’ है. अन्य समाजों के संगठन भी ऐसे अनुभवों से ग़ुज़रते रहे हैं.

गैर-राजनीतिक और गैर-धार्मिक
लगभग सभी सामाजिक संगठन गैर-राजनीतिक और गैर-धार्मिक होने का दावा रखते हैं. उनके संविधान में ऐसा दर्ज होता है. लेकिन यहां इस बात को देखने की ज़रूरत है कि जहां सियासी धड़े-बंदियाँ हो जाती हैं वहां उनका दबाव सामाजिक संगठनों पर ज़रूर पड़ता. उनमें एक प्रकार की खींचतान ज़रूर होती है. जहां राजनीति और धार्मिक संस्थाओं का घालमेल हो जाता है वहां समस्या गहरी हो जाती है. धर्म और राजनीति एक दूसरे की उँगलियों में उँगलियाँ फँसा कर चलते हैं. कुल मिला कर उनकी कोशिश होती है कि समाज के लोगों को जैसे भी बने वोट बैंक में परिवर्तित कर लिया जाए या कम से कम समाज का एक समूह राजनीतिक या धार्मिक नज़रिए से वोट बैंक जैसा दिखने लगे. यानि सियासी पार्टियाँ सामाजिक संगठनों में अपनी प्रॉक्सी दर्ज करती हैं और उसे चलाने वालों को अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश करती हैं. संगठन से जुड़े लोग वहीं के वहीं रहते हैं लेकिन उसके प्रबंधकों पर पार्टी का स्टिकर लग जाता है. कह लीजिए कि संगठन एक तरह से हाइजैक हो जाता है. सियासी लोग कहने लगते हैं कि ‘उस संगठन के लोग हमारे लोग हैं’.

सामाजिक संगठनों में कई बार ऐसा भी होता है कि उसमें जो लोग ओहदेदार बनते हैं वे संगठन बनाने वाले सक्रिय लोगों के अपने क़रीबी और रिश्तेदार होते हैं. इससे संगठन में किसी ख़ास आदमी का चौधरपना बढ़ता है और धीरे-धीरे वो संगठन लोगों की उम्मीदों से दूर जाने लगता है. उसके संविधान में निर्धारित उद्देश्य पीछे रह जाते हैं. संस्थापक सदस्य निराश होने लगते हैं और संगठन दो फाड़ या तीन फाड़ होने लगते हैं.

किसी संगठन की कार्यप्रणाली (working) से किसी के असंतुष्ट होने के विभिन्न कारण हो सकते हैं - जैसे कि संस्था को मिले चंदे और खर्चे का हिसाब-किताब समुचित तरीके से न रखना. इससे कई प्रकार की शंकाएं और संदेह पैदा होते हैं. बही खातों की सतत निगरानी और उसका समुचित ऑडिट न होना कई समस्याएं पैदा कर सकता है. स्थाई और अस्थाई सदस्यों की सूचियां अलग-अलग न होना गलतफ़हमियां पैदा कर सकता है. ऐसे हालात में सदस्य टूटने लगते हैं. नतीजतन ऐसी टूट से नई संस्थाएं खड़ी होने लगती हैं चाहे उनके लक्ष्यों में कोई नयापन न हो. ऐसा इसलिए होता है कि संगठन चलाने वाले लोग वही पुराने ढाँचे में ढले साथी होते हैं. लफ़्ज़ों में थोड़ा हेर-फेर करके लक्ष्यों और उद्देश्यों में कुछ नयापन लाने की कोशिश की जाती है. थोड़े समय के लिए लोगों में जिज्ञासा रहती है कि नया संगठन पहले वाले से किस मायने में अलग है. नए संगठन के पास यदि नए लक्ष्य, नई ऊर्जा हो और वो पहले से स्थापित संगठनों के मुकाबले अधिक कार्य करे, गतिविधियाँ बढ़ाए और उनसे प्रतियोगिता करे तो लोगों का विश्वास जीत भी सकता है.
ग़ैर-सरकारी संगठन
यहां ग़ैर-सरकारी संगठनों की बात भी करते चलते हैं जो एक बहुत ही कारगर संगठनात्मक औज़ार है लेकिन ये किसी न किसी तरह सरकारी तंत्र पर निर्भर होते हैं और वे किसी न किसी तरह सत्ताधारी पार्टी के नज़दीक रहने की कोशिश करते हैं. अनुभव बताता है कि एनजीओ के लिए फंड लाने में सियासी समर्थन (सप्पोर्ट) की ज़रूरत होती है. सत्ताधारी पार्टी में परिवर्तन हो जाने पर ग़ैर-सरकारी संगठन की सफलता की कहानी कहीं असफलता की कहानी में तब्दील न हो जाए इसके लिए राजनीतिक जुगाड़ की ज़रूरत हमेशा होती है. राजनीतिक समर्थन की ज़रूरत पूरा करने की ज़िम्मेदारी पूरे समाज की बनती है ताकि उसके सामाजिक संगठन अपने विकासात्मक कार्य जारी रख सकें. यदि वो समर्थन उन्हें प्राप्त नहीं होता तो एनजीओ कमज़ोर पड़ने लगते हैं. ग़ैर-सरकारी संगठनों में ‘अपने बंदे’ भरने की कहानी सुनी जाती है. बेहतर और समर्पित कार्यकर्ता समाज में उपलब्ध हो जाएँ तो इस कमी को दूर किया जा सकता है.

