10 November 2010

Myth of Mahabali (Maveli बलि) - राजा महाबली का मिथ

राजा महाबली - चित्र विकिपीडिया के साभार
राजा बली को केरल में मावेली कहा जाता है. यह संस्कृत शब्द महाबली का तद्भव रूप है. इसे कालांतर में बलि लिखा गया जिसकी वर्तनी सही नहीं जान पड़ती.  राजा बली की कथा एक अनवरत कथा है जिसका जवाब नहीं. दो दिन पहले दीपावली के अवसर पर श्री आर.पी. सिंह ने शुभकामनाएँ देते हुए बताया कि दैनिक भास्कर में राजा बली के बारे में लेख छपा है और कि दीपावली का त्यौहार मनाने का एक कारण राजा बली की कथा में भी निहित है. राखी का त्योहार भी लक्ष्मी द्वारा महाबली को राखी बाँधने से जोड़ा गया है. इंटरनेट को धन्यवाद कि ज़रा खोज करने पर संदर्भ मिल गए जिन्हें आपसे साझा कर रहा हूँ. पहले स्पष्ट करना आवश्यक है कि पौराणिक कथाओं को कभी भी इतिहास नहीं माना गया है. अतः इन्हें हर कोई किसी भी तरह से व्याख्यायित करता है जैसा कि नीचे दी गई कथाओं से भी स्पष्ट है. पौराणिक पात्र संभव है कि संकेतात्मक रहे हों. संभव है किसी काल विशेष की कुछ वास्तविक घटनाओं के साथ उनका घालमेल किया गया हो. लोक में प्रचलित परंपराओं और किंवदंतियों को इन कथाओं के साथ मिला कर देखने से कई बार उनका एक विशेष अर्थ भी निकलने लगता है. देश भर में कई ऐसे समुदाय हैं जो राजा बली के राज्य में प्रजाओं की सुख-समृद्धि को स्मरण करते हैं और राजा बली के लौटने की कामना करते हैं. कुछ समुदाय राजा बली को अहंकारी आदि कहते हैं लेकिन उसके दानवीर, न्यायाप्रिय होने जैसे गुणों को स्वीकार भी करते हैं. कई स्थानों पर उल्लेख है कि केवल महाबली के प्रति ईर्ष्या के कारण ही उसे पाताल (दक्षिण) में धकेल दिया गया या क्रूरतापूर्वक मार डाला गया. हाँ उसके राज्य को दान में हथिया लेने की कथा खूब प्रचलित है. कई कथाओं में यह राजा महाबली (या मावेली) इंद्र और अन्य देवताओं पर इक्कीस पड़ता दिखाई पड़ता है तो अन्य कथाओं में विष्णु और वामन से वह अपनी दानी प्रकृति के कारण पराजित होता भी दिखता है. केरल में मनाया जाने वाला विश्वप्रसिद्ध ओणम त्योहार महाबली की स्मृति में मनाया जाता है. यहाँ यह बता देना ठीक रहेगा कि प्रसिद्ध पौराणिक पात्र वृत्र (प्रथम मेघ) के वंशज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था. प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का पुत्र महाबली था. इनकी वंशावली की विस्तृत जानकारी मेघवाल आलेख से मिल सकती है. नीचे दी गई कथाओं को सभी ने अपने-अपने तरीके से लिखा है.

पहली कथा
दानवीर राजा बलि का प्रताप सभी लोकों में फैल गया. उन्होंने अपने कारागार में लक्ष्मीजी तथा अन्य देवी-देवताओं को कैद कर लिया. धन-संपत्ति और संसाधनों के अभाव में पृथ्वी पर हाहाकार मच गया. तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और राजा बलि के पास दान प्राप्त करने पहुंचे. वामन ने तीन पग धरती मांगी.  बलि ने उन्हें तीन पग धरती नापने को कहा. तब वामन ने विराट रूप धारण कर लिया. उन्होंने अपने तीन पग में तीन लोकों को नाप लिया. बलि को पाताल लोक में स्थान मिला. लक्ष्मी और अन्य देवगण कारागार से मुक्त होकर क्षीरसागर पहुंचे और वहीं शयन किया. इसी उपलक्ष्य में दीपपर्व मनाया जाता है. पूरी कथा यहाँ पढ़ें- दैनिक भास्कर 04 नवंबर 2010
(साधारण अर्थ- तीन पग नापने का अर्थ यहाँ सब कुछ दान में ले लेना, छीनना या ठगना है.)

