"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


25 August 2020

The History of Madra and Meghs: Dr Naval Viyogi - मद्रों और मेघों का इतिहास: डॉ नवल वियोगी

आज से लगभग 7 वर्ष पहले श्री गिरधारी लाल डोगरा (जी.एल. भगत), आईआरएस (आज सेवानिवृत्त इनकमटैक्स कमिश्नर) ने बताया था कि मेघ समुदाय पर स्वनामधन्य इतिहासकार नवल वियोगी जी ने एक पुस्तक पर कार्य किया है. तब से एक उत्सुकता बनी हुई थी. फिर 18 अक्तूबर 2019 को जब ताराराम जी चंडीगढ़ आए तब उन्होंने भी उक्त पुस्तक का उल्लेख किया. उसी दिन वियोगी जी की पत्नी श्रीमती उषा वियोगी से फोन पर जानकारी ली. उन्होंने पुष्टि की कि एक पुस्तक प्रकाशनाधीन है. 15 अगस्त 2020 को ताराराम जी ने बताया कि सम्यक प्रकाशन, दिल्ली ने वियोगी जी की पुस्तक ‘मद्र और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास’ नामक पुस्तक का प्रकाशन कर दिया है. ऑर्डर प्लेस कर दिया. तीसरे दिन से ही दिल को इंतज़ार था कि पुस्तक कब मिलेगी. कल 24 अगस्त को पुस्तक मिल गई. दिल को ऐसे आराम मिला जैसे कोई नज़दीकी रिश्तेदार मिला हो. 

पुस्तक के तीसरे पन्ने पर पुस्तक के शीर्षक के नीचे कोष्ठकों में लिखा है: ‘(मेघ तथा ब्राह्मणों की समान उत्पत्ति का इतिहास)’. पाँचवें पन्ने पर पुस्तक के लिए ‘दो शब्द’ लिखने की परंपरा का निर्वाह श्री गिरधारी लाल डोगरा जी की कलम से ही हुआ और आगे वियोगी जी का लेखकीय प्राक्कथन है. आज इन दो पर ही अपनी बात लिख रहा हूँ. अपनी दिनांक 20 फरवरी 2013 की टिप्पणी में श्री गिरधारी लाल डोगरा ने इस बात पर मलाल व्यक्त किया है कि निम्न जातियों के इतिहास का सृजन ब्राह्मणवादी विचारधारा के इतिहासकार नहीं कर रहे हैं. (संभवतः यह जातीय श्रेष्ठता में अपना स्थान ऊपर बनाए रखने की कवायद है.) वे इतिहासकार तब चिंतित हुए जब पुरातत्वविदों ने सिंधु घाटी के शहरों का इतिहास बताया कि वो प्राचीन सभ्यता आदिवासी यानि कथित निम्न जातियों के पूर्वजों की थी. परिणामतः इतिहासकार दो भागों में बँटे दिखे लेकिन निष्पक्ष इतिहास लेखन की दिशा में प्रगति अभी भी बाकी है. (कृपया तिथि याद रखें कि यह बात 20-02-2013 को लिखी गई थी.) 

श्री डोगरा बताते हैं कि डॉ वियोगी ने निर्भीक होकर आदिवासियों के इतिहास को प्रकाश में ला खड़ा किया है. डोगरा जी इस बात को रेखांकित करते है कि ब्राह्मणों और मेघों की उत्पत्ति एक ही है और कि मेघों के पूर्वजों -- मद्र, चेदी, बृहद्रथ, खारवेल, मेघ, महामेघ -- ने उत्तर से दक्षिण भारत तक के बड़े इलाके में बहुत समय तक शासन किया. 