ढाँचागत तोड़-फोड़
कई बार संगठनों में एक अनचाही तानाशाही उभर आती है. परिणाम यह निकलता है कि एक-दो लोग मिलकर बाकियों को वीटो करने लगते हैं. सामूहिक जिम्मेदारी पीछे रह जाती है. फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्यकारिणी की अनुमति की जरूरत ख़त्म कर दी जाती है. निष्क्रिय होती कार्यकारिणी और पदाधिकारी केवल हस्ताक्षर करने या मुँह देखने के लिए रह जाते हैं. परिणाम आप समझ सकते हैं.

देखा जाता है कि सामाजिक संगठनों में कभी-कभी व्यक्तियों का कोई ग्रुप एक साथ प्रवेश करता है और आगे चलकर जोड़-तोड़ करके संगठन को हाईजैक कर लेता है. इसका नतीजा अच्छा या बुरा हो सकता है जो परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. ऐसी स्थितियों को भाँपने की क्षमता विकसित करनी चाहिए.
समाज के वातावरण को समझना ज़रूरी है
सामाजिक संगठन चलाने के लिए पहले अपने समाज और समाज के वातावरण को समझना बहुत ज़रूरी है. समाज का अध्ययन वही कर सकता है जो समाज के बीच रहकर उसे नज़दीक से देखे और उसकी विभिन्न गतिविधियों और उसकी ज़रूरतों को निरंतर देखे और परखे. इसके लिए पहली शर्त यह है कि अध्ययन करने वाले व्यक्ति में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह (bias) न हो. यदि हम किसी राजनीतिक, धार्मिक, किसी अन्य विचारधारा की ओर पूरी तरह झुके हुए हैं तब भी अपने समाज के अध्ययन से न्याय करना मुश्किल हो जाएगा. कहने का प्रयोजन (purpose) यह कि मुख्य एजेंडा समाज की विकासात्मक ज़रूरतें होनी चाहिएँ.
देखा गया है कि नए सामाजिक संगठनों की कल्पना युवाओं के माध्यम से होती है. जब वे पाते हैं कि उनके समाज के संगठन उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहे हैं तो वे अपने विचार व्यक्त करने के नए मंच ढूँढने लगते हैं - चाहे वह स्कूल में एक नए नाम वाला संगठन हो या मुहल्लों के नुक्कडों में युवाओं के छोटे-छोटे समूहों की असेंबली हो जो पुराने संगठनों की समीक्षा करते दिख जाते हैं. यह परिवर्तन के कदमों की आहट होती है. पुराना और स्थानीय नेतृत्व उनका पहला निशाना होता है जिसमें वे परिवर्तन की उम्मीद करते हैं. अक़्सर ये युवा बेहतर तरीके से शिक्षित और अपनी विचारधारा के प्रति पहले के मुकाबले अधिक स्पष्ट और व्यापक जानकारी रखते हैं. युवा-मन इस बात को बहुत जल्द महसूस करने और जानने लगता है कि उनका और समाज का नेतृत्व करने वाले लोग समाज का सही मार्गदर्शन कर पा रहे हैं या नहीं. यदि नहीं तो वे आंदोलन की राह पकड़ते हैं. ध्यान रहे कि विरोध और आंदोलन युवाओं का लक्षण है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए उन्हें नए संगठनों की आवश्यकता पड़ती है. उनके निशाने पर अशिक्षित और दिशाहीन नेतृत्व सबसे पहले आता है.