दूसरी कथा
भैयादूज व राजा बलि- जब राजा बलि को पाताल में भेजा था, तब वामन ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वह पाताल में राजा बलि का पहरेदार बना कर रहेगा. अतः उसे भी पाताल जाना पड़ा. भैया दूज के दिन लक्ष्मी जी ने एक ग़रीब औरत का वेष बनाकर राजा बलि से भाई बनने का आग्रह किया. जिसे बलि ने स्वीकार कर लिया. लक्ष्मी जी ने बलि को तिलक लगाकर पूजा की और लक्ष्मी जी ने बलि से भगवान विष्णु को आज़ाद करने का वरदान मांगा. पूरी कथा यहाँ पढ़ें- दैनिक भास्कर अक्टूबर 19, 2009


तीसरी कथा
पौराणिक कथा में राजा बलि ने भगवान विष्णु से पाताल लोक को अपने राज्य के रूप में प्राप्त किया था. भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर राजा बलि से वर मांगने के लिए कहा. राजा बलि ने भगवान से अपने राज्य का रक्षक बनने की स्वीकृति प्राप्त की. बैकुंठ त्यागकर राजा बलि के पाताल लोक में विष्णु जी के नौकरी किए जाने से लक्ष्मीजी बेहद नाराज़ हुईं. कुछ समय पश्चात लक्ष्मीजी ने राजा बलि के यहां पहुंचकर उनका विश्वास प्राप्त किया. तत्पश्चात राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर लक्ष्मीजी ने बहन का पद प्राप्त किया और राजा बलि से भाई के सम्बंध स्थापित होने पर भगवान विष्णु की सेवानिवृत्ति तथा स्वतंत्रता को वापस ले लिया. पूरी कथा यहाँ पढ़ें-  दैनिक भास्कर 27 अगस्त, 2010
(साधारण अर्थ- राजा बली अपनी प्रजा की रक्षा चाहते थे.)

चौथी कथा
जब भगवान विष्णु ने महाबली से तीन पग धरती मांगकर तीनों लोकों को नाप लिया तो राजा बली ने उनसे प्रार्थना की कि आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली है, इसलिए जो व्यक्ति मेरे राज्य में चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए दीपदान करे, उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का पर्व मनाए, उनके घर को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें.
पूरी कथा यहाँ पढ़ें- दैनिक भास्कर 03 नवंबर, 2010
(साधारण अर्थ- कुछ रोचक और भयानक बिंब कथा में जोड़े गए हैं. इसका दूसरा अर्थ महाबली का अपनी प्रजा या संबंधियों को यात्नाओं से बचाना भी हो सकता है.)

पाँचवीं कथा
ब्राम्हण समाज दल्लीराजहरा के तत्वाधान में आयोजित 9 दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ के छठवें दिन प्रवचनकर्ता पं. अखिलेश्वरानंद महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भगवान वामन रूप और राजा बलि की कथा में बताया कि बलि इंद्रासन में बैठकर अपने आपको सबसे बड़ा दानी मानता था. भगवान ने उसकी दान वीरता के गर्व को हरण करने के लिए वामन रूप में बलि के यज्ञ में गए. राजा बलि ने कहा, आप कुछ दान ले लीजिए. वामन ने कहा, मुझे दान की आवश्यकता नहीं. इस पर बलि ने कुछ न कुछ भेंट लेने के लिए कहा. इस पर वामन ने तीन पग भूमि दान में मांगी. बलि भूमि देने के लिए तैयार हो गए.

