जागृति



हमारा जो भी इतिहास मिलता है वो हमने नहीं लिखा दूसरों ने लिखा और वो जो लिखना चाहते थे वो उन्होंने अपने आत्मगौरव (self pride) के लिए लिखा और उसे अपने हक़ में भुनाने के लिए लिखा. इसीलिए क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में हमें अपना कुछ नहीं मिलता. मेघ जाति सदियों तक शिक्षा से वंचित रही. अपना अतीत पूछती रही. दूसरों ने जितना बताया उतना मानती रही. शिक्षित होने के साथ मेघों को नई जानकारियाँ मिलने लगी है. वैज्ञानिक सोच आने लगी है.

मेघों को यदि मानवप्रजाति शास्त्र के अनुसार देखना हो और मूलनिवासी की कसौटी पर कसना हो तो ऐसे उल्लेख मिल जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि मेघों ने आर्यों से पहले आकर सिंधु दरिया के आसपास अपनी बस्तियाँ बसाईँ. मेघों को कोलारियन ग्रुप का कहा गया है जो सेंट्रल एशिया से इस क्षेत्र में आ कर बसा था. जो समूह सबसे पहले आ कर बसा उसे ईरान में तूरानियन (तूरान नामक स्थान के लोग) कहा गया है. वो तूरानियन ग्रुप मंगोलॉयड था. यह ग्रुप ईरान की ओर से हो कर नहीं आया. 'तूरानियन' को संस्कृत में किरात कहा गया. दूसरा कोलारियन मंगोलॉयड ग्रुप असम की ओर से भारत में आया और उसका संपर्क द्रविड़ियन रेस से हुआ. उस ग्रुप को संस्कृत में निषाद कहा गया. जो उत्तर-पश्चिम में कोलारियन ग्रुप बसा वो आर्यों और मुग़लों के संपर्क में आया. इस कोलारियन ग्रुप के लोगों का रंग आमतौर पर गेहुँआ होता है. लेकिन इनमें बहुत गोरे और काफी साँवले रंग के लोग भी पाए जाते हैं. यह रक्तमिश्रण की कहानी है जो पूरे विश्व में एक फिनॉमिना है. लेकिन कोलारियन एक ऐसा सांस्कृतिक ग्रुप है जिसकी अपनी एक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था थी.

मेघों का आर्यसमाज में आना-जाना हुआ तो उन्होंने वेदों का गुणगान सुना और माना. धर्म में वेदों-पुराणों की इतनी महिमा गाई गई कि हम आदतन अपना पिछोकड़ (इतिहास) वहीं ढूँढने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक बात को समझने की ज़रूरत है कि आर्य ब्राह्मणों ने जो साहित्य लिखा वो अपने आत्मगौरव के लिए लिखा है. उसमें दूसरों की जगह कम है. यह बात भी समझ लेनी ज़रूरी है कि यदि वेदों-पुराणों में इतिहास ढूँढने की बात करनी हो तो पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि वेद लिखे कब गए थे. अब भाषाविज्ञानी इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि संस्कृत भारत की सब से पुरानी भाषा नहीं है. दूसरे यह भी जानना पड़ेगा कि वेदों में नायक कौन है और खलनायक कौन है. वेदों में इंद्र आर्यों का हीरो है. उसके विरोध में जो लोग खड़े हैं वे असुर और राक्षस हैं जिन्हें आजकल मूलनिवासी कहा जाता है. मूलनिवासियों को वैदिक और पौराणिक कथाओं में निहायत गंदे तरीके से दिखाया गया. वे मूलनिवासी लोग यूरेशिया की ओर से आए आक्रमणकारी आर्यों से अपने दरियाओं के पानी, जंगलों और ज़मीन की हिफाज़त कर रहे थे. वे नए दुश्मन का सामना कर रहे थे जो बहुत बर्बर था. कहते हैं कि लगभग 500-600 वर्ष तक चले युद्धों के बाद वे आर्य यहाँ के दरियाओं और उसके आसपास की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गए और हारे हुए लोगों को उन्होंने गुलाम बना लिया जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था. उस जीत का बखान और अपना गौरवगान आर्यों ने वेदों और उसके बाद लिखे अपने ग्रंथों में दर्ज किया. हारे हुए लोगों में मेघवंशी भी थे. वेदों में बताई गई उन कथाओं की पड़ताल करके हमारे अपने समाज के श्री आर.एल. गोत्रा ने एक लंबा आर्टिकल ‘Meghs of India’ शीर्षक से लिखा जिसकी तारीफ़ ताराराम जी भी करते हैं जिन्होंने ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है.