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यहां इस बात का संकेत करना बात को स्पष्ट कर देगा कि 90 के दशक तक हमारे समाज में आर्यसमाज की विचारधारा से प्रभावित सामाजिक संगठन कार्य कर रहे थे और इसी दशक के दौरान कबीरपंथी या कबीर की विचारधारा को मानने वाले समूहों ने कबीर मंदिर और कबीर सभाएँ बनाईं. यह हमारे सामाजिक संगठनों में आ रहे परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. यह एक प्रकार की प्रतिपक्षता (एंटीथीसिस) थी. ऐसी प्रतिपक्षता के धरातल पर बने नए सामाजिक संगठन कई बार इतने मज़बूत होते हैं कि वे राजनीतिक धड़ेबंदियों को चुनौती देते हुए नया वोट बैंक तैयार करने की क्षमता विकसित कर लेते हैं. यानि ऐसे सामाजिक संगठन फिर से ऐसा रूप ग्रहण करने लगते हैं जो ग़ैर-राजनीतिक और ग़ैर-धार्मिक होते हुए भी राजनीति और धर्म में दख़लअंदाज़ी करने के क़ाबिल हो जाते हैं. युवाओं के ऐसे संगठनों का फ़ायदा कोई भी उठाना चाहेगा. सामाजिक संगठनों को ही तय करना पड़ेगा कि यदि कोई राजनीतिक और धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहे तो वे अपना इस्तेमाल होने देना चाहते हैं या नहीं. यदि होने देना चाहते हैं तो किस हद तक.

संगठन और समाज-सेवी
सफल सामाजिक संगठनों के सभी कार्यकर्ता तो नहीं लेकिन उनमें कुछ समाज-सेवी अवश्य होते हैं. यदि कोई अच्छा समाजसेवी किसी कारण से राजनीतिक कार्यकर्ता या धार्मिक प्रचारक बन जाए तो यह समाज के लिए बहुत बड़ा नुकसान होता है जिसकी भरपाई किसी भी तरह नहीं हो सकती. समाज-सेवी की कमी न तो राजनीतिज्ञ पूरा कर पाता है और न कोई धार्मिक नेता. समाजसेवी समाज की ज़रूरी संपत्ति है. जहाँ पढ़े-लिखे, सक्रिय और सयाने समाज-सेवी होते हैं उन्हें चुगने के लिए बड़ी सियासी पार्टियाँ और धार्मिक नेता पहुँच ही जाएँगे. यह ऐतिहासिक सत्य है. समाज को समाज सेवियों की रक्षा करनी चाहिए. धार्मिक संस्थाओं और उनके संसाधनों के ज़रिए उनको समर्थन देना चाहिए.

सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा
सामाजिक संगठनों के जो उद्देश्य होते हैं उनकी पूर्ती के लिए कुछ परंपराएँ विकसित करनी पड़ती हैं. यह बात इस संदर्भ में कही जा रही है कि अभी तक मेघ समुदाय में सामूहिक निर्णय लेने की कोई बड़ी, महत्वपूर्ण और स्वस्थ परंपरा देखने में नहीं आई. संगठन बनते हैं, उनके कामकाज की हलचल शुरू में ध्यान खींचती है फिर धीरे-धीरे मद्धम होने लगती हैं. कुछ समय के बाद उनके भीतर झिकझिक शुरू हो जाती है जो उनके कामकाज को खामोश कर देती है. जिन संस्थाओं में डोनेशन बहुत आता हो या पॉलिटिकल ग्रांट आती हो वहां लोगों के निजी स्वार्थ उभर आते हैं. इसका इलाज संगठन के भीतर से हो सकता है. यहाँ दबाव समूहों (प्रेशर ग्रुप्स) की उपस्थिति ज़रूरी होती है. सामूहिक फैसले लेने की आदत का कोई विकल्प नहीं. यह समाज का वास्तविक शक्ति-प्रदर्शन होता है.