वामन ने अपने शरीर का आकार बढ़ाया और एक ही पग में पूरी पृथ्वी को नाप ली, दूसरे पग में स्वर्ग. वामन ने कहा कि अब मैं तीसरा पग कहां रखूं, इस पर बलि ने कहा कि तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख लीजिए. बलि की ऐसी बातों को सुनकर वामन बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि बलि वास्तव में तुम बहुत चतुर हो. मेरा पैर तुम्हारे सिर पर पड़ गया तो तुम्हारी सात्विक जीव मुक्त हो जाएगी. अब जबकि मेरे पैर तुम्हारे सिर पर पडेंगे तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा. पूरी कथा यहाँ पढ़ें- दैनिक भास्कर 24 फरवरी, 2010
(इस कथा के अनुसार महाबली (जिन्हें असुर, दैत्य, आदि भी कहा जाता है) यज्ञ करते थे. यह मेरे लिए नई बात है. इस कथा के कहने की शैली से स्पष्ट है कि मिथ को अपने अंदाज़ में रोचक बना कर कहने की कोशिश की गई है.)

छठी कथा
राजा बलि जब सौंवा अश्वमेध यज्ञ करने लगे तो इन्द्र सहित देवताओं ने भगवान की शरण ग्रहण करते हुए कहा कि भगवान राजा बलि स्वर्ग के इन्द्र सहित देवताओं को स्वर्ग से असमय च्युत करना चाहता है. हे देव आप ही रक्षा कर सकते हैं. श्रीहरि (विष्णु) वामन रूप धारण करके यज्ञस्थल पहुंचे तो गुरु शंकराचार्य (संभवतः यहाँ शुक्राचार्य होना चाहिए) ने राजा बली को बता दिया था कि तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है.  परंतु राजा बली ने तीन कदम जमीन के दान का संकल्प कर दिया. वामन ने विशाल रूप बनाकर पूरा ब्रह्माण्ड दो कदम में नाप लिया. पूरी कथा यहाँ पढ़ें-  दैनिक भास्कर 23 मई, 2010
(यहाँ भी कथा को रोचक बनाने की कोशिश है. पौराणिक कथाओं में इसी प्रकार से परिवर्तन होते रहे हैं. संभव है उनका मूल रूप ही पूरी तरह से बदल दिया गया हो.)

अन्य समाचार जो दिखे
1. दानवीर राजा बलि के मंदिर पर एक शाम दानवीर राजा बलि के नाम भजन संध्या का आयोजन सरगरा समाज नवयुवक मंडल के तत्वावधान में आयोजित किया गया.  दैनिक भास्कर 26 सितंबर, 2010
2. सरगरा समाज के आराध्य देव राजा बलि के दर्शनार्थ कस्बे से दर्शनार्थियों का दल बुधवार को पीचियाक रवाना हुआ. दल में 35 से अधिक लोग शामिल हैं, जो पीचियाक पहुंचकर वहां राजा बलि के मंदिर में आयोजित धार्मिक समारोह में भाग लेंगे. रवानगी के अवसर पर वातावरण राजा बलि के जयकारों से गूंज उठा. दल के सदस्यों को ढोल-नगाड़ों के साथ रवाना किया गया. दैनिक भास्कर 23 सितंबर, 2010