Meghs of India में किया गया अध्ययन बताता है कि आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र के लोग एक ‘वृत्र’ नाम के पुरोहित नरेश के अनुगामी थे या उसके प्रभाव-क्षेत्र में बसे थे. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका प्रभाव था. ऋग्वेद में उसे प्रथम मेघ, अहिमेघ भी कहा गया है. बहुत से मेघवंशी वृत्र को अपना वंशकर्ता मानते हैं. एक जाट नेता मनोज दूहन ने भी कहीं लिखा था कि वृत्र उनका वंशकर्ता है. क्योंकि वृत्र को अहि यानि नागमेघ भी कहा गया इससे पता चलता है कि मेघवंशियों और नागवंशियों का कभी निकट संबंध रहा होगा.

मेघऋषि को लेकर एक समस्या सोशल मीडिया पर उभरी है. लोगों में मेघवंश और मेघवंशी जातियों को लेकर शंकाएँ हैं. हो सकता है यह समस्या नहीं होती अगर हिंदू व्यवस्था के तहत जातियाँ न होतीं. लेकिन हिंदू व्यवस्था (वास्तव में ब्राह्मणीकल व्यवस्था) के लागू होने के कारण वंश या रेस का कई जातियों में बँटवारा हुआ. आज मेघवंश के तहत आने वाली मेघवाल, मेघवार, मेघ आदि जातियाँ निश्चित रूप से जाति के रूप में अलग-अलग हैं. नागवंशी जातियों की भी काफी बड़ी संख्या है.

दूसरी समस्या मेघऋषि की पूजा और उसके नाम पर हाल ही में स्थापित मंदिर हैं. जो लोग सनातनी परंपरा से प्रभावित हैं वे मेघऋषि को पूज्य देव के रूप में स्थापित रहे हैं. अन्य विचारधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे. इस समस्या का समाधान नहीं सुझाया जा सकता. भारतीय संविधान से मशविरा करना पड़ेगा.

इतिहास में लिखे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि आधुनिक इतिहासकारों के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री ने ऐसे राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया है जिनके नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द सरनेम की तरह लगाया जाता था. ‘मेघ’ सरनेम वाले जो राजा थे उनसे पहले और बाद के राजाओं का इतिहास मिला लेकिन ‘Megh’ सरनेम वाले राजाओं का इतिहास नहीं मिला. उनके शासनकाल को अंधकार काल कहा गया. ज़ाहिर है कि परंपरावादी इतिहासकार उन राजाओं के बारे में लिखना ही नहीं चाहते थे. लेकिन आधुनिक और ईमानदार इतिहासकार इस पर और अधिक रोशनी डाल रहे हैं.

अपने पिछोकड़ के बारे में जानना हो तो लोकगीत उसमें मदद करते हैं. अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ समुदाय के अपने लोकगीत नहीं हैं. इसका ज़िक्र डॉ. ध्यान सिंह ने अपने थीसिस में किया है. एक बार श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया था कि हमारे एक लोकगायक राँझाराम हुए हैं जो कथावाचक थे और कई कथाओं के साथ-साथ मेघों की कथा भी सुनाते थे. इसकी पुष्टि कर्नल तिलकराज जी ने भी की. राँझाराम जी मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ते थे. कैसे जोड़ते थे, वो कथा क्या थी उसका रिकार्ड नहीं मिलता. फिलहाल इस बात का इतना महत्व तो है कि मेघों की कथा में सिकंदर है. सैनी और जाट सहित कई समुदाय पोरस को अपना आदमी बताते हैं. और तथ्य यह भी है कि सिकंदर के रास्ते में मेघों की घनी बस्तियाँ थीं. उस युद्ध में मेघों की कोई भूमिका न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता. बाकी आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूँ. अच्छी कल्पना कीजिएगा. प्रसंगवश हमारे कमाल के लोकगायक राँझाराम जो थे वो श्री सुदेश कुमार, आईएएस के पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे.