संगठनों की कथा
कुछ सेल्फ स्टाइल के लोग अचानक उभरते हैं, कुछ समय के लिए एक संगठन बनाते हैं, कुछ कार्य करते हैं और उसके बाद नया संगठन खड़ा कर लिया जाता है. यह परंपरा भी चली आ रही है. पैटर्न के तौर पर देखा गया है कि ये संगठन किसी अल्पावधि लक्ष्य (short term target) प्राप्त करने के लिए बनाया जाता है और कुछ समय के बाद वो अपने आप समाप्त हो जाता है. इनकी परंपरा ऐसी है कि वे आमतौर पर चुनावों से छह महीने या साल भर पहले बनते हैं, कुछ देर कार्य करते हैं और फिर निष्क्रिय हो जाते हैं. ज़ाहिरा तौर पर ऐसे संगठनों का बेसिक नज़रिया सियासी रंग का होता है. इन संगठनों का पैटर्न बताता है कि इनकी स्थापना करने वाले लोग पुश्तैनी तौर पर राजनीति के व्यवसाय से जुड़े थे. क्योंकि मामला सियासी था इसलिए ज़रूरी था कि वे किसी ना किसी धार्मिक संस्था से जुड़ें और उसका लाभ उठाएँ. असली मामला वोट बैंक का था. राजनीतिक नज़रिए से इस पैटर्न पर कोई गंभीर आपत्ति नहीं की जा सकती. लेकिन ऐसे संगठन चुनाव हो जाने के बाद अपनी दूकान का शटर अगले चुनावों तक गिरा लेते हैं, बैनर लगा रहता है लेकिन दरियाँ उठा दी जाती हैं.

ऊपर लिखी स्थिति में जो कुछ नकारात्मक स्थिति है उससे निपटने के लिए अनुभवी लोग कुछ सुझाव देते हैं. उन पर चर्चा कर ली जाए.  
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अच्छी-भली संस्थाओं के टूटने का सबसे बड़ा कारण बहुमत से फैसले करने की आदत में ही देखा गया है. बहुमत का मतलब किसका बहुमत. फैसले करने में जहाँ बहुमत की ज़रूरत महसूस होने लगती है वहाँ संस्था के एक से दो, और दो से चार टुकड़े होने के आसार बनने लगते हैं. कई लोग अपना बहुमत सिद्ध करने कोशिश में संस्थाएँ तोड़ डालते हैं. इसका क्या इलाज है? इसका इलाज है सर्वसम्मति से फैसले लेने की परंपरा बनाना और उसी के अनुसार अपनी कार्यप्रणाली विकसित करना. सर्वसम्मति से फैसले संभव होते हैं जब लक्ष्य भली प्रकार से परिभाषित हो, सोच साफ़ हो और उसमें किसी को कोई शक न हो. किसी कार्य या प्रोजेक्ट को पूरा करने के तरीकों पर अक्सर मतभेद होते हैं. इसका उपाय यह हो सकता है कि कार्य निष्पादन (execution of work) के फैसले एक छोटी समिति को सौंपे जाएँ ताकि वो एकमत हो कर अपनी कार्यनीति (strategy) बना ले. ऐसी समितियों में अनुभवी और जानकार लोगों को रखना लाभकारी होगा. यदि किसी संगठन में यह प्रणाली दो-एक साल के लिए लागू रह जाए तो बहुत से कार्य आसान हो सकते हैं. यदि लक्ष्य सुविचारित और साझा है तो संगठन में विभाजन क्यों? यदि लक्ष्य पूर्वनिर्धारित है और एक सामाजिक समूह उसे करने के लिए कमर कसे है तो कामयाबी हर हाल में मिलनी चाहिए.

इस बात को रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि जिन समुदायों में शिक्षा का प्रसार अधिक है और जिन संगठनों को चलाने वाले कार्यकर्ताओं का शैक्षणिक स्तर ऊँचा है उनके संगठन बेहतर काम कर पाते हैं.

आख़िरी टिप्पणी - इस बात को कई युवा बार-बार उठाते हैं और आपस में चर्चा करते हैं कि क्या हमारे सामाजिक संगठन एक साथ मिल कर कार्य नहीं कर सकते? सीधा और सरल जवाब है - ‘नहीं.’ यह संभव नहीं है. (लेकिन यह ‘नहीं’ अडिग और अंतिम नहीं है. यह कभी ‘हाँ’ में बदल भी सकती है). ऐसे हालात में एक रास्ता हमेशा खुला मिलता है जो फ़ायदे का होता है. यानि ये संगठन अपनी-अपनी गतिविधियाँ और आपसी कंपीटिशन बढ़ाएँ तो मेघ समाज को अवश्य ही लाभ पहुँचेगा. सामाजिक संगठनों का लक्ष्य चाहे जितना भी ग़ैर-सियासी हो समाज को भरपूर लाभ तभी मिलता है जब समाज के सभी संगठन मिल कर राजनीतिक ताक़त दिखने लगें.