डॉक्टर नवल ने अपना प्राक्कथन इसी कथन के साथ शुरू किया है कि यदि ‘भारत के ब्राह्मणवादी सोच वाले इतिहासकारों को कहा जाए कि वे नए सिरे से ब्रिटेन का इतिहास लिखें, तो अवश्य ही वहाँ जातिवाद और जातियों की तलाश कर लेंगे’ क्योंकि जाति के अतिरिक्त उन्हें कुछ सूझता नहीं. प्राचीन भारत का इतिहास लिखते हुए भी उनकी यही सोच कार्य कर रही थी. जिस प्राचीन समाज में जाति को कोई जानता तक नहीं था वहां भी जातियों की तलाश की गई. इतिहासकारों को यह बताने में संकोच भी होता है कि वे स्वयं किस जाति से हैं. इस तरह उन्होंने उच्च जातियों की धार्मिक भावनाओं  को ठेस पहुंचने से बचाया है तो दूसरी ओर अन्य जातियों को दोयम दर्जे पर रखा जो उनकी एक कूटनीतिक चाल रही. वे बताते हैं कि हिंदुओं के सर्वोच्च आराध्य देव श्री राम का मूल संबंध गौतम बुद्ध के वंश यानी इक्ष्वाकु अथवा शाक्य वंश से था. उनके उत्तराधिकारी माली अथवा कुर्मी हैं. वे तक्षक नाग वंश से संबंधित थे. इसी सोच ने पठानिया तथा मेघ राजवंश की आपसी पहचान  नहीं बनने दी. इस विषय में भी चुप्पी साधी गई और राष्ट्र नहीं जान पाया कि उक्त दोनों राजवंशों का रिश्ता आज के मेघ और डूम जैसी जातियों के साथ है. इन दोनों वर्गों को चौथे वर्ग में धकेल देने का काम उन्होंने किया सिर्फ यह बता कर की ये मांस खाते थे. मांस तो अन्य जातियों के लोग भी खाते थे. 

ऐसे विकृत इतिहास का शिकार रहे मेघवंश के लोगों ने स्वयं मेघ वंश का इतिहास लिखने  का कार्य अपने हाथों में लिया. यहां नवल जी ने ताराराम जी के नाम का उल्लेख किया है जिन्होंने ‘मेघवंश: इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है. 

डॉ नवल बताते हैं कि उनकी इस प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के पीछे प्रेरणा का स्रोत श्री जी.एल. भगत (आईआर एस) रहे जो उच्च अधिकारी रहे और विद्वान लेखक भी हैं. नवल जी ने उल्लेख किया है की मग या कश्यप या कनौजिया ब्राह्मणों के साथ मेघ समाज का संबंध है और उनकी मूल उत्पत्ति अलग नहीं है. यहां उन्होंने डॉ राधा उपाध्याय का उल्लेख किया है जिन्होंने ‘विभिन्न ब्राह्मण परिवारों का संरचनात्मक और प्रसारात्मक अध्ययन’ नामक विषय पर शोध कार्य किया और पीएचडी की डिग्री हासिल की. उनके शोध कार्य का कुछ इस्तेमाल नवल जी ने इस पुस्तक के पांचवें अध्याय में किया है. 

नवल जी ने अपने विषय के दूसरे भाग यानी मेघों के आधुनिक इतिहास का उल्लेख करते हुए डॉ ध्यान सिंह का विशेष रूप से उल्लेख किया है जिनका प्रसिद्ध शोध ग्रंथ ‘पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास’ विषय पर था. इस शोध कार्य का उपयोग नवल जी ने आठवें अध्याय में किया है.

पुस्तक मंगवाने के लिए कृपया सम्यक प्रकाशन से निम्नलिखित मेबाइल पर संपर्क करें-

9810249452

3 comments:

  1. इतिहास को खोज और दस्तावेज केरूप में उसको संजोना एक दुष्कर कार्य है ... इसे बाखूबी किया जा रहा है कुछ मनीषियों द्वारा ... अच्छा प्रयास ... सार्थक प्रयास ...

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  2. आज मुझे भी यह पुस्तक प्राप्त हो गयी। विषयवस्तु देखने से लगता है कि यह एक प्रामाणिक दस्तावेज है। पुस्तक पठनीय व ज्ञानवर्धक अवश्य होगी। शेष पढ़ने पर

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  3. श्रेष्ठता की होड़ की विकृत मानसिकता को उजागर करने हेतु आज ऐसी ही शोध परक प्रमाणों की आवश्यकता है । वियोगी जी इस कार्य के लिए हार्दिक आभार ।

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