मिथ से संबंधित बहुत सी जानकारी पढ़ी जा चुकी है. ऊपर दिए अन्य समाचारों के अंतर्गत नज़र आने वाले लोगों के बारे में यदि जानकारी न ली जाए तो बात अधूरी रह जाएगी. इसमें मेघवाल आलेख के संदर्भ, पौराणिक और ऐतिहासिक संकेत सहायक हो सकते हैं. मोटे तौर पर वृत्र या मेघ ऋषि के वंशजों को मेघवंशी कहा जाता हैं. मेघवाल आलेख में उल्लिखित संदर्भों के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि पौराणिक कथाओं में जिन मानव समूहों को असुर, दैत्य, राक्षस, नाग, आदि कहा गया वे सिंधु घाटी सभ्यता के मूल निवासी थे और मेघवंशी थे. आर्यों और अन्य के साथ पृथ्वी (भूमि) पर अधिकार हेतु संघर्ष में वे पराजित हुए और सदियों तक दासता की अमानवीय स्थितियों में रहे. इनके कुचले हुए शरीर और मन स्पष्ट दिखाई देते हैं जिन्हें निम्न होने के लक्षण कहा जाता है. ये धन, अन्न, भूमि, शिक्षा आदि से सदियों वंचित रहे. आज इन्हें अनुसूचित जातियों, जन जातियों और पिछड़ी जातियों (SCs, STs and OBCs) के रूप में जाना जाता है. ये अपने अधिकारों के प्रति संघर्षशील न रहे हों ऐसा भी नहीं है. इनके घर और बस्तियाँ बार-बार तबाह की गईं. जब-जब इनके या इनके पक्ष के किसी साहित्य, इतिहास, धर्म आदि ने रूप ग्रहण किया उसे नष्ट कर दिया गया या भ्रष्ट कर दिया गया. आज इनका कोई इतिहास उपलब्ध नहीं क्योंकि इतिहास विजेता ही लिखवाता है.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इनकी हालत कुछ सुधरी है. सामाजिक वातावरण बदला है. परंतु नई अर्थव्यवस्था में ये केवल अति सस्ता श्रम बन कर ही न रह जाएँ इसलिए इनकी शिक्षा का प्रबंध सरकार का सामाजिक दायित्व है.

एक विद्वान के अनुसार तीन कदमों से तीनों लोकों को नापने का एक अर्थ यह भी है कि राजा बली को धोखे से मार कर ब्राह्मणों ने शिक्षा, अर्थतंत्र और राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया.

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10 comments:

  1. बहुत ही विस्तृत सुन्दर शोध पात्र बन गया. हमने महामेघ वाहन का कहीं उल्लेख देखा है. संभवतः कलिंग के महा प्रतापी राजा खारवेल (२री सदी ईसा पूर्व) इसी वंश का था. पुरानों में एक मघ वंश का भी उल्लेख है. क्या इनमे कोई समानता हो सकती है.

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  2. आदरणीय भाई साहब, सबसे पहले मेरा अभिवादन और धन्यवाद स्वीकार करें. आपकी पैनी दृष्टि ने खारवेल को ढूँढ लिया. वे मेघवंशी थे. आप सही कर रहे हैं. पुराणों में मेघवंश का उल्लेख है. लॉर्ड कन्निंघम ने अपनी पुस्तक 'ऑर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया' में इस वंश का उल्लेख किया है और इसे सिंधु घाटी सभ्यता के साथ जोड़ा है. उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद.

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  3. इस विस्तृत जानकारी के लिए आभार।

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  4. Very good information for the Meghvanshis. In the form of King Mahabali we have a shining sun in mythology. There may be many more. They need to be identified. There story needs to be rewritten.

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  5. Respected Bharat Bhushan Meghji,

    Thank you for presenting comparative myth stories of Raja Bali prevalent in annals of Brahminical history. One thing is for sure that Raja Bali was a strong ruler and it was not possible for anyone to defeat him in battlefield. The so-called Vishnu Avtara ‘Vaman’ was able to defeat Great Raja Bali (Maveli) by treachery and betrayal of trust taking advantage of his innocence, pure heart and customary belief of kindredness.

    These human qualities of pure heart, kindness, compassion, etc. are legacy of our forefathers i.e. our ancient Kings. Whereas, the brahmincal history, written by Aryan race for their Gods and Kings, is full of inequality, betrayal and coercion. Though, the history written by Aryans in their mythological Puranas have tried their level best to tarnish exemplary Rule of Raja Bali but the people at large fully admires his compassion that a mighty ruler renounced his entire kingdom on a word of tongue (vachan) considering the fact that his Guru Sukracharya has warned him not to obey folded hand request of Vaman.