(इस आलेख को तैयार करने में इन सभी से की गई चर्चा का महत्वपूर्ण योगदान रहा :- सर्वश्री-
आर.एल. गोत्रा (सेवानिवृत्त इंवेस्टिगेशन ऑफिसर, सीबीआई), जालंधर, सोमदत्त (रियाटर्ड प्रिंसिपल), मेघ जन-कल्याण सभा, जालंधर, राजकुमार ‘प्रोफेसर’, प्रेज़िडेंट, भगत महासभा, जालंधर, डॉ. शिवदयाल माली, कर्नल तिलक राज, पीएमजी (रिटायर्ड), जालंधर, के.एल. सोत्रा, (रिटायर्ड लेक्चरर), प्रधान, भगत विकास सभा, जालंधर. आप सभी का आभार.)


कुछ सुझाव
(सामाजिक संगठनों के लिए कुछ सुझाव स्वभाविक उभर कर आए हैं-
1. जब आपके संगठन का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने काम और उसकी जानकारी देने के लिए ज़रूर करें.
2. युवा पीढ़ी को सामने रख कर सामाजिक जागरूकता फैलाएँ.
3. अपने कामकाज में ट्रांसपेरेंसी बरतें.
4. हर मीटिंग में फंड और ख़र्चे का हिसाब रखें.
5. अपने संगठन में युवाओं का सहयोग लें.
6. संगठन में बेहतरी लाने के लिए सुझाव आमंत्रित करें.
7. दूसरे शहरों में संगठन के समन्वयक (Coordinator) नियुक्त करें.
8. सभी निर्णय यथासंभव सर्वसम्मति से लें.
9. युवाओं के लिए करियर गाइडेंस के कार्यक्रम चलाएँ. यह बहुत महत्वपूर्ण है.
10. अपनी राजनीति, धर्म और स्वार्थ के लिए सामाजिक संगठन की बलि न दें.
11. अपने लक्ष्यों की सीमाओं को जानें-समझें और उसके अनुसार कार्य करें.
12. उनके अपने पुस्तकालय और प्रकाशन हों.
13. वे सेमिनार और लेक्चरों की सीरीज़ आयोजित कर सकते हैं.
14. एकता हर कीमत पर बनाए रखें.
15. विभिन्न संगठनों में संपर्क स्थापित करें और सहयोग के क्षेत्रों की तलाश करें.



कुछ सीखने लायक बातें
विभिन्न संगठनों ने कई कार्य किए हैं. सभी के पास अपनी मिसालें हैं. ऑल इंडिया मेघ सभा का कार्य निरंतर चला है, उसकी पत्रिका ‘मेघ-चेतना’ निरंतर छपी है और ग़रीब/ज़रूरतमंद छात्रों को स्कालरशिप देने का उनका कार्य चला है. ‘मेघ जन कल्याण’ नामक सभा इसी नाम से अपनी एक पत्रिका का प्रकाशन कर रही है, डॉ. शिवदयाल माली की संस्था Lt. Lala Karam Chand Mali Educational and Charitable Society ने मैडिकल कैंपों के कई आयोजन किए हैं, भगत विकास सभा ने बच्चों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए हैं, भगत महासभा ने युवाओं के लिए करियर गाइडेंस वर्कशॉप्स आयोजित की हैं और अपने संगठन के लिए सोशल मीडिया का ख़ूब इस्तेमाल किया है. जितना गिनवाया गया है उससे कहीं अधिक उक्त सभी संगठनों का कार्य रहा है. उनके सभी कार्यक्रमों का महत्व है. हम उन सभी संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं को इसके लिए बधाई देते हैं. सामाजिक विकास के लिए की गई उनकी पहलकदमियों से सीखने की ज़रूरत है.

ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ की आंतरिक पत्रिका
'मेघ चेतना' के साभार

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