मेघों के अतीत का एक और महत्वपूर्ण पन्ना है उनका आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण. अब पढ़े-लिखे लोग हँस कर पूछते हैं कि क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे जो हमारा शुद्धिकरण किया गया. पिछले दिनों श्री ताराराम जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक के एक सफ़े की फोटोकापी मुझे भेजी जिस पर ऐसा कुछ लिखा था जो चौंकाने वाला था. लिखने वाला सही था या नहीं, पता नहीं, उसमें लिखा है, “1901 में पहली बार आर्य-भक्त भाइयों ने समाज में आना प्रारंभ किया. उस समय इन मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर एक स्थान पर संध्या-हवन आदि में सम्मिलित होना आश्चर्यजनक था.” मेघों के शुद्धिकरण की बात वहाँ की गई है. इससे एक सवाल तो खड़ा होता है कि क्या शुद्धिकरण से पहले मेघों का धर्म कुछ और था कि उनका हिंदुओं के साथ बैठना आश्चर्यजनक हो गया? इस विषय को एक सवालिया निशान के साथ यहीं छोड़ रहा हूँ. आर्यसमाज ने मेघों की शिक्षा के लिए जो शुरुआती प्रबंध किया उससे मेघों को बहुत फायदा हुआ इसमें शक नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि नैतिकता (Morality) और सभ्य व्यवहार से क्या कोई समुदाय ख़ाली हो सकता है चाहे उसकी पहचान किसी धर्म से न भी हो? क्या नैतिकता सिखाने का हक़ सिर्फ़ धर्म को ही है? मेरा विचार है कि जब हमारे पुरखों को किसी धार्मिक स्थान में जाने नहीं दिया जाता था तो उन्हें नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाता था. हमारे समाज में उन दिनों माताएँ किस धर्म के आधार पर अपने बच्चों को सिखाती थीं कि झूठ मत बोलो, पशु-पक्षियों पर दया करो, दिल में करुणा रखो, बूढ़ों-बुज़ुर्गों की सेवा करो वगैरा वगैरा. वो कौन-सी सभ्यता (civility) थी जो हमारे पुरखों के ख़ून में रची-बसी थी? यहाँ धर्म और सभ्यता को इसलिए अलग-अलग कर के देख रहा हूँ क्योंकि सभ्य व्यवहार धर्म के माध्यम से ही आए यह ज़रूरी नहीं. हमारी पृष्ठभूमि में कोई तो सभ्यता ज़रूर रही होगी जिसने सदियों से हमें सभ्य व्यवहार सिखाया है. थोड़ा याद कीजिए कि क्या हमारे समाज में महिलाओं को सती कर डालने की परंपरा थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ विधवा विवाह की कोई समस्या थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ दहेज हत्याओं की कोई समस्य़ा थी? नहीं. मैंने कई साल पहले पढ़ा था कि मेघ अदालतों में नहीं जाते. वजह थी कि हमारी एक अपनी पंचायत जैसी न्याय प्रणाली थी. कभी सुना नहीं कि उस व्यवस्था के अधीन किसी को क्रूर सज़ा सुनाई गई हो. अगर हुक्कापानी बंद करने की बात छोड़ दें तो मेघ अपनी न्याय प्रणाली से संतुष्ट थे. इन सभी ख़ासियतों को आप ‘मेघ-सभ्यता’ कह सकते हैं. ऐसी ‘मेघ-सभ्यता’ जिसमें इंसानियत सबसे सुंदर रंगों में खड़ी दिखाई देती है.

अब कुछ बेसिक से सवालों पर अपनी राय दे रहा हूँ. क्या मेघऋषि से ही हमारा वंश चला? बच्चा भी कहेगा कि मेघऋषि का भी कोई बाप ज़रूर रहा होगा. हाँ भई ज़रूर रहा होगा. बच्चे की बात में सच्चाई है और उसे मान लेने में भलाई है. वैसे भी मेघऋषि हारे हुए पुरोहित नरेश की कहानी है. आप चाहें तो मेघऋषि के प्रति आँखें मूँद कर चल सकते हैं.

बड़ा मशहूर डायलॉग है कि ‘मेघों में एकता नहीं हो सकती’. यह सच्चाई है कि सियासी पार्टियाँ और धर्म या डेरे बनाने वाले लोग यह काम लोगों में एका लाने के लिए नहीं करते. उन्हें वोट, पैसा और आपकी सेवा चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टियाँ और धर्म-डेरे आपको आपस में बाँट लें. आप जिसके यहाँ जाते हैं उसका ठप्पा या स्टिकर जाने-अनजाने में आप पर लग जाता है. जब ठप्पे और स्टिकर अलग-अलग हो गए तो पहचान अपने आप अलग हो गई और एकता की भैंस भी पानी में चली गई. मेघों के अपने कई छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बने हुए हैं. सभी चौधरी हैं. वे इकट्ठे नहीं हो सकते. चलिए इस बात को एक ही बार में मान लें कि बिरादरी के तौर पर मेघों में एकता नहीं हो सकती. तो क्या कोई दूसरा रास्ता है? हाँ है जिसे अपनाया जाना चाहिए. मेघों में कार्य कर रही सियासी पार्टियों और सामाजिक संगठनों को आपसी कंपिटीशन और गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिएँ. इससे बेहतर रिज़ल्ट निकलेगा और वो मेघ-भगत समाज के लिए लाभकारी होगा. शुभकामनाएँ.

जय मेघ, जय भारत.
भारत भूषण भगत, चंडीगढ़.


(यह आलेख डॉ. शिवदयाल माली द्वारा गठित 'मेघ जागृति मंच' के 21-05-2017 को आयोजित कार्यक्रम के लिए लिखा गया थामैं चाहते हुए भी कारणवश इसमें भाग नहीं ले सकूँगारिकार्ड के लिए इसे यहाँ रख लिया है.)