    I feel myself proud to be born in Meghwar community, whose forefathers are Raja Bali, Meghrishi, Kharvel Kings, etc.

    Thanks again for sharing glorious history of our forefathers, which boosts up our morale and imbibes a belief that once we were rulers of this country and we must regain our lost rule.

    With respect,

    Navin K. Bhoiya
    Hon. Secretary
    All India Maheshwari Meghwar Youth Federation
    (www.maheshpanthi.net)

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  6. राजा महाबली के मिथ का पौराणिक आख्यानों में उनकी पंरपराओं का जिक्र करके उनमें से अलिखित इतिहास के लुप्त सूत्रों और कड़ियों की तलाश, उन तथ्यों की मौजूदगी के प्रति जागृति फ़ैलाने के सराहनीय प्रयास के लिए धन्यवाद. इससे सिेंधु घाटी के निवासियों की धुंधली तस्वीर पर कुछ रोशनी पड़ सके, जिन्होंने प्राचीन विश्व के तत्कालीन विकसित सभ्यताओं के तुल्य सभ्यता का निर्माण किया और इतिहास के पन्नों से ऐसे गायब हो गए मानों कभी उनका कोई अस्तित्व ही न था. और आज भी उस सभ्यता का जिक्र लुप्त सभ्यता की भांति किया जाता है. इस विषय में विस्तृ्त जानकारी के लिए आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  7. To dear BHUSANJI,
    Thanks for presentig nice article on raja Bali,
    we proud that we are progeny of Raja Bali and MEGH RISHI,we are the original Indian in indu valley civilization,

    Dr Nitin Jamangar gujarat india

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  8. जब कथा है तो उसका कोई न कोई सूत्र भी रहा होगा। भारतीयों में कई संकेत कथाओं में छुपे होते थे ये सब जानते हैं। कथा की शैली में ही शिक्षा देने का तरीका भी यहां प्रचलित था। महाप्रतापी बलि की संकेत भी मिलता है कि आर्य और अनार्य के बीच संघर्ष टल गया था और समझौता हो गया था। बाद में हर युद्ध नीति और अनीति के बीच हुआ था। त्रेतायुग आते-आते दोनो ही दलों में रिश्ते कायम होने लगे और जंग अच्छे औऱ बुरे के बीच होने लगी। जैसा कि भगवान राम और रावण का युद्ध है। रावण वंशबेल में आर्य था, पर उसने राक्षस कही जाने वाली जाति का नेतु्त्व किया। इसलिए अपनी पौराणिक कथाओं को मात्र कथा कहकर उस पर ध्यान न देने की जो परंपरा विकसित हो गई है मैं उसका सख्त विरोधी हूं। आपने एक अच्छा प्रयास किया है सभी कथाओं को एक साथ प्रस्तुत करके। ये कथाएं हेरफेर के साथ हर जगह लगभग समान है।

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  9. @ रोहित जी, आपकी टिप्पणी महत्पूर्ण है. अनार्य और आर्य दोनों रावण को अपना मानते हैं. क्योंकि उसे असुरों की श्रेणी में भी रखा गया है. इसीलिए मैं पौराणिक कथाओं को मात्र कथा की भाँति देखना चाहता हूँ. परंतु जब इनका प्रयोग ग़रीब-ग़ुरबे के दोहन के लिए होते देखता हूँ तो आज के संदर्भ में इनके मानवीय दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न अवश्य लगा देखता हूँ. इनमें बहुत से प्रक्षिप्त अंश हैं जो इनके विभिन्न पाठों से परिलक्षित होते हैं.

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  10. Mr. R.L. Gottra has sent following comments through e-mail dt.17-11-2010

    "Particularly during the primitive times, it has been observed that the ruling classes created such myths, which suited their objectives. However, in order to know the truth one has to examine & re-examine the things with the process of check & double-check and use imagination, alongwith the power of thought to reach the truthfulness. For that purpose education and awareness is necessary & it was blocked, thereby leading to raising the walls of ignorance leading our country to darkness."
    Thanks Mr Gottra.

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